Thursday, 26 May, 2022
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कैसे मोदी-शाह की भाजपा ओबीसी आरक्षण के बनाए अपने ही जाल में फंस रही है

मोदी सरकार ने पिछड़ों के उप-वर्गीकरण के बारे में सिफ़ारिशें करने के लिए गठित जस्टिस रोहिणी आयोग को जो अंतिम समय सीमा दी थी उसके दो साल बाद भी भारत के पिछड़े वर्ग उसकी रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं, और भाजपा की हिचक रहस्यमय बनी हुई है.

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अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के उप-वर्गीकरण के बारे में सिफ़ारिशें करने के लिए गठित जस्टिस रोहिणी आयोग का कार्यकाल पिछले बुधवार को नौवीं बार बढ़ा दिया गया. मोदी सरकार का यह फैसला कई सवाल पैदा करता है—भारतीय जनता पार्टी किस बात से डर रही है? क्या वह ओबीसी से संबंधित सोशल इंजीनियरिंग के अब तक सफल रहे अपने फॉर्मूले पर पुनर्विचार कर रही है? और, क्या वह ओबीसी कोटा के फायदों के ‘ज्यादा समतापूर्ण बंटवारे’ के अपने वादे से पीछे हटने की कोशिश रही है?

अक्तूबर 2017 में गठित जस्टिस जी. रोहिणी आयोग को 12 सप्ताह में यानी 2 जनवरी 2018 तक अपनी रिपोर्ट दे देनी थी. उसे केंद्रीय सूची में दर्ज ओबीसी के ‘उप-वर्गीकरण के मसले का अध्ययन’ करना था ताकि इसमें हाशिये पर पड़े उन वर्गों को भी लाभ मिले जिन्हें शिक्षा और नौकरी में आरक्षण का कोई बड़ा फ़ायदा नहीं हासिल हो पाया है.’ माना जा रहा था कि उप-वर्गीकरण से भाजपा को लाभ ही होगा. देखा गया है कि आर्थिक तथा राजनीतिक रूप से ताकतवर जातियां—मसलन राजस्थान में जाट और बिहार-उत्तर प्रदेश में यादव— आरक्षण का सारा फायदा बटोर ले जाती हैं और पिछड़ों में हाशिये पर पड़े वर्गों के लिए शायद ही कुछ बच पाता है. उप-वर्गीकरण से इन वर्गों को ताकतवर जातियों की कीमत पर लाभ मिल सकेगा.

जस्टिस रोहिणी आयोग को 12 सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देने का आदेश दिया गया था लेकिन 141 सप्ताह बाद भी उसकी रिपोर्ट का अता-पता नहीं है. नरेंद्र मोदी की सरकार ने बुधवार को इसे 29 सप्ताह और दे दिए, यानी अब उसे कुल 170 सप्ताह दे दिए गए हैं. जो रिपोर्ट मात्र तीन महीने में दाखिल होनी थी उसमें अब शायद तीन साल से भी ज्यादा लग जाएंगे.
अगर अभिनेता से भाजपा सांसद बने सनी देओल ओबीसी के वकील होते तो अपनी ‘दामिनी’ फिल्म में उन्होंने जिस तरह मीनक्षी शेषाद्री के लिए वकालत की थी उसी तरह आज चीख रहे होते– ‘तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख मिलती रही है, लेकिन इंसाफ नहीं मिला, मिलॉर्ड.’

जस्टिस रोहिणी आयोग का कार्यकाल बढ़ाने के हर फैसले– कथित रूप से आयोग के अनुरोध पर– के बाद जारी सरकारी विज्ञप्तियों को पढ़ जाइए, उनमें इसके लिए जो कारण बताए गए हैं वे जाने-पहचाने लगते हैं. जस्टिस रोहिणी ने 12 जून 2019 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ से कहा था, ‘हमने कार्यकाल बढ़ाए जाने की मांग की थी और इसके लिए मंत्रालय को 31 जुलाई से पहले अर्जी भेज देंगे.’ यह एक साल पहले की बात है.


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नौ बार कार्यकाल बढ़ाने की सफाई या चुप्पी

दिसंबर 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आयोग को पहला विस्तार 12 सप्ताह का दिया, कि उसने जो विशद डेटा जमा किया है उसका विश्लेषण वह 12 अप्रैल 2018 तक पूरा करे. मार्च 2018 में मंत्रिमंडल ने ‘दूसरा और अंतिम विस्तार’ और 12 सप्ताह के लिए दे दिया, क्योंकि आयोग ने दाखिलों और नौकरियों से संबंधित डेटा ‘मंगवाई है’ और उनके ‘वैज्ञानिक विश्लेषण’ के लिए उसे समय चाहिए. जून 2018 में मंत्रिमंडल ने तीसरी बार 31 जुलाई तक के लिए ‘अंतिम विस्तार’ (एक बार फिर) की मंजूरी दी ताकि आयोग राज्य सरकारों और दूसरे दावेदारों से मिले डेटा पर ‘विस्तार से नज़र डाल सके’.

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यह अंतिम बार था जब मंत्रिमंडल ने ‘अंतिम’ विस्तार दिया. हर विस्तार के लिए जो कारण बताए गए उन्हें पढ़ना उबाऊ लग सकता है फिर भी उन्हें उनकी निरर्थकता का अंदाजा लेने के लिए पढ़ा जा सकता है. मुझे लगता है कि आयोग के सदस्य भी उन्हें पढ़कर कम चकित नहीं होंगे.

नवंबर 2018 तक के लिए आयोग को चौथा विस्तार इसलिए दिया गया ताकि वह ‘उप-वर्गों की सूची को अंतिम रूप देने से पहले’ सभी दावेदारों से ‘एक बार विचार-विमर्श’ कर सके. मई 2019 तक के लिए पांचवां विस्तार भी ‘उप-वर्गों की सूची को अंतिम रूप देने से पहले’ सभी दावेदारों से ‘एक बार विचार-विमर्श’ करने के लिए दिया गया. 31 जुलाई तक के लिए छठा विस्तार नरेंद्र मोदी को दोबारा जनादेश मिलने के बाद ‘पोस्ट फैक्टो’ (कार्येतर) मंजूरी के रूप में दिया गया. 31 जनवरी तक के लिए सातवां विस्तार इसलिए दिया गया ताकि आयोग ‘विभिन्न दावेदारों से विचार-विमर्श’ करके वह विस्तृत ‘रिपोर्ट सौंप सके’.

31 जुलाई 2020 तक के लिए आठवां विस्तार देते हुए आयोग की कार्यशर्तों में यह भी जोड़ दिया गया कि वह ‘ओबीसी की केंद्रीय सूची में दर्ज विभिन्न प्रविष्टियों का अध्ययन करे और उनमें कोई दोहराव, अस्पष्टता, हिज्जे अथवा लिप्यंतरण में असंगति और भूल हो तो उन्हें सही करने की सिफ़ारिश करे.’

अब मंत्रिमंडल ने पिछले बुधवार को उसे 31 जनवरी 2021 तक के लिए नौवां विस्तार इसलिए दिया है क्योंकि आयोग ‘कोविड-19 महामारी के कारण’ अपना काम करने में असमर्थ रहा.


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विस्तार के पीछे राजनीति

अब हम उन सवालों की ओर लौटते हैं, जो शुरू में ही उठाए गए हैं. भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार आखिर किस बात से डरी हुई है? सबसे आसन्न आशंका तो यह है कि जुलाई में अगर रिपोर्ट आ जाती तो उसका असर अक्तूबर-नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव पर पड़ता. वहां मृतप्राय विपक्ष के कारण नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार जब आराम से चुनाव जीतने की स्थिति में है, तब भाजपा ओबीसी आरक्षण को लेकर कोई विवाद खड़ा नहीं करना चाहती है.

जहां तक आयोग को दिए गए पिछले विस्तारों की बात है, उनकी वजह यही लगती है कि भाजपा जाति के पचड़े को छेड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहती. जब प्रधानमंत्री मोदी का एकछत्र राज कायम है और भाजपा सार्वजनिक विमर्शों पर अपनी पकड़ बनाए हुए है तब एक ऐसा विवाद क्यों खड़ा किया जाए जो बेकाबू हो जाए, और सारा खेल बिगड़ जाए? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से आए मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह भी जानते हैं कि हिंदू समाज को एकजुट करने में जातीय खाइयां किस तरह आड़े आती रही हैं.

तो फिर, इस आयोग का गठन ही क्यों किया गया था? इसकी भी वजह है. 2017 में राजनीतिक स्थितियां बिलकुल अलग थीं. हालांकि मोदी के करिश्मे के बूते भाजपा खासकर हिंदी पट्टी में जातीय समीकरणों से ऊपर उठ चुकी थी, फिर भी वह विभिन्न ओबीसी गुटों के प्रतिनिधि संगठनों से गठजोड़ करके अपनी सोशल इंजीनियरिंग कर रही थी. उन संगठनों में, उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर का सुहेलदेव भारतीय समाज, अनुप्रिया पटेल का अपना दल; बिहार में उपेंद्र कुशवाहा की लोक समता पार्टी; और देश भर में दूसरी कई छोटी पार्टियां शामिल थीं.

चूंकि ओबीसी में सबसे ताकतवर यादव गैर-भाजपा दलों— यूपी में समाजवादी पार्टी या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल– के प्रति वफादार रहे इसलिए भाजपा को ओबीसी की दूसरी कमजोर जातियों को रिझाना मुफीद लगा. इन सभी जातियों के कुल वोट संख्या में कहीं ज्यादा, और चुनावी लिहाज से अहम थे. कमजोर समुदायों को रिझाने की भाजपा की यह सोशल इंजीनियरिंग केवल ओबीसी तक सीमित नहीं रही. उदाहरण के लिए, हरियाणा में जाटों की आबादी कुल आबादी की करीब एक चौथाई ही है मगर इस राज्य के कुल 53 में से 33 सालों तक जाट मुख्यमंत्री ने ही राज किया.

मोदी-शाह ने गैर-जाट मनोहरलाल खट्टर को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाकर बाकी तीन चौथाई आबादी की ओर हाथ बढ़ाया, जिसे जाटों के वर्चस्व के कारण नाराज माना जाता रहा है. महाराष्ट्र में भाजपा ने 2014 में एक ब्राह्मण देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया, हालांकि राज्य में ब्राह्मणों की आबादी मात्र 3 प्रतिशत है. इसके पीछे इरादा राज्य में एक तिहाई आबादी वाले मराठों के वर्चस्व से बड़े बहुमत की नाराजगी का फायदा उठाना था. इसी तरह झारखंड में गैर-आदिवासी चेहरे रघुवर दास को गद्दी सौंपी गई.

जस्टिस रोहिणी आयोग का गठन इसी रणनीति का हिस्सा था— हाशिये पर पड़े ओबीसी समुदायों को आरक्षण में ज्यादा हिस्सेदारी देकर रिझाने की रणनीति का.


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बदलते हालात

यहां आकर यह सवाल सामने आता है कि नफा-नुकसान के गणित ने कहीं भाजपा को ओबीसी के उप-वर्गीकरण के कदम को लेकर संदेह में तो नहीं डाल दिया है? साफ तौर पर यही लग रहा है. इसकी दो वजहें हैं. भाजपा ने जिन ताकतवर समुदायों को— मसलन यादव, जो लालू प्रसाद के राजद या मुलायम सिंह की सपा को एकमुश्त वोट देते रहे— अपना मुख्य निशाना बनाया था वे अब इसकी तरफ रुख कर रहे हैं.

यह 2019 के लोकसभा चुनाव से स्पष्ट हो रहा है. ‘सीएसडीएस’- लोकनीति ने चुनाव के बाद यूपी में जो सर्वे किया उससे यह जाहिर हुआ कि 60 प्रतिशत यादवों ने तो सपा-बसपा को वोट दिया मगर 23 फीसदी ने भाजपा को वोट दिया. बिहार में यादव-बहुल पाटलिपुत्र सीट पर भाजपा के रामकृपाल यादव ने, जो कभी लालू यादव के करीबे थे, लालू की बेटी मीसा भारती को हरा दिया. राजस्थान में भाजपा ने जाट-बहुल क्षेत्रों में काफी अच्छा प्रदर्शन किया.

दूसरे, ओबीसी की ताकतवर जातियों ने भाजपा की ओर झुकाव भले दिखाया हो, भाजपा ओबीसी आरक्षण के नाम पर फिर से मंडलवादी उथलपुथल का खतरा मोल नहीं लेना चाहती. ओबीसी के अंदर ताकतवर और कमजोर समुदायों को एक-दूसरे से भिड़ाने की रणनीति महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड विधानसभा चुनावों में राजनीतिक फायदा न दिला सकी. ऐसे में भाजपा नहीं चाहेगी कि ताकतवर ओबीसी जातियों से उसे जो नया समर्थन मिलने लगा है उसमें ओबीसी के उप-वर्गीकरण के कदम के कारण कोई व्यवधान आए और ‘माया मिली न राम’ वाली नौबत आए.

अब सवाल यह है कि आरक्षण के लाभ का समान बंटवारा करने के नाम पर ओबीसी के उप-वर्गीकरण के अपने वादे को भाजपा पूरी करेगी या नहीं? कहीं मोदी सरकार जनवरी 2021 में जस्टिस रोहिणी आयोग का कार्यकाल दसवीं बार तो नहीं बढ़ाएगी? फिर, 11वीं, 12वीं, 13वीं…. अनंत बार?

मैं भी वही अनुमान लगा सकता हूं, जो आप लगाएंगे.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(विचार निजी हैं)

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1 टिप्पणी

  1. Mujhe aisa lag raha hai ki OBC wale logon ke sath sarkar bahut bada dhoka kar rahi hai. Aur humare OBC ke bade bade neta bilkul chup baithe hai.
    Sarkar Reservation to dekh rahi hai ki OBC/SC/ST wale logon ko reservation milta hai, lekin kabhi sarkar ye nahi bataya ki OBC walon ki is desh mein population 41% hai. Aur government job mein OBC wale only 12% hai. Kabhi ye nahi kaha hai genral category walon ne.
    Mein sarkar se anurodh karta hoon ki OBC category wale logon ko jyada se jyada sarkari jobs dene krapa kare.

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