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प्रतीकात्मक तस्वीर :चाणक्यआईएएस एकेडमी
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सामाजिक न्याय और वंचितों की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाली तमाम राजनीतिक पार्टियों के होते, सवर्णों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा में बड़ी आसानी से पारित हो जाना इस सदी की सबसे अहम सामाजिक-राजनीतिक घटना मानी जा सकती है. बहुजन और समाजवादी धारा की पार्टियों के पास इतनी संख्या तो नहीं थी कि वे इस बिल को पास होने से रोक देते, लेकिन इस बिल का समर्थन करने की उनकी मजबूरी को समझ पाना मुश्किल है.

खास बात यह भी रही कि भारतीय जनता पार्टी की आरएसएस द्वारा संचालित सरकार ने इस फैसले पर किसी तरह की राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश तो दूर की बात, किसी तरह की सामान्य चर्चा भी नहीं कराई.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार के बाद, कांग्रेस की ओर सवर्ण मतदाताओं का रुझान बढ़ने की आशंका के कारण, संघ के थिंक टैंक ने विचार किया और सरकार से सवर्ण आरक्षण की घोषणा करवा दी. देखते ही देखते चालू संसद सत्र में लोकसभा की बैठक के आखिरी दिन विधेयक भी आ गया और चर्चा के बाद पारित भी करा दिया. राज्यसभा में इसके लिए सदन की बैठक आगे बढ़ानी पड़ी तो वह भी किया गया और सुनिश्चित किया गया कि हर हाल में इस सत्र में ये सवर्ण आरक्षण विधेयक पारित हो ही जाए.

सपा-बसपा ने खो दी अपनी पहचान

अब बात करें, सामाजिक न्याय की पक्षधर कही जाने वाली पार्टियों के इस विधेयक को लेकर रवैये की. इस पूरे घटनाक्रम में लगा कि अब ये पार्टियां केवल नाम के लिए ही सामाजिक न्याय की पक्षधर रह गई हैं और इनके अंदर अगर कोई थिंक टैंक है भी तो उसमें सामाजिक न्याय की विचारधारा वाले लोगों के लिए कोई जगह नहीं बची है.

सवर्ण आरक्षण लागू करने के ऐलान के बाद से लेकर अब तक, खासकर, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी चुपचाप भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के पीछे-पीछे चलती दिखाई दीं. भाजपा और कांग्रेस के साथ उनका किसी भी तरह का वैचारिक मतभेद नहीं दिखता है.

सपा ने बिना शर्त इस विधेयक का समर्थन कर दिया और दिखावे के लिए ये कह दिया कि ओबीसी को भी आबादी के अनुपात में आरक्षण मिलना चाहिए. वहीं बीएसपी की एकमात्र दिक्कत ये है कि ये बिल सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में क्यों लाया.

वैसे तो इस वैचारिक भिन्नता के समाप्त होने की बात पहले भी कई बार की जाती रही लेकिन इस घटना ने पूरी तरह से साबित कर दिया कि भाजपा और कांग्रेस से इनका झगड़ा केवल चुनावी ही है, केवल सीटों के लड़ने या बंटवारे करने तक सीमित है.


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बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती तो खुद ही गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की बात करती रही हैं, लेकिन आमतौर पर माना जाता था कि वे इस बात को लेकर गंभीर नहीं हैं, और केवल सवर्णों को चिढ़ाने के लिए ऐसे बयान देती हैं क्योंकि माना जाता था कि ऐसा संभव नहीं हो सकता.

अब उनके इसी विचार को भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस ने अपने हित में बहुत ही चालाकी से इस्तेमाल कर लिया, और ये दोनों दल देखते रह गए. वास्तव में तो ये लगा ही नहीं कि इन दलों की इस विधेयक के बारे में कोई सोच है.

सपा और बसपा की विचार शून्यता उजागर

इनके नेता केवल इसी बात पर खुश होते रहे कि इस बहाने संसद में उन्होंने प्रभावशाली भाषण दे लिए, पिछड़ों के साथ हुए अन्याय की बात कर ली, अनुसूचित जाति और जनजातियों के शोषण की बात कर ली, और इस बहाने उनके समर्थकों ने उनकी जय-जयकार कर दी.

ये सही है कि भारतीय जनता पार्टी ने बहुत ही चालाकी के साथ, सही समय देखकर, ये विधेयक पेश किया ताकि इस पर बुद्धिजीवियों की कोई राय सामने आ ही न सके.

वास्तव में विधेयक पेश होने या पारित होने के बाद ही, सामाजिक न्याय के पक्षधर बुद्धिजीवियों को पता चल पाया कि इस विधेयक में क्या-क्या खेल किए गए हैं. कई बातें तो अब तक स्पष्ट नहीं हैं, जबकि विधेयक दोनों सदनों में पारित हो चुका है.

ये दल जातिगत जनगणना कराए जाने की मांग तक पुरज़ोर तरीके से नहीं उठा पाए, जबकि इस विधेयक के पेश होने का कोई फायदा था तो बस यही था कि यह जातिगत जनगणना कराए जाने की मांग को बल देता था.

सवर्ण आरक्षण में कई गड़बड़ियां

पूरे विधेयक में बहुत सारी विसंगतियां रहीं लेकिन सामाजिक न्याय के पक्षधरों का ध्यान इस ओर गया ही नहीं. उदाहरण के लिए, मध्यप्रदेश में सारी ओबीसी की आबादी के लिए आरक्षण केवल 14 प्रतिशत है, जबकि राज्य की कुल आबादी में उसकी हिस्सेदारी मोटे तौर पर 50 प्रतिशत तो मानी ही जाती है.

मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की मांग लंबे समय से की जाती रही है, लेकिन न तो कांग्रेस ने इस पर ध्यान दिया और न ही भाजपा ने.

अब राज्य की सवर्ण आबादी के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है जबकि उनकी कुल आबादी 15 प्रतिशत से ज़्यादा कतई नहीं होगी. फिर, 10 प्रतिशत भी सारे सवर्णों के लिए नहीं है. उसमें भी जो आर्थिक सीमाएं लगाई गई हैं, उसके हिसाब से जो सवर्ण इसके दायरे में आएंगे, वो मुश्किल से 4 या 5 प्रतिशत ही होंगे, लेकिन उनके लिए 10 प्रतिशत आरक्षण मौजूद रहेगा.

यही स्थिति ओडीशा, झारखंड, बिहार और अन्य राज्यों की है, जहां इस सवर्ण विधेयक की आय और संपत्ति सीमा के तहत आने वाले सवर्णों की संख्या कहीं भी 3 या 4 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं होगी, लेकिन उनके लिए 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा. ये बात न तो सपा के किसी नेता के दिमाग में आई और न ही बसपा के.

एक तरह से इस सवर्ण आरक्षण विधेयक ने सपा और बसपा की वैचारिक शून्यता को उजागर कर दिया है.

राष्ट्रीय जनता दल का इस मामले में रवैया फिर भी बेहतर रहा. राज्य सभा में आरजेडी ने विधेयक के खिलाफ मतदान किया. उनके नेताओं ने विधेयक की तमाम विसंगतियों को उजागर किया, जबकि सपा और बसपा वाले केवल इस उम्मीद में बैठे हैं कि कोर्ट से इस पर रोक लग ही जाएगी.

डीएमके और एमआईएम ने भी विधेयक के खिलाफ वोट डाला.

कोई हैरत नहीं कि कोर्ट से ये स्वत: संज्ञान लेने की उम्मीद में, इस विधेयक के खिलाफ कोई याचिका ही न लगाएं, और उम्मीद करते रहें कि कोई सवर्ण ही इसके खिलाफ याचिका लगाकर उनका काम कर देगा.

दोनों ही दलों के नेता यह समझने में भी नाकाम रहे या बड़ी मासूमियत से इस बात से अनजान बने रहे कि यह सवर्ण आरक्षण, एक तरह से आर्थिक आधार पर आरक्षण लगाने की शुरुआत है.

आरएसएस का एजेंडा पूरा हुआ

आरएसएस आरक्षण प्रणाली की जिस समीक्षा की बात करता रहा है, उसकी उसने यह शुरुआत कर दी है. विपक्षी दल इस बात से भले ही खुश हो लें कि ये भाजपा के जाने का संकेत है और इसीलिए उसने जाने से पहले अपने सबसे ज़रूरी एजेंडा पूरा करने को प्राथमिकता दी, लेकिन वास्तव में विपक्षी दलों की यह ऐसी हार है जिसमें उन्होंने मुकाबला करने की कोशिश ही नहीं की.

अब अगर सपा और बसपा तथा कांग्रेस और भाजपा की सरकारों के कामकाज की तुलना करें, तो सिवाय इसके कोई फर्क नहीं दिखता कि समाजवादी पार्टी इमारतों और निर्माणों के नाम पुराने समाजवादी नेताओं के नाम पर रखती है, बसपा सामाजिक सुधार से जुड़े नेताओं के नामों पर रखती है, कांग्रेस नेहरू खानदान के नाम पर रखती है, और भाजपा संघ के ज्ञात-अज्ञात नेताओं के नामों पर रखती है.


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बाकी इन इमारतों और निर्माणों के स्वरूप में कोई अंतर नहीं होता, क्योंकि वैचारिक अंतर कहीं रह ही नहीं गया है.

किस सरकार के कार्यकाल के दौरान किस तरह का विकास या निर्माण होगा, यह उस सरकार के दल पर निर्भर नहीं करता. पार्टी का असर केवल इतना होगा कि उस विकास या निर्माण का नाम किस नेता पर होगा.

भाजपा और कांग्रेस की बहुत लंबे समय से कोशिश सामाजिक न्याय के पक्षधर माने जाने वाले दलों की इस वैचारिक भिन्नता या पहचान को ही खत्म करने की रही है, और सवर्ण आरक्षण विधेयक के ज़रिए उनकी ये कोशिश एक सफल अंजाम तक पहुंचती दिख रही है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं.)


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