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Wednesday, 4 March, 2026
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खामेनेई के जाने के बाद अब अमेरिका-इज़राईल का राजनीतिक लक्ष्य क्या होगा?

ईरान का सबसे अच्छा दांव यह होगा कि वह अमेरिका को ज़मीन पर लंबे समय तक महंगे युद्ध में उलझाए रखकर थका दे और जीत हासिल करे, जैसा कि वियतनाम, अफगानिस्तान और कुछ हद तक इराक में हुआ.

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होनी होकर रही. ईरान के खिलाफ इजरायल-अमेरिका की जंग—‘ऑपरेशन एपिक फ्युरी’—शनिवार की रात (अमेरिकी समय के अनुसार) करीब सवा एक बजे हवाई और मिसाइल हमलों से शुरू हुई, जिसमें आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई मारे गए. ईरान ने अपने सुप्रीम लीडर की मौत की पुष्टि की है. इज़राईली सेना के अनुसार, ईरान के रक्षा मंत्री अजीज नसीरजादे और ‘आईआरजीसी’ के प्रमुख मोहम्मद पाकपौर समेत सात बड़े राजनीतिक नेता और सैन्य अधिकारी भी मारे गए हैं.

पिछले 30 घंटों से इज़रायल-अमेरिका की सेना ईरान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व, कमांड और कंट्रोल सिस्टम, परमाणु संयंत्र, एयर डिफेंस, बैलिस्टिक मिसाइलों, नौसेना के साधनों और अन्य सैन्य ठिकानों को निशाना बना रही है. ईरान ने जवाब में बहरीन, कतर, यूएई, कुवैत, जॉर्डन और सऊदी अरब में इज़रायल और अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर हमला किया है.

‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने यह बड़ी सैन्य कार्रवाई इसलिए शुरू की क्योंकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को इस स्तर तक बढ़ा रहा था कि वह अमेरिका तक मार करने वाली मिसाइलें बना सके.

इसमें कोई शक नहीं कि इस युद्ध का राजनीतिक लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन कराना है. कोई 2003 के बाद सबसे बड़ा नेवल और एयर आर्मडा सिर्फ़ इसलिए इकट्ठा नहीं करता कि बातचीत का नतीजा अच्छा आए और तानाशाही सरकार बनी रहे. ओमान के विदेश मंत्री बदर बिन हमाद अल बुसईदी ने जेनेवा में ओमान की पहल पर हुई वार्ता के दौरान कहा कि ईरान ने संवर्धित यूरेनियम का भंडार न बनाने और ‘आईएईए’/अमेरिका की निगरानी और जांच की शर्त मान ली है. पिछले साल जून की तरह इस बार भी बातचीत का इस्तेमाल रणनीतिक धोखे के लिए किया गया. राष्ट्रपति ट्रंप और इज़राईली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान की जनता से कहा है कि वे आगे आएं और अपनी सरकार बदल दें.

अमेरिका-इज़राईल की सैन्य रणनीति क्या हो सकती है? और इससे भी ज्यादा ज़रूरी सवाल है कि ईरान का राजनीतिक लक्ष्य और सैन्य रणनीति क्या हो सकती है?

ईरान का राजनीतिक लक्ष्य और सैन्य रणनीति

ईरान का राजनीतिक लक्ष्य साफ है: 1979 से सत्ता में बैठी मौजूदा सरकार को बचाए रखना. ईरान के इस्लामी गणतंत्र ने रजा शाह पहलवी की दमनकारी और अलोकप्रिय राजशाही को हटाया था, लेकिन पिछले 47 सालों में यह इस्लामी गणतंत्र राजशाही से भी ज्यादा दमनकारी और अलोकप्रिय बन गया है. इसने लोगों पर शिया शरीअत लागू की, इस्लामी उम्मा का नेतृत्व पाने की कोशिश और परमाणु हथियार कार्यक्रम के कारण आर्थिक प्रतिबंध झेले, जिससे देश की अर्थव्यवस्था कमज़ोर हुई. दमन और आर्थिक तंगी से लोगों में गुस्सा बढ़ा, खासकर महिलाओं पर शरीया कानून के विरोध में की गई सख्ती ने हालात और खराब किए.

मुल्ला आंदोलन की सफलता की एक बड़ी वजह यह थी कि पुरानी शाही सेना तटस्थ रही. इसके बाद सुरक्षा के लिए इस्लामी गणतंत्र ने ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स’ (आईआरजीसी)—सेपाह—बनाया. इसमें ‘बासिज’ नाम की गैर-पेशेवर सेना भी शामिल है, जो धार्मिक सरकार के आदेश लागू करती रही है. ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान आर्मी’—आर्तेश—एक सामान्य नियमित सेना है.

इस्लामी गणतंत्र और आईआरजीसी के नेताओं को पता है कि अगर सत्ता बदली तो उन्हें सड़कों पर या कानून के जरिए मौत का सामना करना पड़ सकता है. शिया विचारधारा में शहादत को महत्व दिया जाता है, इसलिए उन्हें उम्मीद है कि गृहयुद्ध में भी वे जीत सकते हैं. इसलिए ईरान का सबसे अच्छा दांव यह होगा कि वह अमेरिका को ज़मीन पर लंबे और महंगे युद्ध में उलझाकर थका दे, जैसा वियतनाम, अफगानिस्तान और कुछ हद तक इराक में हुआ. हालांकि, अमेरिका की ज़मीन पर लड़ाई की कोई योजना नहीं है. वह हवाई, मिसाइल और ड्रोन हमलों, समुद्री घेराबंदी और स्पेशल फोर्स के गुप्त ऑपरेशन पर निर्भर रहेगा. ईरान के पास इसका सीधा जवाब नहीं है.

ईरान की संभावित सैन्य रणनीति

ईरान की संभावित मिलिट्री स्ट्रैटेजी यह होगी कि लंबे समय तक हवाई, मिसाइल और ड्रोन कैंपेन से हुए नुकसान को झेला जाए और US-इज़राइल के लिए मिलिट्री शर्मिंदगी पैदा की जाए. इसके लिए वह बड़े मिलिट्री या सिविलियन एसेट्स पर हमला करेगा ताकि वे पीछे हटें या, इससे भी बदतर, घरेलू दबाव के कारण ज़मीनी हमले के रूप में गुस्से में जवाब दिया जाए. इसके तहत ईरान का लक्ष्य किसी बड़े जहाज, यहां तक कि विमानवाहक पोत को डुबोना, हवाई अड्डों को नुकसान पहुंचाना, खाड़ी और पड़ोसी देशों के तेल कुओं और रिफाइनरियों को निशाना बनाना या नागरिकों को लक्ष्य बनाना हो सकता है.

पिछले अनुभव के बाद राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व अंडरग्राउंड बंकरों में छिप सकता है, लेकिन अब साफ है कि कोई जगह पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. ज़रूरत पड़ी तो नियमित सेना को हटाया जा सकता है ताकि वह तटस्थ न हो. आईआरजीसी और नियमित सेना ज़मीन पर पारंपरिक युद्ध लड़ सकती हैं और ‘बासिज’ छापामार युद्ध लड़ सकता है. हाउदी और हिज्बुल्ला जैसे सहयोगी भी अपने क्षेत्रों में अमेरिका-इजरायल और उनके साथियों को निशाना बना सकते हैं. सरकार की अलोकप्रियता के कारण बड़े जन आंदोलन की संभावना कम है.

अमेरिका-इज़राईल की सैन्य रणनीति

बिना ज़मीन पर सेना उतारे, सत्ता परिवर्तन के साफ लक्ष्य के साथ अमेरिका-इजरायल ईरान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को कमज़ोर करने और कमांड सिस्टम को तोड़ने के लिए लगातार हवाई, मिसाइल और ड्रोन हमले जारी रख सकते हैं. साथ ही एयर डिफेंस, बैलिस्टिक मिसाइल, सैन्य, बिजली और आर्थिक ढांचे को भी निशाना बनाया जा सकता है.

स्पेशल फोर्स और सरकार विरोधी लड़ाके अंदर से ऑपरेशन को मजबूत कर सकते हैं. इलेक्ट्रॉनिक और साइबर हमले आधुनिक हथियारों को निशाना बनाने के साथ सूचना व्यवस्था भी ठप कर सकते हैं.

ज़रूरत पड़ने पर आईआरजीसी, नियमित सेना और बासिज के सैनिकों को माफी की घोषणा कर उन्हें तटस्थ करने की कोशिश की जा सकती है. अगर सेना तटस्थ हो जाती है, तो उम्मीद है कि जनता सड़कों पर उतरकर बाकी काम कर देगी.

अमेरिका-इज़राईल की हवाई सुरक्षा दुनिया में सबसे आधुनिक मानी जाती है. वे इसका इस्तेमाल ईरान की रणनीति को नाकाम करने और अपने विमानवाहक पोतों को सुरक्षित दूरी पर रखके कर सकते हैं.

पूर्वानुमान

अभी युद्ध के नतीजे पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी. अमेरिका और इजरायल अपनी सैन्य क्षमता दिखा चुके हैं. ईरान की ऐतिहासिक सहनशक्ति भी मजबूत है. उसके पास आईआरजीसी और बासिज जैसी कट्टर धार्मिक ताकतें हैं.

अमेरिका की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह ईरान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को कितना कमजोर कर पाता है, सेना को तटस्थ बना पाता है और सरकार के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा कर पाता है. ईरान के लिए जरूरी है कि उसका नेतृत्व सुरक्षित रहे, सेना वफादार रहे, वह अमेरिका को बड़ी सैन्य चुनौती दे सके और जनता का समर्थन हासिल कर सके.

अनुभव बताता है कि असली युद्ध शुरू होने के बाद बहुत कम योजनाएं पूरी तरह लागू हो पाती हैं. अंतिम नतीजा क्या होगा, यह समय ही बताएगा.

लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के GOC इन C थे. रिटायरमेंट के बाद, वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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