विपक्ष के नेता राहुल गांधी के ग्रेट निकोबार द्वीप दौरे और वहां बनने वाले कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट और पावर प्लांट प्रोजेक्ट के कारण होने वाली बड़े पैमाने की जंगल कटाई की आलोचना करने वाले वीडियो के बाद काफी हंगामा हुआ. जैसा कि उम्मीद थी, खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले लोगों ने विपक्ष पर ‘विकास’ रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करने का आरोप लगाया, ताकि लागत और फायदे पर होने वाली सही चर्चा को दबाया जा सके.
यह शिकायतें बिल्कुल गलत हैं. असलियत यह है कि ‘ग्रेट निकोबार द्वीपों के समग्र विकास’ का यह प्रोजेक्ट सेना के लिए बहुत कम उपयोगी है. मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? क्योंकि मैंने कुछ अलग किया—मैंने असली प्रोजेक्ट के दस्तावेज पढ़े.
जनवरी 2023 के एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट डॉक्यूमेंट में “defence”, “military”, “naval” या “dual-use” जैसे शब्द खोजिए, तो कुछ भी नहीं मिलता. मार्च 2021 की पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में सिर्फ एयरपोर्ट पर एक “डिफेंस एप्रन” का ज़िक्र है, जिसमें कहा गया है कि रक्षा क्षेत्र कुल का सिर्फ 5.6 प्रतिशत होगा और नवंबर 2022 की पर्यावरण मंजूरी में कहा गया है कि कोई भी रक्षा सुविधा सिर्फ गलाथिया बे के पश्चिमी हिस्से तक सीमित होगी.
जो लोग कांग्रेस पर राष्ट्रीय सुरक्षा का ‘विरोध’ करने का आरोप लगा रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि अंडमान और निकोबार द्वीपों में ज्यादातर रक्षा ढांचा कांग्रेस सरकारों ने ही बनाया है, जिसमें ग्रेट निकोबार में आईएनएस बाज भी शामिल है. यहां फिलहाल हेलीकॉप्टर और डॉर्नियर Do-228 निगरानी विमान तैनात हैं, लेकिन एयरफील्ड को 10,000 फीट तक बढ़ाया जा रहा है. इसके बाद इसे Su-30MKI और जगुआर जैसे लड़ाकू विमानों और पी-8 पोसाइडन निगरानी विमान के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, जो मलक्का जलडमरूमध्य की ओर उड़ान भरते हैं.
यह रक्षा सुविधा 45-50 हेक्टेयर ज़मीन साफ करके बनाई गई थी और अब कहा जा रहा है कि इस कमर्शियल प्रोजेक्ट के लिए 6,500 हेक्टेयर से ज्यादा कीमती पुराने जंगलों को काटा जाएगा.
ध्यान रहे, अंडमान द्वीपों में आईएनएस कोहासा और एयर फोर्स स्टेशन कार निकोबार जैसे मौजूदा एयरफील्ड भी दक्षिण की ओर मलक्का तक एयर पावर भेज सकते हैं. ऐसे में गलाथिया बे में “ड्यूल-यूज” कमर्शियल एयरपोर्ट सेना की ताकत में बहुत कम बढ़ोतरी करेगा, लेकिन पर्यावरण को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाएगा.
फायदा बहुत कम है और नुकसान बहुत ज्यादा—सिर्फ नाजुक और अनोखे जंगलों, तटों, पेड़-पौधों और जानवरों के लिए ही नहीं, बल्कि वहां के आदिवासी लोगों और उनके जीवन के तरीके के लिए भी. दिल्ली में बैठे लालची और कम सोचने वाले फैसले लेने वालों के लिए यह सब शायद मायने नहीं रखता.
राष्ट्रीय सुरक्षा में कोई योगदान नहीं
अब आप उन घर बैठे वीरों में से हो सकते हैं जो कहते हैं: हमें तथ्यों से क्या मतलब? हमें सब कुछ चाहिए! तो चलिए देखते हैं कि असली एडमिरल क्या कहते हैं. पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने कहा: “मौजूदा सैन्य मौजूदगी और इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत, बढ़ाया और बेहतर किया जा सकता है…बिना द्वीप के कीमती पर्यावरण और सामाजिक ढांचे को ज्यादा नुकसान पहुंचाए.”
उन्होंने यह भी कहा कि ग्रेट निकोबार के उत्तर में स्थित द्वीपों को सैन्य उपयोग के लिए विकसित किया जा सकता है.
एक और गहरी समस्या की ओर पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ, अंडमान निकोबार कमांड, रियर एडमिरल सुधीर पिल्लई ने ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा कि जब तक “जॉइंट कमांड स्ट्रक्चर, चोकपॉइंट डॉक्ट्रिन और ऐसा मरीन स्ट्रैटेजी डॉक्यूमेंट नहीं होगा जो बताए कि ग्रेट निकोबार किस काम के लिए है”, तब तक वहां बनाया गया कोई भी इंफ्रास्ट्रक्चर “बिना सोच का प्लेटफॉर्म” होगा. क्या आप समझ सकते हैं कि इसमें कितनी बड़ी गलती है?
कुछ लोग यह सोचते हैं कि भारत, गलाथिया बे में बने गैर-सैन्य बेस की मदद से मलक्का जलडमरूमध्य को ब्लॉक करके चीन के समुद्री रास्तों को रोक सकता है. एडवार्ड फिशमैन, जो किताब Chokepoints के लेखक हैं, कहते हैं कि चोकपॉइंट ऐसा रास्ता होता है “जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए इतना जरूरी हो कि उसे बंद करने से दुश्मन घुटनों पर आ जाए.”
इस हिसाब से मलक्का इतना बड़ा चोकपॉइंट नहीं है. अगर मलक्का बंद हो जाए, तो चीनी जहाज सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य का इस्तेमाल कर सकते हैं. असल में, मलक्का जलडमरूमध्य की कम गहराई (कम से कम 25 मीटर) की वजह से बड़े जहाज (मलक्कामैक्स साइज से बड़े) पहले से ही लोम्बोक और मकासर जलडमरूमध्य का इस्तेमाल करते हैं. इससे गलाथिया बे का ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल के रूप में उपयोग भी सीमित हो जाएगा और अगर भारत अकेले कोई सैन्य कार्रवाई करता है, तो उसका टकराव इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर और थाईलैंड से भी हो सकता है, जो मिलकर मलक्का जलडमरूमध्य को नियंत्रित करते हैं.
क्या चीन की बढ़ती ताकत से निपटने के लिए हमें ज्यादा सैन्य क्षमता चाहिए? बिल्कुल. क्या एक ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल और सिविल एयरपोर्ट भारत की आर्थिक रूप से चीन को रोकने की क्षमता बढ़ाएंगे? शायद नहीं.
असल में, यह भी तय नहीं है कि इतना पैसा और पर्यावरण का नुकसान करके बनाया गया ट्रांसशिपमेंट पोर्ट सफल होगा भी या नहीं. रिटायर्ड नौसेना अधिकारी अभिजीत सिंह ने लिखा है कि गलाथिया बे एक दूर का इलाका है, जो भारत के दूसरे पोर्ट और इंडस्ट्रियल सेंटर से काफी दूर है. इसमें वह कनेक्टिविटी नहीं है जो कोलंबो, विजिंजम और केरल के वल्लारपदम जैसे दूसरे ट्रांसशिपमेंट पोर्ट्स में है.
कोई कह सकता है कि यह जोखिम प्राइवेट निवेशकों का है, लेकिन पर्यावरण पर असर और सरकार की 12,320 करोड़ रुपये की सब्सिडी इसे सिर्फ प्राइवेट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय—और बल्कि वैश्विक—मुद्दा बना देती है.
संक्षेप में, ग्रेट निकोबार का ट्रांसशिपमेंट पोर्ट और एयरपोर्ट प्रोजेक्ट भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा में लगभग कोई योगदान नहीं करता. फिर भी इसे देश के सामने रणनीतिक हित के नाम पर पेश किया जा रहा है. पर्यावरण का नुकसान, द्वीप के लोगों की अपील और व्यापक विरोध को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, जबकि सरकार अपने करीबी लोगों के लिए बड़ी सब्सिडी देने की तैयारी कर रही है. ऐसे में इस तरह के विनाश के खिलाफ आवाज उठाना विपक्ष और हर जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है.
लेखक अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य है. व्यक्त विचार निजी हैं. उनका एक्स हैंडल @dubeyamitabh है.
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