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Saturday, 3 January, 2026
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यूपी में SIR की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से BJP चिंतित, अब शहरी मजबूत इलाकों में नए वोटर जोड़ने पर फोकस

दिप्रिंट द्वारा देखे गए अस्थायी आंकड़ों से पता चलता है कि कुल मतदाताओं में से 18.7% नाम सूची से हटाए जा सकते हैं. लखनऊ में सबसे ज्यादा वोटर हटाए गए, इसके बाद गाजियाबाद, कानपुर, मेरठ और प्रयागराज का नंबर है.

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को चौंका दिया है. अस्थायी आंकड़ों के मुताबिक, करीब 2.89 करोड़ नाम, यानी कुल मतदाताओं का 18.7 प्रतिशत, वोटर लिस्ट से हटाया जा सकता है. इनमें से कई नाम बीजेपी के मजबूत इलाकों से हैं.

वहीं दूसरी ओर, अल्पसंख्यक बहुल जिलों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान कम नाम हटाए गए हैं. SIR का उद्देश्य वोटर लिस्ट को साफ करना है, जिसमें अपात्र और दोहराए गए वोटरों के नाम हटाए जाते हैं.

दिप्रिंट द्वारा देखे गए अस्थायी आंकड़ों के अनुसार, लखनऊ में सबसे ज्यादा वोटर हटाए गए हैं. यहां करीब 30 प्रतिशत मतदाता, यानी लगभग 12 लाख वोटरों के नाम सूची से हटाए गए हैं.

इसके बाद गाजियाबाद में 28.83 प्रतिशत (8.18 लाख), कानपुर नगर में 25.50 प्रतिशत (9 लाख), मेरठ में 24.66 प्रतिशत (6.65 लाख), प्रयागराज में 24.64 प्रतिशत (11.56 लाख), गौतम बुद्ध नगर में 23.94 प्रतिशत (4.47 लाख) और आगरा में 23.25 प्रतिशत (8.36 लाख) वोटरों के नाम हटाए गए हैं.

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ये जिले बीजेपी के मजबूत गढ़ माने जाते हैं, जहां या तो पार्टी के सांसद हैं या सबसे ज्यादा विधायक बीजेपी के हैं.

इसके उलट, मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जैसे अल्पसंख्यक बहुल जिलों में अपेक्षाकृत ज्यादा वोटर डिलीशन नहीं हुआ है. 2011 की जनगणना के अनुसार, इन जिलों में मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत से ज्यादा है.

इन जिलों में रामपुर सबसे ऊपर है, जहां 18.29 प्रतिशत यानी 3.21 लाख वोटरों के नाम हटाए गए हैं. इसके बाद सहारनपुर में 16.37 प्रतिशत (4.32 लाख), मुजफ्फरनगर में 16.29 प्रतिशत (3.44 लाख), मुरादाबाद में 15.76 प्रतिशत (3.87 लाख) और बिजनौर में 15.53 प्रतिशत (4.27 लाख) वोटरों के नाम हटाए गए हैं.

चुनाव आयोग के सूत्रों ने बताया कि इन वोटरों के नाम इसलिए हटाने के लिए चिन्हित किए गए हैं, क्योंकि रिवीजन प्रक्रिया के दौरान उनके गणना फॉर्म “अनकलेक्टेड” यानी एकत्र नहीं किए गए के रूप में दर्ज किए गए थे. आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी पता चलता है कि ज्यादातर शहरी जिलों में ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा नाम हटाए जा रहे हैं.

जिन लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें 1 जनवरी से इन हटाए गए नामों को चुनौती देने का मौका मिलेगा.

ड्राफ्ट वोटर लिस्ट का प्रकाशन 31 दिसंबर से बढ़ाकर 6 जनवरी 2026 कर दिया गया है.

सत्तारूढ़ पार्टी में तनाव

हालांकि, फाइनल वोटर लिस्ट 6 मार्च को जारी होने की संभावना है, लेकिन करीब 12.55 करोड़ वोटरों वाली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होने से ही बीजेपी के भीतर तनाव बढ़ गया है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 14 दिसंबर को इस मुद्दे को उठाया था, जब उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि उत्तर प्रदेश की आबादी करीब 25 करोड़ है, ऐसे में लगभग 65 प्रतिशत लोगों को वोट देने का हक होना चाहिए.

उन्होंने कहा, “इस हिसाब से वोटरों की संख्या करीब 16 करोड़ होनी चाहिए, लेकिन SIR में अब तक सिर्फ करीब 12 करोड़ वोटर ही शामिल हुए हैं. इसका मतलब है कि करीब चार करोड़ पात्र वोटरों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं, और इनमें से 85-90 प्रतिशत ‘हमारे’ हैं.”

योगी के बयान के बाद, नए नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से चल रही SIR प्रक्रिया पर ध्यान देने को कहा, लेकिन बीजेपी के अंदर चिंता बनी हुई है, क्योंकि 18.7 प्रतिशत वोटरों को हटाने के लिए चिन्हित किया गया है.

बीजेपी पदाधिकारियों को चिंता है कि पार्टी के मजबूत माने जाने वाले इलाकों में, कमज़ोर सीटों की तुलना में ज्यादा वोटरों के नाम हटाए जा रहे हैं.

यूपी बीजेपी इकाई के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “अगर हम इस डेटा को अभी सही मान लें, तो यह एक चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में वोटर लिस्ट से ज्यादा नाम नहीं हटाए गए हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “दूसरी ओर, लखनऊ और गाजियाबाद जैसे बड़े शहरी केंद्रों में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए हैं. हमें इस डेटा की समीक्षा करनी होगी और लोगों को फॉर्म-6 के बारे में बताकर इन इलाकों में नए वोटर जोड़ने का काम शुरू करना होगा.”

फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए वोटर पंजीकरण के लिए किया जाता है. जिन लोगों के नाम छूट गए हैं, वे ज़रूरी दस्तावेज देकर फॉर्म-6 भर सकते हैं और नए वोटर बन सकते हैं.

वहीं, बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष विजय बहादुर पाठक का मानना है कि पार्टी के पास इस मुद्दे से निपटने के लिए अभी पर्याप्त समय है.

उन्होंने कहा, “फिलहाल हमारा फोकस उन इलाकों में नए वोटर जोड़ने पर होगा, जहां नाम हटने की संभावना ज्यादा है. इसके अलावा, चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को एक बार फिर अपडेट किया जाएगा और हम उस प्रक्रिया पर भी ध्यान देंगे.”

उन्होंने आगे कहा, “इस समय बड़े शहरी इलाकों में रहने वाले कई लोग अपने ग्रामीण पते से वोट देना पसंद करते हैं, इसी वजह से उनके नाम ‘डिलीशन’ कैटेगरी में दिख रहे हैं. यह एक सामान्य प्रक्रिया है और बहुत चौंकाने वाली नहीं है, लेकिन हमें नए वोटर जोड़ने पर ध्यान देना होगा.”

दूसरी ओर, SIR प्रक्रिया का विरोध कर रही समाजवादी पार्टी अंदरूनी तौर पर आत्मविश्वास में दिख रही है, क्योंकि जिन जिलों में सबसे ज्यादा नाम हटाए जा रहे हैं, उन्हें पार्टी का मजबूत गढ़ नहीं माना जाता. इसके अलावा, पार्टी ने पहली बार पूरे राज्य में 1.5 लाख से ज्यादा बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) नियुक्त किए हैं.

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता फक्रुल हसन चांद ने दिप्रिंट से कहा, “ ‘अनकलेक्टेबल फॉर्म’ या ‘हटाए जाने की संभावना वाले’ फॉर्म का प्रतिशत बहुत ज्यादा है और हमने अपने कार्यकर्ताओं को SIR के बारे में पूरी तरह जागरूक करने की कोशिश की है. हालांकि, प्रक्रिया थोड़ी परेशान करने वाली है, लेकिन इससे हमें संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में मदद मिली है. अब हर बूथ पर हमारे कार्यकर्ता हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “पहले हमें रिपोर्ट मिली थी कि SIR के दौरान अल्पसंख्यक इलाकों में दिक्कतें आ सकती हैं, लेकिन जागरूकता शिविरों के बाद हमने देखा कि इन इलाकों के लोगों ने इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लिया है. अब हमें बीजेपी के आगे के कदमों से सावधान रहना होगा.”

लखनऊ के गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में सहायक प्रोफेसर और यूपी आधारित राजनीतिक विश्लेषक डॉ. शिल्प शिखा सिंह के अनुसार, मीडिया रिपोर्ट्स में कुल वोटरों के करीब 18.7 प्रतिशत नाम हटाए जाने की संभावना की बात सभी राजनीतिक दलों के लिए चौंकाने वाली है.

हालांकि, उन्होंने कहा कि अगर इन हटाए गए नामों का बड़ा हिस्सा शहरी इलाकों से है, तो इससे सत्तारूढ़ पार्टी पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि परंपरागत रूप से शहरों में उसकी स्थिति मजबूत रही है.

उन्होंने कहा, “चाहे लखनऊ हो, गाजियाबाद हो या मेरठ, इन जगहों पर चुनावी समीकरण आमतौर पर बीजेपी के पक्ष में माने जाते हैं. दूसरी ओर, मुरादाबाद, सहारनपुर और रामपुर जैसी सीटें आमतौर पर समाजवादी पार्टी के पक्ष में मानी जाती हैं, लेकिन साफ तस्वीर के लिए हमें 6 मार्च तक इंतजार करना चाहिए, जब अंतिम सूची जारी होगी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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