scorecardresearch
Friday, 24 May, 2024
होममत-विमत'आंतरिक गुटबाजी' के कारण कांग्रेस की हुई ये दुर्दशा, अब यह भाजपा की भी लुटिया डुबा रही है

‘आंतरिक गुटबाजी’ के कारण कांग्रेस की हुई ये दुर्दशा, अब यह भाजपा की भी लुटिया डुबा रही है

कायदे से देखें तो वर्तमान में उत्तर प्रदेश और गुजरात को छोड़कर करीब सभी बड़े राज्यों में भाजपा में गुटबाजी शुरू हो गई है.

Text Size:

2014 में केंद्र की सत्ता से जाने के बाद कांग्रेस राज्यों से भी एक-एक कर बाहर होने लगी. हालत यहां तक खराब हो गई कि मार्च 2022 में पंजाब की सरकार गंवाने के बाद पूरे देश में सिर्फ दो राज्य में ही कांग्रेस पार्टी की सरकार बच गई थी.

राज्य सरकारों की संख्या के मामले में कांग्रेस आम आदमी पार्टी के बराबर हो गई थी, जिसकी दिल्ली के बाद पंजाब में सरकार बनी. हिमाचल में सरकार बनने से पहले तक कांग्रेस की सिर्फ दो राज्य छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सरकार थी. वैसे कांग्रेस कई राज्यों में गठबंधन सरकार का हिस्सेदार थी. अभी भी बिहार, झारखंड और तमिलनाडु में कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार है. लेकिन पूर्ण सरकार के मामले में वह आश्चर्यजनक रूप से पिछले साल देश की सबसे नई स्थापित पार्टी आम आदमी पार्टी के बराबर खड़ी हो गई थी.

कांग्रेस की ऐसी दुर्दशा के कई कारण थे, जिसमें मुख्य था 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुए अन्ना आंदोलन, जिसके बाद पूरे देश भर में भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस के खिलाफ एक माहौल तैयार हो गया. लेकिन राज्यों में उसकी सरकार गिरने का कारण भ्रष्टाचार के अलावा राज्य नेताओं के बीच भयंकर गुटबाजी भी थी.

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भी भाजपा मोदी के चेहरे और नेतृत्व में ही इकट्ठे होकर कई राज्यों में चुनाव लड़ी व जीती. चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने उत्तर प्रदेश को छोड़कर लगभग सभी राज्यों में अपने भरोसेमंद व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया. हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, असम और त्रिपुरा को इसके उदाहरण के तौर पर देख सकते हैं. वहीं कांग्रेस इन सभी राज्यों में आपसी कलह का शिकार हुई. उसके नेता चुनाव के समय भी एक दूसरे के पैर खींचने में लगे रहें.


यह भी पढ़ें: हिंदी मीडिया में आज तक ब्राह्मणवाद जारी है, स्वर्णिम जातीय अतीत का मोह लार टपका रहा है


हिमाचल में दिखी गुटबाजी

लेकिन अब परिस्थिति बदल रही है. अब गुटबाजी भाजपा के घर में भी प्रवेश कर गई है. हिमाचल और कर्नाटक में भाजपा के हारने की वजह एंटी-इनकंबेंसी के अलावा आंतरिक गुटबाजी भी रही. हिमाचल प्रदेश में भाजपा अभी तीन धरों में बटी हुई है. एक धरा है पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम सिंह धूमल और उनके बेटे कैबिनेट मंत्री अनुराग ठाकुर का, दूसरा है पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का और तीसरा धरा है भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

पिछले काफी लंबे समय से हिमाचल भाजपा में प्रेम सिंह धूमल का वर्चस्व रहा था, लेकिन 2014 के बाद मोदी-शाह ने अपने करीबी जेपी नड्डा को आगे कर दिया. उसके बाद से ही अंदर खाते खटपट शुरू हो गई. 2017 विधानसभा चुनाव में तो यहां तक आरोप लगा कि प्रेम सिंह धूमल को हराने में पार्टी नेताओं की ही भूमिका थी, क्योंकि उनकी मर्जी के खिलाफ जाकर पार्टी ने उनका चुनावी क्षेत्र बदलकर हमीरपुर से सुजानपुर कर दिया था. नतीजा यह हुआ कि इस विधानसभा चुनाव से प्रेम सिंह धूमल नदारद रहें, जिसके कारण भाजपा उनके गृह जिला हमीरपुर की पांचों विधानसभा सीट हार गई.

कर्नाटक में येदियुरप्पा की नाराज़गी

हिमाचल वाली स्थिति ही कर्नाटक में भी थी. भ्रष्टाचार के कई आरोपों के बावजूद येदियुरप्पा भाजपा के सबसे मजबूत और लोकप्रिय चेहरा थे. वह जनसंख्या के लिहाज से भी प्रदेश के सबसे बड़े समुदाय ‘लिंगायत समाज’ से आते थे. लेकिन पार्टी आलाकमान ने उनकी उम्र 75 साल से ऊपर होने का हवाला देकर उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया. यह उम्र वाला मौखिक नियम(भाजपा के संविधान में इसका कोई जिक्र नहीं है) अमित शाह ने भाजपा अध्यक्ष रहते हुए बनाया था. इसकी मदद से मोदी-शाह ने भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय राजनीति से दूर कर दिया और उन्हें मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया. कुछ नेताओं को राज्यपाल बनाकर किनारे किया.

येदियुरप्पा को हटाकर भाजपा ने भले ही लिंगायत समुदाय से ही ताल्लुक रखने वाले बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन बोम्मई का लिंगायत समुदाय में अच्छी पकड़ नहीं थी. पूरे राज्य स्तर पर येदियुरप्पा ही लिंगायत के प्रमुख नेता थे. नतीजा सामने है. कर्नाटक चुनाव के दौरान येदियुरप्पा खामोश हो गए, जिसका पार्टी के प्रचार अभियान और कार्यकर्ताओं पर काफी बुरा असर पड़ा.


यह भी पढ़ें: कर्नाटक ने दिखायी 2024 के लिए विपक्ष को राह— ध्यान सामाजिक सीढ़ी के सबसे निचले हिस्से के लोगों पर हो


मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी है भयंकर गुटबाजी

इस साल के अंत में हिन्दी भाषी क्षेत्र के तीन प्रमुख राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं. भाजपा के लिए ये तीनों राज्य लोकसभा के हिसाब से भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि तीनों राज्यों की कुल 65 लोकसभा सीट में से 62 पर अभी भाजपा का कब्जा है. लेकिन तीनों ही राज्यों में भाजपा नेताओं के बीच गुटबाजी चरम पर है.

सबसे ज्यादा गुटबाजी राजस्थान में है. वहीं भाजपा की सबसे मजबूत नेता वसुंधरा राजे सिंधिया हैं. 2014 के बाद से वह अपने तौर पर लगातार सीधा नरेंद्र मोदी और अमित शाह से टक्कर लेती रहीं है. केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा राजे को कमजोर करने के लिए कई नेताओं को आगे किया और कई नेताओं को केंद्रीय मंत्री बनाकर उनके बराबर खड़ा करने की कोशिश की. इन नेताओं में पूर्व केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर, वर्तमान केन्द्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत हैं. वहीं वसुंधरा राजे के खिलाफ खुलकर बोलने वाले नेता सतीश पूनिया को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया. उनका कार्यकाल दिसंबर 2022 में पूरा हो गया था फिर भी उन्हें चुनाव तक रखने की बात चल रही थी. वसुंधरा राजे गुट के कड़े विरोध के बाद मार्च में उन्हें हटाया गया.

अभी हाल ही में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक बयान देकर तहलका मचा दिया कि पायलट के बगावत के समय वसुंधरा राजे ने उनकी सरकार बचाने में मदद की थी. बाद में गहलोत पलट गये लेकिन सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया.

सिंधिया के कारण मध्यप्रदेश भाजपा में तल्खी और बढ़ी

मध्यप्रदेश में भी ऐसी ही हालत है. केंद्रीय नेतृत्व काफी लंबे समय से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को हटाकर अपने किसी पसंदीदा नेता को मुख्यमंत्री बनाना चाह रहा है. केंद्रीय नेतृत्व के पसंदीदा नेताओं में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर शामिल है.

कांग्रेस से सिंधिया के बगावत के बाद जब मार्च 2020 दोबारा भाजपा की सरकार बनने वाली थी, उस समय शिवराज चौहान को बदलने की चर्चाएं चल रही थी, लेकिन भारी संख्या में विधायक शिवराज के साथ खड़े हो गए. ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद गुटबाजी और तल्खी और बढ़ गई है. मुख्यमंत्री शिवराज समेत कई भाजपा नेता चाहते हैं कि उपचुनाव में हारे हुए सिंधिया समर्थक विधायकों को अगले चुनाव में टिकट नहीं दिया जाए और सिंधिया हर हाल में अपने सभी समर्थक विधायकों को टिकट दिलवाने पर अड़े हुए हैं.

दूसरी तरफ सिंधिया के जाने के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी काफी कम हो गई है. दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री की रेस से स्पष्ट रूप से बाहर है. इसलिए अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर कमलनाथ मुख्यमंत्री के लिए कांग्रेस के एकलौता चेहरा बच गए हैं. चेहरे के नाम पर अभी कांग्रेस में कोई विवाद नहीं है.

वहीं, छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को केंद्रीय नेतृत्व अब भाव नहीं दे रहा है. लेकिन अभी भी वह छत्तीसगढ़ में भाजपा के सबसे बड़े नेता हैं. वहां कांग्रेस में भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव के बीच विवाद है. लेकिन बघेल के लोकलुभावन कार्यों और रमन सिंह की खामोशी के कारण कांग्रेस सरकार के रिपीट होने की प्रबल संभावना है.

कायदे से देखें तो वर्तमान में उत्तर प्रदेश और गुजरात को छोड़कर करीब सभी बड़े राज्यों में भाजपा में गुटबाजी शुरू हो गई है. उत्तर प्रदेश में भी है लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब निर्विवाद रूप से भाजपा के सबसे बड़े नेता बन चुके हैं. वहीं गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गृह राज्य है, इसलिए फिलहाल यहां राज्यस्तरीय नेताओं के बीच गुटबाजी की कोई गुंजाइश नहीं है.

(अमरजीत झा पंजाबी यूनिवर्सिटी में जर्नलिज्म के रिसर्च स्कॉलर है. व्यक्त विचार निजी हैं)

(संपादन- आशा शाह)

share & View comments