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Tuesday, 1 April, 2025
होममत-विमतमैंने इस्लाम अपनाने और अपनी हिंदू पहचान को दफ़न करने का फैसला क्यों किया

मैंने इस्लाम अपनाने और अपनी हिंदू पहचान को दफ़न करने का फैसला क्यों किया

पेरियार ने आंबेडकर को इस्लाम अपनाने की सलाह दी थी. वर्षों के अनुसंधान के बाद, मैंने भी यही पाया कि भारत में जाति व्यवस्था के उन्मूलन में सक्षम एकमात्र धर्म इस्लाम है.

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दलित कैमरा से जुड़े अपने आठ वर्षों के अनुभव, और जातियों पर अपने 14 वर्षों के अनुसंधान से मैंने एक ही बात सीखी. बाबा साहेब आंबेडकर ने सही कहा था कि जातिवाद से मुकाबले का एकमात्र तरीका है हिंदू धर्म को छोड़ना.
दलित कैमरा एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है जो इसी नाम की एक वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के सहारे दलितों, आदिवासियों, बहुजनों और अल्पसंख्यकों की आवाज़ों को दर्ज करता है.

उनके नक्शेकदम पर चलते हुए, मैंने 30 जनवरी 2020 को केरल के त्रिशूर जिले के ऐतिहासिक शहर कोडुंगल्लूर में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम धर्म अपनाने का फैसला किया. कोडुंगल्लूर वही जगह है जहां भारत की पहली मस्जिद बनाई गई थी. मैं अब रईस मोहम्मद हूं.

यह तारीख महत्वपूर्ण है. यह वही दिन है जब पहले हिंदुत्व आतंकवादी नाथूराम गोडसे ने मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या की थी. यह वो दिन भी है जब हिंदू धर्म में जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले हमारे प्रिय भाई रोहित वेमुला का जन्म हुआ था.

मुक्ति का धर्म

बचपन में भगवान अयप्पा के भक्त के रूप में मैं छह बार कोडुंगल्लूर गया था. यही वो जगह है जहां सीपीआई-एमएल (अविभाजित) के केरल राज्य सचिव नजमल बाबू ने 2015 में इस्लाम अपनाया था. तर्कवादी थान्थई पेरियार (पिता) ने कहा था कि अगर कोई 15 मिनट में जाति का सफाया करना चाहता है और आत्मसम्मान के साथ जीना चाहता है, तो इस्लाम एकमात्र समाधान है. पेरियार ने भी बाबा साहेब आंबेडकर को मुक्ति के धर्म के रूप में इस्लाम को चुनने का सुझाव दिया था.

अपने अनुसंधान के वर्षों में मैंने भी यही पाया कि भारत में जाति व्यवस्था को खत्म करने की क्षमता वाला एकमात्र धर्म इस्लाम है.

जाति-विरोधी आंदोलन भारत में सबसे लंबे समय तक चलने वाला सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन रहा है. इसकी मुख्य मांग है हिंदू समाज में ‘अछूतों’ को समान दर्जे का नागरिक मानना, और उन्हें हिंदू धर्म के बजाय संविधान के दायरे में देखना. लेकिन मैं ये जानने को उत्सुक था कि इस्लाम के सहारे जाति व्यवस्था का सफाया करने का यह आसान समाधान कभी भी दलित आंदोलन और दलित साहित्य में एक संदर्भ बिंदु क्यों नहीं रहा.


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समानता के लिए संघर्ष

मुझे फ़ासीवाद के खतरों, और प्रस्तावित नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 के खिलाफ आयोजित एक सभा को संबोधित करने के लिए जनवरी में कोडुंगल्लूर आमंत्रित किया गया था.

मुसलमान आज नरेंद्र मोदी के भारत में नागरिकता के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं. लेकिन उनकी यह लड़ाई दलितों के संघर्ष से अलग है. पहली लड़ाई न्याय और नागरिकता के लिए है. जबकि दूसरी लड़ाई आत्मसम्मान के लिए, बराबर के इंसान के रूप में देखे जाने जैसी बिल्कुल बुनियादी मांग से जुड़ी है. इस लिहाज से दलितों का हाल कहीं अधिक बुरा रहा है.

यही वो अवसर था जब मैंने इस्लाम को अपनाया और रविचंद्रन बथरान की अपनी हिंदू पहचान को दफ़न कर दिया. मैं अपने हिंदू नाम का उल्लेख नहीं करना चाहता क्योंकि यदि आप गहराई से गौर करें तो सभी हिंदू नाम परोक्ष रूप से केवल जाति का ही उल्लेख करते हैं, और मैं नहीं चाहता कि रईस मोहम्मद इस पुराने बोझ को लेकर चले. वैसे असली समस्या नाम की नहीं है. आखिरकार, मेरे माता-पिता ने बहुत प्यार से मेरा नाम रखा था. लेकिन समस्या तब आती है जब हिंदू समाज उस नाम को एक जाति से और फिर उसे मेहतर के वंशानुगत काम से जोड़ देता है. मेरे पिता के साथ बुरा बर्ताव किया गया था क्योंकि हिंदू समाज का कहना था कि वह वो काम करते थे जिसे कि गंदा माना जाता है. यह हद दर्जे का पाखंड है. पहले, आप कुछ समूहों पर एक पारंपरिक पेशा थोपते हैं, उनके सदस्यों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं, और फिर जाति व्यवस्था के बजाय लोगों को दोष देते हैं.

मेरे माता-पिता ने मेरे लिए संस्कृत नाम चुना. मेरे रिश्तेदारों को ये एक असामान्य बात लगी थी, जिन्होंने हमेशा उन नामों को चुना है जो आसानी से चक्किलियारों या अछूतों से जुड़े होते हैं. लेकिन मेरे माता-पिता की तरह, मुझे भी गैर-बराबरी के व्यवहार का सामना करना पड़ा.

मेरी शिक्षा और आय मेरी पहचान को नहीं बदल पाई, और कभी बदल भी नहीं सकेगी. लेकिन खुद दलित आंदोलनों द्वारा ही इस झूठ को फैलाया जाता है.

मेरे पिता सफाईकर्मी का काम करते थे और मेरी मां एक स्थानीय स्कूल में स्वीपर थीं. पिछले 15 वर्षों से मैंने अपने माता-पिता और उनके जैसे लाखों अन्य लोगों के साथ उनके काम – सफाईकर्मी/स्वीपर/मेहतर – की वजह से होने वाले भेदभाव और छुआछूत की समस्या से निपटने को लेकर काम किया है.

हम तमिलनाडु की चक्किलियार/अरुंथथियार जाति के हैं, जिन्हें विशेष रूप से साथ के अछूतों द्वारा प्रवासी या बाहरी बताया जाता है. इसका कारण ये है कि अरुंथथियार की पहली भाषा तेलुगु के करीब है. अविभाजित आंध्रप्रदेश, केरल, तमिलनाडु, असम, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर और कर्नाटक में अपने शोध के दौरान मैंने पाया कि इन सभी राज्यों में सफाईकर्मियों को बाहरी लोगों के रूप में देखा जाता है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे दूसरे राज्यों से गए थे या नहीं. ये दिलचस्प है कि अविभाजित आंध्रप्रदेश के अलावा सभी दक्षिण भारतीय राज्यों में सफाईकर्मी तेलुगु बोलते हैं. आंध्रप्रदेश में वे हिंदी, और ओडिया से मिलती-जुलती एक बोली का प्रयोग करते हैं.


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मेहतरों और स्वीपरों को ऊंची जाति के हिंदुओं के घरों में प्रवेश की अनुमति नहीं है. इस कारण से शौचालय भी घर से बाहर बनाए जाते हैं. भारतीय समाजशास्त्रियों और मानवविज्ञानियों ने जातियों और भारतीय घरों के अंतर्संबंधों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है, जहां दलितों के लिए अलग प्रवेश की व्यवस्था होती है (जैसा कि अधिकांश भवनों में देखा जा सकता है). वैसे ग्रामीण इलाकों में हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं.

इसके विपरीत, मस्जिदों में परिसर के भीतर ही शौचालय की व्यवस्था होती है. शौचालय को अपवित्र नहीं माना जाता है. इसी कारण से मुझे मस्जिदें पसंद आती हैं. मुझे एक भी वजह नहीं दिखती कि दलित हिंदूवाद का बोझ क्यों उठाते रहें.

कौन हैं दलित?

कई लोग मुझसे दलित कैमरा से ‘दलित’ शब्द को हटाने का अनुरोध करते हैं. दलित कोई अछूतों के भौतिक अस्तित्व को दर्शाने वाला शब्द नहीं है, यह एक क्रांतिकारी अवधारणा है जिसकी दलित पैंथर्स ने कल्पना की थी. अब मेरी कोई जाति नहीं है. लेकिन दलित कैमरा का हिस्सा होना दलित पैंथर्स, और अपने प्यारे मुस्लिम भाइयों और बहनों के प्रति मेरी एकजुटता का प्रतीक है.

हमारे लिए, बाबा साहेब आंबेडकर की तस्वीर ही अपने आप में काफी है. ये उनकी विचारधारा और न्याय की अवधारणा को व्यक्त करती है.

इसलिए दलितों और मुसलमानों को एक लड़ाई लड़नी है. मुसलमानों की लड़ाई संवैधानिक है, लेकिन दलितों की लड़ाई सामाजिक है, जो कहीं अधिक कठिन है. बहुत से दलित अभी भी नहीं जानते हैं कि हिंदू धर्म के कारण ही उनके साथ गैर-बराबरी का व्यवहार किया जा रहा है. इसी कारण से दलितों को ये भान नहीं है कि वे भी एक दिन खुद को बिना नागरिकता के पा सकते हैं.

(रईस मोहम्मद, जिन्हें पहले रविचंद्रन बथरान के नाम से जाना जाता था, दलित कैमरा @dalitcamera के संस्थापक हैं. व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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