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Wednesday, 29 May, 2024
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केजरीवाल का देशभक्ति बजट वो राजनीतिक विकल्प नहीं जिसकी भारत को जरूरत है

कई लोग कहेंगे कि इस मोदी युग में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर उनसे होड़ लेकर केजरीवाल राजनीति का सटीक खेल खेल रहे हैं. लेकिन मंदिर-मंदिर घूमते राहुल गांधी और चंडीपाठ करतीं ममता बनर्जी भी यही सब कर रही हैं, तो केजरीवाल कौन-सी नयी और स्मार्ट चाल चल रहे हैं?

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अरविंद केजरीवाल तभी से भारत का प्रधानमंत्री बनने की ख़्वाहिश पाले बैठे हैं जब वे गुमनाम नौकरशाह से एक्टिविस्ट बनकर देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने के आंदोलन के दौरान रामलीला मैदान के मंच पर अण्णा हज़ारे के बगल में बैठे थे. उस मंच से दिल्ली के मुख्यमंत्री के दफ्तर तक उनका सफर चमत्कार और नाटकीयता से भरपूर था, खासकर इसलिए कि उन्होंने झटके में इस्तीफा भी दिया और दोबारा चुनकर सत्ता में भी लौटे. इसके बाद से वे जल्दी ही ‘नायक’ नुमा जोशीले एक्टिविस्ट से एक चतुर नेता में तब्दील हो गए, जिसे भारतीय राजनीति में अपना जलवा दिखाने का अनुभवसिद्ध कायदा अच्छी तरह मालूम होता है.

अपनी पूरी ताकत से सत्ता की कमान थामे रहो और उसे ज्यादा से ज्यादा मजबूत बनाते जाओ. उन्होंने पंजाब और गुजरात में भी अपने पैर फैलाने की कोशिश की मगर उन्हें समझ में आ गया कि कोई कमजोरी है. कुछ ऐसा है जो उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरीखे, जो फिलहाल आगामी एक दशक के लिए तो अजेय नज़र आ रहे हैं, असाधारण नेताओं की पांत में पहुंचने से रोकता है. लेकिन दिल्ली विधानसभा में केजरीवाल का ताजा भाषण यही संकेत दे रहा है कि आम आदमी पार्टी के संयोजक को वह चीज मिल गई है जो उन्हें मोदी का विकल्प बना सकती है, वह चीज है रामभक्ति.


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मोदी के रंग में केजरीवाल

अपने ‘देशभक्ति बजट’ से केजरीवाल ने आदर्श हिंदू बनने के सबसे अपेक्षित रास्ते को चुन लिया है, और वे विकास का भी वादा कर रहे हैं. मुश्किल यह है कि मोदी ने 2014 में ही इस खेल में राष्ट्रीय स्तर पर और 2001 के बाद से गुजरात के स्तर पर महारत हासिल कर ली थी. ‘विकास’ और ‘हिंदू हृदयसम्राट’ जैसे मुहावरों की तो याद होगी ही. इन दो मुहावरों ने मोदी की छवि स्वतः चमका दी थी.

कई लोग कहेंगे कि इस मोदी युग में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर होड़ लेकर केजरीवाल राजनीति का सटीक खेल खेल रहे हैं. लेकिन मंदिर-मंदिर घूमते राहुल गांधी और चंडीपाठ करतीं ममता बनर्जी भी यही सब कर रही हैं, तो केजरीवाल कौन-सी नयी और स्मार्ट चाल चल रहे हैं? इससे आपको तात्कालिक रूप से तो कुछ वोटों का फायदा मिल सकता है लेकिन अंततः यह गिरावट की ओर ले जाने वाली दौड़ ही है.

टीवी पत्रकार रजत शर्मा ने एक कार्यक्रम में कहा कि केजरीवाल ने बुज़ुर्गों को अयोध्या में बन रहे राममंदिर की मुफ्त यात्रा करवाने का वादा केवल इसलिए किया है क्योंकि मोदी ने देश का राजनीतिक विमर्श अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण से बदलकर उसमें भगवान राम और मंदिर को प्रासंगिक बना दिया है. शर्मा ने एक प्रासंगिक मुद्दा उठाया है. अब तक तो केजरीवाल एक शिक्षित, विकास समर्थक, ‘आम आदमी’ वाली अपनी छवि के बूते ही कामयाबी हासिल करते रहे हैं.

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अब इसमें रामराज्य का तत्व जोड़कर वे मोदी जैसा बनने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, जिसमें वे विफल ही होंगे क्योंकि मोदी के ठीक बाद योगी आदित्यनाथ खड़े हैं, अपनी प्रबल हिंदुत्ववादी पहचान के साथ.

वास्तव में लगातार तीसरी बार सबसे अच्छा काम करने वाले मुख्यमंत्री बताए गए योगी ने केजरीवाल को दूसरे नंबर पर डाल दिया है. इसमें यह भी जोड़ लीजिए कि योगी भाजपा में प्रधानमंत्री पद के सबसे तगड़े दावेदार माने जाते हैं. इसकी वजह भी है. आखिर, उन्होंने उत्तर प्रदेश में सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान हिंसा से निजी तथा सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान की भरपाई के लिए लोगों से 23.36 लाख रुपये वसूल कर ‘राष्ट्र विरोधी तत्वों’ को सबक सिखाया है.

अपनी जमात से अलग जाते केजरीवाल

केजरीवाल उसी हिंदुत्ववादी ‘हेवीवेट कैटेगरी’ में एक नहीं, दो-दो बॉक्सरों— मोदी और योगी— से मुक़ाबला करने पर आमादा नज़र आते हैं. जाहिर है, उन्हें धूल चाटना पड़ सकता है. लोककल्याण मार्ग तक पहुंचने के लिए वे जो रास्ता चुन रहे हैं और जो ‘देशभक्ति बजट’ उन्होंने पेश किया है उसे लोग वैकल्पिक राजनीति के रूप में शायद ही स्वीकार करेंगे, अगर वे भाजपा के मुक़ाबले में खड़े होंगे. मोदी की भाजपा को 2019 में कुल 37 फीसदी वोट मिले थे. खुद को हनुमानभक्त और रामभक्त घोषित करके इस वोट प्रतिशत में हिस्सेदारी करना आसमान से तारे तोड़ने जैसा ही होगा, क्योंकि यहां सुपरस्टार मोदी हैं.

खुद को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने का एकमात्र उपयुक्त विकल्प केजरीवाल के पास यही था कि वे शासन और नीतिगत पहल पर ही ज़ोर दें, जैसा उन्होंने पिछले साल फरवरी में दिल्ली के चुनाव के दौरान दिया था और ‘आप’ को 70 में से 62 सीटें मिली थीं और भाजपा के खाते में 8 सीटें ही आई थीं. वह चुनाव दिल्ली दंगों और सीएए विरोधी आंदोलन के कारण जबरदस्त ध्रुवीकरण के माहौल में लड़ा गया था. लेकिन केवल विकास और कल्याणकारी कार्यक्रमों के बूते 62 सीटें ले आना केजरीवाल का ही करिश्मा था. और यह कोई पहली बार नहीं था जब उन्होंने सुशासन के मुद्दे पर सत्ता हासिल की थी.

सत्ता की भूख विवेकपूर्ण सोच के साथ क्या कुछ कर सकती है, यह इसी से जाहिर है कि केजरीवाल राष्ट्रीय स्तर पर मोदी से मुक़ाबला करने का क्या रास्ता चुन रहे हैं, यह हाराकीरी से कम नहीं है. राहुल गांधी कट्टर हिंदुओं का दिल जीतने के लिए जनेऊधारी ब्राह्मण तक बन गए और नाकाम रहे. इसलिए केजरीवाल को अपनी अलग और विशिष्ट छवि ही बनानी चाहिए, नौकरशाह से नेता बने शख्स की छवि, जो शासन और नीतिगत पहल के सारे पेंच जानता-समझता है.

लोगों के जेहन में उनकी छवि अपनी कमीज की जेब में रेनोल्ड्स कलम रखने वाले मुख्यमंत्री की ही है. इसे वे न भूलें, वरना मोदी और योगी से कहीं ज्यादा हिंदू दिखने के चक्कर में वे मात खा सकते हैं.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

लेखिका एक राजनीतिक पर्यवेक्षक हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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