Thursday, 20 January, 2022
होममत-विमतवंशवादी राजनीति के लिए गांधी परिवार पर निशाना साधने वाले मोदी अपनों के मामले में नरम क्यों पड़ गए

वंशवादी राजनीति के लिए गांधी परिवार पर निशाना साधने वाले मोदी अपनों के मामले में नरम क्यों पड़ गए

भाजपा नेताओं को अब किसी राजनीतिक वंश का होने या अपने बेटे-बेटियों को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए संकोच करने की जरूरत नहीं है.

Text Size:

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को अब किसी राजनीतिक वंश का होने या अपने बेटे-बेटियों को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए संकोच करने की जरूरत नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी नेताओं के पारिवारिक हितों के पोषण या अपनी संतानों की राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने के मुद्दे पर अपने विचारों को संशोधित कर लिया है. 26 नवंबर को संविधान दिवस पर दिए मोदी के भाषण का सार यह था कि ‘वंशवादी पार्टियां बुरी हैं लेकिन राजनीतिक वंश चलेंगे’. वे शब्दों का कोई राजनीतिक खेल नहीं कर रहे थे. यह बीच रास्ते सुधार करने का मामला है.

संसद के सेंट्रल हॉल में दिए गए उनके इस भाषण को फिर से सुनिए. उन्होंने इस बात पर चिंता जाहिर कि ‘परिवार के लिए’ बनी और ‘परिवार के द्वारा’ चलाई जा रहीं पार्टियों ने किस तरह अपना ‘लोकतांत्रिक चरित्र’ गंवा दिया है. मोदी का कहना है कि वंशवादी पार्टियां लोकतंत्र और संविधान की भावना के विरोध में होती हैं. इसके बाद उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनका नया विचार क्या है, ‘मैं जब वंशवादी पार्टियां कहता हूं तो मेरे कहने का मतलब यह नहीं होता कि किसी एक परिवार से एक से ज्यादा लोग राजनीति में न आएं. जी नहीं. कोई पार्टी इसलिए वंशवादी नहीं हो जाती कि किसी परिवार के एक से ज्यादा सदस्य अपनी योग्यता और जनता के आशीर्वाद से राजनीति में उतर जाते हैं.’

मोदी फर्क करना चाहते हैं. किसी राजनीतिक परिवार का कोई व्यक्ति अपनी योग्यता और जन समर्थन से राजनीति में उतरता है तो उन्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन एक ही परिवार की पीढ़ी-दर-पीढ़ी द्वारा चलाई जा रहीं पार्टियां ‘स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरा हैं’. यानी उनके विचार से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (नेहरू-गांधी परिवार), समाजवादी पार्टी (यादव परिवार), द्रविड़ मुन्नेत्र कणगम (करुणानिधि परिवार), राष्ट्रीय जनता दल (यादव परिवार), शिवसेना (ठाकरे परिवार), और तृणमूल कांग्रेस (ममता परिवार) आदि लोकतंत्र के लिए खतरा हैं. लेकिन यह बात ज्योतिरादित्य सिंधिया, पीयूष गोयल, धर्मेन्द्र प्रधान, अनुराग ठाकुर, और किरण रिजिजू (सभी मोदी सरकार के मंत्री) पर लागू नहीं होती. न ही यह भाजपा के मुख्यमंत्रियों पर लागू होती है, मसलन कर्नाटक के बासवराज बोम्मई या पेमा खांडू पर.

नवीन पटनायक (ओड़ीशा) और वाइ.एस. जगन मोहन रेड्डी जैसे भी कुछ मुख्यमंत्री हैं, जो संसद में भाजपा के सहयोगी है और राजनीतिक वंश से आते हैं तथा अपनी पार्टी चला रहे हैं. लेकिन तकनीकी रूप से वे लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं हैं क्योंकि उन्होंने जिन पार्टियों (बीजू जनता दल और वाइएसआर कांग्रेस) की स्थापना की उनके वे पहली पीढ़ी के नेता हैं. कहा जा सकता है कि इन पार्टियों का नियंत्रण ‘एक के बाद दूसरी पीढ़ी’ के हाथ में नहीं आया. मोदी के आलोचक कटाक्ष कर सकते हैं कि मोदी शिवसेना या लोकजनशक्ति पार्टी (पासवान परिवार) का साथ ले चुके हैं और अब अपना दल (सोनेलाल, अनुप्रिया पटेल परिवार) का सहयोग ले रहे हैं. अब, जो बीत गई वो बात गई. वर्तमान यह है कि अनुप्रिया ने अपने पिता की पार्टी को तोड़कर अपना दल (सोनेलाल) बना लिया है. इसलिए इस पार्टी को लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं माना जा सकता.


यह भी पढ़ें: धारणा बनाने की बजाए उम्मीद जगाना- कोविड की दूसरी लहर के बाद की राजनीति के लिए BJP तैयार


राजनीतिक वंशवाद पर मोदी का नया विचार अलग क्यों

यह पहली बार है कि मोदी ने वंश वालों और वंशवादी पार्टियों के बीच फर्क किया है. वे ‘परिवार द्वारा चलाई जा रही पार्टियों’ के खिलाफ हमेश बोलते तो रहे लेकिन राजनीतिक वंशवाद का कभी समर्थन नहीं किया था.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

वे व्यापक दायरे वाले ‘परिवारवाद’ को खारिज करते रहे और सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक संदर्भों में सत्ता के भेदभावपूर्ण आवंटन, वंचितों को दरकिनार करके समर्थों को सत्ता देने के लिए वंशवादी राजनीति को जिम्मेदार बताते रहे. ‘अपने उपनामों के बूते चुनाव जीतने वालों’ को वे निशाना बनाते रहे. पिछली जनवरी में राष्ट्रीय युवा संसद समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने युवाओं का आह्वान किया था कि वे हमारे लोकतंत्र को कमजोर करने वाले ‘वंशवाद के जहर’ को नाकाम करने के लिए राजनीति में उतरें : ‘वंश से उभरे लोग सोचते है कि कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता… उन्हें अपने घरों में इसके कामयाब उदाहरण मिल जाते हैं. इसलिए इन लोगों के मन में कानून के प्रति कोई सम्मान नहीं होता, न ही उन्हें इसका कोई डर होता है.’

इसलिए, मोदी का संविधान दिवस वाला भाषण, जिसमें उन्होंने सक्षम और जनाधार वाले वंशजों के राजनीति में प्रवेश का अनुमोदन किया है, उनके विचार में बड़े परिवर्तन को दर्शाता है.

क्यों बदला मोदी का मन

मोदी जब मुख्यमंत्री थे, और गांधी परिवार पर वंशवादी राजनीति को मजबूत करने का आरोप लगाते हुए और भारतीय राजनीति की कई बुराइयों के लिए उसे दोषी ठहराते हुए उस पर हमला करना शुरू किया था, तब भाजपा नेता खूब तालियां बजाते थे. 2014 में जब वे प्रधानमंत्री बन गए, भाजपा नेता कई युवा वंशजों को सरकार में शामिल न किए जाने की सफाई देते हुए मोदी के वंशवाद विरोधी रुख का उल्लेख किया करते थे. इसलिए, एक चुस्त-दुरुस्त युवा नेता अनुराग ठाकुर को, जो पहली बार 2008 में सांसद बने थे, सरकार से इसलिए अलग रखा गया क्योंकि वे हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे हैं. धूमल ने जब राजनीति से संन्यास जैसा ही ले लिया तभी अनुराग को 2019 में जूनियर मंत्री बनाया गया. उन्होंने अपनी क्षमता दिखाकर इस मौके का फायदा उठाया और दो साल में ही प्रोन्नति हासिल कर ली.

अनुराग के बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा की अध्यक्ष बनीं प्रतिभाशाली और तेजतर्रार नेता पूनम महाजन को भाजपा नेताओं के मुताबिक इसलिए सरकार से बाहर रहना पड़ा क्योंकि वे दिवंगत भाजपा नेता प्रमोद महाजन की बेटी हैं. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक तो अपनी पार्टी के आला नेताओं से यह भी नहीं पूछ सकते कि 2019 में वर्तमान सांसद होने के बावजूद उन्हें पार्टी ने चुनाव में टिकट क्यों नहीं दिया. चार बार सांसद रह चुके दुष्यंत सिंह को न तो सरकार में लिया गया और न पार्टी की कोई ज़िम्मेदारी दी गई क्योंकि वे राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे हैं. ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे कि युवा भाजपा नेताओं को वंशज होने की कीमत चुकानी पड़ी जबकि सत्ता के शिखर के करीब होने के कारण कई दूसरे युवा वंशजों (सूची ऊपर देखें) को सरकार में ऊंचे मुकाम हासिल कर लिये.

लेकिन वंशजों के मामले में मोदी ने अपने विचार अब बदल क्यों लिये? ऊपर से तो यही लगता है कि हाल में 30 विधानसभा और तीन लोकसभा सीटों पर उपचुनाव में भाजपा की किरकिरी इसकी वजह हो सकती है. कई ऐसी सीटें थीं जिन पर भाजपा ने दिवंगत हुए विधायकों के परिजनों को टिकट देने से माना कर दिया और हार गई, मसलन हिमाचल प्रदेश की जुब्बल-कोटखई सीट और कर्नाटक की हंगल सीट. लेकिन यह सोचना भी भोलापन ही होगा कि सिर्फ उपचुनाव के नतीजों के कारण प्रधानमंत्री मोदी अपना विचार बदल देंगे.

एक समय था जब भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व किसी की टिकट काट देता था तब कोई उफ़्फ़ तक नहीं करता था. उदाहरण के लिए, 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने अनंत कुमार की पत्नी तेजस्विनी को टिकट नहीं दिया, हालांकि वे बंगलूरू दक्षिण क्षेत्र में काफी लोकप्रिय थीं और अनंत कुमार वहां से लगातार छह बार चुनाव जीत चुके थे. लेकिन पार्टी ने तेजस्वी सूर्य को खड़ा किया. पार्टी के नेताओं ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. लेकिन आज समय बदल गया है. हाल के उपचुनावों के बाद सभी राज्यों में भाजपा नेता परिजनों को टिकट न देने के पार्टी के फैसले पर सवाल उठा रहे है.

भाजपा में कई ऐसे हैं जो नेतृत्व के रुख को बहुत सही नहीं मानते. वे खुल कर कुछ नहीं कहते लेकिन उनकी कानाफूसियां काफी मुखर हैं. इस लेखक के मुताबिक उनका आम विचार यह है— ‘अगर डॉकतार की संतान डॉक्टर बन सकती है, इंजीनियर की संतान इंजीनियर बन सकती है, तो राजनीतिक नेता की संतान में क्या बुराई है? मैं किसी चुनाव क्षेत्र को मेहनत करके क्यों तैयार करूंगा अगर मैं अपनी विरासत अपने परिवार को नहीं सौंप सकता? मेरे परिवार में किसी का रुझान राजनीति की ओर है तो वह इसलिए क्यों नुकसान उठाए क्योंकि मैं राजनीति में हूं? जो भी हो, मोदीजी नहीं समझ सकते.’

यह चिंता तो जायज है कि वंशवादी राजनीति के कारण सत्ता का विषम बंटवारा होता है, लेकिन कई ऐसे कठिन सवाल भी हैं जिनके जवाब मुश्किल हैं मसलन— एक ऊर्जावान और तेजतर्रार नेता और नोएडा के विधायक पंकज सिंह हाशिये पर इसलिए क्यों पड़े रहें कि वे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे हैं? गृह मंत्री अमित शाह के बेटी जय अगर कभी राजनीति में कदम रखना चाहें तो इसमें गलत क्या होगा? और शौर्य डोभाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को इसलिए क्यों दबाया जाए कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के बेटे हैं? उनका तो राजनीतिक वंशवाद का भी मामला नहीं है.

भाजपा के हलक़ों में ऐसे कई सवाल चक्कर काट रहे हैं कोई नहीं जानता कि इनमें से कुछ सवाल मोदी के कानों तक पहुंचे हैं या नहीं, या उन्हें यह एहसास तो नहीं हुआ कि वंशवाद से ग्रस्त अपनी सरकार और पार्टी में वंशवाद के प्रति उनका विरोध एक आडंबर ही है? या यह भारत की चुनावी राजनीति में वंशवाद की उपयोगिता या उसे खारिज करने की निरर्थकता जैसी उन कुछ कड़वी सच्चाइयों का अंततः स्वीकार है?

जो भी हो, प्रधानमंत्री मोदी ने वंशवादी राजनीति और वंशजों के प्रश्न पर अपने रुख में परिवर्तन करके भाजपा में कई दिलों को जीत लिया है.

यहां व्यक्त विचार निजी हैं.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: राहुल गांधी के हाथों में पार्टी की कमान क्यों कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए माकूल साबित हो सकती है


 

share & View comments