Monday, 27 June, 2022
होममत-विमतक्या याद रखें और क्या भूल जाएं, बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद के सबक

क्या याद रखें और क्या भूल जाएं, बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद के सबक

इतिहास को करेक्ट करने की 'कट ऑफ लाइन' क्या होगी? हिंदुत्व की विचारधारा चाहती है कि इतिहास को ठीक करने का काम पांच-छह सौ साल पहले तक ही हो और उससे पहले जो हुआ, उसे भूल जाना चाहिए.

Text Size:

याद रखना यानी स्मरण यानी मेमरी एक जरूरी चीज है. हम क्या हैं, कौन हैं, हमारे होने का उद्देश्य क्या है, हम किस देश के हैं, किस समाज या परिवार के हैं, ये सब कुछ याद रखने से जुड़ी बातें हैं. ऐसे समाज या देश की कल्पना करना भी मुश्किल है जिसमें लोगों को कुछ भी याद न हो. लेकिन बहुत ज्यादा याद रखना, खासकर अप्रीतिकर, कष्टकारी, बुरे अनुभवों को याद रखना राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक हो सकता है.

वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद मामले में यही हो रहा है.

ये मस्जिद पुरानी है. हो सकता है इसका इतिहास चार सौ या पांच सौ साल पुराना हो. अब इसके इतिहास को नए सिरे से खंगाला जा रहा है और इसके आधार पर कुछ लोग सत्य का संधान करने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ लोग इसके आधार पर राजनीति कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग इसका इस्तेमाल समुदायों के बीच कड़वाहट बढ़ाने के लिए कर रहे हैं.

ये मुमकिन है कि इस मस्जिद को बनाते समय कुछ ऐसा हुआ हो, जो किसी समुदाय को असहज करता हो. मुमकिन है कि ऐसा कुछ भी न हुआ हो.

इस लेख का मकसद ये पता लगाना नहीं है कि मस्जिद बनाते समय क्या हुआ था. मेरा निवेदन सिर्फ इतना है कि उस समय जो कुछ हुआ था, उससे अगर राष्ट्र निर्माण, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा नहीं मिल रहा हो, तो उन घटनाओं या न घटी घटनाओं को भूल जाना चाहिए.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें


यह भी पढ़ें: दोगुनी रफ्तार से मर रहे हैं उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के ट्रॉपिकल फॉरेस्ट, जलवायु परिवर्तन है बड़ा कारण


अच्छी और बुरी यादें तथा राष्ट्र निर्माण

यहां हम दो तरह की स्मृतियों या यादों की बात कर रहे हैं. पहली स्मृतियां वे हैं, जिनका मानव और राष्ट्र के विकास में या न्याय के लिए महत्व होता है. हमें ये याद रखना चाहिए कि मानव विकास में हम किन दौर से गुजरे और हर दौर ने हमें क्या सिखाया.

राष्ट्र के तौर पर हमें याद रखना चाहिए कि अन्य नागरिकों के साथ मिलकर हमने किस तरह से राष्ट्र को बनाया और किस तरह हमने साथ मिलकर अच्छी और सुखद चीजें कीं. हमें ये भी याद रखना चाहिए कि अतीत में क्या किसी समुदाय के साथ ऐसा अन्याय हुआ है, जिसकी छाया उनके वर्तमान पर भी है. इस याद के आधार पर उन समुदायों के लिए विशेष अवसर प्रदान करने को लेकर सहमति बन सकती है. ऐसी जानकारी के आधार पर कोई समुदाय अपने विशेषाधिकार या प्रिविलेज को छोड़ने का भी फैसला कर सकता है. संगीत, कला, साहित्य, विज्ञान, ये सब क्रमिक विकास से यहां तक पहुंचे हैं. इनके इतिहास को याद रखना चाहिए.

क्या ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ा इतिहास और उसकी यादें इनमें से किसी श्रेणी में फिट बैठती हैं?

ज्ञानवापी मस्जिद निर्माण के दौरान जो कुछ हुआ होगा, उसका इतिहास और उससे जुड़ी यादें न तो राष्ट्र निर्माण में मददगार हैं और न ही इससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है. मानव सभ्यता के इतिहास को आगे बढ़ाने में भी इन यादों की कोई भूमिका नहीं है. न ही कला या विज्ञान के क्षेत्र में इन यादों का कोई महत्व है. बल्कि इससे जुड़ी यादों की अलग- अलग व्याख्याएं भारत की राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को कमजोर ही बनाती हैं. अगर कोई पक्ष ये मानता है कि इस मस्जिद को बनाने के दौरान मंदिर को तोड़ा गया था और इसे यादों में ताजा रखकर अगर कोई पक्ष उस ऐतिहासिक ‘अपराध’ का न्याय करने के लिए आज बैठता है तो इसके कई तरह के परिणाम हो सकते हैं.

अयोध्या में मस्जिद गिराने के बाद अब काशी और आगे चलकर अगर हर मस्जिद का इतिहास इसी तरह खंगाला गया तो क्या आगे चलकर ये मांग नहीं उठ सकती कि तमाम पुराने मंदिरों का भी इतिहास खंगाला जाए. ये भी तो मुमकिन है कि उनमें से ज्यादातर मंदिर बौद्ध या जैन धर्मस्थलों को तोड़कर बनाए गए हों. आखिर ये तो एक ऐतिहासिक तथ्य है ही कि भारत के सबसे बड़े भूभाग पर राज करने वाले सम्राट चंद्रगुप्त जैन और सम्राट अशोक बौद्ध थे. उनके बनाए धर्मस्थल यूं ही तो गायब नहीं हो गए होंगे. उनके बाद भी पाल और कुषाण जैसे बड़े बौद्ध वंशों का भारत में राज रहा. उनके समय के बने स्तूप और बुद्ध मूर्तियां अक्सर यहां-वहां खुदाई में मिलती रहती हैं. ये भी तो मुमकिन है कि पुराने मंदिर स्तूपों के ऊपर बने हों. या स्तूपों को ही मंदिर का रूप दे दिया गया हो.

सवाल उठता है कि इतिहास को करेक्ट करने की ‘कट ऑफ लाइन’ क्या होगी? हिंदुत्व की विचारधारा चाहती है कि इतिहास को ठीक करने का काम पांच-छह सौ साल पहले तक ही हो और उससे पहले जो हुआ, उसे भूल जाना चाहिए.

हिंदुत्व की विचारधारा के लिए उससे पहले का इतिहास अप्रीतिकर और असहज करने वाला है. इतिहास में इससे पीछे जाने पर ये पता चलेगा कि भारत में बौद्ध और जैन धर्म लगभग खत्म कैसे हो गया. पीछे जाने के क्रम में ये पता चलेगा कि जाति व्यवस्था भारतीय समाज में कैसे व्याप्त हुई. ये जानकारी भी मिलेगी कि क्या द्रविड़ों और आर्यों में सचमुच कोई संघर्ष हुआ था. हो सकता है कि ये जानकारी मिले कि सिंधु घाटी सभ्यता का विनाश कैसे हुआ? यहां तक कि मुगल काल और दूसरे मुसलमान शासकों के दौर को ठीक से खंगालने से ये भी पता चलेगा कि मुस्लिम शासक किन हिंदू शासकों के बुलावे पर भारत आए या वे जब आए तो किन लोगों ने लड़ने की जगह हाथ मिला लेना या रिश्तेदारियां बना लेना पसंद किया. इस काल के इतिहास में ये जानकारियां भी मिलेंगी कि किन हिंदू जातियों और समाजों को मुगल दरबारों में जगह मिली.

क्या हम ये सब जानना और याद रखना चाहते हैं? हिंदुत्व की वैचारिकी फैलाने वालों को मुगल काल का भी चुना हुआ इतिहास ही क्यों चाहिए? बाबर, अकबर और औरंगजेब के साथ राणा सांगा, मान सिंह और मिर्जा जय सिंह और राजा बीरबल, टोडरमल, तानसेन आदि का भी तो इतिहास था. इसलिए मैं कहता हूं कि याद रखना जोखिम का काम हो सकता है.


यह भी पढ़ें: अंडे, स्याही और थप्पड़- शरद पवार की NCP क्यों आक्रामक तेवर अपना रही है


राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी है भूलना

हर राष्ट्र के निर्माण के दौरान कुछ अच्छा और कुछ बुरा होता है. राष्ट्र निर्माण हमेशा एक तकलीफदेह प्रक्रिया है क्योंकि इस दौरान कुछ अस्मिताओं, कुछ इलाकों और समुदायों को साथ लाना पड़ता है. ये प्रक्रिया जरूरी नहीं है कि हमेशा सहमति से हो. दुनिया का इतिहास बताता है कि खासकर बड़े राष्ट्रों के निर्माण के दौरान अक्सर असहमत अस्मिताओं और इलाकों को जबरन राष्ट्र में शामिल किया जाता रहा है.

मिसाल के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस जैसे देश लंबे समय तक और कई बार हुए गृह युद्ध और आक्रमण के बाद बने. इस दौरान एक इलाके ने दूसरे इलाकों पर हमला किया, उन्हें पराजित किया, अत्याचार हुए और किए गए और तब जाकर राष्ट्र उस शक्ल में पहुंचा जहां आज वे नजर आ रहे हैं.

अमेरिका में तो उत्तरी राज्यों की सेनाओं ने दक्षिणी कनफेडरेट राज्यों की सेनाओं को भीषण गृह युद्ध में पराजित किया, जिसमें अनुमान है कि 10 लाख से ज्यादा सैनिक मारे गए. दक्षिण कनफेडरेट राज्यों की हार को अगर इतिहास से हटा दें तो संयुक्त राष्ट्र अमेरिका संभवत: मौजूदा रूप में नहीं होता. इसी तरह फ्रांस में दर्जनों अस्मिताएं फ्रांसिसी अस्मिता में विलीन हुईं, तब जाकर फ्रांस बना. फ्रांस में ये सब सौ साल से ज्यादा समय तक चला. इटली की मौजूदा शक्ल इसलिए है क्योंकि उत्तरी इटली ने दक्षिणी इटली और कई द्वीपों को युद्ध में पराजित किया. ये बेहद भीषण युद्ध था और इस दौरान नागरिकों की हत्या और बलात्कार जैसे युद्ध अपराध खूब किए गए. इंग्लैंड तो आपसी युद्धों के बाद ही बना देश है और वहां तो एकीकरण अब तक पूरा नहीं हुआ है. आयरलैंड और स्कॉटलैंड के काफी लोग अब भी मन से खुद को ब्रिटेन का हिस्सा नहीं मानते.

अब सवाल उठता है कि अगर अमेरिका के दक्षिणी राज्यों के लोग हर वक्त ये याद रखें और सोचते रहें कि उत्तर वालों ने हमें हराया था और हमारे युवा सैनिकों को मारा था तो इसी तरह अगर उत्तरी राज्यों के लोग दक्षिण वालों को पराजित मानें और इस वजह से उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करें तो क्या अमेरिका सच्चे मायने में एक राष्ट्र बन पाएगा?

इसी तरह दक्षिण इटली के लोग अगर इस बात को लेकर बैठे रहें कि उत्तर वालों ने किस तरह हमें हराया और हमारे परिवार की महिलाओं का बलात्कार किया, तो क्या इटली एक राष्ट्र बन पाएगा? क्या उत्तरी इटली वाले अगर दक्षिण इटली की हार का सालाना जश्न मनाएं तो क्या ये इटली की एकता को खंडित करने वाली बात नहीं होगी?

अगर फ्रांस की हर नस्ल और हर कबीले से आए लोग अपनी पुरानी जड़ों को ही अपनी प्राथमिक पहचान मानें तो क्या वे सही मायने में फ्रांस के नागरिक बन पाएंगे? क्या नागरिकों को ये याद रखना चाहिए कि लगभग हजार साल पहले, 9वीं और 10वीं शताब्दी में किन कबीलों के लोगों ने उनके कबीलों पर किस तरह के अत्याचार किए थे और क्या इस आधार पर उन्हें दूसरे कबीलों से नफरत करनी चाहिए?

ये सच है कि राष्ट्र निर्माण के दौरान उन देशों में बहुत कुछ बुरा हुआ होगा. लेकिन अब वहां इसकी चर्चा नहीं होती और चर्चा होती भी है तो इतिहास के लेखन और पठन-पाठन में. ये वहां नफरत और राजनीति का आधार नहीं है.

भारत को अगर सच्चे मायने में एक राष्ट्र बनना है तो अतीत की बुरी यादों को भूलना होगा. उन यादों को इतिहास की किताबों में रहने दें, उन यादों को नफरत और कटुता का आधार बनाना राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाएगा.

(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


यह भी पढ़ें: फिलहाल ज्ञानवापी को भूलकर वाराणसी को 2006 के बमकांड मामले में तो इंसाफ दिलाइए


 

share & View comments