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Thursday, 18 July, 2024
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जजों के बीच विविधता न होने के लिए सिर्फ कॉलेजियम ही नहीं, सरकार भी दोषी

अनेक एससी/एसटी जजों का कहना है कि हाइकोर्ट में प्रोन्नति की उनकी बारी आती है, तो उनके खिलाफ कोई फर्जी शिकायत दर्ज करा दी जाती है और उनका प्रमोशन रुक जाता है.

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उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट और नरेंद्र मोदी सरकार के बीच लगातार बयानबाजी के साथ खींचतान शुरू है. केंद्रीय कानून मंत्री किरेण रिजिजू ने कॉलेजियम व्यवस्था को भारतीय संविधान के विपरीत बताया, तो सुप्रीम कोर्ट को नागवार गुजरा.

फिर, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट में संविधान दिवस समारोह में विचाराधीन कैदियों के प्रति न्यायपालिका के सुस्त रवैये के लिए न्यायाधीशों को फटकार लगाई. उसी कार्यक्रम में कानून मंत्री ने टिप्पणी की कि ‘केंद्र सरकार न्यायाधीशों की नियुक्तियों में सामाजिक विविधता के लिए प्रतिबद्ध है और हाइकोर्टों के माननीय मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध करती रही है कि वे नियुक्ति के लिए प्रस्ताव भेजते समय इसका ख्याल रखें.’

जाहिर है, ऐसा लगता है कि जजों की नियुक्ति में विविधता सरकार के लिए एक मुद्दा है. और यह महत्व रखता है क्योंकि, जैसा कि स्तंभकार दिलीप मंडल ने बताया कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश एनवी रमन्ना के नेतृत्व वाले कॉलेजियम ने विविधता के मुद्दे को तरजीह नहीं दी और उनके कार्यकाल के दौरान हाइकोर्टों में नियुक्त अधिकांश न्यायाधीश ‘ऊंची जातियों’ के थे.
अलबत्ता, इसके लिए कॉलेजियम ही पूरी तरह जिम्मेदार नहीं है. उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों के बीच विविधता की कमी के लिए केंद्र सरकार भी दोषी है.

न्यायपालिका में एससी/एसटी प्रतिनिधित्व

देश की उच्च न्यायपालिका में खासकर महिलाओं, एससी, एसटी और ओबीसी के मामले में विविधता की भारी कमी है. सुप्रीम कोर्ट के 27 न्यायाधीशों में से सिर्फ तीन महिला जज हैं, दो एससी, और एक ओबीसी समुदाय के हैं. एसटी समुदाय से कोई जज नहीं है. आजादी के बाद से सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त होने वाले न्यायमूर्ति एच.के. सेमा एसटी समुदाय से इकलौते जज रहे हैं.

इससे पता चलता है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों में एससी और एसटी समुदाय के प्रतिनिधित्व के मुद्दे की जांच के लिए 2000 में गठित संसदीय समिति (करिया मुंडा समिति) की रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद भी कोई खास प्रगति नहीं हुई है.
यह स्थापित सिद्धांत है कि विविधता से सार्वजनिक संस्थानों की जवाबदेही बढ़ाती है. न्यायपालिका में एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी को इन समुदायों के प्रति न्यायपालिका की असंवेदनशीलता की एक वजह माना जाता है, जो एक हद तक इन वंचित समुदायों के विचाराधीन कैदियों की संख्या वृद्धि में भी दिखाई देता है.

तो, उच्च न्यायपालिका में उनके प्रतिनिधित्व की कमी के लिए कौन जिम्मेदार है? ऐसा लगता है कि सरकार ने उच्च अदालत के पाले में गेंद डाल देने का रटा-रटाया तरीका अपना लिया है. हालांकि, न्यायाधीश सिर्फ अपने फैसलों के जरिए अपने को अभिव्यक्त करते हैं, इसलिए विविधता की कमी का दोष पूरी तरह से उन्हीं पर डाल दिया गया है. हालांकि, न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए योग्य लोगों की मांग और पूरा करने की व्यापक समझ के बिना यह दोष आसानी से नहीं मढ़ा जा सकता है.


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जज बनने योग्य प्रतिभाओं की मांग और पूरा करना

सुप्रीम कोर्ट के जज अधिकतर हाइकोर्टों से और कुछ बार से लिए जाते हैं. बार के सदस्य ज्यादातर वे वरिष्ठ वकील होते हैं, जो सॉलिसिटर जनरल और एडिश्नल सॉलिसिटर जनरल का पद संभाल चुके होते है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में ज्यादातर जज हाइकोर्टों से ही आते हैं.

हाइकोर्टों में जजों की नियुक्ति जिला अदालतों के न्यायाधीशों और हाइकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की होती है. जिला या अधीनस्थ न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए की जाती है, इसलिए एससी, एसटी, महिला और ओबीसी समुदायों के लोगों के लिए प्रवेश की संभावना है.

इन समुदायों के काफी संख्या में लोग जिला या अधीनस्थ अदालतों में आ रहे हैं. हालांकि, मुझे ऐसे कई जजों ने बताया है कि जब हाइकोर्ट में पदोन्नति के लिए उनकी बारी आती है, तो उनके खिलाफ फर्जी शिकायतें दायर कर दी जाती हैं. जब तक ऐसी शिकायतों का निपटारा होता है, तब तक ये जिला जज रिटायर हो जाते हैं.

जिला जजों पर हाइकोर्ट की सख्त निगरानी के कारण ऐसे जज सार्वजनिक रूप से कुछ कहने से कतराते हैं. उनका यह भी कहना है कि ऐसी घटनाओं के खिलाफ शिकायत भी दर्ज नहीं करा सकते हैं, क्योंकि उसमें उच्च न्यायपालिका जुड़ी होती है और वही अंतिम निर्णायक होती है. ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्टों ने इन मुद्दों की अनदेखी की है, जो कथित रूप से एससी/एसटी समुदाय के जिला जजों की हाइकोर्टोंं में पदोन्नति में अड़चन बने हुए हैं.

हाइकोर्टों में अधिकांश जज हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे वकीलों के पूल से नियुक्त किए जाते हैं. जजों की प्रोफाइल पढ़ने से यह साफ हो जाता है कि वे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल, महाधिवक्ता, अतिरिक्त महाधिवक्ता या केंद्र और राज्य सरकारों की स्थायी परिषद के सदस्य रह चुके हैं. ऐसे पदों को सामूहिक रूप से विधि अधिकारी कहा जाता है. इन पदों पर नियुक्तियां न्यायपालिका के बजाय सरकारें करती हैं, जिसका अर्थ है कि सरकारें परोक्ष रूप से वकीलों की प्रोफाइल को अपग्रेड करने के लिए जिम्मेदार हैं, और इस तरह हाइकोर्टों और बाद में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम से सिफारिश में उनके आ जाने की संभावना बढ़ जाती है.

विधि अधिकारियों में विविधता की स्थिति

अटॉर्नी जनरल देश के सर्वोच्च विधि अधिकारी होते हैं. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार, अटॉर्नी जनरल की किसी भी अदालत में सबसे पहले सुनवाई होगी. संविधान के अमल में आने के बाद से 14 अधिवक्ताओं को अटॉर्नी जनरल और 23 अधिवक्ताओं को सॉलिसिटर जनरल के रूप में नियुक्त किया गया है. इन 37 नियुक्तियों में महिला, एससी या एसटी समुदाय से एक भी नहीं था.

फिलहाल, 21 अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल हैं, और उनमें केवल दो महिलाएं हैं. कोई भी एससी/एसटी वर्ग से नहीं है. सुप्रीम कोर्ट भी वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता का पद सौंपता है, लेकिन एससी वर्ग के केवल एक वकील को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया है.

न्यायाधीशों का चयन ज्यादातर वकीलों के रैंक से किया जाता है, लेकिन विधि अधिकारी होने से उनकी प्रोफ़ाइल दमदार बन जाती है. ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार ही मुख्य रूप से जिम्मेदार होती है. इसलिए, यह तर्क देना गलत होगा कि देश की उच्च न्यायपालिका में एससी, एसटी और महिला न्यायाधीशों के कम प्रतिनिधित्व के लिए अकेले कॉलेजियम प्रणाली ही जिम्मेदार है. सरकार पहले अपने अंदर झांके.

(अरविंद कुमार (@arvind_kumar__) लंदन विश्वविद्यालय के रॉयल होलोवे से राजनीति में पीएचडी, और ब्रिटेन के हायर एजुकेशन अकादमी (एएफएचईके एसोसिएट फेलो हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)


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