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Saturday, 11 April, 2026
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स्पेक्ट्रम जंग का बड़ा हथियार है, उसे वायरल वीडियो के लिए नीलाम न करें

हमारे सामने असली विकल्प सीधा-सा है: क्या हम यह चाहते हैं कि जब सबसे ज्यादा ज़रूरी हो तब हमारे सैनिक बैंडविड्थ के लिए वायरल वीडियो से मुकाबला करें?

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इज़रायल और ईरान के बीच हाल की जंग ने आधुनिक युद्ध में दूरसंचार से जुड़े स्पेक्ट्रम पर नियंत्रण की अहमियत को साफ कर दिया है. ड्रोनों के ज़रिए तुरंत संदेश भेजकर ईरान द्वारा मिसाइलों की बौछार, इज़रायल द्वारा उन्हें रोकने की सटीक कार्रवाई, सैटेलाइट ‘आईएसआर’ और एआई की मदद से सटीक निशाना लगाना—यह सब सुरक्षित और बिना रुकावट वाले इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक चैनल्स की वजह से संभव हो रहा है. इंटरनेट पर आधारित युद्ध ऐसा ही होता है. इसमें स्पेक्ट्रम युद्ध के लिए एक बहुत अहम संसाधन है.

सैन्य स्पेक्ट्रम की उपलब्धता इसलिए ज़रूरी है क्योंकि आधुनिक युद्ध में हमले सिर्फ विमानों, मिसाइलों और बमों से नहीं होते; इसमें सेन्सिंग, जैमिंग, रिलेइंग और रि-टास्किंग भी शामिल होती है और ये सब तुरंत होता है ताकि हमले कम समय में पूरे हों और गति बनी रहे.

अमेरिका के सैन्य इतिहास से पता चलता है कि जब स्पेक्ट्रम कमज़ोर पड़ता है तो क्या होता है. ‘ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम’ (अफगानिस्तान, 2001) में ‘यूएचएफ’ सैटेलाइट पर 255 प्रतिशत ज्यादा दबाव पड़ा, जिससे स्पेशल फोर्सेस और हवाई ऑपरेशनों को ज़रूरी संदेश भेजने की CENTCOM की क्षमता कमज़ोर हो गई. ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ (2003) में बैंडविड्थ पर इतना ज्यादा दबाव पड़ा कि नेटवर्क क्रैश हो गया. नतीजा यह हुआ कि केवल आवाज़ वाले ‘एनालॉग’ सिस्टम का सहारा लेना पड़ा. सेना ने स्पेक्ट्रम के “e-turf wars” में बमों को जैम करने वाली जुगाड़ तकनीक, हवाई समर्थन के संदेश, या ‘आईएसआर’ संदेशों को प्राथमिकता देने का फैसला किया था. बोस्निया के ‘ऑपरेशन डेलीबरेट फोर्स’ (1995) में हवाई हमलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ था और इसमें दर्ज है कि अमेरिकी वायुसेना के पायलट स्कॉट ओ’ग्राडी जब अपने एफ-16 विमान से कूदे थे तब उनके बचाव में रुकावट इसलिए आ सकती थी क्योंकि उनसे संपर्क सीमित हो गया था.

स्पेक्ट्रम न केवल युद्ध को आसान बनाता है बल्कि वह खुद युद्ध का हिस्सा होता है. ‘स्टील्थ’ विमान, ‘स्टैंड-ऑफ’ हथियार, पहले से चेतावनी देने वाले हवाई प्लेटफॉर्म, इलेक्ट्रॉनिक हमला करने वाले विमान और ड्रोन—ये सभी कमांड और कंट्रोल, लक्ष्य तय करने, युद्ध में हुए नुकसान का आकलन करने और अलग-अलग सेनाओं के बीच तालमेल के लिए इसी पर निर्भर होते हैं. जिस पक्ष के पास मजबूत और सुरक्षित बैंड्स की पहुंच होती है वह दूर तक निगरानी कर सकता है, तेज़ी से फैसले ले सकता है, ज्यादा असरदार हमला कर सकता है और कमजोर संचार वाले पक्ष से ज्यादा तेज़ी से स्थिति के हिसाब से कदम उठा सकता है.

भारत में समय के साथ सैन्य बैंडविड्थ के बड़े हिस्से को मोबाइल और फाइव-जी सेवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए नीलाम किया जा चुका है. नागरिकों की ज़रूरतों का ध्यान रखा जा सकता है, लेकिन उन बैंड्स की कीमत पर नहीं, जो युद्ध की क्षमता तय करते हैं.

भारत में स्पेक्ट्रम पर दबाव

सीमाओं पर तनाव के कारण भारत की सेना को बड़े जोखिम वाले युद्ध का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए ज्यादा डिफेंस बैंड्स को फाइव-जी के लिए नीलाम करना आसान नहीं है.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2015 में 1900/2100 MHz बैंड में थ्री-जी स्पेक्ट्रम के 15 MHz को रक्षा मंत्रालय और दूरसंचार मंत्रालय के बीच अदला-बदली करने की मंजूरी दी थी और ज्यादा मूल्यवान 2100 MHz स्पेक्ट्रम को नीलामी और मोबाइल ब्रॉडबैंड के लिए उपलब्ध कराया था. कुछ साल बाद जब भारत फाइव-जी की तैयारी कर रहा था तब 3300-3600 MHz बैंड को लेकर रणनीतिक और व्यावसायिक प्राथमिकताओं के बीच खींचतान शुरू हो गई. 2025 में सरकार ने रक्षा मंत्रालय और ‘इसरो’ समेत कई विभागों द्वारा कथित तौर पर इस्तेमाल न किए गए 687 MHz बैंड को दोबारा इस्तेमाल की मंजूरी दी ताकि मोबाइल के लिए कुल 1,587 MHz उपलब्ध हो सके. इसमें से 320 MHz तुरंत उपलब्ध कराया जाना था जबकि बाकी 2028-29 में उपलब्ध कराया जाना था.

हर फैसला तकनीकी रूप से सही और उदार दिखता है, लेकिन कुल मिलाकर यह सैन्य इस्तेमाल के लिए बने, बिना रुकावट वाले नेटवर्क को कमजोर कर सकता है, जिससे भविष्य के ऑपरेशन्स पर असर पड़ सकता है.

विभिन्न क्षेत्रों को यह स्पेक्ट्रम देने का मुख्य कारण भारत में डाटा का बहुत ज्यादा इस्तेमाल है. हाल के सरकारी और उद्योग से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि भारत में मोबाइल फोन का हर उपभोक्ता औसतन हर महीने 36 जीबी, यानी हर दिन 1 जीबी से ज्यादा डाटा इस्तेमाल कर रहा है. यह दुनिया में प्रति स्मार्टफोन मोबाइल डाटा के औसत इस्तेमाल से लगभग दोगुना है.

भारत में डाटा के दाम दुनिया में सबसे सस्ते हैं. प्रति जीबी औसत कीमत एक डॉलर से भी कम है, जबकि दुनिया में औसत कीमत करीब 2 डॉलर है. अमेरिका में 1 जीबी मोबाइल डाटा की औसत कीमत करीब 6 डॉलर है. कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया में भी 1 जीबी डाटा की कीमत 5 से 6 डॉलर के बीच है. भारत में सस्ती दरों की वजह से डाटा का इस्तेमाल और डिजिटल सेवाओं का विस्तार तेज़ी से बढ़ा है, लेकिन इसके साथ कम कीमत में ज्यादा इस्तेमाल की आदत भी बढ़ गई है.

डाटा का हर इस्तेमाल बेकार नहीं होता. सस्ते डाटा ने यूपीआई, ऑनलाइन पढ़ाई, टेली-मेडिसिन और कई डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं को आसान बनाया है. लेकिन यह भी सच है कि स्पेक्ट्रम का बड़ा हिस्सा कम उपयोगी मनोरंजन और लगातार बेवजह स्क्रोलिंग में खर्च हो रहा है. जिस देश में स्पेक्ट्रम सीमित है और डिफेंस के लिए इसकी ज़रूरत बढ़ रही है, वहां यह चिंता ज़रूरी मानी जा सकती है.

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इंटरनेट अनुशासन

भारत में बड़े उपभोक्ता आधार के कारण अगर इस्तेमाल में थोड़ा अनुशासन लाया जाए, जो वैश्विक स्तर के करीब हो, तो ज्यादा जरूरी कामों के लिए बड़ी क्षमता उपलब्ध हो सकती है. इससे सरकार पर डिफेंस और अंतरिक्ष एजेंसियों से बार-बार बैंड्स लेने का दबाव भी कम होगा.

इंटरनेट अनुशासन कई तरीकों से लाया जा सकता है. सरकार के लिए सबसे आसान तरीका कीमत है. बहुत सस्ते डाटा का उद्देश्य था कि करोड़ों लोगों को इंटरनेट से जोड़ा जाए और डिजिटल इस्तेमाल की आदत बने. यह उद्देश्य पूरा हो चुका है. इसलिए अब इस व्यवस्था पर दोबारा विचार करना और टू-टियर ढांचे की ओर बढ़ना समझदारी हो सकती है. इस ढांचे में ज़रूरी संचार और डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं के लिए सस्ता डाटा हो और इसके ऊपर मनोरंजन जैसी सेवाओं के लिए प्रीमियम कीमत हो.

लेकिन यह सिर्फ आर्थिक या व्यवहार का मामला नहीं है, यह रणनीतिक मामला भी है. भारतीय सेनाएं अब इंटरनेट आधारित ऑपरेशन्स की ओर बढ़ रही हैं, इसलिए उन्हें मजबूत, तेज़ और बिना रुकावट वाले नेटवर्क की ज़रूरत होगी—चाहे वह तुरंत मिलने वाले आईएसआर संदेश हों, सटीक निशाना लगाना हो, ड्रोनों के झुंड से हमला हो, या युद्ध क्षेत्र में मजबूत संचार व्यवस्था. इन नेटवर्कों को ज्यादा ही नहीं बल्कि बेहतर स्पेक्ट्रम की ज़रूरत होगी—ऐसे बैंड्स जो सुरक्षित हों, जिन्हें प्राथमिकता मिले और जो व्यावसायिक दबाव से सुरक्षित हों.

अभी 4-जी, 5-जी और आने वाली 6-जी की व्यावसायिक मांग को पूरा करने के लिए डिफेंस से समय-समय पर बैंड्स खाली करने को कहा जाता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्कों के खिलाफ जाता है. इसकी जगह जरूरी है कि डिफेंस और स्पेस रिसर्च के लिए ज़रूरी बैंड्स की पहचान कर उन्हें सुरक्षित कर दिया जाए. पहले मजबूत सैन्य योजना बने और उसके बाद ही जो अतिरिक्त बैंड्स हों, उन्हें दिया जाए.

स्पेक्ट्रम की सही रणनीति में तीन बातें शामिल होंगी: डाटा के ज्यादा मनोरंजन वाले इस्तेमाल के लिए ऊंची रिजर्व कीमत और अनुशासित नीलामी, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सुरक्षित और बिना रुकावट वाले बैंड्स, और अनावश्यक इस्तेमाल के बजाय बेहतर नागरिक उपयोग को बढ़ावा देना.

अगर सही संतुलन बनाया जाए तो भारत को तीन फायदे मिल सकते हैं: मनोरंजन पर ज्यादा खर्च करने वालों से नीलामी के जरिए ज्यादा कमाई, डिजिटल भटकाव कम होने से काम में बेहतर उत्पादकता और सबसे अहम—सेनाओं को जमीन, समुद्र और हवा के साथ-साथ इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्र में भी भविष्य की जंग के लिए साफ स्पेक्ट्रम मिल सकेगा.

इसलिए हमारे सामने सीधा सवाल है: क्या हम चाहते हैं कि जरूरत पड़ने पर हमारे सैनिक बैंडविड्थ के लिए वायरल वीडियो से मुकाबला करें?

एयर मार्शल जीएस बेदी ‘सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज’ (सीएपीएसएस) और ‘सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज’ (सीएलएडब्ल्यूएस) के प्रतिष्ठित फेलो हैं. ये उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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