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Thursday, 8 January, 2026
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भारत-पाकिस्तान ताशकंद समझौते के दौरान क्या हुआ था?

ताशकंद समझौते के दौरान सोवियत संघ ने प्रोटोकॉल पर खास ध्यान दिया. दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के लिए व्यवस्थाएं बिल्कुल एक जैसी थीं. इस वार्ता को अमेरिका और ब्रिटेन का भी समर्थन मिला था.

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छह दशक पहले, भारत और पाकिस्तान के बीच अहम बातचीत 3 से 10 जनवरी 1966 तक उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में चली थी. उस समय ताशकंद सोवियत संघ का हिस्सा था. इन वार्ताओं का नतीजा ताशकंद घोषणा पत्र के रूप में निकला, जिस पर दोनों देशों ने 1965 के युद्ध को औपचारिक रूप से खत्म करने के लिए हस्ताक्षर किए.

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारत का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ताशकंद गया था. इसमें रक्षा मंत्री वाईबी चव्हाण, विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह, प्रधानमंत्री के सचिव एलके झा, गृह सचिव एलपी सिंह, विदेश सचिव सीएस झा, सेना के उप प्रमुख पीपी कुमारमंगलम, पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त केवल सिंह, सोवियत संघ में भारत के राजदूत टीएन कौल और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के संयुक्त सचिव सीपी श्रीवास्तव शामिल थे.

पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व राष्ट्रपति अयूब खान कर रहे थे. इसमें विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो, वाणिज्य मंत्री गुलाम फारूक खान, सूचना मंत्री ख्वाजा शाहाबुद्दीन और सूचना सचिव अल्ताफ गौहर शामिल थे.

गौहर सिर्फ सूचना सचिव ही नहीं थे—वह अयूब खान के भरोसेमंद सहयोगी और किताब Friends, Not Masters के मुख्य लेखक भी थे. दोनों प्रतिनिधिमंडलों के बीच एक बड़ा फर्क यह था कि जहां भारतीय टीम नियमित रूप से चर्चा करती थी और शास्त्री के नेतृत्व में एकजुट थी, वहीं पाकिस्तानी टीम में हमेशा आपसी खींचतान चलती रहती थी. भुट्टो अक्सर “ताशकंद छोड़ देने और देश को भरोसे में लेने” की धमकी देते थे. भुट्टो और गौहर के बीच टकराव काफी तीखा था (भुट्टो के पाकिस्तान की बागडोर संभालने के बाद गौहर को जेल में डाल दिया गया था).

ताशकंद ही क्यों?

ताशकंद प्राचीन सिल्क रोड का हिस्सा था और भले ही यह बल्ख और बुखारा जितना प्रसिद्ध नहीं था, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी हिस्सों में यह एक जाना-पहचाना नाम था. उन्नीसवीं सदी के मध्य में इसे रूसी साम्राज्य में शामिल कर लिया गया था और 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद यह सोवियत संघ का हिस्सा बन गया.

भारत-पाकिस्तान वार्ता के लिए ताशकंद को इसलिए चुना गया क्योंकि यह नई दिल्ली (1,570 किमी) और तत्कालीन पाकिस्तान की राजधानी रावलपिंडी (1,580 किमी) — दोनों से लगभग बराबर दूरी पर था. इसके अलावा, उज्बेक राष्ट्रपति मैडम यादगार नसरीदिनोवा सोवियत प्रीमियर एलेक्सी कोसिगिन की करीबी सहयोगी थीं.

सोवियत संघ ने प्रोटोकॉल पर बहुत ध्यान दिया. दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के लिए व्यवस्थाएं बिल्कुल एक जैसी थीं. शास्त्री, अयूब खान और कोसिगिन के लिए बनाए गए तीनों विला (जहां बातचीत हुई) आकार और बनावट में बिल्कुल एक जैसे थे. कोसिगिन ने बराबरी पर जोर अपनी उद्घाटन भाषण में भी दिया. उन्होंने वार्ता को “भारत-पाकिस्तान” और “पाकिस्तान-भारत” — दोनों शब्दों का 13-13 बार इस्तेमाल किया. इन वार्ताओं को अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैरोल्ड विल्सन का भी समर्थन प्राप्त था.

5 अगस्त या 3 सितंबर: सीजफायर लाइन या अंतरराष्ट्रीय सीमा

दोनों तारीखें अहम थीं, क्योंकि तारीख के चयन से यह तय होता था कि किस देश को हमलावर माना जाएगा. भारत के अनुसार, संघर्ष की शुरुआत 5 अगस्त 1965 को हुई थी, जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर सेक्टर में सीजफायर लाइन पार कर ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ शुरू किया.

पाकिस्तान ने 60 कंपनियां भेजीं, जिनमें से हर एक में करीब 110 सशस्त्र लोग (सिविल कपड़ों में) शामिल थे. इन्हें कश्मीर के 60 अलग-अलग इलाकों में जाने और वहां आगजनी, हत्या, पुलों, संचार व्यवस्था और सरकारी संपत्ति को नष्ट करने के निर्देश दिए गए थे. इसके लिए स्टेन गन, हथगोले और अन्य विस्फोटकों का इस्तेमाल किया जाना था.

जिब्राल्टर की पांच यूनिट—तारीक, कासिम, खालिद, सलाहुद्दीन और गजनवी जैसे मुस्लिम सेनापतियों के नाम पर—तोपखाने की गोलाबारी की आड़ में जम्मू-कश्मीर में दाखिल हुईं. इनके निशाने पर गुरेज़, कुपवाड़ा, उरी, पुंछ, मेंढर, नौशेरा और अखनूर जैसे इलाके थे.

हालांकि, भारत शुरू में चौंक गया था, लेकिन इससे भी बड़ा झटका पाकिस्तानी सैनिकों को लगा. उन्हें स्थानीय लोगों का ज़रा भी समर्थन नहीं मिला. उल्टा, उनकी मौजूदगी की सूचना जम्मू-कश्मीर पुलिस को दे दी गई, जिसने उन्हें तुरंत सीजफायर लाइन पर तैनात पंजाब पुलिस के हवाले कर दिया.

इस तरह 8 अगस्त 1965 को, जिस दिन प्रस्तावित विद्रोह शुरू होना था, क्योंकि यह शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी की बरसी थी—यह ऑपरेशन बिखर गया. पाकिस्तानी प्रतिष्ठान के लिए यह और भी शर्मनाक था कि ऑपरेशन जिब्राल्टर की पूरी योजना ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित कर दी गई.

15 अगस्त का लाल किले से दिया गया भाषण

एक हफ्ते बाद, लाल किले की प्राचीर से बोलते हुए प्रधानमंत्री शास्त्री ने कहा, “इस हमले की पूरी जिम्मेदारी पाकिस्तान की है. पाकिस्तान ने हमले के बाद आंतरिक विद्रोह की उम्मीद की थी. वह कश्मीर में अशांति बढ़ाना चाहता है. ऐसी स्थिति में बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है. हम कश्मीर में अमन और चैन चाहते हैं, लेकिन अगर हम पर हमला किया गया, तो सरकार की जिम्मेदारी है कि बल का जवाब बल से दे.”

उन्होंने आगे कहा, “हमें अपनी सीमाओं की रक्षा करनी है और उन लोगों की साजिशों को नाकाम करना है, जो हम पर बुरी नज़र डालते हैं. आज जिस झंडे के नीचे हम खड़े हैं, उसकी इज्जत बनाए रखनी होगी. हम भले ही नष्ट हो जाएं, लेकिन अपने झंडे का सम्मान कभी धूमिल नहीं होने देंगे. भारत आगे बढ़ता रहेगा और समृद्ध होता रहेगा.”

अपनी परंपरा के अनुसार, शास्त्री ने अंत में सभी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आज़ाद हिंद फौज के नारे—‘जय हिंद’—को दोहराने के लिए कहा, और पूरे जनसमूह ने पूरी ताकत और जोश के साथ इसका जवाब दिया.

जिब्राल्टर से ग्रैंड स्लैम तक

ऑपरेशन जिब्राल्टर की करारी हार के बाद पाकिस्तान ने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू किया, जिसमें पूरी तरह से सैन्य हमला किया गया. 23 अगस्त को पाकिस्तान सेना की तीन कंपनियों ने, हल्की मशीन गनों और मोर्टार से लैस होकर, मेंढर सेक्टर में घुसने की कोशिश की, लेकिन उन्हें पीछे हटा दिया गया.

भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) के प्रमुख जनरल रॉबर्ट हैरोल्ड निमो को जनरल जेएन चौधरी ने इन घुसपैठ की घटनाओं की जानकारी दी. यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के महासचिव यू थांट को भेजी गई. अमेरिकी मीडिया को भी इसकी भनक लग गई थी. द डेनवर पोस्ट की एक रिपोर्ट (जिसे 28 अगस्त को हिंदुस्तान टाइम्स ने छापा) में कहा गया, “कश्मीर में सीमा पर हो रही लड़ाई की जिम्मेदारी हमलावर पर होनी चाहिए, और वह पाकिस्तान नजर आता है.”

रिपोर्ट में वॉशिंगटन पर भी सवाल उठाए गए थे और कहा गया था कि अमेरिका से भारी सैन्य और आर्थिक मदद मिलने के बावजूद पाकिस्तान चीन की ओर बढ़ रहा है.

उस समय पाकिस्तान अमेरिका समर्थित दो रक्षा समझौतों का सदस्य था: सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (CENTO) और साउथ ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (SEATO).

अगस्त के आखिर तक भारत ने भी ताकत दिखाने का फैसला किया. 28 अगस्त को भारतीय सेनाओं ने सीएफएल के साथ उरी-पुंछ लूप में अपने ठिकानों से पाकिस्तानी सैनिकों को बाहर खदेड़ दिया. इन्हीं कार्रवाइयों के दौरान भारत ने रणनीतिक रूप से अहम हाजी पीर दर्रे पर कब्ज़ा किया और 8,600 फीट की ऊंचाई पर तिरंगा फहराया. बाद में इस चौकी को लौटाना एक बेहद विवादास्पद मुद्दा बन गया.

सीएफएल या एलएसी

पाठक ध्यान दें कि इस कॉलम में सीजफायर लाइन (सीएफएल) शब्द का इस्तेमाल किया गया है, न कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी). रिकॉर्ड के लिए बता दें कि 1972 के शिमला समझौते के बाद, कुछ छोटे बदलावों के साथ, सीएफएल को एलएसी के रूप में नामित किया गया था. हालांकि, पहलगाम हमलों के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि रद्द किए जाने के चलते पाकिस्तान ने 24 अप्रैल 2025 को इस समझौते को निलंबित कर दिया. इसके बाद एलएसी फिर से सीएफएल बन गई है.

(यह ताशकंद घोषणा पर आधारित लेखों की सीरीज़ का पहला लेख है.)

(संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (एलबीएस म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, पीएमएमएल के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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