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Thursday, 15 January, 2026
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वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज विवाद जानबूझकर खड़ा किया गया, जम्मू को कॉलेज चाहिए, राजनीति नहीं

बीजेपी की वजह से जम्मू का चलता हुआ मेडिकल कॉलेज बंद हुआ, जो नुकसान होने दें, वे कैसे संरक्षक हो सकते हैं?

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यह सब हमेशा धीरे-धीरे शुरू होता है. एक फाइल आगे बढ़ती है. किसी अनुमति की दोबारा जांच होती है. एक “प्रशासनिक” फैसला लिया जाता है, लेकिन कुछ फैसलों के पीछे एक बड़ा सवाल छिपा होता है, जो हमें परेशान करना चाहिए: जब इलाज, पढ़ाई और आगे बढ़ने के लिए बने संस्थानों को पहचान और धर्म की लड़ाई में घसीटा जाता है, तो फिर क्या बचता है? अगर अस्पताल भी धर्म देखकर चलेंगे, तो क्या इमरजेंसी में मरीज और डॉक्टर का धर्म पूछा जाएगा? क्या काबिलियत से ज्यादा नाम और पहचान ज़रूरी हो जाएगी? क्या जीने के लिए किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत पड़ेगी?

श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में एमबीबीएस कोर्स को रोकना कोई छोटा या आम फैसला नहीं है. यह एक खतरे की घंटी है. जम्मू का एक ठीक से चल रहा मेडिकल कॉलेज अस्थिर कर दिया गया. स्टूडेंट्स का भविष्य अधर में लटका दिया गया है. पूरे इलाके पर हमला किया गया, न इसलिए कि वहां बिल्डिंग या टीचर नहीं थे, बल्कि इसलिए कि लगातार राजनीतिक दबाव बनाया गया. जब एजुकेशन को गैर-ज़रूरी बना दिया जाता है, तो भविष्य भी अनिश्चित हो जाता है.

नेशनल मेडिकल कमीशन का यह फैसला भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लंबे विरोध के बाद आया. बीजेपी ने बार-बार यह सवाल उठाया कि इस संस्थान में मुस्लिम स्टूडेंट्स क्यों पढ़ रहे हैं. यह मामला कभी नियमों या क्षमता का नहीं था. यह सिर्फ पहचान और धर्म का मुद्दा था. मेरिट पर सवाल खड़े किए गए. बराबरी को शक की नज़र से देखा गया. एक संस्थान को इसलिए सज़ा दी गई क्योंकि वहां संविधान के मुताबिक सभी को बराबर मौका मिला. आखिर विविधता कब से गलती बन गई?

जम्मू के लोगों के लिए यह घटना एक कड़वी सच्चाई दिखाती है. बीजेपी खुद को लंबे समय से जम्मू की रक्षक बताती आई है. 2015 में जब एम्स सिर्फ कश्मीर के लिए घोषित हुआ था, तब जम्मू ने भी बराबरी की मांग की थी. वह आंदोलन न्याय के लिए था, किसी को बाहर करने के लिए नहीं. बीजेपी ने उस गुस्से का इस्तेमाल राजनीति में फायदा उठाने के लिए किया. आज, करीब दस साल बाद, वही पार्टी जम्मू का चलता हुआ मेडिकल कॉलेज बंद कराने में भूमिका निभा रही है. ऐसे रक्षक किस काम के जो नुकसान होने दें? ऐसा नेतृत्व कैसा जो कमी और वंचना को स्वीकार करे?

श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज में 42 मुस्लिम स्टूडेंट्स को पूरी तरह मेरिट के आधार पर दाखिला मिला था. कोई नियम नहीं तोड़ा गया. कोई प्रक्रिया गलत नहीं थी. यह सिस्टम पर भरोसा बढ़ाने वाली बात होनी चाहिए थी, लेकिन इसके उलट, इसे मुद्दा बना दिया गया. मेरिट की रक्षा करने की जगह पहचान पर सवाल उठाए गए. कॉलेज को बचाने की जगह उसे कमज़ोर किया गया. यही तरीका होता है सांप्रदायिक राजनीति का — वह खुलकर शिक्षा का विरोध नहीं करती, बल्कि उसे खोखला बना देती है. कमज़ोर चीज़ों को तोड़ना आसान होता है, मजबूत चीज़ों को नहीं.

इस फैसले का नुकसान सबको हुआ है. हिंदू, मुस्लिम और सिख — सभी स्टूडेंट्स उहापोह में हैं. जिन परिवारों ने पैसे लगाए, सपने देखे, वे परेशान हैं. जम्मू पहले ही कम अवसरों और युवाओं के बाहर जाने की समस्या से जूझ रहा है. मेडिकल कॉलेज सिर्फ एक इमारत नहीं होता. वह इलाज, नौकरी, रिसर्च और इलाके की इज्जत होता है. उसे हटाना जम्मू को पीछे ले जाना है. यह ताकत देना नहीं, बल्कि चुपचाप नुकसान पहुंचाना है.

छात्र कोई साइड डैमेज नहीं हैं

इस पूरे मामले के संवैधानिक असर भी गंभीर हैं. अनुच्छेद 14 सभी को कानून के सामने बराबरी देता है. अनुच्छेद 15 भेदभाव से रोकता है. अनुच्छेद 21ए शिक्षा को अधिकार मानता है. जब किसी इंस्टीट्यूट को स्टूडेंट्स के धर्म के कारण निशाना बनाया जाता है, तो संविधान के ये अधिकार सिर्फ कागज़ों पर रह जाते हैं. संविधान सिर्फ अदालतों में नहीं, स्कूल और कॉलेज की क्लास में भी ज़िंदा रहता है.

कार्ल मार्क्स ने कहा था कि सत्ता खुद को बनाए रखने के लिए हालात बनाती है. शिक्षा लोगों को सोचने और सवाल करने की ताकत देती है. पढ़े-लिखे युवा आसानी से बहकावे में नहीं आते. इसलिए जब संस्थानों को कमज़ोर किया जाता है और मौके छीने जाते हैं, तो डर पैदा होता है. जम्मू में जो हो रहा है, वह प्रशासन की गलती नहीं, बल्कि एक राजनीतिक तरीका है. पढ़ा-लिखा समाज सवाल करता है. कमज़ोर समाज को बस डराया जाता है.

इस बनाए गए संकट में जिम्मेदारी चुनी हुई सरकार की है. जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने संयम दिखाया. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि प्रभावित छात्रों को कहीं और एडजस्ट किया जाएगा. यह साफ करता है कि छात्र किसी राजनीतिक लड़ाई का नुकसान नहीं होने चाहिए.

जम्मू को कॉलेज, अस्पताल और मौके चाहिए, न कि आंदोलन और झगड़े. जो पार्टी जम्मू की बात करने का दावा करती है और उसकी शिक्षा व्यवस्था को कमज़ोर करती है, वह उसके युवाओं की आवाज नहीं हो सकती क्योंकि अगर जम्मू पढ़ा-लिखा होगा, तो वह इस अन्याय पर सवाल करेगा और शायद इसी डर से उसके संस्थानों को कमज़ोर किया जा रहा है — ताकि सवाल न उठें, सिर्फ नारे सुनाई दें.

(एडवोकेट श्रिया हांडू जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) की रिसर्च हेड और अतिरिक्त प्रवक्ता हैं. उनका एक्स हैंडल @iamshriyahandoo है. ये उनके निजी विचार हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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