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Wednesday, 28 January, 2026
होममत-विमतबीते दस साल में चर्चित बीफ लिंचिंग मामलों की फॉरेंसिक लैब रिपोर्ट में क्या मिला?

बीते दस साल में चर्चित बीफ लिंचिंग मामलों की फॉरेंसिक लैब रिपोर्ट में क्या मिला?

दिप्रिंट ने गौरक्षकों द्वारा की गई लिंचिंग के कई मामलों की पड़ताल की. कितने मामलों में पीड़ितों के पास सच में बीफ था?

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नई दिल्ली: पिछले एक दशक में, बीफ रखने या ले जाने के शक में की गई हत्याएं और गंभीर हमले पूरे भारत में बार-बार सुर्खियां बने हैं, लेकिन बहुत कम लोगों ने हर मामले के उतार-चढ़ाव को आखिरी तक फॉलो किया. तो फॉरेंसिक रिपोर्ट में उस मांस के बारे में क्या सामने आया?

दिप्रिंट ने गौरक्षकों की भीड़ द्वारा की गई लिंचिंग के कुछ चर्चित मामलों की जांच की है.

मोहम्मद अखलाक (सितंबर 2015, उत्तर प्रदेश)

दादरी में मोहम्मद अखलाक की लिंचिंग 2015 में देश को झकझोर देने वाले शुरुआती मामलों में से एक थी. यह मामला यह भी दिखाता है कि लिंचिंग की जांच कितनी उलझी हुई हो सकती है.

अखलाक पर एक गाय काटने और उसका मांस अपने फ्रिज में रखने का आरोप था. ईद के तीन दिन बाद, एक भीड़ उनके घर में घुस गई. उनकी पत्नी को घसीटा गया, उनकी मां को टॉयलेट में बंद कर दिया गया. जिन लोगों के साथ वे बड़े हुए थे और जिन पड़ोसियों को दोस्त मानते थे, उन्हीं लोगों ने उनकी हत्या कर दी.

लिंचिंग के तीन महीने बाद, उत्तर प्रदेश पशु चिकित्सा विभाग ने कहा कि फ्रिज में मिला लगभग 4-5 किलो मांस बीफ नहीं बल्कि मटन था.

एक पशु चिकित्सा अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “मेरी जानकारी के अनुसार और सही तरीके से की गई शारीरिक जांच के बाद, यह मांस बकरी का प्रतीत होता है.”

पुष्टि के लिए सैंपल मथुरा की एक फॉरेंसिक लैब में भेजा गया.

छह साल बाद, पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन विश्वविद्यालय की एक नई रिपोर्ट ने पहले निष्कर्ष को सीधे तौर पर खारिज कर दिया और दावा किया कि मांस “गाय या उसके वंश” का था.

इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में केस वापस लेने की याचिका दायर की.

अखलाक के भाई जान मोहम्मद ने कहा, “मेरे भाई ने कोई गाय नहीं काटी थी. हमारे घर में गाय का मांस नहीं था. एक अफवाह के कारण भीड़ हमारे घर आई, जिसने मेरी मां के साथ बदसलूकी की, मेरे भतीजे पर हमला किया और मेरे भाई की बेरहमी से हत्या कर दी. तब हमारा देश हमें बचा नहीं पाया और अब भी नहीं, जब यूपी सरकार ने केस वापस लेने का फैसला किया.”

दादरी गांव में मोहम्मद अखलाक का घर अब भी खाली पड़ा है | इनसेट: मोहम्मद अखलाक | फोटो: साकिबा खान/दिप्रिंट
दादरी गांव में मोहम्मद अखलाक का घर अब भी खाली पड़ा है | इनसेट: मोहम्मद अखलाक | फोटो: साकिबा खान/दिप्रिंट

लुकमान खान (अगस्त 2020, हरियाणा)

30 साल के लुकमान खान चार बच्चों के पिता हैं और लकवाग्रस्त (पैरालाइज्ड) हैं. 31 जुलाई 2000 को, जब वह इस्लामपुर गांव से अपनी पिकअप ट्रक में मांस ले जा रहे थे, तब फ्लाईओवर के नीचे 8 से 10 लोगों की भीड़ ने उन पर हमला कर दिया. लुकमान ने तब दिप्रिंट को बताया था कि पुलिस की मौजूदगी में उन्हें करीब तीन घंटे तक पीटा गया और आखिर में श्मशान घाट पर उन्हें बचाया गया, जब भीड़ उन्हें ज़िंदा जलाने के लिए तैयार थी. भीड़ बार-बार उन्हें मुसलमान कहकर बुला रही थी और “जय श्री राम” का नारा लगवाने को कह रही थी.

पुलिस ने मांस का सैंपल फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा और बाद में रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि वह मांस न तो गाय का था और न ही उसकी नस्ल का. यह जानकारी एक सप्लीमेंट्री चार्जशीट में सामने आई. हालांकि, दिप्रिंट द्वारा देखे गए कोर्ट के दस्तावेज़ में यह साफ नहीं है कि जांच किस लैब में हुई और समय-सीमा क्या थी.

खान नूंह के रहने वाले थे और पिकअप ट्रक ड्राइवर का काम करते थे. उनके पिता बिलाल, जो अब सड़क किनारे ठेले पर फल बेचते हैं, बताते हैं कि इस इलाके में भैंस के मांस का व्यापार पारंपरिक पेशा रहा है और गुर्जर समुदाय के मांस व्यापारी बिना किसी परेशानी के यह काम करते रहे हैं, लेकिन खान, जो एक मुसलमान थे, निशाना बना दिए गए.

लुकमान ने कहा, “उन्होंने मुझसे करीब 50 बार ‘जय श्री राम’ बुलवाया होगा. जब मैंने कहा कि यह मेरे धर्म में नहीं है और मैंने अल्लाह का नाम लिया, तो उन्होंने मुझे और ज्यादा मारा.”

पास के घसेरा गांव के लोग रोज़ाना होने वाली परेशानियों का ज़िक्र करते हैं.

स्थानीय दुकानदार इरशाद ने कहा, “मैं यहां सड़क किनारे बिरयानी बेचता हूं और बजरंग दल के लोग अक्सर आते हैं, मेरी दुकान उलट देते हैं, बिरयानी का चावल फेंक देते हैं और हमसे पैसे मांगते हैं.”

हमले में लुकमान खान को कई फ्रैक्चर और चोटें आई हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
हमले में लुकमान खान को कई फ्रैक्चर और चोटें आई हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

उन्होंने मुझसे करीब 50 बार ‘जय श्री राम’ बुलवाया होगा. जब मैंने कहा कि यह मेरे धर्म में नहीं है और मैंने अल्लाह का नाम लिया, तो उन्होंने मुझे और ज्यादा मारा

नसीब कुरैशी (मार्च 2023, बिहार)

बिहार के छपरा में हिंदू समूहों ने 47 साल के नसीब कुरैशी की बीफ ले जाने के शक में हत्या कर दी. नसीब और फिरोज कुरैशी घर जा रहे थे, तभी 10-15 लोगों ने, जिनमें गांव का सरपंच भी शामिल था, उन पर हमला कर दिया.

पुलिस ने बताया कि यह घटना रसूलपुर में हुई. पीड़ित को लाठियों और धारदार हथियारों से बेरहमी से पीटा गया. जबकि फिरोज भागने में कामयाब हो गए, नसीब बाद में दरौदा अस्पताल में मिले, जहां उनका शव फेंक दिया गया था.

रसूलपुर थाना के एसएचओ राहुल कुमार श्रीवास्तव ने दिप्रिंट को बताया, “उनके पास या हमले की जगह के आसपास कहीं भी बीफ नहीं मिला.”

नसीब की मौत पटना ले जाते समय रास्ते में हो गई. उनकी मौत के बाद परिवार ने एफआईआर दर्ज कराई और बीएनएस की धारा 103 (हत्या) के तहत मामला दर्ज किया गया.

उनके पास या हमले की जगह के आसपास कहीं भी बीफ नहीं मिला

अफान अब्दुल अंसारी (जून 2023, महाराष्ट्र)

अफान अब्दुल अंसारी ने अपने 32वें जन्मदिन — 24 जून 2023 को आखिरी सांस ली.

अंसारी और उनके सहकर्मी नासिर हुसैन संगमनेर से मुंबई मांस ले जा रहे थे, तभी 11 लोगों की भीड़ ने उन्हें पीट-पीटकर मार डाला. इस मामले में भीड़ पर हत्या, दंगा और गैरकानूनी जमावड़े के आरोप लगे. वहीं, अंसारी और हुसैन पर भी पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए गए.

अंसारी के चाचा असगर ने दिप्रिंट को बताया कि उनका परिवार भैंसों का कारोबार करता है, बीफ का नहीं.

पुलिस ने बरामद मांस को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा, लेकिन रिपोर्ट दिप्रिंट के साथ साझा करने से इनकार कर दिया. घोटी पुलिस स्टेशन में बार-बार फोन करने और थानाध्यक्ष से बात करने के बावजूद पुलिस ने रिपोर्ट की जानकारी देने से मना कर दिया. मामले में अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी गई है.

मांस परिवहन उद्योग से जुड़े प्रतिनिधि शफीउल्लाह ने कहा कि ट्रांसपोर्ट रूट्स पर गौ-रक्षक समूहों द्वारा वसूली आम बात है.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “सुरक्षित आवाजाही के लिए ट्रांसपोर्टरों को रेगुलर रिश्वत देनी पड़ती है.”

मुंबई के देवनार स्लॉटरहाउस को भेड़, बकरी और भैंसों की सप्लाई के लिए क्षेत्रीय पशु परिवहन बेहद ज़रूरी है. ये जानवर कोल्हापुर, अहमदनगर, मालेगांव, संगमनेर, नासिक और पालघर से लाए जाते हैं. पशुओं की आवाजाही दस्तावेज़ पर निर्भर करती है, जिनमें बीएमसी से ऑनलाइन अनुमति, सरकारी डॉक्टर के प्रमाणपत्र और आरटीओ की मंजूरी शामिल है.

ट्रांसपोर्टरों को सुरक्षित आवाजाही के लिए नियमित रूप से रिश्वत देनी पड़ती है

साबिर मलिक (अगस्त 2024, हरियाणा)

25 साल के साबिर मलिक, जो पश्चिम बंगाल से आए कचरा बीनने वाले और प्रवासी मजदूर थे, उन्हें 27 अगस्त 2024 को हरियाणा के चरखी दादरी में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला.

असम और बिहार से आए प्रवासी मजदूरों द्वारा हवासा खुर्द गांव में बीफ खाने के दावों के बाद, हिंदू समूहों ने लोगों के घरों में घुसकर मांस की तलाश शुरू कर दी. पुलिस मौके पर पहुंची, मांस के सैंपल जब्त किए और “एहतियात के तौर पर” पांच प्रवासी मजदूरों को हिरासत में लिया.

लेकिन मलिक को कबाड़ बेचने के बहाने बस स्टैंड ले जाया गया, जहां भीड़ ने उन्हें पीट-पीटकर मार डाला.

लिंचिंग के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा, “गायों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं हो सकता. अगर गांवों को किसी वध की जानकारी मिल जाए…तो उन्हें कौन रोक सकता है?”

बाद में फरीदाबाद की फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) ने पुष्टि की कि पुलिस द्वारा बरामद मांस बीफ नहीं था.

बाढड़ा के डिप्टी एसपी भारत भूषण ने कहा, “हमें रिपोर्ट मिल गई है, जिसमें पुष्टि हुई है कि वह बीफ नहीं था.”

मलिक के बहनोई साजाउद्दीन सरदार ने दिप्रिंट को बताया, “एफएसएल रिपोर्ट ने वही साबित किया, जो हम चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे. बीफ खाने के आरोप पूरी तरह झूठे थे.”

एफएसएल रिपोर्ट ने वही साबित किया, जो हम चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे. बीफ खाने के आरोप पूरी तरह झूठे थे

अशरफ मुन्यर (अगस्त 2024, महाराष्ट्र)

72 साल के अशरफ मुन्यर, जो जलगांव जिले के निवासी थे, धुले-सीएमटी एक्सप्रेस से अपनी बेटी के लिए मालेगांव मांस ले जा रहे थे. उनके पास दो प्लास्टिक के डिब्बों में मांस था. सह-यात्रियों को शक हुआ कि वह बीफ ले जा रहे हैं.

दर्जनों लोगों ने उन्हें घेर लिया, थप्पड़ मारे और गालियां दीं. हमले का वीडियो वायरल हो गया. वीडियो में लोग बार-बार पूछते दिखते हैं: “क्या ले जा रहे हो? कहां जा रहे हो? कहां से हो? वहां बकरियां नहीं मिलतीं? कितने लोग इसे खाएंगे?”

मुन्यर ने कहा कि डिब्बों में भैंस का मांस था.

मुंबई रेलवे पुलिस के अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि मांस को नाले में फेंक दिया गया था, जिससे फॉरेंसिक जांच संभव नहीं हो सकी. जांच 30 अगस्त को की गई, यानी वीडियो वायरल होने के एक दिन बाद.

पुलिस ने मुन्यर पर हमला करने वाले अज्ञात लोगों के खिलाफ बीएनएस की कई धाराओं में मामला दर्ज किया, जिनमें गैरकानूनी जमावड़ा, दंगा, गलत तरीके से रोकना, चोट पहुंचाना, शरारत, आपराधिक धमकी और शांति भंग करने के इरादे से अपमान शामिल है.

मोहम्मद शाहिदीन (जनवरी 2025, उत्तर प्रदेश)

1 जनवरी 2025 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में मोहम्मद शाहिदीन को गाय काटने के शक में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला.

शाहिदीन अतिरिक्त कमाई के लिए पिकअप ट्रक चलाने का फ्रीलांस काम कर रहे थे. पुलिस के पहुंचने से पहले उन्हें करीब एक घंटे तक पीटा गया. बाद में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

उनका परिवार पूरा दिन अलग-अलग जगहों पर भटकता रहा, तब जाकर पुलिस ने बताया कि उन्हें किस अस्पताल में ले जाया गया था और उनकी हालत क्या थी.

पति की हत्या वाली रात शाहिदीन की पत्नी रिजवाना ने दिप्रिंट से पूछा, “किसने उन्हें किसी जानवर की मौत पर किसी इंसान की जान लेने का अधिकार दिया?”

वकील सिमाब कय्यूम ने बताया, एक साल बाद मामले में आंशिक चार्जशीट दाखिल की गई. अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है. इसके बजाय, शाहिदीन के सहयोगी अदनान पर ही उनकी हत्या का आरोप लगाया गया है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगे की जांच पर रोक लगा दी है क्योंकि शाहिदीन के परिवार ने याचिका दायर कर कहा कि लिंचिंग मामलों की जांच से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पूनावाला फैसले के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया. परिवार ने 50 लाख रुपये मुआवजे और विशेष जांच टीम (एसआईटी) के गठन की मांग की.

जांच रुकी होने के कारण फॉरेंसिक रिपोर्ट जारी नहीं की गई है. मामला एक सांड के वध के आरोप से जुड़ा है. पूनावाला फैसले में लिंचिंग मामलों की जांच के लिए बाध्यकारी दिशानिर्देश तय किए गए हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि जांच नोडल अधिकारी की निगरानी में और धारा 103(2) के तहत की जाए, जो लिंचिंग से संबंधित है.

किसने उन्हें किसी जानवर की मौत पर किसी इंसान की जान लेने का अधिकार दिया?

चमन कुमार (मई 2025, दिल्ली)

नेपाल के नागरिक चमन कुमार पर उत्तरी दिल्ली में चार से पांच लोगों ने हमला किया. शक था कि वह बीफ बेच रहे हैं. यह हमला 15 साल के एक लड़के की शिकायत के बाद हुआ, जिसने कुमार की दुकान से मांस खरीदा था और उसे गाय का मांस होने का शक हुआ.

पुलिस ने दुकान से मांस जब्त कर फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा. नॉर्थ वेस्ट जिले के डीसीपी भीषम सिंह के मुताबिक, एफएसएल रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि मांस गाय या उसकी नस्ल का था. मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी गई है.

पुलिस सूत्रों के अनुसार, इसके बाद कुमार और उनका परिवार दिल्ली छोड़कर चला गया.

नदीम (मई 2025, उत्तर प्रदेश)

उनकी लिंचिंग का वीडियो आज भी नदीम के मोबाइल की गैलरी में सबसे ऊपर है. यह ऐसी याद है, जिसे वह भूलना नहीं चाहते.

वीडियो में नदीम, जो मांस ट्रांसपोर्टर हैं और उनके तीन साथी — अकील, अकील और अरबाज़ निर्वस्त्र और खून से लथपथ हैं.

नदीम ने कहा, “बजरंग दल के सदस्यों ने हम चारों पर तब हमला किया, जब हम मांस ले जा रहे थे. उन्होंने हमें पीटा और लूटा.”

25 मई 2025 को अलीगढ़ में बाइक पर सवार लोगों के एक समूह ने नदीम की पिकअप का पीछा किया और चारों को एक घंटे से ज्यादा समय तक पीटा. यह सब दो पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हुआ, जो एक वैन में थे. पीड़ितों ने पुलिस को बताया था कि उनके पास लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन के कागज़ थे, जिन्हें भीड़ ने फाड़ दिया और उनसे नकद और मोबाइल फोन लूट लिए. मांस का सैंपल लेकर अलीगढ़ की फॉरेंसिक लैब में भेजा गया.

फॉरेंसिक रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि वे बीफ नहीं, बल्कि भैंस का मांस ले जा रहे थे.

एक पन्ने की इस रिपोर्ट पर जलाली के पशु अस्पताल के संयुक्त निदेशक के हस्ताक्षर हैं. इसमें रजिस्ट्रेशन नंबर, केस नंबर और एफआईआर का विवरण जल्दबाजी में लिखे गए हैं. निष्कर्ष में लिखा है: “रासायनिक विश्लेषण के आधार पर, सैंपल गाय या उसकी नस्ल का नहीं है.”

फिर भी नदीम और उनके साथियों पर उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 की धारा 3 (वध पर रोक), 5 (बीफ परिवहन पर रोक) और 8 (वध या परिवहन पर सजा) के तहत मामले दर्ज हैं.

नदीम ने 14 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई, जिन पर भारतीय न्याय संहिता की कई धाराओं में केस दर्ज हुआ, जिनमें दंगा, गैरकानूनी जमावड़ा, हत्या की कोशिश, जबरन वसूली और डकैती शामिल हैं. खास बात यह है कि उन पर धारा 103(2) नहीं लगाई गई, जो खास तौर पर मॉब लिंचिंग से जुड़ी है.

हमले के बाद से चारों लोग काम नहीं कर पा रहे हैं.

नदीम ने दिप्रिंट को बताया, “लिंचिंग के बाद से इलाके में इतना डर है कि हम अपनी दुकानें तक नहीं खोल पा रहे हैं और न ही काम कर पा रहे हैं.” उनके सिर में गंभीर चोटें आई थीं, जिनमें 36 टांके लगे.

रासायनिक विश्लेषण के आधार पर, सैंपल गाय या उसकी नस्ल का नहीं है

फॉरेंसिक जांच कैसे काम करती है

दिल्ली स्थित एक फॉरेंसिक लैब के एक सहायक ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया कि मांस के सैंपल की जांच डीएनए विश्लेषण के जरिए की जाती है.

लैब में प्रतिबंधित जानवरों के डीएनए सैंपल रखे जाते हैं, जिनमें गाय, ऊंट, बाघ, हाथी और अन्य जानवर शामिल हैं. जब्त किए गए मांस से निकाले गए डीएनए को इन रेफरेंस सैंपलों से मिलाया जाता है.

अधिकारी ने समझाया, “अगर डीएनए मैच हो जाता है, तो यह साफ हो जाता है कि मांस हमारे सैंपल किट में मौजूद किसी प्रतिबंधित जानवर का है. अगर मैच नहीं होता, तो हम सिर्फ इतना ही कह सकते हैं कि मांस हमारे रेफरेंस किट में मौजूद किसी जानवर का नहीं है; हम यह नहीं बता सकते कि वह किस जानवर का है.”

डीएनए जांच से जानवर का लिंग भी पता चल सकता है और अलग-अलग तरह के बोवाइन (गाय-भैंस वर्ग) मांस में फर्क किया जा सकता है. यहां तक कि टिशू (ऊतक) के छोटे सैंपल भी जांच के लिए पर्याप्त होते हैं. नतीजों की पुष्टि के लिए लैब अक्सर सैंपल की कई बार जांच करती है.

समयसीमा: आमतौर पर लैब में जांच में 36 घंटे लगते हैं. हालांकि, मामलों की ज्यादा संख्या के कारण अक्सर देरी हो जाती है. अधिकारी ने कहा, “यह इस बात पर निर्भर करता है कि लैब पर कितना काम का बोझ है और कितने मामले लंबित हैं.”

पर्यावरणीय कारण: सही नतीजों के लिए समय बहुत ज़रूरी होता है. “नमी या अन्य पर्यावरणीय कारणों से मांस सड़ सकता है. इसलिए जितनी जल्दी जांच हो, उतना बेहतर होता है.”

संसाधनों की कमी: नए डीएनए रेफरेंस सैंपल जुटाना महंगा होता है, इसलिए लैब मौजूदा सैंपल कलेक्शन के साथ ही काम करती हैं. इसका मतलब यह है कि लैब अपने डेटाबेस में मौजूद प्रतिबंधित जानवरों की पहचान तो पक्के तौर पर कर सकती हैं, लेकिन गैर-प्रतिबंधित जानवरों की सिर्फ पुष्टि नहीं होने की बात कह सकती हैं, उनकी सही पहचान नहीं कर पातीं.

व्यवहार में इसका मतलब यह है कि जब रिपोर्ट में लिखा होता है कि “सैंपल गाय या उसकी नस्ल का नहीं है”, तो इसका संकेत होता है कि मांस संभवतः भैंस या बकरी जैसे किसी वैध स्रोत का है, लेकिन उसका सही जानवर कौन सा है, यह तय नहीं हो पाता.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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