Friday, 27 May, 2022
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क्या धर्मांतरण कानून बनाने से जबरन धर्म परिवर्तन पर अंकुश लग सकेगा

धर्मान्तरण की शिकार महिलाओं के हितों की रक्षा जरूरी है, बीवी को तलाक दिये बगैर शादी के लिये इस्लाम धर्म अपनाने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई आवश्यक.

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प्रलोभन देकर या दूसरी तरह से मायाजाल में फंसा कर लोगों को धर्म परिवर्तन के लिये प्रेरित करने वाले तत्वों और संगठनों पर अंकुश लगाने के लिये सरकार अब धर्मांतरण निरोधक कानून बनाने की तैयारी कर रही है. देश में धर्मांतरण निरोधक कानून बनाने की मांग कई दशकों से उठ रही है और इस संबंध में पहली बार 1954 में संसद में कानून बनाने का असफल प्रयास भी किया गया था. एक बार फिर इस दिशा में सरकार कदमताल कर रही है.

धर्म परिवर्तन के बगैर भी दो वयस्क, किसी भी जाति या धर्म के हों विशेष विवाह कानून के तहत विवाह करके इसका पंजीकरण करा सकते हैं. ऐसे अनगिनत मामले हैं जिनमें दो अलग अलग धर्मों को मानने वाले वयस्कों ने धर्मांतरण के बगैर ही विवाह किया है और वे खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं.

ऐसी स्थिति में अलग अलग धर्मों के दो वयस्कों द्वारा विवाह किये जाने को अनावश्यक तूल देने की बजाय इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि अगर जबरन धर्मांतरण हो रहा है तो इसकी मूल वजह क्या है? और क्या सिर्फ विवाह के लिये धर्मांतरण उचित है, यदि हां तो इस समस्या से कैसे निपटा जाए?


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सवाल यह भी है कि भारतीय दंड संहिता में समुचित प्रावधान होने के बावजूद क्या इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर धर्मांतरण निरोधक कानून की आवश्यकता है?

पहली नजर में तो राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे कानून की आवश्यकता नहीं लगती क्योंकि यह विषय राज्य के अंतर्गत आता है. कुछ राज्यों में पहले से ही इस बारे में कानून हैं. संभवतः ये राज्य पहले से ही धर्मांतरण की समस्या से जूझ रहे हैं और इसीलिए वहां कानून बनाकर इसे दंडनीय बनाया गया है. ऐसी स्थित में अन्य राज्यों को भी इस तरह का कानून बनाने की सलाह दी जा सकती है.

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लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कानून बना देने से समस्या का निराकरण तो नहीं होगा. हमें प्रलोभन या प्रेम प्रसंग के बाद किसी को धर्म परिवर्तन के लिये बाध्य करने से रोकने की दिशा में ठोस उपाय करने होंगे. साथ ही, पहली बीवी को विधिवत तलाक दिये बगैर इस्लाम धर्म अपना कर दूसरी शादी करने वाले व्यक्तियों को दंडित करने और इस तरह की घटनाओं का शिकार होने वाली महिलाओं के हितों की रक्षा के लिये ठोस कदम उठाने होंगे.

इसके अलावा, सरकार को ऐसी योजनायें बनानी होंगी जिनका लाभ हाशिये पर जीवन गुजार रहे लोगों तक पहुंचे और वे बेहतर जिंदगी की लालसा में धर्म परिवर्तन करने के लिये बाध्य नहीं हों. इसके लिये राज्यों में पुलिस को अधिक चुस्त संवेदनशील बनाने की भी आवश्यकता है.

सिर्फ विवाह के लिये धर्म परिवर्तन के अलावा भी समाज के कमजोर तबके के सदस्यों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन की घटनायें सामने आती रही हैं और इनके लिये देश में सक्रिय मिशनरियों पर आरोप लगते रहे हैं. लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या अभी तक जबरन धर्मांतरण के किसी भी मामले में आरोपी व्यक्तियों को सजा हुई है? शायद नहीं.


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इस समय एक नया तरीका सामने आया है जिसमें पहले किसी हिन्दू युवती से विवाह के बाद उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला जाता है. हमारे देश का कानून दो वयस्कों को अपनी इच्छा से शादी करने की इजाजत देता है. यह शादी अंतरजातीय और दूसरे धर्म के युवक या युवती के साथ हो सकती है. इस तरह का विवाह करने वाले जोड़े अपनी शादी का विशेष विवाह कानून के तहत पंजीकरण करा सकते हैं, लेकिन समस्या उस समय खड़ी होती है जब ऐसा विवाह करने वाली युवती को धर्म परिवर्तन के लिये बाध्य किया जाने लगता है.

शायद यही वजह है कि मुस्लिम युवकों के साथ हिन्दू युवतियों के प्रेम प्रसंगों की घटनाओं को अब लव जिहाद का नाम दिया जाने लगा है. देश में इस तरह की घटनायें बढ़ रहीं हैं जिनमें मुस्लिम युवक से शादी करने वाली दूसरे धर्म की युवती को धर्म परिवर्तन नहीं करने के कारण प्रताड़ित किया गया और कुछ मामलों में ऐसी युवतियों की हत्या तक कर दी गयी.

ऐसे मामले भी सामने आये हैं जिनमें किसी युवक ने अपना छद्म नाम रखकर हिन्दू युवती के साथ मेलजोल बढ़ाया और शादी भी की लेकिन बाद में पता चला कि युवक हिन्दू नहीं बल्कि मुस्लिम है.

धर्मांतरण से जुड़ा ताजा मामला झारखंड की राष्ट्रीय स्तर की शूटर तारा शाहदेव का है जिससे रकीबुल उर्फ रंजीत कोहली की शादी हुयी थी. शादी के बाद तारा को हकीकत पता चली और उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला गया. फिलहाल यह मामला रांची की अदालत में लंबित है.

इसी तरह, एक पूर्व माडल रश्मि ने नवंबर 2017 में आरोप लगाया कि उसका पति आसिफ धर्मांतरण के लिये उस पर दबाव डाल रहा है और इससे इंकार करने पर वह उसके साथ मारपीट करता है. पुलिस ने माडल की शिकायत पर भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया. ऐसी ही एक घटना उत्तर प्रदेश की है जहां जुलाई, 2018 में अपने पति और बच्चों को छोड़ धर्म परिवर्तन कर बिजनौर निवासी इंतजार के साथ निकाह करने वाली दिल्ली की निधि शर्मा की हत्या कर दी गयी.

इस तरह की घटनाओं में हो रही वृद्धि के परिप्रेक्ष्य में ही सरकार धर्मान्तरण पर काबू पाने के लिये राष्ट्रीय स्तर का कानून बनाने पर विचार कर रही है. मोदी सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में भी इस विषय को आगे बढ़ाया था लेकिन 2015 में कानून एवं न्याय मंत्रालय इस प्रक्रिया से सहमत नहीं था. इस वजह से मामला आगे नहीं बढ़ पाया था, लेकिन आज स्थिति भिन्न है. संभव है कि सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में इस संबंध में विधेयक पेश करे.

जहां तक राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाने का सवाल है तो संसद में पहली बार 1954 में भारतीय धर्मान्तरण विनियमन एवं पंजीकरणः विधेयक 1954 में पेश किया गया लेकिन लोकसभा में बहुमत के अभाव में यह गिर गया. इसके बाद, 1960 और 1979 में भी इसके असफल प्रयास हुये थे. नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार के गठन के बाद 2015 में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राष्ट्रव्यापी स्तर पर धर्मांतरण निरोधक कानून बनाने पर जोर दिया था.

इस समय देश के महज आधा दर्जन राज्यों में ही धर्म स्वतंत्रता या धर्मांतरण निरोधक कानून हैं तो फिर इन राज्यों से बाहर विवाह करने के लिये धर्म परिवर्तन जैसी घटना होने पर उन्हें कैसे रोका जा सकता है? यह कैसे साबित किया जायेगा कि यह धर्मांतरण डरा धमका कर या फिर किसी प्रकार का प्रलोभन देकर या सिखा पढ़ाकर कराया गया है?

हिन्दू युवतियों को धर्म परिवर्तन के लिये बाध्य किये जाने की इन घटनाओं का जिक्र करते समय इस तथ्य का उल्लेख करना भी जरूरी है कि हिन्दू पतियों द्वारा पत्नी को तलाक दिये बगैर ही इस्लाम धर्म कबूलने और फिर दूसरी शादी करने की भी घटनायें सामने आती रहीं हैं.

पत्नी को तलाक दिये बगैर ही इस्लाम धर्म कबूल कर दूसरी शादी करने की घटनाओं से चिंतित उच्चतम न्यायालय ने 1995 में ही महिलाओं के हितों की रक्षा और धर्म का दुरुपयोग रोकने के इरादे से धर्मांतरण कानून बनाने की संभावना तलाशने के लिये एक समिति गठित करने पर विचार का भी सुझाव दिया था. न्यायालय का मत था कि इस कानून में यह प्रावधान भी किया जा सकता है कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है तो वह अपनी पहली पत्नी को विधिवत तलाक दिये बगैर दूसरी शादी नहीं कर सकेगा और यह प्रावधान प्रत्येक नागरिक पर लागू होना चाहिए.


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धर्म स्वतंत्रता कानून अथवा धर्मांतरण निरोधक कानून इस समय देश के सात राज्यों अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और उत्तराखंड में है. राजस्थान ने भी 2008 में इस तरह का विधेयक पारित किया था लेकिन यह कानून नहीं बन सका क्योंकि केन्द्र ने कुछ स्पष्टीकरण के लिये इसे वापस भेज दिया था.

मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्रता कानून के अंतर्गत जबरन अथवा बहला फुसलाकर या धोखे से धर्म परिवर्तन निषेध और दण्डनीय अपराध है. इस अपराध के लिये कानून में एक साल की सजा और पांच हजार रुपए के जुर्माना का प्रावधान है. नाबालिग, महिला या अनुसूचित जाति-जनजाति के सदस्य की स्थिति में यह सजा बढ़कर दो साल और जुर्माने की रकम 10 हजार रुपए हो सकती है.

इसी तरह, हिमाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता कानून, 2006 में ऐसे अपराध के लिये दो साल तक की कैद और 25 हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है जबकि अवयस्क, महिला और अनुसूचित जाति-जनजाति के सदस्य के मामले में तीन साल तक की सजा और 50 हजार रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि केन्द्र सरकार किसी संप्रदाय के सदस्यों को निशाना बनाने की बजाये ऐसे कदम उठायेगी जिसके तहत पहली बीवी को विधिवत तलाक दिये बगैर धर्म परितर्वन कर दूसरी शादी करने वालों, धोखे से विवाह करने और बाद में पत्नी पर धर्म परिवर्तन का दबाव डालने वाले व्यक्तियों और उसके परिजनों को जल्द से जल्द सजा मिल सके.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं .जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं.यह आलेख उनके निजी विचार हैं)

 

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