जैसा कि हमने देखा है, पूरी ताकत पूरी तरह भ्रष्ट कर देती है, लेकिन अब यह भी साफ हो रहा है कि पूरी तरह की कमजोरी भी हमारी सोच को उतनी ही बुरी तरह भ्रष्ट कर देती है. अगर आपने इंडियन यूथ कांग्रेस द्वारा AI समिट में बाधा डालने के विवाद को फॉलो किया है, तो आप समझ जाएंगे कि मैं क्या कह रहा हूं.
यूथ कांग्रेस की यह कार्रवाई उस समय हुई, जब सरकार यह समझने की कोशिश कर रही थी कि कई झटकों से कैसे निपटा जाए. समझदार लोगों में से किसी ने भी इस आधिकारिक दावे पर विश्वास नहीं किया कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता हमारी बातचीत की क्षमता की बड़ी जीत है—चाहे राष्ट्रीय मीडिया ने इसे कितना भी अच्छा दिखाने की कोशिश की हो. फिर वैश्विक एपस्टीन स्कैंडल के असर ने सरकार को और परेशान कर दिया.
इसके बाद AI समिट आया, जिसे सरकार अपनी उपलब्धि के बड़े प्रदर्शन के रूप में दिखाना चाहती थी, लेकिन समिट में बहुत कुछ गलत हो गया—आयोजन की गलतियों से लेकर अजीब सुरक्षा नियमों तक, जिससे प्रतिनिधियों को परेशानी हुई और दिल्ली के आम नागरिकों को परेशान किया गया और यहां तक कि सरकार की पसंदीदा एक ‘यूनिवर्सिटी’ द्वारा दिखाया गया रॉबोट डॉग भी विवाद में रहा. यह साफ हो गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उपलब्धि बनने के बजाय, इस समिट से दुनिया भर में नकारात्मक खबरें आईं.
स्वाभाविक रूप से, सरकार घबरा गई. मीडिया से कहा गया कि गलतियों पर ध्यान देना बंद करें और यह दिखाएं कि समिट में बहुत महत्वपूर्ण काम हुआ है. यह सच हो सकता है, लेकिन शायद बहुत देर हो चुकी थी. लोगों की राय बनने लगी थी और बाद में की गई कोशिश काम नहीं कर रही थी. सरकार को समिट की छवि बचाने और संकट से बाहर निकलने के लिए किसी चमत्कार की ज़रूरत थी.
अंदाज़ा लगाइए, सरकार की मदद के लिए कौन आया?
यूथ कांग्रेस.
हां, सच में.
जैसा कि आप जानते होंगे, यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने मोदी विरोधी नारे लगाकर और अपनी शर्ट उतारकर प्रदर्शन करने की कोशिश की. शायद उनका यह विरोध उनके बगल (आर्मपिट्स) दिखाकर ध्यान खींचने पर आधारित था.
इस दृश्य पर एक प्रतिक्रिया (कम से कम मेरी) यह थी कि यह प्रदर्शन मूर्खतापूर्ण, गलत समय पर और अनुचित था. एक अंतरराष्ट्रीय समिट में बाधा डालना और बनियान उतारकर प्रदर्शन करना भारत या उसकी संसदीय विपक्ष की छवि के लिए अच्छा नहीं है.
रणनीतिक तौर पर, यह आत्मघाती गोल से भी बुरा था. अचानक, समिट की सारी गड़बड़ियां भूला दी गईं और यूथ कांग्रेस का विरोध ही मुख्य मुद्दा बन गया. सरकार ने बिना शर्ट वाले प्रदर्शन पर हुए विवाद का फायदा उठाया, संकट से बाहर निकल आई और अपनी समस्याओं से ऊपर उठने का तरीका खोज लिया.
सरकार ने खुद को उच्च सोच वाला दिखाया और कहा कि वह तकनीक से चलने वाले 21वीं सदी के भारत का वादा कर रही है, जबकि विपक्ष पुराने जमाने की राजनीति में फंसा हुआ है.
मिडिल क्लास की प्रतिक्रिया
हम प्रदर्शन के सही या गलत होने पर बहस कर सकते हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से इसमें कोई बहस नहीं है: यह एक बड़ी रणनीतिक गलती थी. एक ही रात में कांग्रेस, सरकार की विफलताओं का मज़ाक उड़ाने वाली पार्टी से अपने कार्यकर्ताओं के काम का बचाव करने वाली पार्टी बन गई.
मुझे इस विवाद पर उदारवादी लोगों की प्रतिक्रिया दिलचस्प लगी. कुछ लोगों ने हमेशा की तरह गालियां दीं और इधर-उधर की बातें कीं. कुछ वामपंथी लोगों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि की चिंता करना या प्रदर्शन के तरीके पर सवाल उठाना पुरानी सोच है और इस सरकार से लड़ने के लिए सही नहीं है.
लेकिन सबसे ज्यादा दिलचस्प प्रतिक्रिया उन समझदार और संतुलित लोगों की थी, जिन्होंने प्रदर्शन को सही ठहराने की कोशिश की. उनका कहना था: आज के समय में विरोध कैसे किया जाए?
संसद अब बहस या विरोध का मंच नहीं रह गई है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सरकार के निर्देशों का पालन करने वाले रोबोट की तरह काम करता है. दूसरे मीडिया भी ताकतवर लोगों को नाराज न करने के लिए खुद ही खबरें रोक लेते हैं. सरकार का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं को न्यायपालिका से भी समर्थन नहीं मिलता. जज खुले तौर पर पक्षपाती हो सकते हैं और सरकार के आलोचकों को जेल में रख सकते हैं, भले ही वे किसी अपराध में दोषी साबित न हुए हों.
तो ऐसे माहौल में लोग विरोध कैसे करें? 15 साल पहले बनियान उतारकर प्रदर्शन गलत लगता, लेकिन अब यह इसलिए हो रहा है क्योंकि विरोध के बाकी रास्ते बंद हो गए हैं.
मैं इस सोच से पूरी तरह सहमत नहीं हूं. लेकिन कोई भी ईमानदार व्यक्ति मानेगा कि इसमें कुछ सच्चाई है. यह दक्षिणपंथ की उस सोच से अलग है, जहां या तो सरकार की पूजा करो या देश विरोधी कहलाओ.
जब मैं देश भर में मिडिल क्लास लोगों से मिलता हूं, तो मुझे इसी तरह की बातें सुनने को मिलती हैं. ये लोग खुद प्रदर्शन नहीं करेंगे, लेकिन उनकी नाराज़गी साफ दिखती है.
सरकार की विश्वसनीयता की समस्या
अब तक सरकार और उसके समर्थक कहते रहे हैं कि मिडिल क्लास में कोई नाराज़गी नहीं है. उनके अनुसार सिर्फ ‘कम्युनिस्ट’, ‘सेक्युलर’ और ‘मुस्लिम’ लोग ही नाराज हैं. उनका कहना है कि मिडिल क्लास सरकार से खुश है.
हां, लेकिन एक सीमा तक.
प्रधानमंत्री का करिश्मा बीजेपी को अगला चुनाव जिता सकता है, लेकिन इसका एक कारण विपक्ष की कमजोरी भी है और लोगों को भरोसा नहीं है कि विपक्ष स्थिर विकल्प दे सकता है. फिर भी मिडिल क्लास की नाराजगी असली है और बढ़ रही है.
बीजेपी नेता कहते हैं कि मिडिल क्लास मायने नहीं रखता और सरकारी योजनाएं चुनाव जितवा देंगी, लेकिन यही बात कांग्रेस नेताओं ने भी कही थी, जब यूपीए-2 के समय मिडिल क्लास नाराज़ था और हम जानते हैं कि उसके बाद क्या हुआ.
शायद अब वक्त आ गया है कि सरकार समझे कि यूथ कांग्रेस की मूर्खता से उसे सिर्फ थोड़े समय की राहत मिली है. मिडिल क्लास की चिंता खत्म नहीं होगी. अब लोग टीवी चैनलों की तारीफ पर भरोसा नहीं करते. सरकार के दावों पर शक किया जा रहा है. उसकी विश्वसनीयता कम हो रही है.
क्या अब समय आ गया है कि असहमति को दबाना कम किया जाए और लोकतांत्रिक संस्थाओं को सही तरीके से काम करने दिया जाए? अगर लोकतंत्र में विश्वास के लिए नहीं, तो राजनीतिक फायदे के लिए ही सही. इस पर सोचने की ज़रूरत है.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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