ताइवान की प्रतिष्ठित ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना मिलिट्री एकेडमी’ के बैंगनी रंग के मखमल से सज्जित हॉल में वह तस्वीर टंगी थी. पहले यह एकेडमी’ व्हाम्पोया में स्थित थी. इसे आधुनिक चीन का पालना माना जाता है. लेकिन कम ही लोगों को मालूम है कि अलगथलग पड़े इस भवन के सामने किसकी मूर्ति खड़ी है. यह मूर्ति है बर्लिन यूनिवर्सिटी के ऑर्गेनिक केमिस्ट एर्न्स्ट डेविड बर्गमैन की, जिनका नाम नाजियों ने मूल किताबों से निकाल दिया था और जो 1933 में अपने खिलाफ चलाए गए मुकदमे से बचने के लिए फरार हो गए थे. वे इजरायल के परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रथम अध्यक्ष के रूप में मशहूर थे. राष्ट्रपति शिमोन पेरेस उन्हें इजरायल के सात संस्थापकों में गिनते थे. बर्गमैन को इजरायल के परमाणु हथियार कार्यक्रम का जनक माना जाता था.
1988 के शुरू के दिनों में राजनीतिशास्त्री यीत्ज़ाक शीचोर को ताइवान के काऊशुंग में हॉल में ले जाया गया था, उन्होंने पाया कि उस वैज्ञानिक की एक और गुप्त संतान है: “किसी ने स्पष्ट नहीं किया कि बर्गमैन को समर्पित एक और तीर्थस्थल क्यों बनाई गई. जी हां, वह तीर्थस्थल ही था. कहने की जरूरत नहीं कि मैंने कुछ पूछने की हिम्मत नहीं की.”
इस सप्ताह राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ शिखर बैठक करके लौट रहे राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने विमान में ही घोषणा की कि ‘वार्ता के मद्देनजर’ उन्होंने ताइवान को 14 अरब डॉलर मूल्य के हथियारों की बिक्री थोड़ी आगे के लिए टाल दी है. ट्रंप ने कहा: “मैं कर सकता हूं, नहीं भी कर सकता हूं”. उन्होंने अपना यह दावा दोहराया कि ताइवान ने “मेरा चिप उद्योग चुरा लिया”. उन्होंने यह भी संकेत किया कि भौगोलिक दूरी ने उस द्वीप को अरक्षणीय बना दिया है.
ताइवान के कुछ नेताओं को इस दावे के मतलब पर संदेह है. अमेरिकी कांग्रेस ने 1979 में जो ‘ताइवान रिलेशंस एक्ट’ पास किया था उसके तहत वादा किया गया था कि ‘जो रक्षा सामग्री और डिफेंस सर्विस जितनी मात्रा में जरूरी होगी वह’ उपलब्ध कराई जाएगी. 1982 में ताइवान को जो तथाकथित ‘छह आश्वासन’ दिए गए थे उनके तहत वादा किया गया था कि हथियारों की बिक्री के मामले में अमेरिका चीन से कोई सलाह नहीं लेगा.
वैसे, ताइवान लंबे समय से चिंता करता रहा है कि अमेरिका अपने इस मित्र देश की आखिर किस हद तक सहायता करेगा. 1964 में चीन के परमाणु परीक्षणों के बाद दक्षिण कोरिया और जापान की तरह ताइवान ने भी परमाणु हथियार हासिल करने पर विचार करना शुरू किया और इस लक्ष्य के करीब पहुंच गया था.
आज, ट्रंप चीन के साथ रिश्ते सुधारने की जो कोशिश कर रहे हैं वह इन तीन देशों को परमाणु हथियार हासिल करने की दहलीज पार करने के लिए उकसाने तक पहुंच सकती है.
बम के पक्ष में तर्क
दुनिया भर के राष्ट्र-राज्यों की तरह ताइवान को भी कई संकटों ने सुरक्षा की अपनी स्थिति पर विचार करने को मजबूर किया है. ईस्ट एशिया का 85 फीसदी तेल और गैस होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर जाती है. इसके अलावा फारस की खाड़ी में युद्ध छिड़ गया है. इन दोनों बातों ने ताइवान की कमजोरियों को रेखांकित कर दिया है. इसके पूर्व राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन ने परमाणु शक्ति को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का वादा किया था, और अंतिम परमाणु रिएक्टर को पिछले साल बंद कर दिया गया था. वैसे, इस देश का सेमीकंडक्टर उद्योग बिजली की भारी मांग करता है. विशेषज्ञ बॉनी लिन और जेन नाकानों ने अनुमान लगाया है कि दुनिया भर में सेमीकंडक्टर की बढ़ती मांग के कारण उसके उपयोग में दोगुनी तेजी से वृद्धि हो सकती है.
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का जो आधुनिकीकरण चल रहा है (जिसे इस सदी के मध्य तक पूरा किया जाना है) उसके कारण अनिश्चितता बढ़ गई है और ताइवान को चीनी कब्जे में लिए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं. हालांकि यूक्रेन युद्ध ने साफ कर दिया है कि युद्ध में बड़ी ताकतों की जीत निश्चित नहीं मानी जा सकती है, और आक्रमण का प्रतिरोध करने में ताइवान काफी सक्षम है, फिर भी यह सवाल बना हुआ है कि बंदरगाह की लंबे समय तक नाकाबंदी का कब तक प्रतिरोध किया जा सकता है.
अमेरिका शुरू से परमाणु हथियारों के बूते चीन को एक सीमा से आगे बढ़ने से रोकता रहा है. 1950 में उसने उत्तरी कोरिया के खिलाफ परमाणु हथियारो का इस्तेमाल करने का विचार कर लिया था और इसके सात साल बाद उसने इस प्रायद्वीप पर अपने परमाणु हथियारो को स्थापित करना शुरू कर दिया था. चीन ने अमेरिका की इस हिम्मत का इम्तिहान 1954 और 1958 के बीच तब लिया जब उसने डाचेन द्वीपों पर आक्रमण किया था और किनमेन तथा मात्सु पर गोले बरसाए थे. इतिहासकार पांग यांग हुएई ने लिखा है कि इसके जवाब में अमेरिका ने कम शक्तिशाली परमाणु हथियार गिराने वाले लड़ाकू जेट विमानों से लैस युद्धपोत रवाना कर दिए थे.
इसके जवाब में चीनी सेना ने अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम शुरू कर दिया था. 1962 के बाद से ताइवान को अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA से चीन के परमाणु कार्यक्रमों के बारे में खुफिया सूचनाएं मिलने लगी थीं. लॉप नूर परमाणु परीक्षण स्थल के बारे में ये सूचनाएं खुफिया विमानों से ली गई तस्वीरों पर आधारित थीं. ताइवान के फौजी शासक च्यांग काई-शेक ने बर्गमैन से संपर्क करने का आदेश दिया. शीचोर ने लिखा है कि इजरायल को इस पहल का जवाब देने के कई कारण नजर आए, जिनमें एक यह भी था कि अरब के क्रांतिकारियों को चीन से ज्यादा समर्थन मिलने लगा था.
1964 में चीन के पहले परमाणु परीक्षण के बाद ताइवान ने बर्गमैन को निमंत्रित किया, जिन्होंने सेंट्रल ताइवान के लालु सन मून लेक होटल में एक सप्ताह तक गुप्त बैठकें की. इन बैठकों के बाद समझौता किया गया कि ताइवान में परमाणु हथियारों, मिसाइलों, और इलेक्ट्रॉनिक्स पर अनुसंधान करने वाले संस्थानों की स्थापना करके इजरायल के परमाणु कार्यक्रम जैसा कार्यक्रम शुरू किया जाए.
मुकम्मल बीमा
दूसरी कई उभरती परमाणु शक्तियों की तरह ताइवान ने भी परमाणु शक्ति के शांतिपूर्ण उपयोग के वादे की आड़ में परमाणु हथियार कार्यक्रम चलाया. उसने परमाणु हथियारों के लिए जरूरी यूरेनियम और प्लूटोनियम के उत्पादन के लिए निर्णायक फ्युल प्रोसेसिंग संयंत्र पश्चिम जर्मनी और फ्रांस से हासिल करने की पहल की. CIA ने गुप्त स्रोतों से पता लगा लिया कि ताइवान के वैज्ञानिकों ने 1974-75 में, परमाणु बम के पुर्जों के मॉडल कंप्यूटर द्वारा तैयार कर लिये थे. विशेषज्ञ डेविड अलब्राइट और एंड्रिया स्ट्रिकर ने लिखा है कि CIA ने अनुमान लगाया कि ताइवान ‘हथियार जैसा परमाणु यंत्र’ 1976 तक तैयार कर लेगा.
अमेरिका ताइवान पर भारी दबाव डाल रहा था कि वह अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे. लेकिन ताइवान ने सीआइए की खुफियागीरी और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी द्वारा निरीक्षणों को धता बताने की तैयारी की. लुंग-युआन रिसर्च पार्क में एक गुप्त प्लूटोनियम सेपरेशन प्लांट स्थापित किया गया; ताइवान ने लघु परमाणु वारहेड के डिजाइन के आभासी परीक्षण के लिए जरूरी सुपरकंप्यूटर क्षमताएं हासिल की.
जहां यह सारा काम हो रहा था उस ‘इंस्टीट्यूट फॉर न्यूक्लियर इनर्जी रिसर्च’ के डिप्टी-डाइरेक्टर चांग सीएन-यी को सीआइए ने नियुक्त कर लिया. चांग को 1987 में वह सूचना देकर ताइवान से निकाल लिया गया, जिसके आधार पर अमेरिका ने उस देश के नेतृत्व से सीधा सवाल किया और उसके परमाणु कार्यक्रम को जबरन बंद करवाया.
चीन को लेकर आशंकित एशिया के दूसरे देश भी इसी तरह के ऑपरेशन में जुड़े हुए थे. दक्षिण कोरिया के फौजी तानाशाह जनरल पार्क चुंग-ही ने 1971 में अपने वैज्ञानिकों को आदेश दिया कि वे छह साल के अंदर लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें और दूसरे परमाणु हथियार तैयार कर दें. 1974 में अमेरिकी राजदूत फिलिप हबीब द्वारा भेजे गए कूटनीतिक संदेश (जिसे अब सार्वजनिक कर दिया गया है) में दर्ज है कि यह फैसला ‘अमेरिकी वादों के टिकाऊपन पर बढ़ते संदेह’ के कारण लिया गया.
अमेरिका ने 1950 के दशक में ही जापान को भी दूसरे मित्र देशों के मामले में की गई व्यवस्था के अनुसार परमाणु हथियार देने पर विचार कर लिया था. 1967 के बाद से जापान ने उन तथाकथित तीन सिद्धांतों को संस्थागत रूप दे दिया, जो देश को परमाणु हथियार रखने, उनका उत्पादन करने, या अपने यहां स्थापित करने से रोकते हैं. लेकिन, इन तीन सिद्धांतों को आगे बढ़ाने वाले प्रधानमंत्री साटो एसाकू ने अपने अधिकारियों को परमाणु हथियार हासिल करने की गुंजाइशों का अध्ययन करने का गुप्त आदेश भी दिया था, और उस गुप्त संधि पर दस्तखत किया था जो अति संकटपूर्ण स्थिति में अमेरिकी रणनीतिक सेना की वहां तैनाती की इजाजत देती थी.
अनिश्चित भविष्य
ऐसी योजनाओं का विरोध बहुत पहले से जाहिर था. एक तो यह कि एशिया का कोई विकसित औद्योगिक लोकतंत्र परमाणु सीमारेखा को पार करता दिखेगा तो चीन युद्ध छेड़ने पर मजबूर हो सकता है. परमाणु हथियारों का, यह जानते हुए कि इससे कुछ विनाश तो होगा ही, इस्तेमाल करने की ताइवान जैसे देशों की इच्छा को अभी आजमाया नहीं गया है. अंत में, ताइवान के पास परमाणु क्षमता से इतर दूसरे साधन हैं जो दुश्मन में खौफ पैदा कर सकते हैं : टेक्नोलॉजी के उद्यमी मॉरिस चांग ने परमाणु हथियार परियोजना बंद किए जाने से एक साल पहले, 1987 में ‘टीएसएमसी’ की स्थापना की, जो आज दुनिया में इस्तेमाल होने वाले 90 फीसदी सुपर-एड्वान्स्ड सेमीकंडक्टर का उत्पादन कर रहा है.
इस तरह की जोड़तोड़ के नये-नये तत्व निरंतर विकसित होते रहते हैं. ट्रंप पूरा ज़ोर लगाते रहे हैं कि ताइवान में अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर के उत्पादन की व्यवस्था अमेरिका में स्थानांतरित कर दी जाए. यह अमेरिका की कमजोरियों में कमी लाएगा, लेकिन ताइवान के वजूद के लिए खतरे को लेकर चिंताएं बढ़ा देगा. इसके अलावा, यूक्रेन से लेकर फारस की खाड़ी तक जो घटनाएं घट रही हैं वे तमाम देशों को अपने लिए उभर रहे खतरों का आकलन करने और उनसे निबटने के उपायों पर विचार करने को मजबूर कर रही हैं.
स्कॉलर आइक फ़्रेमैन कहते हैं: “शी हर बार ताइवान का इम्तहान लेते हैं और हर बार कोई नतीजा नहीं निकलता, और अमेरिका हर बार यह जाहिर कर देता है कि उसमें आर्थिक कष्ट उठाने का माद्दा नहीं है. और इससे शी को और ज्यादा ज़ोर लगाने का हौसला बढ़ता महसूस होगा.”
एशिया की उभरती शक्तियां यह विचार कर रही हैं कि प्रतिरोध किया जाए या नहीं, अगर किया जाए तो किस तरह. दूरदराज़ के मित्र देशों का बचाव करने के लिए अपनी संपदा और अपना खून दांव पर लगाने में अमेरिका की बढ़ती हिचक न केवल युद्ध की संभावना और अधिक बढ़ाएगी बल्कि उसे अकल्पनीय रूप से और ज्यादा विनाशकारी बनाएगी.
प्रवीण स्वामी दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका X हैंडल @praveenswami है. विचार निजी हैं.
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