केरलम पिछले हफ्ते सुर्खियों में रहा. पहली और ज्यादा चर्चा वाली खबर यह थी कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्य का नाम केरल से बदलकर केरलम करने को मंजूरी दे दी. इस खबर को मीडिया में काफी जगह मिली. सत्तारूढ़ एलडीएफ, यूडीएफ के बड़े घटकों और बीजेपी ने इसे मौजूदा ‘उपनिवेशवाद से मुक्ति’ अभियान के तहत एक ‘ऐतिहासिक’ कदम बताया.
केरलम विधानसभा ने इस मुद्दे पर बीस महीने पहले (जून 2024) सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर मलयालम में केरलम के लोगों को बधाई दी. केवल कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने इस पर टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि ‘केरल’ नाम संस्कृत और तमिल ग्रंथों तथा दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के अशोक के शिलालेखों में मिलता है, जबकि “केरलम” नाम का ज़िक्र लगभग 11वीं सदी ईस्वी के आसपास मिलता है.
हालांकि, दूसरी घोषणा को पहले पन्ने पर जगह नहीं मिली और न ही थरूर या किसी अन्य राजनीतिक दल के नेता ने इस पर टिप्पणी की. यह घोषणा भारत के सबसे ‘शिक्षित और सशक्त’ राज्य के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, यूपी और उत्तराखंड की तरह राज्य सिविल सेवा परीक्षा की अधिकतम उम्र सीमा बढ़ाने से जुड़ी थी. सामान्य वर्ग के लिए यह सीमा 40 साल कर दी गई है, जबकि अन्य वर्गों को पांच साल की छूट दी गई है.
जैसा कि कई पाठक जानते होंगे, राज्य सिविल सेवाएं आईएएस के लिए फीडर सेवा भी होती हैं. भर्ती प्रक्रिया में करीब अठारह महीने लगते हैं और फिर संस्थागत व ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण में और अठारह से चौबीस महीने लग जाते हैं. ऐसे में कई अधिकारी अपनी पहली ‘सरकारी नौकरी’ शुरू करते समय रिटायरमेंट से सिर्फ कुछ साल दूर रह जाते हैं.
जो लोग इस लोकप्रिय कदम के समर्थन में तर्क देते हैं—क्योंकि इससे अवसर बढ़े बिना उम्मीद ज़रूर बढ़ती है, वे विविधता और समावेशन की बात करते हैं. लेकिन इसका दूसरा पहलू देखना भी ज़रूरी है. जो लोग 30 साल की उम्र के बाद सेवा में आते हैं, उनके लिए किसी भी सेवा में शीर्ष स्तर तक पहुंचने के मौके बहुत कम रह जाते हैं.
दरअसल, कई साल की तैयारी के बाद नेतृत्व के पद तक न पहुंच पाने की निराशा उन्हें लगातार परेशान करती रहती है. यह बात पूर्व आईएएस अधिकारी और पूर्व आरबीआई गवर्नर डी. सुब्बाराव तथा पूर्व आईपीएस अधिकारी और पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त यशोवर्धन झा आजाद ने जोर देकर कही थी.
सफर
आइए सिविल सेवकों की शुरुआती प्रवेश आयु के सफर पर नज़र डालें. 1955 में पब्लिक सर्विसेज (क्वालिफिकेशन फॉर रिक्रूटमेंट) कमेटी ने आईएएस, आईएफएस और केंद्रीय सेवाओं के लिए 21–23 साल की उम्र सीमा और आईपीएस व फॉरेस्ट सेवा के लिए 20 साल की उम्र की सिफारिश की थी. कोठारी कमेटी (1976) और सतीश चंद्र कमेटी (1989) ने अधिकतम उम्र 26 साल रखने का समर्थन किया.
लेकिन खासकर मंडल के बाद की राजनीतिक ज़रूरतों के कारण सरकार ने इसे पहले 28 और बाद में 30 साल कर दिया. सदी के मोड़ तक, योगिंदर अलघ और पीसी होता की अध्यक्षता वाली समितियों ने अधिकतम उम्र सीमा को क्रमशः 26 और 24 साल करने का प्रस्ताव दिया. दूसरी प्रशासनिक सुधार आयोग (2008) ने भी इसी बात को दोहराते हुए 25 साल की सीमा की सिफारिश की.
दुर्भाग्य से यूपीए सरकार के आखिरी फैसलों में से एक यह था कि प्रवेश आयु सीमा बढ़ाकर 32 साल कर दी गई. यह कदम दिखावे में अरुण निगवेकर कमेटी की मुख्य सिफारिशों के खिलाफ अभ्यर्थियों की चिंताओं को दूर करने के लिए उठाया गया था, जबकि उस कमेटी की सिफारिशें भी आंशिक रूप से ही मानी गई थीं. दो मुख्य प्रस्ताव—ग्रेजुएट में पढ़े गए विषय तक ही वैकल्पिक पेपर की पसंद सीमित करना और उम्र सीमा 25 साल करना—को खारिज कर दिया गया.
उम्र सीमा कम करने की राजनीति
उम्मीद थी कि यूपीए का यह फैसला मोदी सरकार पलट देगी. खासकर इसलिए कि 2017 में नीति आयोग के दस्तावेज ‘स्ट्रेटेजी फॉर न्यू इंडिया @75’ में सिविल सेवा सुधारों की कई बातें कही गई थीं. एक बड़ी सिफारिश यह थी कि सामान्य वर्ग के लिए सिविल सेवा की अधिकतम उम्र सीमा को चरणबद्ध तरीके से 2022-23 तक 27 साल कर दिया जाए, लेकिन 2018 में इस सुझाव को ठुकरा दिया गया. राजनीतिक गणित साफ था: उम्र सीमा घटाने से एक मुखर और आकांक्षी वर्ग नाराज़ हो सकता है.
अब ज़मीनी हकीकत के साथ राजनीतिक नेतृत्व की चिंताओं की तुलना करते हैं. अधिकतम उम्र बढ़ाने के पक्ष में मुख्य तर्क यह दिया जाता है कि इससे टियर-2 और टियर-3 शहरों और ग्रामीण इलाकों के उम्मीदवारों को उचित मौका मिलेगा और प्रतिनिधित्व में समानता बनी रहेगी. यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा—जिसे आम तौर पर आईएएस परीक्षा कहा जाता है—हर साल 13 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों को आकर्षित करती है.
लेकिन इस परीक्षा से काफी पहले हर साल स्कूल खत्म करने वाले छात्र चार बड़े प्रवेश परीक्षाएं देते हैं—नीट, जेईई, सीयूईटी और सीएलएटी. इन प्रवेश परीक्षाओं में भी आरक्षण बिल्कुल उसी तरह लागू होता है जैसे यूपीएससी में. केवल एक छोटा सा फर्क है, वह भी बेंचमार्क विकलांगता वाले व्यक्तियों (PwBD) के मामले में—इन प्रवेश परीक्षाओं में यह 5 प्रतिशत है, जबकि यूपीएससी में यह 4 प्रतिशत है.
उम्र सीमा कम करने के पांच तर्क
अब ऊपर बताई गई प्रवेश परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों के आंकड़ों पर नजर डालते हैं. नीट में 20 लाख से ज्यादा छात्र बैठते हैं, जेईई में 13 से 15 लाख, सीयूईटी में 11.3 लाख और सीएलएटी में 92,000 छात्र. देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में पहले से ही समावेशन का ध्यान रखा जाता है, इसलिए देश के पास इतना बड़ा समूह है, जिसमें से उम्मीदवार यूपीएसी परीक्षा के लिए योग्य हो सकते हैं. कुछ नए आईआईटी और आईआईएम में बहुत कम खाली सीटों को छोड़ दें, तो प्रवेश स्तर पर लगभग हर सीट भर जाती है.
एनटीए, जो नीट, जेईई और सीयूईटी आयोजित करता है—देशभर में परीक्षा केंद्र बनाता है—नीट के लिए 500 से ज्यादा और सीयूईटी के लिए 350 से ज्यादा—जिससे यह तर्क कमज़ोर पड़ता है कि टियर-2 या टियर-3 शहरों के छात्रों को नुकसान होता है. बल्कि रिपोर्ट में बताया गया है कि जेईई के टॉप 500 छात्रों में से 46 प्रतिशत तथाकथित पिछड़े इलाकों से आते हैं.
दूसरा बिंदु यह है कि कोचिंग उद्योग के फैलाव के कारण अब तैयारी के मौके देशभर में लगभग बराबर हो गए हैं—जम्मू-कश्मीर के राजौरी से लेकर अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर तक. स्मार्टफोन का आम होना, बहुत सस्ता डेटा, हर बड़ी भाषा में तैयारी सामग्री की उपलब्धता और अलग-अलग कोचिंग संस्थानों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण भारी छूट भी दी जा रही है. याद रहे कि यह बदलाव बाजार की ताकत से आया है, सरकार की पहल से नहीं.
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, संख्या नहीं बदलेगी. उदाहरण के लिए अगर आईएएस में 200 पद हैं, तो 30 एससी को, 15 एसटी को, 54 नॉन-क्रीमी लेयर ओबीसी को, 20 ईडब्ल्यूएस को और 8 PwBD को मिलेंगे और 63 सीटें सामान्य रहेंगी. जब हर वर्ग में युवा लोग होंगे, तो उनके बीच बेहतर तालमेल बनेगा. चाहे हमें पसंद हो या नहीं, ट्रेनिंग अकादमियों में उम्र के आधार पर समूह बन जाते हैं. जब उम्र 23 से 43 साल तक अलग-अलग होगी, तो रुचियां और उम्मीदें भी अलग होंगी.
चौथा, अक्सर कहा जाता है कि आरक्षित वर्ग के लोग भारत सरकार के सचिव या बड़े देशों में राजदूत नहीं बन पाते. उम्र सीमा कम होने से यह स्थिति भी संतुलित हो सकती है.
पांचवां, संस्थाओं को अग्रिम पंक्ति पर युवा लोगों की जरूरत होती है. जैसे सेना में कमांडिंग ऑफिसर सबसे अहम होता है, वैसे ही आईएएस में डिप्टी कमिश्नर या जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. सेना ने कोशिश की है कि उसके कमांडिंग ऑफिसर शुरुआती तीस की उम्र में हों. क्या यह जरूरी नहीं कि हम भी डीसी की औसत उम्र कम करने की कोशिश करें? चूंकि अधिकारी इस पद पर सात से नौ साल की सेवा के बाद पहुंचते हैं, इसलिए उन्हें परीक्षा तब देनी चाहिए जब वे बीस की शुरुआती उम्र में हों.
अपने तर्क को समझाने के लिए, सिकंदर ने अपनी सभी बड़ी जीत—जिसमें पोरस के खिलाफ जीत भी शामिल है—30 साल की उम्र तक हासिल कर ली थी. स्वामी विवेकानंद ने भी शिकागो में अपना प्रसिद्ध भाषण इसी उम्र में दिया था. आदि शंकराचार्य ने 32 साल की उम्र तक चारों पीठ स्थापित कर दी थीं और अद्वैत दर्शन का प्रचार किया था. नेपोलियन ने 35 साल की उम्र में खुद को सम्राट घोषित किया था. इसलिए, जहां अनुभव, समझ और संयम सलाहकार भूमिकाओं में जरूरी हो सकते हैं, वहीं जमीन पर काम करने के लिए युवा, ऊर्जावान और जोखिम लेने की क्षमता रखने वाले लोगों की ज़रूरत होती है.
संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (एलबीएस म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, पीएमएमएल के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.
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