5 अगस्त 1965 को जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की घुसपैठ के लिए केवल ‘मूक सहमति’ की ज़रूरत थी, लेकिन पूरी तरह से सैन्य अभियान चलाने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी ज़रूरी थी. पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल मूसा खान ने लिखित आदेश पर जोर दिया.
लेकिन घटनाओं के एक अजीब मोड़ में, विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने खुद कमान संभाली. वह खैबर पख्तूनख्वा की खूबसूरत स्वात घाटी पहुंचे, जहां राष्ट्रपति अयूब खान कैंपिंग कर रहे थे और वहां से उन्होंने एक निर्देश प्राप्त किया, जिसका शीर्षक था—‘कश्मीर की जद्दोजहद के लिए सियासी मकसद’.
भुट्टो इससे ज्यादा कुछ और नहीं चाह सकते थे. इस घोषणा ने उन्हें अपने सभी कैबिनेट सहयोगियों से ऊपर कर दिया और सेना को निर्देश की शर्तों को समझने और लागू करने के लिए भुट्टो पर निर्भर रहना पड़ा.
सूचना सचिव अल्ताफ गौहर ने इस निर्देश से उद्धरण दिया: “(सेना को) ऐसा कदम उठाना था जिससे कश्मीर मसला फिर से एक्टिव हो जाए, भारत के संकल्प को कमजोर किया जा सके और उसे बातचीत की मेज पर लाया जा सके, बिना किसी बड़े युद्ध को भड़काए.”
भुट्टो की खास शेखी और घमंड झलकाते हुए, इसमें आगे कहा गया, “एक सामान्य नियम के तौर पर, हिंदुओं का मनोबल सही समय और सही जगह पर दिए गए दो कड़े झटकों से ज्यादा नहीं टिकेगा. इसलिए ऐसे मौकों को तलाशा जाना चाहिए और उनका फायदा उठाया जाना चाहिए.”
इस तरह, 1 सितंबर 1965 की तड़के पाकिस्तान ने भारत पर अपना पूरा हमला शुरू कर दिया. पाकिस्तान ने 70 टैंकों और दो ब्रिगेड की एक टुकड़ी को रणनीतिक रूप से बेहद अहम शहर अखनूर पर कब्ज़ा करने के लिए आगे बढ़ाया, ताकि पंजाब और कश्मीर के बीच की सप्लाई लाइन को तोड़ा जा सके. अगर अखनूर पर कब्ज़ा हो जाता, तो कश्मीर घाटी बहुत कमज़ोर हो जाती.
शुरुआत में पाकिस्तान को कुछ सफलता मिली और पहले ही दिन चंब पर कब्ज़ा कर लिया गया. मेजर जनरल अख्तर हुसैन मलिक के नेतृत्व में 12वीं डिवीजन अखनूर की ओर बढ़ रही थी, जो वहां से सिर्फ 12 मील दूर था.
इसी अहम मोड़ पर मलिक को कमान से हटा दिया गया—औपचारिक रूप से ऑपरेशन जिब्राल्टर की विफलता के कारण, लेकिन असल में इसलिए ताकि वह अखनूर में संभावित जीत का श्रेय न ले सकें, जो उस समय लगभग तय लग रही थी.
सेना प्रमुख जनरल मूसा खान की नाराज़गी के बावजूद, मलिक की जगह याह्या खान को नियुक्त किया गया. अयूब और याह्या दोनों सुन्नी पठान थे, जबकि मूसा खान शिया थे और मलिक अहमदिया समुदाय से थे.
हवाई हमलों से सीमा पार तक
प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने बहुत कम समय में कैबिनेट की बैठक बुलाई. कैबिनेट ने उनके उस फैसले को मंजूरी दी, जिसमें भारतीय वायुसेना (आईएएफ) को अखनूर की ओर बढ़ रही पाकिस्तानी सेना को रोकने की अनुमति दी गई. 1 सितंबर को शाम 5:19 बजे (भारतीयसमयानुसार), आईएएफ ने 26 ग्राउंड सपोर्ट मिशन शुरू किए, जिनमें पाकिस्तान के एक दर्जन टैंक, कई भारी तोपें और 62 वाहन नष्ट कर दिए गए. इसके बाद पाकिस्तान भागते हुए सुरक्षा परिषद पहुंचा. दरअसल, संयुक्त राष्ट्र भारत और पाकिस्तान सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) ने 31 अगस्त को ही एक रिपोर्ट सुरक्षा परिषद को दी थी, जिसमें कहा गया था कि “वर्तमान सैन्य संघर्ष जल्दी ही बड़े स्तर तक पहुंच सकता है और कश्मीर से बाहर पूरी तरह सैन्य टकराव में बदल सकता है.”
अगले दिन (2 सितंबर), शास्त्री ने अपने कैबिनेट सहयोगियों, विपक्षी दलों के नेताओं, रक्षा बलों के शीर्ष अधिकारियों और गृह, रक्षा व विदेश मंत्रालय के अफसरों के साथ कई बैठकें कीं. इन बैठकों में सीमा की स्थिति पर विस्तार से चर्चा हुई. शास्त्री ने अपने साथियों को समझाया कि कश्मीर की रक्षा के लिए पश्चिमी पाकिस्तान पर ध्यान भटकाने वाला हमला जरूरी है, जिससे “उन्हें अपने ही इलाकों की रक्षा के लिए कश्मीर का अभियान छोड़ना पड़े.”
तनाव बढ़ने के फायदे और नुकसान, जिसमें पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान तथा चीन के खिलाफ तीन मोर्चों पर युद्ध की आशंका भी शामिल थी—पर खुली और साफ चर्चा के बाद, भारत ने 3 सितंबर को अपने तीन युद्ध उद्देश्य तय किए.
ये थे;
अ) कश्मीर को बलपूर्वक कब्जाने की पाकिस्तान की कोशिशों को नाकाम करना और यह साफ कर देना कि पाकिस्तान को कभी भी भारत से कश्मीर छीनने नहीं दिया जाएगा, ब) पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाओं की ‘आक्रामक शक्ति’ को नष्ट करना और स) इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए केवल उतना ही पाकिस्तानी इलाका कब्ज़े में लेना जितना ज़रूरी हो, जिसे युद्ध के संतोषजनक रूप से खत्म होने के बाद खाली कर दिया जाएगा.
इन युद्ध उद्देश्यों की घोषणा के तुरंत बाद, शास्त्री ने आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) से देश को संबोधित किया: “(हमारा) झगड़ा पाकिस्तान के लोगों से नहीं है. हम उनके भले की कामना करते हैं; हम चाहते हैं कि वे आगे बढ़ें, हम उनके साथ अमन और दोस्ती से रहना चाहते हैं. इस मौजूदा संघर्ष में असली मुद्दा सिद्धांत का है. क्या किसी देश को यह अधिकार है कि वह किसी दूसरे देश में अपने सशस्त्र लोगों को इस खुले उद्देश्य से भेजे कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को गिरा दे?” और आगे उन्होंने कहा, “यहां न कोई हिंदू है, न मुसलमान, न सिख, न ईसाई, बल्कि सिर्फ भारतीय हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि इस देश के लोग, जिन्होंने पहले भी अपनी देशभक्ति साबित की है, देश की रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़े होंगे.”
इस तरह पाकिस्तान के लिए 1965 के युद्ध की शुरुआत की तारीख 3 सितंबर मानी गई, जब भारत ने औपचारिक रूप से यह बताया कि वह “पंजाब और राजस्थान सेक्टरों में अंतरराष्ट्रीय सीमा पार पाकिस्तान के इलाके पर कब्ज़ा करेगा”, ताकि कश्मीर से पाकिस्तान को बाहर किया जा सके.
पाकिस्तान को यह गलतफहमी थी कि वह सैन्य कार्रवाई को केवल कश्मीर तक सीमित रख सकता है, क्योंकि उसे लगता था कि भारत कभी भी निर्विवाद अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने की हिम्मत नहीं करेगा. यह फैसला भारत के लिए भी आसान नहीं था. आरडी प्रधान ने अपनी किताब Debacle to Resurgence में वाईबी चव्हाण का बयान दर्ज किया है: “अंतरराष्ट्रीय सीमा पार पाकिस्तान पर हमला करने का फैसला बहुत मजबूरी में लिया गया कदम था और इसमें बड़ा जोखिम था. यह कदम पूरी स्थिति की तस्वीर बदल देगा. अगर हम असफल होते, और मैं इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता, तो देश असफल हो जाता. देश जीत गया.”
इसी बीच, 2 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासचिव यू थांट ने शास्त्री और अयूब खान दोनों को एक जैसी चिट्ठी लिखकर तुरंत “सीजफायर” करने को कहा. 4 सितंबर को शास्त्री का जवाब सख्त था: “आपका संदेश ऐसा है कि इससे यह आभास मिलता है कि जो खतरनाक घटनाएं हुई हैं, उनके लिए हम पाकिस्तान के बराबर जिम्मेदार हैं. जब तक आपके संदेश को हालात की सच्चाई के संदर्भ में नहीं पढ़ा जाता, यह भारत और पाकिस्तान के बीच एक तरह की बराबरी दिखाता है, जिसे तथ्य सही साबित नहीं करते.”
जब 11 सितंबर को अमेरिकी राजदूत गोल्डबर्ग की अध्यक्षता में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने इसी तरह का प्रस्ताव पास किया, तो संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि जी. पार्थसारथी ने साफ कहा कि “हालांकि, सीजफायर ज़रूरी है, लेकिन यह तब तक नहीं हो सकता जब तक पाकिस्तान को आक्रामक देश के रूप में पहचाना न जाए और उससे पीछे हटने को न कहा जाए.” यह उसी रुख की दोहराई थी कि युद्ध की शुरुआत 5 अगस्त को पाकिस्तान ने की थी.
यही मुद्दा जनवरी 1966 में हुई ताशकंद शिखर बैठक में सबसे बड़ा विवाद का कारण बना.
(यह ताशकंद घोषणा पर आधारित लेखों की सीरीज़ का दूसरा लेख है.)
(संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (एलबीएस म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, पीएमएमएल के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.)
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
