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समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव व बसपा नेता मायावती | पीटीआई
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उत्तर प्रदेश की राजनीति, वहां का समाज और अर्थव्यवस्था काफी बदल चुकी है. ये 1993 नहीं है कि सपा-बसपा के साथ आने भर से बीजेपी बुरी तरह हार जाएगी. उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की ऐतिहासिकता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि आने वाले आम चुनाव में यह बीजेपी के विजय रथ को ठीक वैसे ही रोक देगा, जैसा बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए विधानसभा चुनाव में हुआ था.

6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दिये जाने की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद 1993 की शुरुआत में हुए विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा ने गठबंधन करके राम लहर के उस दौर में भी जीत हासिल की थी. उस विधानसभा चुनाव में लगा नारा, ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ आज भी लोगों के जेहन में तरो ताजा है. लेकिन इस बार सपा-बसपा के साथ आने भर से जय श्रीराम हवा में नहीं उड़ेंगे.

इतिहास में एक लॉन्ग साइक्लिक थ्योरी है, जो कि यह बताती है कि पूर्व में हुई घटनाएं अपने आपको रिपीट करती हैं. हालांकि इसके समानांतर मार्कसिस्ट थ्योरी नहीं मानती की इतिहास खुद को कभी भी उसी रूप में दोहराता है. इतिहास खुद को पहली बार त्रासदी और दूसरी बार प्रहसन के रूप में दोहराता है.


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लॉन्ग साइक्लिक थ्योरी के आधार पर माना जा रहा है कि बसपा और सपा के बीच हुआ यह गठबंधन अपने परिणामों को भी रिपीट करेगा. जैसे इसके पूर्ववर्ती गठबंधन ने राम लहर को रोक दिया था, वैसे ही इस बार का गठबंधन मोदी लहर भी रोक देगा. इस गठबंधन की सफलता की झांकी गोरखपुर, फूलपुर और कैराना के उपचुनाव में दिख भी चुकी है, इसके बावजूद भी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि अपने पूर्ववर्ती गठबंधन की तरह ही यह भी अपना प्रदर्शन दोहरा पाएगा.

परिस्थितियों में आया बदलाव

अगले तीन-चार महीने में होने जा रहा चुनाव, नब्बे के दशक की परिस्थितियों में हुए चुनाव से काफी कुछ अलग है. बदली हुई परिस्थितियों ने दलित और पिछड़े समुदाय के वोटरों में व्यापक स्तर पर बिखराव ला दिया है, जिसकी वजह से सिर्फ जातियों की संख्या के आधार पर चुनाव परिणामों का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है.

परिस्थितियों में बदलाव, अर्थव्यवस्था में परिवर्तन, सूचना और तकनीकी क्षेत्र में क्रांति, नई सामाजिक/राजनीतिक चेतना के उभार, और राजनीतिक पार्टियों में आये आमूल-चूल परिवर्तन की वजह से आया है, जिसका चुनावों में हो रही वोटिंग पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है.

बदल चुकी है यूपी की अर्थव्यवस्था

अर्थव्यवस्था में आए परिवर्तन की बात करें तो इसकी शुरुआत नब्बे के दौर में उदारीकरण की नीतियां अपनाने से हुई. उसी दौर से ये पार्टियां उत्तर प्रदेश में सत्ता आयीं. लंबे दौर में इन पार्टियों ने दलित और पिछड़े समाज को यह कहकर मोबिलाइज किया था कि सरकार देश के सभी प्रकार के संसाधनों, नौकरियों, और अवसरों को कंट्रोल करती है, इसलिए राजनीतिक सत्ता पर कब्जा कर लेने से सभी रास्ते खुल जाएंगे.

इसको मान्यवर कांशीराम के उस वक्तव्य से भी समझा जा सकता हैं, जिसमें वो बार-बार कहते हैं कि ‘राजनीतिक सत्ता’ मास्टर चाभी (गुरु की किल्ली) है, जिसको कब्जा कर लेने से शक्ति के सभी रास्ते खुल जाते हैं. जैसे-जैसे दलितों-पिछड़ों ने राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करना शुरू किया, वैसे- वैसे ही अर्थव्यवस्था का उदारीकरण होता चला गया, और सरकार (राज्य) ने संसाधनों, नौकरियों, और अवसरों को निजी क्षेत्र के हाथों में सौंपना शुरू कर दिया.

नयी अर्थव्यवस्था ने सवर्ण जातियों के कुछ खास वर्ग को अत्यधिक अमीर बना दिया है. अब एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जिसमें किसी समुदाय के अमीर होने का एकमात्र स्रोत या कारण सरकार नहीं है. सिर्फ सरकार पर कब्जा कर लेने भर से किसी समाज का हर किस्म से सशक्तीकरण नहीं हो सकता. सपा और बसपा की चार-चार बार राज्य में सरकार बनने के बावजूद इनके समर्थक समूहों की हालत आशानुरूप नहीं बदल पायी है.

सूचना और तकनीकी क्रांति का चुनावों पर असर

अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के दौर में ही दुनियाभर में सूचना और सूचना और तकनीकी क्षेत्र में क्रांति हुई, जिसने पुरानी अर्थव्यवस्था की अवधारणा को तेजी से बदल दिया. उत्तर भारत की ज़्यादातर बहुजन/समाजवादी पार्टियां अपने अंदर का सामंतवादी चरित्र न मार पाने की वजह से अपने ही समुदाय के उच्च शिक्षित वर्ग से हमेशा दूरी बना कर रहीं. इसलिए ये पार्टियां अर्थव्यवस्था में तेजी से आ रहे बदलाव का समाज पर पड़ने वाले सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव को समझने में नाकाम रहीं. अपनी इंटेलेक्चुअल विरोधी मानसिकता की वजह से इन पार्टियों की सरकारें हमेशा कुछ एक नौकरशाहों के चंगुल में फंसी रहीं.

विकास का लाभ किन सामाजिक समूहों को

उत्तर प्रदेश में खासकर दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का तेजी से शहरीकरण हुआ है, शहरीकृत हो चुकी सीटों पर बीजेपी बहुत ही मजबूत होकर उभरी है. शहरीकरण से तमाम किस्म के नए अवसरों का निर्माण हुआ. लेकिन यदि इन अवसरों से लाभान्वित तबके को जानने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारों द्वारा खनन, शराब, सड़क निर्माण, खरीद-फरोख्त आदि में दिये गए पट्टों और ठेकों की लिस्ट का सामाजिक-जातीय अध्ययन किया जाए तो निराशा ही हाथ लगती है.

अर्थव्यवस्था में आए बदलाव का थोड़ा बहुत फायदा जिन पिछड़ी जातियों के कुछ एक परिवारों को मिला, वो जातियां अपनी महत्वाकांक्षा के विस्तार और नयी सरकार में अवसरों की तलाश में पिछले चुनावों में तेजी से बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो चुकी हैं.

बदलती अर्थव्यवस्था और सपा और बसपा की सीमाएं

क्षेत्रीय ताकत होने के नाते सपा और बसपा किसी समुदाय की बड़ी महत्वाकांक्षा को पूरी नहीं कर सकतीं, क्योंकि केंद्र में बनी पिछले कई सरकारों में ये शामिल ही नहीं हुईं. बसपा केंद्र सरकार में कभी नहीं रही. केंद्र की सत्ता में होना महत्वपूर्ण है, क्योंकि केंद्र सरकार का बजट बहुत बड़ा होता है और ढेरों योजनाएं और ठेके से लेकर सप्लाई तक के फैसले केंद्र सरकार करती है.

दलित-पिछड़े समाज की प्रमुख जातियां, जिनमें राजनीतिक या फिर व्यावसायिक महत्वाकांक्षा बढ़ गयी है, वो लोकसभा के चुनाव में एकमुश्त गठबंधन को वोट शायद ही देंगी. हां विधानसभा चुनाव में वे गठबंधन को वोट जरूर दे देती हैं, वो भी तब जब वह आम चुनाव के साथ न हो रहा हो. यहां यह बता देना जरूरी है कि किसी जाति, समुदाय या फिर व्यक्ति के अंदर महत्वाकांक्षा का बढ़ना एक अच्छी बात है.

अर्थव्यवस्था में आए परिवर्तन के नकारात्मक प्रभाव को देखें तो इसकी सबसे बड़ी मार निषाद, मल्लाह, कुम्हार, राजभर, नट, मुसहर, धरकर जैसी सैकड़ों कामगार जातियों पर पड़ी है. इस परिवर्तन की वजह से इन जातियों का पारंपरिक रोजगार छिनता जा रहा है, जिससे इन जातियों के लोग खेतिहर मजदूर बनने को विवश होते जा रहे हैं. यह स्थिति हिन्दू और मुसलमान दोनों समाज की कामगार जातियों की है. इसलिए पिछले एक दशक में उत्तर भारत में अति पिछड़ा और पसमान्दा समाज का बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ है, जिससे एक नयी सामाजिक/राजनैतिक चेतना का निर्माण हो रहा है.

पहले मुस्लिम समाज को एकमुश्त वोटर के तौर पर देखा जाता रहा है, लेकिन पसमान्दा आंदोलन ने इस मिथ को तोड़ रहा है. इस समाज की जो समस्यायें हैं, उनको लेकर भविष्य में कौन-कौन से कदम उठाए जाने हैं, इस विषय पर सपा-बसपा ने अभी तक कोई भी विचार नहीं किया है. अब यही हालत दलितों में भी हो रही है, जहां छोटी-छोटी जातियां अपने-अपने बैनर तले इकट्ठी हो रहीं हैं, और अपने लिए रास्ता तलाश रही हैं.

पूरी नहीं हुई वंचितों की उम्मीदें

चूंकि उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर समय सपा और बसपा की ही सरकारों का शासन रहा है, इसलिए इन समुदायों में जो गुस्सा पैदा हुआ है, वह इन्हीं के प्रति है. इस गुस्से की वजह से पिछले चुनावों में अति पिछड़ी और अति दलित जातियों का झुकाव तेजी से बीजेपी की तरफ बढ़ा. अति पिछड़े और पसमांदा समाज की कामगार जातियाँ अपनी आवाज उठाने के लिए छोटी-छोटी पार्टियां बनाके चुनाव लड़ रही हैं. बीजेपी ऐसे ही कुछ समूहों को अपनी खेमे में लाने में कामयाब रही है. हाल फिलहाल में अखिलेश यादव ने भी कुछ एक ऐसी पार्टियों को अपने साथ लेने की कोशिश की है, लेकिन ऐसी कोशिश बिना किसी नीति के शायद ही कारगर हो.

इस गठबंधन के प्रति अति-पिछड़ी जातियों में नब्बे के दौर वाला उत्साह लाना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि तब सपा और बसपा दोनों ही नयी पार्टियां थी, लोगों ने इनका शासन नहीं देखा था. इसलिए इनको सत्ता में लाने के प्रति उत्साह था. उस उत्साह की वजह से ही लगभग डेढ़ दशक तक ये समुदाय सपा-बसपा को ही वोट देते रहे. लेकिन अब उस उत्साह में कमी आ गयी है.

सपा और बसपा मे पुराना वैचारिक तेज नहीं रहा

अति पिछड़ी जातियों में सपा-बसपा के प्रति आए उत्साह में कमी का एक बड़ा कारण पिछले एक दशक में इन पार्टियों की विचारधारा, संगठन, नेतृत्व और रणनीति के स्तर पर आया अमूलचूल बदलाव भी है, जिसकी वजह से दोनों ही पार्टियां काफी उथल पुथल के दौर से गुजर रही हैं. समाजवादी पार्टी में हुई उथल-पुथल हाल फिलहाल की है, जिसका सबको पता है, लेकिन पर्दे के पीछे ऐसी ही उथल पुथल बसपा में भी हुई है, जिसकी वजह से इस पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी जैसी महत्वपूर्ण संस्था सिर्फ खानापूर्ति के लिए बची रह गयी है.

पार्टी की रणनीति में आए बदलाव की वजह से अतिपिछड़े और गैर जाटव समाज के सभी बड़े नेता एक एक करके या तो पार्टी से निकलते रहे या फिर निकाले जाते रहे. बसपा छोड़कर जाने वाले ज़्यादातर दलित-पिछड़े समाज के नेता बीजेपी में चले गए, जिसकी वजह से बीजेपी को दलित-पिछड़े समाज के चुनाव जीतने वाले जमीनी नेता मिल गए हैं. ऐसे नेता पिछले दो-तीन दशक से राजनीति में सक्रिय है, इसलिए जमीनी स्तर पर इनकी काफी पकड़ है. बसपा छोड़कर जाने वाले नेताओं की वजह से जमीनी स्तर पर ऐसे कद्दावर नेताओं की कमी हैं, जोकि अपनी बदौलत विरोधी खेमे से वोट खींच कर ला सकें. यही हालत सपा की भी है.

इन पार्टियों ने अपनी सरकार बनने पर सरकारी संस्थाओं में व्याप्त जातिगत भेदभाव समाप्त करके सभी जातियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का वादा किया था, लेकिन सरकार बनने पर इस दिशा में कोई भी ठोस कदम नहीं उठाये गए. स्थानीय स्तर की छोटी-मोटी सरकारी नौकरी में होने वाली भर्तियाँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ गईं, जिसकी वजह से अतिपिछड़ों, पसमांदा और दलित समाज की तमाम जातियों का सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व न के बराबर है. अति पिछड़े समुदाय नें जब भी अपना वाजिब हिस्सा मांगा तो ये पार्टियां उनको अनुसूचित जाति मे शामिल करने का दिलासा दिलाती रहीं।

उक्त समुदायों के प्रतिनिधित्व की हालत इन सरकारों द्वारा स्थापित गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, उर्दू-अरबी-फारसी विश्वविद्यालय, शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय, सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, और इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय में तो बहुत ही खराब है, जिसकी वजह से इन समुदायों में संदेश गया है कि उनके सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान के लिए ये नेता सीरियस नहीं हैं, और इनका एक मात्र मकसद सत्ता पर कब्जा किए रहना है.


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गठबंधन के बाद अगले कदम के तौर पर अगर इन दोनों पार्टियों ने इन समुदायों के बीच जाकर कोई नीतिगत मसौदा नहीं तैयार किया, तो बीजेपी इस गठबंधन को दो जातियों नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दो परिवारों के बीच गठजोड़ बताकर प्रचारित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी.

ऐसे में, अगर सपा और बसपा ने अपनी राजनीति को नए तरीके से परिभाषित नहीं किया तो इस गठबंधन के आने वाले आम चुनाव में किंगमेकर बनकर उभरने का सपना अधूरा ही रह जाएगा.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से बढ़ती असमानता पर शोध कर रहे हैं)


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