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Thursday, 13 June, 2024
होममत-विमतयांगत्से की घटना ने भारतीय सेना की ताकत उजागर की लेकिन उसका पलड़ा नौसेना ही भारी कर सकती है

यांगत्से की घटना ने भारतीय सेना की ताकत उजागर की लेकिन उसका पलड़ा नौसेना ही भारी कर सकती है

चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपने सैन्य अड्डे बनाना चाहता है. हमें महाद्वीपीय दायरे में रणनीतिक रूप से रक्षात्मक मुद्रा की भरपाई नौसैनिक दायरे में आक्रमण क्षमता बढ़ाकर करनी होगी.

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परमाणु शक्ति से लैस दो देश भारत और चीन 9 दिसंबर को अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में 16,000 फुट की ऊंचाई पर शून्य से नीचे तापमान वाले इलाके में एक-दूसरे से टक्कर लेने के लिए आमने-सामने आ गए. उनके सैनिक हथियारों से लैस थे मगर उन्होंने उनका इस्तेमाल नहीं किया. शायद अपने फौजी अधिकारियों के जरिए दिए गए राजनीतिक आकाओं के आदेश का पालन करते हुए दोनों देशों के सैनिकों ने आपस में हाथापाई, धक्का-मुक्की, भर ही की. कुछ सैनिकों ने लाठियों के वार किए जिसके कारण गंभीर चोट तो लगी लेकिन कुछ को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा.

फौजी ताकत का इस्तेमाल आपसी रजामंदी की सीमा तक ही किया गया. मुठभेड़ थोड़ी देर ही चली. स्थानीय कमांडरों ने तुरंत बैठक की और एक-दूसरे पर दोषारोपण किए. भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने की जरूरत पर ज़ोर देते हुए मामले को रफा-दफा करने के बयान जारी किए गए.

इस तरह की घटनाएं कई वर्षों से घटती रही हैं, सिवाय जून 2020 में गलवान घाटी में हुई टक्कर के जिसमें दोनों तरफ कुछ मौतें भी हुई थीं. इसके बाद यही उम्मीद की जा रही थी कि ऐसी और घटनाएं घटेंगी, हालांकि यह निश्चित नहीं कहा जा सकता था कि वे कब और कहां और कैसे घटेंगी जबकि भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति और जवाबी कार्रवाई की उसकी फौजी क्षमता को लेकर कोई संदेह नहीं किया जा सकता.

3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के इर्द-गिर्द इतनी जगह है कि चीन इस तरह की गतिविधियां चला सकता है. लेकिन दो तरह की संभावित समस्याओं में फर्क करने की जरूरत है. पहली समस्या यह है कि दोनों पक्ष जिन स्थानों पर गश्त करते हैं वे उनके अपने-अपने दावों की सीमाओं के अंदर हैं और उनकी अलग-अलग व्याख्या की जाती है. गश्त आमतौर पर थोड़े समय के लिए की जाती है. दोनों तरफ के गश्ती दलों में आमना-सामना हो सकता है और टकराव भी हो सकता है, जो कभी-कभी (शायद ही कभी) हाथापाई में बदल जाता है.

दूसरी समस्या तब पैदा होती है कि जब कोई गश्ती दल खाली जगह पर कब्जा करके वहां स्थायी ठिकाना बनाता है, जैसा लद्दाख के देप्सांग में हुआ और हमारे लिए गश्त लगाना मुश्किल हो गया. इसे ‘सलामी स्लाइसिंग’ (फांक बनाना) कहा गया. इससे यथास्थिति बदलती है और जमीन पर नियंत्रण भी बदलता है.

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बड़ी तस्वीर

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बयान दिया कि यांगत्से में चीनी सेना ने अतिक्रमण करके एलएसी पर यथास्थिति को बदलने की कोशिश की लेकिन भारतीय सेना ने सतर्कता बरतते हुए समय पर कार्रवाई करके इस कोशिश को नाकाम कर दिया. हालांकि यह साफ तौर से नहीं कहा गया मगर यह बयान यह संकेत देता है कि चीनी सेना ने उन स्थानों पर कब्जा करने की कोशिश की जिन पर किसी का कब्जा नहीं था या कुछ स्थानों से हमारी सेना को बेदखल करने की कोशिश की.

घटना के स्वरूप के मद्देनजर पहली कोशिश की ज्यादा संभावना दिखती है. चीन ने 1967 में नाथु ला की घटना के बाद से भारत की किसी सीमा चौकी पर हमला नहीं किया है लेकिन कुछ जगहों पर जमीनी कब्जे की स्थिति बदल दी है और भारत उन जगहों को बिना लड़े गंवा चुका है. अब सवाल यह है कि क्या भारत की सैन्य तैयारी भविष्य में ऐसे नुकसान को रोक सकने की है? क्या यांगत्से की घटना कोई उम्मीद बंधाती है?

इससे निश्चित ही उम्मीद बंधती है, बशर्ते हम छोटे फ़ायदों के फेर में बड़े लाभ की अनदेखी न करें. यहां छोटे फायदे का अर्थ है चीन द्वारा हड़पे जाने वाले छोटे-छोटे क्षेत्र, और बड़ा मसला है जापान समेत अमेरिका और दूसरे देशों (जिन्होंने अधिकृत तौर पर घोषणा की है कि चीन आज ‘सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती पेश कर रहा है) के साथ टकराव के व्यापक परिदृश्य में चीन का रणनीतिक लक्ष्य.

भारत के रणनीतिकारों को इस बड़े खेल का पता होना ही चाहिए और उसी के मुताबिक अपनी रणनीति बनानी चाहिए. इस बात का एहसास होना चाहिए कि जमीन को लेकर विवादों की आड़ में अपने नियंत्रण का विस्तार करने के लिए जो सैन्य दबाव बनाया जाता है उसकी भी अपनी एक भूमिका है. इसका लक्ष्य भारत को उपमहादेश में सिमटे रहने को मजबूर करना है ताकि चीन-अमेरिका होड़ में उसकी भूमिका कमजोर हो जाए.

सैन्य दृष्टि से, चीन उत्तरी सीमा और पाकिस्तान पर दबाव बनाकर भारत को सीमित करने की कोशिश में लगा है. इसके साथ ही चीन आर्थिक टूल और सैन्य साजोसामान की सप्लाई को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करके भारत के पड़ोस में अपनी घुसपैठ बनाने की भी कोशिश कर रहा और इसका लक्ष्य हिंद महासागर क्षेत्र में अपने अड्डे बनाना है. चीन अगर अपनी आर्थिक ताकत के लिए महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों को सुरक्षित नहीं करता तो उसके लिए यह क्षेत्र रणनीतिक कमजोरी का कारण बन सकता है. जिबूटी, पाकिस्तान और म्यांमार में सैनिक अड्डा बनाने का काम वह शुरू कर चुका है. अब इसके लिए वह बांग्लादेश, श्रीलंका और कुछ अफ्रीकी देशों पर नज़र रखे हुए है.

नौसैनिक क्षमता बदल सकती है समीकरण

भारत के रणनीतिकारों को देश की सीमाओं की रक्षा और अपनी नौसैनिक क्षमता को मजबूत करने के लिए संसाधानों की अपनी क्षमताओं के कारण हमेशा चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. सैन्य ताकत के विकास के लिए भारत के पास जो रणनीतिक विकल्प हैं उन्हें चीन और पाकिस्तान के कारण पैदा हो रहे उन खतरों से जोड़ना पड़ेगा, जो इस महादेश के सामने उपस्थित हैं और जो नौसैनिक मोर्चे पर उनके लिए चुनौती पेश करने की उसकी क्षमता से जुड़ते हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि नौसैनिक पहलू उन देशों के साथ सहयोग की संभावना बनाता है जिन देशों के हित और भारत के हित मिलते-जुलते हैं, मसलन अमेरिका, जापान और पश्चिमी देश.

महाद्वीपीय दायरे में, चीन और पाकिस्तान के प्रति रणनीतिक रूप से रक्षात्मक मुद्रा की भरपाई नौसैनिक दायरे में आक्रमण क्षमता बढ़ाकर करनी होगी. इससे सत्ता संतुलन बदल सकता है. यह सेना को पश्चिम से उत्तर लाकर संतुलन बनाने की जरूरत को रेखांकित करता है. यह प्रक्रिया शायद जारी भी है, लेकिन यह ‘स्ट्राइक कोर’ में केंद्रित इसकी युद्ध क्षमता को भी पुनर्गठित करने की मांग करता है. बड़े इलाके पर कब्जा अब यथार्थपरक राजनीतिक लक्ष्य नहीं हो सकता. नौसेना को पनडुब्बियों, विमानवाही पोतों और समुद्री जहाजों में निहित आक्रमण क्षमता की जरूरत है.

यह सब बहुत खर्चीला है और इनके विकास व उत्पादन में लंबा समय लगता है और इनके लिए विदेशी तकनीकी मदद की जरूरत होती है. नौसेना को रक्षा बजट का 17.8 फीसदी हिस्सा देकर तो यह निश्चित ही हासिल नहीं किया जा सकता. महाद्वीपीय और समुद्री क्षेत्रों में भी अहम भूमिका निभाने वाली वायुसेना को अपनी समयसीमा खत्म होते विविध साजो-सामान को भी बदलने की जरूरत आ पड़ी है. इसलिए विमानों, पनडुब्बियों, विमानवाही पोतों, और समुद्री जहाजों की खरीद में देरी चिंता का कारण है.

क्या किया जाए

मूल बात यह है कि सेना में 1.8 लाख पद खाली पड़े हैं, इसके बावजूद वह जमीनी खतरों से निपटने के लिए तो अच्छी तरह तैयार है लेकिन भारत जमीनी क्षेत्र में अपनी ताकत के बूते नौसैनिक क्षेत्र में भी उस तरह का खिलाड़ी बनने से अभी काफी दूर है. वह क्षमता रक्षा बजट में बड़ी वृद्धि के बिना नहीं हासिल हो सकती, जबकि उलटे वह बजट जीडीपी के प्रतिशत के लिहाज से भी और सरकारी खर्च के हिसाब से सिकुड़ता ही जा रहा है. इसके साथ ही, व्यापक रणनीतिक तस्वीर को और राजनीतिक लक्ष्यों से जुड़े ऑपरेशनों के साधनों की पहचान ध्यान में रखते हुए संसाधनों का आवंटन भी किया जाना चाहिए.

सैन्य क्षमता का विकास हमेशा एक चुनौती रही है. यह उस ‘विज़न’ से निर्देशित होना चाहिए जो रणनीतिक वातावरण में सक्रिय बड़ी ताकतों के कारण बनती है और इसलिए राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राथमिकताएं तय करना आसान बनाती है. राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के परिप्रेक्ष्य में, इसका जवाब दिशाहीन विश्व में भारत को एक ताकत के रूप में उभरने के ‘विज़न’ में निहित है. इस विज़न और रणनीति के अभाव में उस अल्पकालिकता और तोड़-मरोड़ को तरजीह मिल जाती है जो राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है मगर राष्ट्रीय हित के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

यांगत्से जैसी घटनाओं से हमें जमीनी सच्चाइयों के बारे में सावधान हो जाना चाहिए. इसके साथ ही, ऐसा न हो कि वे हमें अहम रणनीतिक कारकों के प्रति अंधा कर दें.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) प्रकाश मेनन (रिटायर) तक्षशिला संस्थान में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक; राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के पूर्व सैन्य सलाहकार हैं. उनका ट्विटर हैंडल @prakashmenon51 है. व्यक्त विचार निजी हैं)


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