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Tuesday, 18 June, 2024
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‘बातचीत में सहानुभूति रखें, टकराव से बचें’: 2022 के लिए BJP ने यूपी के किसानों का भरोसा जीतने की रणनीति बनाई

पिछले महीने मुजफ्फरनगर में संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा आयोजित 'महापंचायत' में किसानों ने अपना प्रदर्शन तेज करने की कसम खाई थी, और इनमें से कई लोगों ने अगले साल के यूपी चुनावों में भाजपा को हराने का भी आह्वान किया था.

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नई दिल्ली: पिछले हफ्ते सिंघू बॉर्डर पर एक दलित सिख की हत्या फ़िलहाल कुछ समय के लिए किसानों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के मुद्दे पर भारी पड़ सकती है, लेकिन भाजपा को डर है कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए नए कृषि कानूनों के खिलाफ कई महीनों से व्याप्त असंतोष का अगले साल होने वाले यूपी चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.

पिछले महीने मुजफ्फरनगर में संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा आयोजित ‘महापंचायत’ में किसानों ने न सिर्फ अपना प्रदर्शन तेज करने की कसम खाई थी, बल्कि इनमें से कई लोगों ने अगले साल के यूपी चुनावों में भाजपा को हराने का भी आह्वान किया था. महापंचायत में मौजूद गन्ना किसानों ने भी गन्ने की कीमतों में आये ठहराव को लेकर यूपी सरकार के खिलाफ नाराजगी जताई थी.

असंतुष्ट किसानों को शांत करने और लुभाने की आशा से, भाजपा ने अपने सभी सांसदों, विधायकों और जिला प्रतिनिधियों सहित यूपी- विशेष रूप से पश्चिमी यूपी और लखीमपुर खीरी (जिसमें सिख किसानों की घनी आबादी है और जहां हाल ही में कई किसानों की मौत भी हुई है) के आसपास के जिलों में – अपने नेताओं को चुनाव की घोषणा से पहले ही प्रत्येक ग्राम पंचायत तक पहुंचने के लिए निर्देश दिया है.

पार्टी के एक नेता के अनुसार, राज्य भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि किसानों को मोदी सरकार द्वारा उनके कल्याण के लिए शुरू की गई सभी योजनाओं के बारे में सूचित किया जाए.

भाजपा के सूत्रों ने बताया कि पार्टी अक्टूबर में हर गांव में किसान चौपाल (जहां भाजपा नेता छोटे समूहों में किसानों से मिलते हैं) का आयोजन कर रही है. इसके बाद, नवंबर में सभी जिला मुख्यालयों में एक ट्रैक्टर रैली – किसान आंदोलन में किसानों द्वारा आयोजित रैली के तर्ज पर- की योजना बनाई गई है. दिसंबर में, पार्टी का लक्ष्य प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में किसान सम्मेलन आयोजित करना है.

पार्टी नेताओं को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे नाराज किसानों से पूरी सहानुभूति के साथ बातचीत करें और उनसे किसी भी टकराव से बचें. उन गांवों में चुनाव प्रचार से बचने के लिए भी निर्देश दिए गए हैं जहां किसानों के बीच अधिक विरोध है और इसके बजाय आसपास के गांवों पर ध्यान केंद्रित करने को कहा गया है.


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‘किसानों के नेताओं के साथ टकराव से बचें’

पश्चिमी यूपी में किसानों के आंदोलन का अधिक प्रभाव पड़ा है, जहां गन्ने की कम कीमत (मोदी सरकार ने अगस्त में गन्ने के उचित और लाभकारी मूल्य में बढ़ोतरी की है) जैसे मुद्दों पर भी किसान सरकार से असंतुष्ट हैं.

पिछले महीने, उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने भी राज्य में गन्ने की खरीद की कीमतों में 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की घोषणा की थी – लेकिन इसे अपर्याप्त बताया गया था. साथ ही कोविड महामारी के बाद बेरोजगारी में हुई वृद्धि के कारण भी सरकार की आलोचना हो रही है. यहां जाट किसानों में बीजेपी के खिलाफ गुस्सा भी ज्यादा दिखाई दे रहा है, जो विधानसभा चुनाव में पार्टी के खिलाफ जा सकता है.

और इसलिए, पार्टी सूत्रों के अनुसार, भाजपा ने अपने नेताओं को गांवों का दौरा करने और वहां व्यापक रूप से किसान चौपाल लगाने के लिए कहा है.

पश्चिमी यूपी बीजेपी के एक विधायक के मुताबिक़,‘हमारा उद्देश्य शांतिपूर्ण ढंग से किसानों को समझाना और उनकी भ्रांतियां दूर करना है. चूँकि पश्चिमी यूपी में अभी उत्तेजित माहौल में है और विरोधी पार्टियाँ चुनाव के समय आग में घी डाल सकती है इसलिए हम सतर्क हैं. हमें कहा गया है नाराज़ किसानों के साथ किसी क़ीमत पर मुठभेड़ नहीं करना है. अगर वे रास्ता रोकते हैं तो दूसरे रास्ते से कम विरोध वाले गांवों में कैंपेन करना है. हालांकि गांवों में विरोंध हरियाणा-पंजाब जैसा नहीं है.’

यूपी के 58,195 ग्राम पंचायतों पर सरदार पटेल की जयंती 31 अक्टूबर तक हर ग्राम पंचायत में इन चौपालों का आयोजन हो रहा है.

इन चौपालों में कृषि क़ानून की भ्रांतियों के अलावा कृषि सम्मान निधि – केंद्र सरकार की योजना जिसके तहत सभी भूमि धारक किसान परिवारों को तीन समान किश्तों में प्रति वर्ष 6,000 रुपये की सहायता राशि प्रदान की जाती है – के लाभाथियों से संवाद, फर्टीलाईजर, कषि उपकरणों,बीज आदि पर दिए जा रहे सब्सिडी के बारे में किसानों को बताना शामिल है.

पहले चरण में विधायक, ज़िला अध्यक्ष, सांसद, मंत्री आदि को गांवों में पहुंचने को कहा गया है. दूसरा चरण नवंबर में शुरू होगा जहां प्रत्येक ज़िला मुख्यालय पर ट्रैक्टर रैली होगी जिसके ज़रिये पीएम और मुख्यमंत्री योगी के किए गए कामों के प्रति आभार जताया जाएगा और दिसंबर के महीने में हर विधानसभा क्षेत्र में किसान सम्मेलन आयोजित किया जाएगा.

यूपी बीजेपी किसान मोर्चा के प्रमुख कामेश्वर सिंह द प्रिंट से कहतें है, ‘कथित किसान नेताओं ने किसानों के बीच तमाम तरह की भ्रांतियां फैलाई है और उन्हें गुमराह किया है. उन्हें कहा गया है मंडियाँ ख़त्म हो जाएगी, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदारी नहीं होगी और उनकी ज़मीन छिन जाएगी. पीएम मोदी से ज़्यादा किसानों का हमदर्द कौन है? किस सरकार ने किसानों को उनके अकाउंट में किसान स्म्मान निधि के ज़रिये पैसा दिया? गन्ना के ज़्यादातर भुगतान हो चुके हैं और गन्ना की क़ीमत योगी सरकार ने बढ़ाई है. इन बातों को किसानों को बताने की ज़रूरत है’


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‘युवा जाटों का भाजपा से मोहभंग’

मगर भाजपा द्वारा किसानों की नाराज़गी कम करने की कोशिशों का फ़िलहाल उत्साहवर्धक नतीजा नहीं देखने को मिल रहा.

पश्चिमी यूपी के कई जिलों के बीजेपी ज़िला अध्यक्ष कहतें है, ‘हम अपनी तरफ़ से सारी कोशिशें कर रहें है नुक़सान को कम करने के लिए. पर संभावना इस बात की ज़्यादा है कि हम जाटों में युवा, जो मोदी के नाम पर 2019 में देशभक्ति के रंग में रंगा थे, वह किसान आंदोलन, मंहगांई,पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती क़ीमतों और कोरोना महामारी के बाद रोज़गार के घटते अवसरों की वजह से से उतना उत्साहित नहीं है. यह वोट बैंक समाजवादी पार्टी और अजित सिंह की पार्टी आरएलडी के पास जा सकता है. 2019 में हमें जाटों के 90 प्रतिशत वोट मिले थे. इसबार चालीस-पचासफ़ीसदी तक मिलेगें. कई गांवों में हमारा विरोध भी हो रहा है, पर चुनाव तक स्थिति संभल जाएगी.’

बीजेपी के एक और विधायक कहतें है, ‘सिर्फ़ जाट, मुस्लिम, गुर्जर ही नहीं बल्कि सिख भी किसान आंदोलन के कारण हमसे नाराज़ हैं. कम-से-कम लखीमपुर खीरी और तराई इलाक़े में हर गांव में कुछ सिख हैं जो बीजेपी को नुक़सान पहुचाएगें. सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह भावना सिखों में घर कर गई है कि हम सिख विरोधी और जाट विरोधी हैं. इसे रोकने की ज़रूरत है. यूपी में सबसे ज़्यादा सिखों की आबादी लखीमपुर खीरी में है, जहां चार किसान बीजेपी नेता की गाड़ी से कुचलकर मारे गए हैं. गन्ना की क़ीमतों में बढ़ोतरी से कुछ फ़ायदा जरूर होगा, पर उसका असर कितना टिकता है यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम कितना सघन कैंपेन इन इलाक़ों में कर पाते हैं.’

2012 में भाजपा पश्चिमी यूपी की 110 विधानसभा सीटों में से केवल 38 सीट ही जीत पाई थी जो 2017 में बढ़कर 88 हो गयी. इसकी बड़ी वजह 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद जाट और मुस्लिम समुदाय के बीच खड़ी हुई दीवार थी और उसका फ़ायदा बीजेपी को मिला. पर किसान आंदोलन के कारण जाट- मुस्लिम एकता फिर से बहाल होती दिख रही है. हालांकि लव जेहाद जैसे मुद्दे इस एकता को कभी भी चकनाचूर कर सकतें हैं.


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