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Thursday, 25 April, 2024
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आप ने पंजाब में चुनाव का बिगुल फूंका, लेकिन असंतोष और नेतृत्व संकट से 2022 की संभावनाएं धूमिल

पंजाब में पहली बार मैदान में उतरी आप 2017 के विधानसभा चुनावों में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. हालांकि, आप का केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश अध्यक्ष भगवंत मान को छोड़कर राज्य में किसी अन्य नेता को तैयार करने में नाकाम रहा है.

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चंडीगढ़ : पंजाब विधानसभा चुनाव में अभी लगभग एक साल का समय बाकी है लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) ने 21 मार्च को राज्य के मोगा जिले में किसान महासम्मेलन आयोजित करने के साथ चुनावी बिगुल फूंक दिया है.

रैली में आप के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अमरिंदर सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने यह आरोप लगाते हुए केंद्र की मोदी सरकार पर भी निशाना साधा कि तीनों नए विवादास्पद कृषि कानूनों को किसानों से सलाह-मशविरा किए बिना पारित किया गया है.

आप के किसान सम्मेलनों से पार्टी को 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले कुछ समर्थन तो हासिल हो सकता है लेकिन राज्य में मजबूत नेताओं का अभाव इसके लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

पंजाब में 2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार मैदान में उतरी आप दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी, यहां तक कि उसने 117 में से 20 सीटें जीतीं थी. हालांकि, आप का केंद्रीय नेतृत्व पिछले चार वर्षों में पंजाब में पार्टी अध्यक्ष भगवंत मान को छोड़कर किसी अन्य नेता को तैयार करने में विफल रहा है.

यहां तक कि संगरूर से आप के सांसद मान भी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए जाट या दलित चेहरों को साथ नहीं ला पाए हैं और वह आप का झंडा बुलंद रखने के लिए मुख्यत: विधायकों पर ही निर्भर रहे हैं.

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राजनीतिक विश्लेषक और आईएसबी, मोहाली में प्रोफेसर सिद्धार्थ सिंह का कहना है, ‘आप खुद ही अपनी सबसे बड़ी दुश्मन रही है. दिल्ली के अलावा पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां उसने मजबूत स्थिति बनाई थी. पंजाब में आप की चुनौतियां उसके अपने राष्ट्रीय मुद्दों का नतीजा है. यदि आप पंजाब में जीतती भी है तो पंजाब के नेता अरविंद केजरीवाल के लिए चुनौती बन सकते हैं. और आप अब तक वन-मैन शो रही है.’

उन्होंने कहा, ‘आप में आंतरिक असंतोष, विघटन के कारण घटी विश्वसनीयता, और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली केंद्रीय टीम के भीतर असुरक्षा की भावना वो वजहें है जो पंजाब में मजबूत स्थानीय नेतृत्व उभरने में बाधक बनी हैं.’

हालांकि, आप अपनी संभावनाओं को लेकर आश्वस्त है. पार्टी का कहना है कि उसके विधायक अनुभवी नेता हैं और उसका दावा है कि इससे कुछ प्रमुख चेहरे उभरकर सामने आएंगे.


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मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार

केजरीवाल की रैली के बाद पंजाब कांग्रेस प्रमुख सुनील जाखड़ ने कहा कि वह इस बात को लेकर आप प्रमुख से निराश हैं कि वह आगामी चुनावों के लिए मुख्यमंत्री पद के चेहरे की घोषणा करने में विफल रहे.

जाखड़ ने कहा, ‘हम रैली के दौरान केजरीवाल से सीएम उम्मीदवार घोषित करने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन इस पर निराशा ही हाथ लगी. ऐसा लगा कि उनके पास कहने के लिए कुछ है ही नहीं.’

2017 के विधानसभा चुनाव में भी आप ने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की थी. हालांकि, मान सबसे लोकप्रिय नेता थे, लेकिन केजरीवाल ने उन्हें भी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नामित नहीं किया. आप के एक पूर्व नेता ने कहा, ‘ऐसा इसलिए क्योंकि यह तय किया गया था कि केजरीवाल खुद सीएम होंगे. इसकी घोषणा नहीं की गई थी क्योंकि मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर केजरीवाल को लोग खारिज कर सकते थे. पंजाब की राजनीति में जाट सिखों का दबदबा रहा है और आम तौर पर इसमें कोई बदलाव भी नहीं होने जा रहा है. यदि आप ने अब भी कोई सबक न सीखा तो 2022 का चुनाव भी 2017 की पुनरावृत्ति ही होगा.’

हालांकि, आप नेता इससे पूरी तरह असहमत हैं. पार्टी विधायक और नेता प्रतिपक्ष हरपाल सिंह चीमा ने दिप्रिंट को बताया, ‘इस बार पार्टी में चीजें बहुत अलग होंगी. हम चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेंगे. यही नहीं मौजूदा नेतृत्व के अलावा, हम कुछ नए विश्वसनीय चेहरे और कुछ जाने-माने चेहरों को भी शामिल करेंगे.’

आप के ही एक अन्य विधायक कुलतार सिंह संधवान ने कहा, ‘पहले पार्टी को सरकार और राजनीति में अनुभव रखने वाले प्रमुख नेताओं की जरूरत थी. अब हम दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरने जा रहे हैं. अब सभी विधायक अनुभवी और दक्ष हो गए हैं और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं.’

आप की चुनावी रणनीति 2017 के चुनावों वाली जैसी ही है, सत्तारूढ़ पार्टी को निशाना बनाने वाले अभियान के अलावा स्वास्थ्य और शिक्षा के ‘दिल्ली मॉडल’ को भुनाना और मुफ्त सुविधाओं का वादा करना.

पंजाब विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और एक समाजशास्त्री मनजीत सिंह का कहना है, ‘लेकिन मुद्दों से ज्यादा मायने रखता है चेहरा और दुर्भाग्यवश आप के मामले में केजरीवाल की अपनी खुद की भी प्रतिष्ठित पहचान पंजाब में तभी धूमिल पड़ गई थी जब उन्होंने (पूर्व राजस्व मंत्री और वरिष्ठ अकाली नेता) बिक्रम सिंह मजीठिया से (मजीठिया की तरफ से केजरीवाल के खिलाफ मानहानि के मामले में) माफी मांगी थी. यही वजह है कि 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में मिले 25 फीसदी वोट शेयर की तुलना में आप को 2019 के संसदीय चुनावों में पंजाब में 7-8 फीसदी ही वोट मिले.’

अगस्त 2018 में केजरीवाल द्वारा मजीठिया से माफी मांगने के बाद उनकी ही पार्टी के कई विधायकों ने सार्वजनिक तौर पर इस कदम के खिलाफ असंतोष जताया था. यहां तक कि मान ने भी प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, और 2019 लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें राज्य इकाई प्रमुख के तौर पर वापस लाया गया.

आप विधायक सुखपाल सिंह खैरा को उसी साल केजरीवाल द्वारा नेता विपक्ष के पद से अचानक हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने उनके खिलाफ प्रदर्शन का नेतृत्व किया था.

कोई प्रमुख चेहरा नहीं

खैरा और उनका समर्थन करने वाले कुछ अन्य विधायकों के अलावा आप 2014 के बाद से कई प्रमुख चेहरे गंवा चुकी है.

पार्टी क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू को शामिल करने के करीब पहुंच थी, लेकिन वह इसके बजाय कांग्रेस में लौट गए. जुलाई 2016 में सिद्धू के राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि वह आप में शामिल होंगे. हालांकि, आप के साथ उनकी बातचीत बीच में ही अटक गई. सिद्धू ने ही एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा, ‘मैं चाहता हूं कि मेरी भूमिका तय की जाए लेकिन ऐसा नहीं किया गया.’

अगस्त 2016 में आप ने तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष सुच्चा सिंह छोटेपुर को भ्रष्टाचार के कथित आरोपों के चलते हटा दिया. 2012 में कांग्रेस छोड़ने वाले अनुभवी नेता छोटेपुर उस समय आप का नेतृत्व कर रहे थे जब 2014 के आम चुनावों में उसने शानदार प्रदर्शन करते हुए राज्य की 13 में से चार सीटें जीत ली थीं.

छोटेपुर के निकट सहयोगी और आप के एक पूर्व नेता कर्नल जे.एस. गिल का कहना है, ‘अब छोटेपुर को फिर से लाने के लिए हमसे संपर्क किया जा रहा है. लेकिन जैसा कि आप हमेशा करती है, वो उन्हें अपने मंच पर तो वापस लाना चाहती है लेकिन पार्टी में उनकी क्या भूमिका होगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया है. दिल्ली और पंजाब में आप के नेताओं को दूसरों का सम्मान करना सीखने की जरूरत है. यदि वे उनका साथ चाहते हैं तो उन्हें पूरा अधिकार भी दें.’

2014 में जीतने वाले चार सांसदों में से दो—डॉ. धर्मवीर गांधी और हरिंदर सिंह खालसा—को अगस्त 2015 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण हटा दिया गया था.

सिद्धार्थ सिंह ने कहा, ‘आप इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए कदम उठाती तो दिख रही है. लेकिन साथ ही एक ही समय कई राज्यों में विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने का उद्देश्य यह भी है कि किसी भी राज्य के स्थानीय नेतृत्व की तरफ से केजरीवाल को कोई चुनौती न मिले. इसे अपनी सफलता के लिए मजबूत स्थानीय नेतृत्व को उभारने के प्रयास करने होंगे. साथ ही अपनी लड़ाई मजबूती से लड़ने के लिए मुद्दों का चुनाव बहुत सावधानी से करना होगा.’

(नेहा महाजन द्वारा संपादित)

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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