विदुर जी द्वारा कहा जाने वाला श्लोक महाभारत में दिया गया नैतिक उपदेश है, जो बताता है कि नेताओं और लोगों को मुश्किल फैसले कैसे लेने पड़ते हैं:
त्यजेत् कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् .
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥
(कुल के लिए एक व्यक्ति का त्याग किया जा सकता है; गांव के लिए कुल का त्याग किया जा सकता है;
जनपद/राष्ट्र के लिए गांव का त्याग किया जा सकता है; आत्मा के लिए पृथ्वी का त्याग किया जा सकता है.)
आज की वैश्विक राजनीति की स्थिति में, यह सोचने का समय है कि एक व्यक्ति का महत्व ज्यादा है या बाकी लोगों का महत्व ज्यादा है.
उक्त श्लोक केवल बड़े कारणों के लिए त्याग की बात करता है, लेकिन ईरान की जंग, जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है, क्या महाभारत का यह श्लोक हमें दोबारा सोचने के लिए कहता है? क्या हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि क्या त्याग करना है और इसकी कीमत कौन तय करता है?
जब हम इस पर सोच रहे हैं, तब अमेरिकी पायलटों को “दुश्मन के इलाके” से बचाया गया और वे अपने देश वापस भेजे जाने का इंतज़ार कर रहे हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बयान में कहा कि पहली बार अमेरिकी पायलटों को दुश्मन के इलाके के अंदर से बचाया गया है.
ट्रंप ने कहा, “हम कभी भी किसी अमेरिकी सैनिक को पीछे नहीं छोड़ेंगे! हम इन दोनों ऑपरेशन को बिना एक भी अमेरिकी के मारे जाने या घायल हुए पूरा कर पाए, यह फिर साबित करता है कि हमने ईरान के आसमान में पूरी तरह हवाई ताकत और बढ़त हासिल कर ली है.”
वहीं, ईरान ने रविवार को दावा किया कि उसने कई दुश्मन विमानों को नष्ट कर दिया, जिनमें अमेरिका का सी-130 विमान और दो ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर शामिल हैं. युद्ध के 35वें दिन तक पहुंचने के बाद भी दोनों पक्ष पीछे हटने के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं.
देश राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लोगों की जान जाने को सही ठहरा रहे हैं और रणनीतिक ताकत के लिए पूरे समुदायों के नुकसान को भी सही बताया जा रहा है. विचारधारा (जैसे वेनेजुएला हमले को सही ठहराने में) या वैश्विक प्रभाव (जैसे ईरान युद्ध में) के नाम पर शहरों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. यह विदुर की उस पंक्ति की याद दिलाता है, “राष्ट्र के लिए गांव का त्याग किया जा सकता है.”
लेकिन यह श्लोक नैतिक रूप से सोचने के लिए भी कहता है. अगर “स्व” का मतलब अहंकार नहीं, बल्कि अंतरात्मा या मानवता माना जाए, तो यह श्लोक नेताओं को अपने निजी हित और सत्ता की राजनीति से ऊपर उठने की चुनौती देता है, चाहे वह किसी नेता का अहंकार हो या किसी देश की ताकत.
जब ‘बड़ा हित’ अंतहीन युद्ध बन जाता है
कुछ लोग यह सोचकर युद्ध शुरू करते हैं कि यह “बड़े हित” के लिए है. इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं. इराक युद्ध (2003-2011) कथित तौर पर WMD (विनाश के बड़े हथियार) खोजने के लिए लड़ा गया, जो एक “तानाशाह” ने छिपा रखे थे. बाद में ये दावे गलत साबित हुए. इराक पर यह आरोप भी लगाया गया कि सद्दाम हुसैन का अल-कायदा से संबंध था और उसने 9/11 हमले में शामिल आतंकवादियों की मदद की थी. इस संबंध का कोई पक्का सबूत कभी नहीं मिला. तब यह सवाल उठता है कि इस “बड़े हित” की जंग से आखिर किसका फायदा हुआ, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता, हिंसा और बहुत ज्यादा जान-माल का नुकसान हुआ.
इस बीच 9/11 हमले के दोषी और अल-कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में छिपे हुए थे, जिसे आतंकवाद की ज़मीन माना जाता है. आखिरकार अमेरिकी नेवी सील्स ने उसे वहीं ढूंढा और मार गिराया.
रूस-यूक्रेन का चल रहा संघर्ष भी एक लंबी और विनाशकारी लड़ाई बन गया है, जिसमें दोनों तरफ भारी नुकसान हुआ है. इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है और ऊर्जा व खाद्य की कमी भी हुई है. यह सोचने पर मजबूर करता है कि यूरोप की सबसे उपजाऊ ज़मीन पर युद्ध के विस्फोटों का कितना असर पड़ा होगा और पर्यावरण को कितना नुकसान हुआ होगा.
दिलचस्प बात यह है कि जहां यूक्रेन अपने सक्षम लोगों को रूस के खिलाफ युद्ध में लगा रहा है, वहीं कुछ युवा यूक्रेनी पुरुष भारत में टूरिस्ट वीज़ा पर थे. “बड़े हित” के बजाय इस संघर्ष ने बहुत दुख और वैश्विक अस्थिरता पैदा की है, जिसमें किसी की साफ जीत नहीं दिख रही.
अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष भी व्यापक अस्थिरता का उदाहरण है, जबकि दुनिया यह सोच रही है कि आखिर इस युद्ध की वजह क्या है. अमेरिका के अनुसार यह अभियान ईरान की परमाणु मिसाइल क्षमता और उसके सहयोगी नेटवर्क को खत्म करने के लिए है, लेकिन इस संघर्ष ने मध्य पूर्व में अभूतपूर्व अस्थिरता पैदा कर दी है. इसके असर ऑस्ट्रेलिया और एशिया तक महसूस हो रहे हैं: ऊर्जा की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी (ब्रेंट क्रूड के अनुसार 40 प्रतिशत तक), क्षेत्रीय सुरक्षा पर खतरा और विश्व व्यापार में बाधा इसके तुरंत प्रभाव हैं. दुबई, कुवैत और अबू धाबी जैसे आर्थिक केंद्र, जिन्हें पहले सुरक्षित माना जाता था, अब मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. ईरान के खिलाफ कार्रवाई का उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और आतंक के केंद्र को कमजोर करना बताया जा रहा है, लेकिन क्या ईरान वास्तव में पाकिस्तान से बड़ा खतरा था?
यूरोप में अमेरिका के सहयोगी देश भी इस युद्ध का समर्थन नहीं कर रहे हैं, जिससे “बड़े हित” का तर्क और कमज़ोर हो जाता है. संस्कृत का यह श्लोक मानकर चलता है कि “बड़े हित” के लिए क्या त्याग करना है, इस पर नैतिक स्पष्टता होनी चाहिए. आज यह नैतिक स्पष्टता नजर नहीं आती.
यह किसका नैरेटिव है?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वर्षों में, संघर्ष की आवाज़ें काफी हद तक शांत हो गई थीं. शीत युद्ध के चरम समय पर भी सशस्त्र टकराव टाल दिए गए, जो असली कार्रवाई से ज्यादा प्रतीकात्मक था. देशों ने अधिकतर शांति बनाए रखी, और नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) और वारसॉ पैक्ट (1955-1991) ने असली युद्ध की जगह राष्ट्रीय दिखावे ज्यादा किए.
2000 के शुरुआती वर्षों में चर्चा तकनीक, ग्लोबल वार्मिंग, सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की ओर मुड़ गई और GDP बढ़ने लगे. जैसे-जैसे देश विकसित हुए, हमारी सोच भी बदली. ज्यादा लोग अपनी बात रखने लगे, शासन में भाग लेने लगे और सोशल मीडिया के आने से विचार खुलकर और जोर से साझा होने लगे. आज बहुत कम लोग युद्ध के पक्ष में हैं. दुनिया अपने आप युद्ध नहीं चाहती, जब तक युद्ध उस पर थोपा न जाए.
“एजेंट प्रोवोकेटर” (उकसाने वाला) का विचार उक्त संस्कृत श्लोक के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है. आमतौर पर श्लोक मानता है कि बड़ा और सही उद्देश्य होने पर सोच-समझकर त्याग किया जाता है. लेकिन जब उकसाने वाले लोग या संगठन, चाहे राज्य हों या गैर-राज्य, जानबूझकर हिंसा भड़काते हैं, नैरेटिव बदल देते हैं या अलग-अलग प्रतिक्रियाएं पैदा करते हैं, तो नैतिक क्रम टूट जाता है. ऐसे संकट बनाए जाते हैं जहां त्याग ज़रूरी लगता है, और देश बड़े उद्देश्य के नाम पर लोगों, समुदायों और नैतिक सीमाओं को छोड़ने लगते हैं.
जब तक कोई उकसाने वाला न हो, देश आपस में नहीं लड़ते. आम तौर पर मानव इतिहास शांत रहता है, जब तक उसे उकसाया न जाए. लेकिन सीरिया, पहलगाम और वेनेजुएला जैसे मामलों में कुछ छोटे समूहों की कहानी को आगे बढ़ाया गया. पाकिस्तान मुसलमानों पर अत्याचार की कहानी बताता रहा है, लेकिन पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, बलूचिस्तान और अपने ही हिंदू, सिख और ईसाई लोगों के साथ हुए बुरे व्यवहार को भूल जाता है. अगर पहलगाम की घटना न होती, तो ऑपरेशन सिंदूर भी नहीं होता.
इसी तरह, 7 अक्टूबर 2023 के हमलों से पहले इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच एक संतुलन था. हमास ने उकसाने का काम किया. मतभेदों का फायदा वे लोग उठाते हैं जो अपने हित साधना चाहते हैं. ऐसे हालात में त्याग की व्यवस्था धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि धोखे के आधार पर तय होने लगती है.
तब श्लोक की अंतिम चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है और नैतिक समझ यह मांग करती है कि जानबूझकर पैदा किए गए संघर्ष से सावधान रहें. वरना खतरा है कि इंसानियत ऐसी उकसावे वाली स्थितियों के कारण दुनिया को नष्ट करने लगे, जहां विनाश सही लगने लगता है.
किसी की नहीं जंग
ट्रंप बार-बार इससे बाहर निकलने की बात करते हैं, इसलिए NATO अब “नॉन-अमेरिकन ट्रीटी” जैसा बन गया है. इससे फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा, “हम सभी को स्थिरता, शांति और सामान्य स्थिति में वापसी चाहिए–यह कोई शो नहीं है”, जिससे साफ होता है कि वे मौजूदा संघर्ष के बढ़ने से असहज हैं. ईरान युद्ध में संयम की उनकी मांग एक बड़े सवाल को सामने लाती है–यह जंग आखिर किसकी है?
जब इस आधुनिक संघर्ष को “किसी की भी नहीं जंग” कहा जाता है, तो यह संस्कृत श्लोक के गलत इस्तेमाल को चुनौती देता है. अगर जंग किसी की नहीं है, तो त्याग मांगने का नैतिक अधिकार किसके पास है?
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने पहले कहा था कि कनाडा “अफसोस के साथ” इस युद्ध का समर्थन करता है, भले ही अंतरराष्ट्रीय कानून टूटा हो, लेकिन 10 मार्च को उन्होंने हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा कि कनाडा इस संघर्ष में “कभी हिस्सा नहीं लेगा”. हालांकि, कनाडा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ खोलने के लिए बातचीत में भाग लेने को तैयार है, क्योंकि इसके बंद होने से दुनिया पर आर्थिक असर पड़ रहा है.
आज पृथ्वी पर सबसे ज्यादा आबादी है. दुनिया ज्यादा समावेशी और विकसित हो चुकी है. कोई भी युद्ध नहीं चाहता, और यह एक ऐसी जंग है जो हम पर थोपी गई है.
महाभारत के श्लोक को देखते हुए सवाल उठता है कि संयम रखना उच्च नैतिक रास्ता है या इससे आगे और आक्रामकता बढ़ती है?
किसी की नहीं जंग की कीमत
मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध की मानवीय, सैन्य, आर्थिक और व्यापारिक कीमत बहुत ज्यादा हो चुकी है. हज़ारों लोगों की जान जा चुकी है और आम लोगों व महत्वपूर्ण ढांचे का भारी नुकसान हुआ है. सैन्य खर्च तेज़ी से बढ़ा है. अमेरिका अरबों डॉलर खर्च कर चुका है, जबकि यह युद्ध एक हफ्ते में खत्म होने वाला बताया गया था, लेकिन एक महीने से ज्यादा हो गया है. आधुनिक हथियार और रक्षा सिस्टम इतनी तेजी से नष्ट हो रहे हैं कि भविष्य की तैयारी पर असर पड़ सकता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के बंद होने से तेल सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमत बढ़ गई है. 23 मार्च के अपने लेख में मैंने ईरान युद्ध के आर्थिक नुकसान के बारे में लिखा था.
इसके अलावा कई ऐसे नुकसान भी हैं जिन्हें सीधे मापा नहीं जा सकता. मध्य पूर्व के बाज़ार में निवेशकों का भरोसा कम हो रहा है, उड़ानों के बंद होने का खर्च बढ़ रहा है, यात्रा महंगी हो रही है, दुबई और अबू धाबी जैसे शहरों को नुकसान हो रहा है और इसका असर पूरी दुनिया में महसूस हो रहा है. कतर से मिलने वाली हीलियम की कमी से सेमीकंडक्टर और ऑटोमोबाइल उद्योग पर असर पड़ेगा. मध्य पूर्व के डीसैलिनेशन प्लांट, ऊर्जा प्लांट और तेल भंडार को नुकसान से पर्यावरण पर लंबे समय तक असर रहेगा.
तेल से जुड़े ढांचों पर हमलों से जहरीली गैसें, धातु और प्रदूषण मिट्टी, पानी और हवा में फैल रहे हैं. आग, तेल रिसाव और गैसों का उत्सर्जन पर्यावरण को और ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है.
ईरान के वित्त मंत्री अब्बास अराघची ने संयुक्त राष्ट्र को लिखे पत्र में कहा, “बुशहर परमाणु बिजली संयंत्र के पास बार-बार हमले बहुत चिंता की बात हैं. इससे पूरे क्षेत्र में रेडियोधर्मी प्रदूषण का गंभीर खतरा है, जिससे इंसानों और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ेगा.”
परमाणु केंद्रों पर हमलों के लंबे समय के परिणामों के बारे में सोचकर डर लगता है.
आखिर में, “किसी की नहीं जंग” पूरी दुनिया का बोझ बन जाती है और इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और सभी देशों पर पड़ेगा. इससे कोई भी बच नहीं पाएगा.
भारत के लिए भू-राजनीतिक असर
जब दुनिया की “महाशक्तियां” अपने हिसाब से फैसले लेती हैं, नियमों की परवाह नहीं करतीं, संयुक्त राष्ट्र को नज़रअंदाज़ किया जाता है और सहयोगियों की सलाह भी नहीं मानी जाती, तो सवाल उठता है कि क्या नई विश्व व्यवस्था की ज़रूरत है? और क्या इसमें भारत के लिए अवसर है या इससे भारत की कमजोरी बढ़ेगी?
वैश्विक नियम कमज़ोर होने से यह स्थिति भारत की अर्थव्यवस्था को पीछे धकेल सकती है और ऊर्जा व संसाधनों की कमी का खतरा बढ़ सकता है. लेकिन संस्कृत श्लोक के साथ देखें तो यह समय भारत के लिए रणनीतिक अवसर भी दे सकता है.
अगर दुनिया अलग-अलग समूहों में बंट रही है, तो भारत को किसी एक शक्ति के लिए खुद को कुर्बान करने की ज़रूरत नहीं है. भारत अमेरिका, रूस, ईरान, इज़रायल और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ संतुलन बनाकर अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रख सकता है.
आधुनिक नए शीत युद्ध के दौर में भारत को गुटनिरपेक्ष आंदोलन जैसी नीति अपनानी चाहिए, यानी देश के बड़े हित के लिए सभी देशों के साथ संबंध बनाए रखना चाहिए. अगर “स्व” का मतलब देश का हित और सभ्यता के मूल्यों से जोड़ा जाए, तो भारत का असली मौका किसी एक पक्ष को चुनने में नहीं, बल्कि नई व्यवस्था बनाने में है, जहां भारत दुनिया को संतुलित करने वाली ताकत बन सकता है. यहां किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय संयम ही सबसे बड़ी रणनीति बन सकता है.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
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