बांग्लादेश की नई और चर्चित नेशनल सिटिजन पार्टी 12 फरवरी को हुए देश के हाई-वोल्टेज संसदीय चुनाव में कथित तौर पर सिर्फ छह सीटें ही जीत पाई हैं.
यह पार्टी 2024 की तथाकथित जुलाई क्रांति के छात्र नेताओं द्वारा बनाई गई थी, जिसने शेख हसीना के नेतृत्व वाली चुनी हुई सरकार को गिरा दिया था. उम्मीद थी कि यह पार्टी देश की भावनाओं, खासकर हसीना विरोधी माहौल, को चुनावी फायदे में बदल देगी. सोशल मीडिया अभियान और राय पहले ही फैसला सुना चुके थे: एनसीपी गेम-चेंजर होगी—आखिर माहौल तो उन्होंने ही बनाया था.
लेकिन पारंपरिक पार्टियों, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी के मुकाबले, एनसीपी नेतृत्व को लेकर अंदरूनी टकराव, विचारधारा के मतभेद और सत्ता की महत्वाकांक्षा से जूझती रही. अपनी ही असुरक्षाओं से घिरी पार्टी ने कट्टर जमात-ए-इस्लामी के साथ हाथ मिला लिया और अब बांग्लादेश की जनता ने भारी बहुमत से बीएनपी के पक्ष में फैसला दे दिया है.
बांग्लादेश चुनाव का नतीजा एक पुरानी बहस को फिर से सामने लाता है: क्या लोकलुभावन राजनीति सड़कों की ताकत को चुनावी जीत में बदल सकती है?
तर्कसंगत मतदाता की एंट्री
भारत में आम आदमी पार्टी (AAP) एक दुर्लभ सफलता की कहानी है. यह इंडियन अगेंस्ट करप्शन आंदोलन से पैदा हुई थी. इसने जंतर-मंतर पर व्यवस्था के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से बने राष्ट्रीय माहौल को वोट में बदला और दिल्ली चुनाव जीतकर भारत की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी, इंडियन नेशनल कांग्रेस, को हरा दिया. सरकार गिराने की कोशिश करने वाले आंदोलनों के उलट, AAP ने चुनाव लड़कर अपनी लोकप्रियता को परखा.
तो फिर 2022 में श्रीलंका और 2024 में बांग्लादेश के आंदोलन ऐसा क्यों नहीं कर पाए? युवा आंदोलनों को पारंपरिक नेतृत्व और राजनीतिक पार्टियों को चुनौती देने में मुश्किल क्यों होती है?
जवाब है तर्कसंगत मतदाता. ऐसा मतदाता जो अपना वोट बेकार नहीं करना चाहता और नेतृत्व व अनुभव को ध्यान से देखता है. आखिर देश चलाना सोशल मीडिया की तारीफ या इंस्टाग्राम या एक्स पर फॉलोअर्स की संख्या से नहीं होता.
एशिया में हाल के ज़ेनरेशन ज़ी आंदोलनों—चाहे नेपाल हो या फिलीपींस—ने दिखाया कि सोशल मीडिया का दायरा सही सवाल उठाने और भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, खराब शासन या कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को सामने लाने में सफल रहा, लेकिन ग्राउंड पर पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों और उनके नेतृत्व की ताकत फर्क डालती है.
सत्ता पाने की जल्दी युवाओं को अधीर बना देती है, लेकिन चुनाव में यह हमेशा काम नहीं करती.
नेपाल में 5 मार्च को होने वाले चुनाव के पहले, कई युवा नेताओं को पारंपरिक पार्टियों—नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट–लेनिनिस्ट) या नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी, में जगह बनाने में दिक्कत हुई है. वे अब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी जैसी युवा केंद्रित पार्टियों में उम्मीदवारों की जीत की संभावना देख रहे हैं.
श्रीलंका में भी स्थापित नेशनल पीपल्स पावर के नेतृत्व वाला गठबंधन, जिसके नेता अनुर कुमार दिसानायके थे, चुनाव जीता. न कि अरगलाया आंदोलन के युवा नेताओं द्वारा बनाई गई पीपल्स स्ट्रगल अलायंस (पीएसए). पीएसए न सिर्फ सीटें जीतने में नाकाम रही, बल्कि उसका वोट प्रतिशत भी बहुत कम रहा.
श्रीलंका और बांग्लादेश दोनों दिखाते हैं कि युवा जरूरी नहीं कि हर उम्र के लोगों का प्रतिनिधित्व करें. मतदाता हर पीढ़ी के लोग होते हैं.
एनसीपी का चूका हुआ मौका
अब फिर बांग्लादेश पर लौटते हैं. लगभग 1.25 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में 18-35 साल के युवा 30 प्रतिशत थे. एनसीपी इन मतदाताओं को आकर्षित कर सकती थी, लेकिन उसे बीएनपी और जमात की छात्र इकाइयों से कड़ी टक्कर मिली, जो खुद पार्टियों जितनी पुरानी हैं.
साथ ही, एनसीपी अपनी ही गलती की शिकार बनी. पार्टी के अंदर नेतृत्व की लड़ाई इतनी ज्यादा थी कि वह सितंबर 2025 में विश्वविद्यालय चुनाव भी लड़ने का भरोसा नहीं जुटा पाई. वहां वह अपनी किस्मत आज़मा सकती थी, लेकिन उसने जोखिम नहीं लिया, शायद इस डर से कि छात्र चुनाव में हार से राष्ट्रीय माहौल खराब हो जाएगा.
यहां तक कि जमात की छात्र इकाई, इस्लामी छात्र शिबिर, जिसने ढाका यूनिवर्सिटी और जहांगीर नगर यूनिवर्सिटी में जीत हासिल की, उसे भी जमात की राष्ट्रीय जीत का संकेत माना गया था. लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ.
और आखिर में, एनसीपी, जो आगे बढ़ने वाली और महत्वाकांक्षी युवाओं का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी, उसने जमात के साथ हाथ मिला लिया—एक ऐसी पार्टी जो देश के सांस्कृतिक मेल-जोल, धर्मनिरपेक्षता और महिला सशक्तिकरण जैसे मूल सिद्धांतों को चुनौती देती है और जिसका अतीत भी खराब रहा है.
एनसीपी ने ऐसी चीज़ का बचाव करने की कोशिश की जिसे बचाया नहीं जा सकता था और अब नतीजे सामने हैं.
अंत में, आधुनिक दौर में सोशल मीडिया आवाज़ों को जोड़ने, सरकार के खिलाफ नाराज़गी दिखाने या शिकायतें रखने का एक आसान और असरदार मंच हो सकता है, लेकिन चुनाव नतीजे दिखाते हैं कि भले ही लोकलुभावन आंदोलन राजनीतिक कहानी बदल दें और सत्तारूढ़ सरकार को कमज़ोर कर दें, लेकिन चुनाव जीतने के लिए पार्टी का संगठन, मजबूत नेतृत्व और संस्थागत मौजूदगी ज्यादा जरूरी होती है, सिर्फ आंदोलन की लोकप्रियता नहीं.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल अफेयर्स पर कॉमेंटेटर हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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