scorecardresearch
Wednesday, 24 July, 2024
होममत-विमतमंडल कमीशन और राजनीति में पिछड़ा उभार की सवर्ण प्रतिक्रिया में आया कोलिजियम सिस्टम

मंडल कमीशन और राजनीति में पिछड़ा उभार की सवर्ण प्रतिक्रिया में आया कोलिजियम सिस्टम

कांग्रेस ने कोलिजियम सिस्टम लाने की जजों की कोशिश का कभी विरोध नहीं किया. बल्कि बाद में कांग्रेस शासन में कानून मंत्री बने कपिल सिब्बल ने तो 1993 के इस केस में कोलिजियम सिस्टम के पक्ष में बहस की थी.

Text Size:

उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति जजों द्वारा किए जाने और एनजेएसी (नेशनल ज्यूडिशियल एप्वांयटमेंट कमीशन) एक्ट को सुप्रीम कोर्ट कोर्ट द्वारा निरस्त किए जाने की कड़ी आलोचना की है. पहली बार उन्होंने अपनी राय 26 नवंबर को संविधान दिवस समारोह में और फिर एल.एम. सिंघवी मेमोरियल लेक्चर में रखी. फिर लगभग वही राय उन्होंने राज्यसभा में पदेन सभापति पद से अपने संबोधन में भी रख दी. उप-राष्ट्रपति की आलोचना का मुख्य बिंदु ये है कि सुप्रीम कोर्ट संसद से ऊपर नहीं है क्योंकि जनतंत्र में जनता की भावना संसद के माध्यम से ही अभिव्यक्त होती है. उप-राष्ट्रपति एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है इस पद से कोलिजियम सिस्टम की हो रही आलोचना के गंभीर मायने हैं. इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट के जज लगातार कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण कोलिजियम सिस्टम देश का कानून है और इसके विरोध में कही जा रही बातों को वे गंभीरता से लेते हैं.

जजों द्वारा जजों की नियुक्ति का कोलिजियम सिस्टम संविधान में नहीं है. 1993 में सेकेंड जजेज़ केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ये आया. सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बैंच ने संविधान के 124(2) अनुच्छेद में लिखे ‘…राष्ट्रपति जजों की नियुक्ति चीफ जस्टिस के परामर्श के बाद करेंगे’ में परामर्श का अर्थ ‘चीफ जस्टिस की सहमति से करेंगे’ लगाया और इस तरह संविधान की धारा को नए सिरे से लिख डाला. मामूली से दिखने वाले इस भाषाई फेरबदल से भारत में जजों की नियुक्ति का तरीका बदल गया और राष्ट्रपति और सरकार की भूमिका जजों द्वारा भेजी गई लिस्ट पर मुहर लगाने की हो गई. ये तब जबकि संविधान सभा ने कोलिजियम जैसा सिस्टम लाने के बारे में लाए गए तीन-तीन संशोधनों को 23-24 मई 1949 को खारिज किया था.

इस लेख में हम उस ऐतिहासिक दौर की पड़ताल करेंगे, जिस दौर में सुप्रीम कोर्ट के जज कोलिजियम सिस्टम लेकर आए. हमारा तर्क है कि 80 से लेकर 90 के दशक की शुरुआत में देश की राजनीति की सामाजिक संरचना तेजी से बदल रही थी. खासकर पिछड़े वर्ग की लोक सभा और विधान सभाओं में संख्या बढ़ रही थी और उसी के साथ उच्च जातियों की हिस्सेदारी घट रही है. इस बीच, वीपी सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशों के मुताबिक सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू कर दिया. इससे सवर्ण तबकों के इलीट घबरा गए. उन्हें लगा कि संसद-विधानसभाओं, मंत्रिमंडलों के बाद अगर नौकरशाही में भी उनका दबदबा टूट गया तो क्या होगा. इसे देखते हुए उन्होंने जजों की नियुक्ति की ऐसी व्यवस्था बनाई जो संसद और सरकार से पूरी तरह आजाद है और जिसमें सवर्ण वर्चस्व बनाए रखने में कोई बाधा नहीं हो. इस तरह वर्चस्ववादी वर्ग ने सत्ता के एक अंग को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया.

1993 में कोलिजियम सिस्टम का आना क्यों महत्वपूर्ण है

सवाल उठता है कि कोलिजियम सिस्टम को इससे पहले क्यों नहीं लाया गया. दरअसल इसके कारणों को समकालीन राजनीति के समाजशास्त्र से समझा जा सकता है. आजादी के बाद के पहले बीस साल लगभग पूरी तरह कांग्रेस के थे. 1967 में पहली बार उसे तब झटका लगा जब विधानसभा चुनावों के बाद 9 राज्यों में गैर-कांग्रेस दलों की मिली-जुली सरकार बन गई. इन सरकारों में उन जातियों का प्रतिनिधित्व भी था, जिन्हें समेटकर चलने में कांग्रेस विफल साबित हुई थी. इनमें मझौली और अपेक्षाकृत निचली जातियों के संगठन और नेता भी थे.

1977, इस प्रक्रिया का दूसरा अहम पड़ाव था, जब पहली बार केंद्र में कांग्रेस हार गई और जनता पार्टी की सरकार बनी. इस सरकार में पिछड़ी जातियों के कई प्रमुख नेता थे. इसी दौरान दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग यानी मंडल कमीशन का गठन हुआ. हालांकि उसकी रिपोर्ट आने तक जनता पार्टी की सरकार जा चुकी थी. 1977 में ही उत्तर भारत के दो सबसे महत्वपूर्ण राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में ओबीसी समुदायों के दो नेता – राम नरेश यादव और कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने और दोनों ने अपने अपने राज्यों में पहली बार पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू कर दिया.

ओबीसी का दबदबा राष्ट्रीय राजनीति में पहली बार 1989 में ढंग से दिखा जब कई ओबीसी नेता उभरकर सामने आए और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने. 1990 का दशक राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक खींचतान के लिए भी जाना जाता है. 1989 के लोकसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला और यहां से भारत ‘कांग्रेस सिस्टम’ से ‘गठबंधन सिस्टम’ के दौर में प्रवेश कर गया, जो 2014 तक चला. राजनीति विज्ञानी अतुल कोहली इस दौर को भारत में ‘सरकार चलाने में बढ़ते संकट’ के काल के तौर पर देखते हैं. एक अन्य राजनीति विज्ञानी एमपी सिंह ने इसे ‘क्राइसिस ऑफ इंडियन स्टेट’ माना. प्रसिद्ध राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी ने इस बारे में एक प्रसिद्ध लेख लिखा है जिसका शीर्षक है ‘द क्राइसिस ऑफ मॉडर्न स्टेट ऐंड डिक्लाइन ऑफ डेमोक्रेसी.’ ये तर्क दिया गया कि गठबंधन सरकारों में नीतियों को लेकर स्थिरता नहीं होगी और सरकार कब क्या फैसला कर ले, कह पाना मुश्किल होगा.

ये दिलचस्प है कि जिस समय लोकतंत्र का समाज के निचले और मझोले तबकों में विस्तार हो रहा था और वंचित जातियों के लोग राजनीति और राजकाज में हिस्सेदारी लेने की कोशिश कर रहे थे तो अकादमिक संस्थानों में बैठे विद्वान इसे भारतीय लोकतंत्र का संकट बता रहे थे. ये शायद इसलिए भी हुआ क्योंकि अकादमिक संस्थानों में आम तौर पर वंचित स्वर नहीं हैं या कम हैं. इस बारे में समाजशास्त्री प्रोफेसर विवेक कुमार का ये लेख पढ़ा जाना चाहिए.

बहरहाल, 1990 आने तक संसद और सरकार में सामाजिक विविधता का दबाव दिखने लगा था और इसी बीच वीपी सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिश के मुताबिक सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत पद ओबीसी के लिए आरक्षित कर दिए. इससे तय हो गया कि सरकारी नौकरियों में भी अब सवर्ण वर्चस्व खत्म होगा. ऐसे लोग भी थे जो इस प्रक्रिया को लोकतंत्र का विस्तार बता रहे थे. योगेंद्र यादव ने राजनीति में दलित और पिछड़ी जातियों की बढ़ती हिस्सेदारी को ‘दूसरा लोकतांत्रिक उभार’ माना. वहीं एंथ्रॉपॉलजिस्ट लूसिया मिकेलुत्ती ने इसे ‘वर्नाकुलराइजेशन ऑफ डेमोक्रेसी’ माना. लूसिया मिकेलुत्ती बताती हैं कि राजनीति में वंचित जातियों का उभार, लोकतांत्रिक राजनीति के समाज के निचले तबके तक पहुंचने की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है. इसका सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी है और ये आम जनता की चेतना में व्याप्त हो चुका है. क्रिस्टोफ जैफरलो भी इसे सकारात्मक रूप में लेते हैं और पिछड़ी जातियों के इस राजनीतिक उभार को साइलेंट रिवोल्यूशन कहते हैं.

हाल ही में राजनीति विज्ञानी पवित्रा सूर्यनारायण ने बताया है कि पिछड़ी जातियों के राजनीतिक उभार और पदों में आ रही विविधता ने उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों में ये भय पैदा कर दिया कि उनकी सामाजिक श्रेष्ठता भी खतरे में पड़ सकती है.

यही वो राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज कोलिजियम सिस्टम लेकर आए. ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि पहले जजेज़ केस (1981) के बाद ये तय हो गया था कि जजों की नियुक्ति में राष्ट्रपति यानी सरकार की सर्वोच्चता रहेगी. इसके बाद, दो ओबीसी नेता पी. शिव शंकर और बी. शंकरानंद केंद्रीय कानून मंत्री बने थे और जजों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता की शुरुआत हो चुकी थी. एससी-एसटी के ज्यादा जज आएं, इसकी मांग तेज हो रही थी.


यह भी पढ़ेंः जजों के बीच विविधता न होने के लिए सिर्फ कॉलेजियम ही नहीं, सरकार भी दोषी


पिछड़ी जातियों के साइलेंट रिवोल्यूशन से न्यायपालिका को बचाने की कोशिश

कोलिजियम सिस्टम आने के समय के राजनीतिक सामाजिक संदर्भों से ऐसे संकेत मिलते हैं कि संसद, विधानसभाओं, सरकारों और नौकरशाही में आ रहे पिछड़ा-दलित उभार से न्यायपालिका को बचाने के लिए कोलिजियम सिस्टम लाया गया. वंचित जातियों के लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आने और उनका प्रभाव बढ़ने के खिलाफ ये सामाजिक रूप से प्रभुत्वशाली वर्ग की प्रतिक्रांति या सुरक्षात्मक रणनीति थी.

1993 में केंद्र की सत्ता कांग्रेस के पास थी और पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे. वे कानून मंत्री भी थे. कांग्रेस ने कोलिजियम सिस्टम लाने की जजों की कोशिश का कभी विरोध नहीं किया. बल्कि बाद में कांग्रेस शासन में कानून मंत्री बने कपिल सिब्बल ने तो 1993 के इस केस में कोलिजियम सिस्टम के पक्ष में बहस की थी. इस केस में उन्होंने दलील दी थी कि – ‘चीफ जस्टिस जजों के नामों की सिफारिश करें, इसके पहले उन्हें दो या तीन वरिष्ठ जजों से परामर्श करना चाहिए. इस तरह जो राय बनेगी, वह पूरी न्यायिक बिरादरी की राय मानी जाएगी और इसे मानना राष्ट्रपति के लिए बाध्य होना चाहिए.’

स्पष्ट है कि कपिल सिब्बल जो कह रहे थे, वही बात कोलिजियम सिस्टम के रूप में लागू हुई. फर्क सिर्फ ये हुआ कि चीफ जस्टिस अब चार सीनियर जजों की राय लेते हैं.

2004 में दोबारा केंद्र की सत्ता में आने के बाद के दस साल में भी कांग्रेस ने कभी कोलिजियम सिस्टम को बदलने की कोशिश नहीं की. ऐसा लगता है कि कोलिजियम सिस्टम सामाजिक इलीट के वर्चस्व को सुरक्षित रख पा रहा था और कांग्रेस इस वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व कर रही थी या फिर इन वर्गों को नाराज नहीं करना चाहती थी.

ये भी तथ्य है कि जजों की नियुक्ति का मामला 1990 में खोलने और इसे नौ जजों की बेंच को सौंपने वाले चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को रिटायरमेंट के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. यही नहीं कांग्रेस ने उन्हें राज्य सभा में भी भेजा. उनके भतीजे दीपक मिश्रा आगे चलकर कोलिजियम सिस्टम के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश बने. धार्मिक अल्पसंख्यकों में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने को लेकर गठित कमीशन के भी वे अध्यक्ष बने.

कोलिजियम सिस्टम के आने के साथ ही न्यायपालिका में सामाजिक विविधता लाने की कोशिशों का अंत हो गया. इस बारे में होने वाली तमाम मांगों पर केंद्र सरकार नियमित रूप से चीफ जस्टिस को पत्र लिखती है, जिस पर कभी कोई कार्रवाई कोलिजियम नहीं करता. केंद्र सरकार द्वारा संभवत: ऐसे सौ पत्र लिखे जा चुके हैं. लेकिन उच्च न्यायपालिका में एससी-एसटी-ओबीसी के जज लगभग नदारद हैं. सामाजिक विविधता विहीन न्यायपालिका ने जैसे फैसले दिए हैं, उनकी भी समीक्षा होनी चाहिए. लेकिन ये काम इस लेख के दायरे से बाहर है.

[अरविंद कुमार (@arvind_kumar__) लंदन विश्वविद्यालय के रॉयल होलोवे से राजनीति में पीएचडी, और ब्रिटेन के हायर एजुकेशन अकादमी (एएफएचईके) एसोसिएट फेलो हैं. दिलीप मंडल इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन के पूर्व मैनेजिंग एडिटर रहे हैं और मीडिया व समाज शास्त्र पर किताबें लिखी हैं. उनका ट्विटर हैंडल @Profdilipmandal है.]

(संपादनः शिव पाण्डेय)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: जजों की नियुक्ति का कॉलेजियम सिस्टम, जिसे लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने है


 

share & View comments