Wednesday, 29 June, 2022
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सावरकर ने आत्मघाती गोरक्षा को खारिज करने की सलाह दी थी

सावरकर जाति व्यवस्था को मिटाना चाहते थे, झींगा पकाते थे और गोरक्षा को तभी तक जायज मानते थे जब तक वह मानवता को शर्मसार न करे.

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हर किसी को मालूम है कि विनायक दामोदर सावरकर जब रत्नगिरि जेल में बंद थे, तभी 1923 में उन्होंने अपना ग्रंथ लिखकर ‘हिंदुत्व’ शब्द की अपनी व्याख्या दी थी और इसे लोकप्रिय किया था, लेकिन कम ही लोगों को यह एहसास होगा कि वे अपने समय से कहीं आगे थे. ऐतिहासिक संदर्भों में उनके खिलाफ भेदभाव तो हुआ है लेकिन तथ्य यह भी है कि उनका अधिकांश लेखन मराठी में है जिसका अनुवाद उपलब्ध न होने के कारण यह समकालीन विद्वानों और पाठकों तक नहीं पहुंचा है.

उनका जन्म रूढ़िपंथी, धर्मपरायण चितपावन ब्राह्मण समुदाय में हुआ था, इसके बावजूद वे बचपन से ही जातिप्रथा से नफरत करते थे. उनकी दोस्ती विभिन्न जतियों और तबकों के बच्चों के साथ थी और वे उनके घरों में जाकर खाना खाया करते थे. वे अपने समय के उन गिनती के ब्राह्मणों में थे, जो पढ़ाई करने के लिए समुद्री जहाज़ से लंदन गए थे. उस समय उनके समुदाय में समुद्री यात्रा वर्जित थी क्योंकि इससे जाति गंवाने का डर रहता था.

सावरकर को अपने समय के कई ब्राह्मणों की तरह निरामिषवाद को लेकर कोई आपत्ति नहीं थी. अक्टूबर 1906 में उनकी पहली मुलाक़ात युवा मोहनदास करमचंद गांधी से हुई, जो लंदन के इंडिया हाउस में आए थे, जहां सावरकर तथा दूसरे क्रांतिकारी रहते थे. गांधी जब उनसे राजनीतिक विचार-विमर्श करने गए थे तब सावरकर अपना खाना पका रहे थे. उन्हें बीच में रोक कर सावरकर ने पहले खाना खा लेने का अनुरोध किया. एक चितपावन ब्राह्मण को झींगा पकाते देखकर पक्के शाकाहारी गांधी दंग रह गए और उन्होंने खाना खाने से माफी मांग ली.


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सावरकर ने उनका मज़ाक-सा उड़ाते हुए कहा, ‘जब आप हमारे साथ खाना ही नहीं खाएंगे तो हमारे साथ काम कैसे करेंगे? और, यह तो बस उबली हुई मछली है… हमें तो ऐसे लोग चाहिए जो अंग्रेज़ों को ज़िंदा खा जाएं.’ ज़ाहिर है, यह पहली मुलाक़ात कोई अच्छी नहीं रही और उनके बीच मतभेद बढ़ते ही गए.

लंबी कैद ने सावरकर के राजनीतिक विचारों को परिपक्व बनाया, उन्होंने जाति प्रथा और छुआछूत पर लेख लिखे कि इनके कारण पूरा राष्ट्र किस तरह कमज़ोर हो रहा है.

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जातिविहीन भारत

गांधी या आंबेडकर के राजनीतिक विमर्श में भी जब ये विचार दाखिल नहीं हुए थे तब इन प्रथाओं को पूरी तरह, बिना शर्त खत्म करने की वकालत करके सावरकर जातिविहीन भारत के अग्रदूत बन गए थे. 1931 में अपने निबंध ‘हिंदू समाज के सात बंधन’ में उन्होंने कहा कि प्रतिभा या बुद्धिमत्ता को वंशानुगत मानना गलत है. व्यक्ति का चरित्र और आचरण उसके परिवेश से बनते हैं. जाति प्रथा की पैरवी करने वाली ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरी धार्मिक कृतियों के खिलाफ मत प्रकट करते हुए उन्होंने लिखा कि इनके चलते खुद को जड़ बना लेना मूर्खता ही है.

उन्होंने लिखा कि मनुष्यों द्वारा लिखे गए इन ग्रंथों में परस्पर विरोधी बातें लिखी हैं, जो खास संदर्भ तथा खास समाज के लिए प्रासंगिक रही होंगी. समाज जब आगे बढ़ रहा है तो उनमें भी परिवर्तन की या उन्हें रद्द कर देने की ज़रूरत है. जाति प्रथा को सावरकर ने एक बुराई के रूप में देखा, जिसने हिंदू समाज को बांट कर रख दिया और दूसरे समूहों द्वारा हमलों तथा धर्मांतरणों का निशाना बना दिया.

उन्होंने जिन सात बंधनों को ध्वस्त करने की वकालत की थी वे निम्नलिखित हैं-

1. वेदोक्तबंदी: वेद साहित्य एवं अनुष्ठानों का आरक्षण केवल ब्राह्मण समुदाय के लिए.

2. व्यवसायबन्दी: पेशा चुनने का अधिकार केवल व्यक्ति का, जो उसकी योग्यता पर आधारित होगा, न कि उसकी पैदाइश पर.

3. स्पर्शबंदी: छुआछूत को वे पाप और समाज का कलंक मानते थे.

4. समुद्रबंदी: समुद्र पार या विदेश जाने करने पर जाति गंवाना.

5. शुद्धिबंदी: हिंदू धर्म अपनाने पर रोक. उनका कहना था, ‘जो लोग आस्था के कारण धर्म परिवर्तन करते हैं उन पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन धर्म परिवर्तन करके कोई हिंदू नहीं बन सकता, इस पुरातन विचार के आधार पर हम अपने हिंदू समाज की संख्या बढ़ाने से क्यों मना करें, जिसका किसी प्राचीन ग्रंथ में अनुमोदन नहीं मिलता?’

6. रोटीबंदी: अंतर-जातीय भोज पर प्रतिबंध.

7. बेटीबंदी: अंतर-जातीय विवाह पर प्रतिबंध.

समाज सुधार

भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि चार वर्णों की रचना उन्होंने की, इस आधार पर सावरकर का कहना है कि चातुर्वर्ण व्यवस्था की पुनर्व्याख्या होनी चाहिए. उन्होंने लिखा है, ‘हर व्यक्ति की अपनी विशेषता होती है, अपने गुण होते हैं. भगवान कृष्ण ने यही कहा था कि मैंने मनुष्यों की रचना की, जो स्वभाव, चरित्र, गुण तथा मूल्यों के मामले में एक-दूसरे से भिन्न हैं, और वे अच्छे हों या बुरे, वे सब मेरी ही रचनाएं हैं. कृष्ण ने कहीं यह नहीं कहा कि मनुष्यों को गुण आदि वंशानुगत मिलते रहेंगे… सावरकर का कहना है कि इसलिए हम सब जन्म से शूद्र हैं. जीवन में आगे बढ़ते हुए हम गुण, शिक्षा, मूल्य हासिल करते जाते हैं और अलग-अलग स्तर की चेतना तथा सोच विकसित करते हैं. चातुर्वर्ण व्यवस्था के पीछे मूलभूत अवधारणा यही है.’

सावरकर ने ज़ोर देकर कहा कि वर्ण व्यवस्था सनातन धर्म का हिस्सा नहीं है, ‘सनातन धर्म कालातीत ऊंचे आदर्शों और आस्थाओं का विचार है, जो अनश्वर हैं…. जबकि जाति व्यवस्था, विधवा विवाह या निरामिषता का विरोध मानव निर्मित सामाजिक प्रथाएं हैं जिन्हें समाज की ज़रूरतों के अनुसार खत्म किया जा सकता है.’

रत्नगिरि में 1924 से 1937 तक कैद में रहते हुए सावरकर इन विचारों को प्रसारित करने के लिए बड़े पैमाने पर सामाजिक सुधारों की पैरवी करते रहे. उन्होंने बड़े पैमाने पर अंतर-जातीय भोज आयोजित करने और सभी जातियों को सामुदायिक प्रार्थना के लिए ‘पतित पावन मंदिरों’ के निर्माण की वकालत की, जिसका स्थानीय ब्राह्मण समुदाय ने भारी विरोध किया.

गो-पूजा

गऊ पूजन जैसे मामलों पर भी सावरकर के विचार मौलिक थे. उन्होंने लिखा, ‘गाय-भैंस जैसे जानवर और बरगद-पीपल जैसे पेड़ मनुष्य के लिए उपयोगी हैं इसलिए हम उन्हें प्यार करते हैं; इस लिहाज से हम उन्हें पूजा के योग्य भी मान सकते हैं. उनकी रक्षा, उनका जीवन और और उनकी भलाई हमारा फर्ज़ है और इस अर्थ में यह हमारा धर्म है.’

इसके साथ ही उन्होंने सावधान भी किया कि अगर ‘जानवर या पेड़ मनुष्य के लिए समस्या बने, तो वे सुरक्षा पाने या पालने के काबिल नहीं रह जाते और तब उन्हें नष्ट करना मानवीय तथा राष्ट्रीय हित और मानव तथा राष्ट्र धर्म बन जाता है. जब गाय मनुष्य के हित में नहीं रह जाती और वास्तव में नुकसानदेह बन जाती हो और मानवतावाद शर्मसार होने लगता हो, तब आत्मघाती हद तक न जाकर गोरक्षा को खारिज कर देना चाहिए.’

गोरक्षा के नाम पर आजकल भीड़तंत्र और हत्याओं को जिस तरह बढ़ावा दिया जा रहा है, उसके मद्देनजर यह एक मौजूं सलाह है.

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि वे गाय को एक ‘सुंदर प्राणी’ मानते हैं, उनकी आस्था उसकी रक्षा में तो है मगर उसे देवी के रूप में पूजने में नहीं है. सावरकर का कहना था कि कचरा खाने वाले और अपने ही गोबर पर बैठे रहने वाले जानवर को देवी का दर्जा देना, और आंबेडकर तथा चोखा मेला का इसलिए अनादर करना कि वे कथित नीची जाति से जुड़े हैं, ‘मानवता तथा देवत्व, दोनों का अपमान है’. उन्होंने लिखा, ‘हम जिस देवता की पूजा करते हैं वैसे ही बन जाते हैं इसलिए हिंदुत्व के आदर्श तो नरसिंह होने चाहिए, न कि दब्बू गाय.’

अपने निबंध का समापन करते हुए वे लिखते हैं, ‘मैं गाय का शत्रु नहीं हूं. मैंने केवल गाय की पूजा से जुड़ी झूठी धारणाओं और प्रवृत्तियों की आलोचना की है ताकि थोथे को उड़ा दिया जाए और सार तत्त्व को बचाया जाए और गोरक्षा के सच्चे लक्ष्य को बेहतर तरीके से हासिल किया जा सके. धार्मिक अंधविश्वासों को फैलाए बिना गोरक्षा के आंदोलन को स्पष्ट आर्थिक तथा वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित किया जाए और लोकप्रिय बनाया जाए. रक्षा के लिए पूजा-भाव बेशक जरूरी है. लेकिन गोरक्षा के कर्तव्य को भूलकर केवल पूजा में लीन होना अनुचित होगा.’

जिस तरह उन्होंने हिंदू समुदाय से इन अंधविश्वासों को त्यागने का आह्वान किया, उसी तरह उन्होंने मुस्लिम समुदाय को समय के मुताबिक खुद को सुधारने और ‘कुरान को पूरी इज्जत देते हुए इस धारणा को खारिज करने’ की सलाह दी कि ‘कुरान के एक भी शब्द पर सवाल नहीं उठाया जा सकता क्योंकि यह खुदा का शाश्वत संदेश है.’

इसकी व्याख्या करते हुए सावरकर कहते हैं कि अरब में गृहयुद्ध के दौर में दमित तथा पिछड़े लोगों के लिए जो मूल्य उचित लगते थे उन्हें जीवन के शाश्वत मूल्यों के तौर पर कबूल नहीं किया जा सकता. मुसलमानों को ‘केवल उन्हीं बातों को स्वीकार करने की आदत डालनी चाहिए, जो आधुनिक युग के लिए प्रासंगिक हों.’

तर्कवादी सावरकर

अथक तर्कवादी सावरकर केवल तार्किकता और वैज्ञानिक सोच पर भरोसा करते थे. उन्होंने गांधी के इस बयान की निंदा की थी कि बिहार में 1934 में भीषण भूकंप इसलिए आया क्योंकि भारत के लोग छुआछूत को मानते हैं. सावरकर ने कहा था, ‘भारत में यह हमलोगों का दुर्भाग्य है कि गांधीजी जैसे प्रभावशाली व्यक्ति अपनी ‘आंतरिक आवाज़’ के बूते यह कहते हैं कि 1934 में बिहार में आया भीषण भूकंप बर्बर जाति प्रथा के लिए भगवान द्वारा दी गई सज़ा है. मैं इंतज़ार कर रहा हूं कि महात्मा जी की आंतरिक आवाज़ क्वेटा के भूकंप का क्या कारण बताती है.’

पूंजीवादी, बाज़ार केंद्रित, मशीन पर चलने वाले समाज के पक्के पैरोकार सावरकर ने 1930 के दशक में ही लिख दिया था कि वैज्ञानिक सोच ही आधुनिक तथा समृद्ध भारत का आधार बन सकती है. ‘चरखा नहीं बल्कि विज्ञान, आधुनिक विचार और औद्योगीकरण से ही हम भारत में हरेक स्त्री-पुरुष को रोज़गार, भोजन, कपड़ा और खुशहाल जीवन दे सकते हैं.’

उनके विचार क्रांतिकारी थे और अपने समय से बहुत आगे के थे, जिन्होंने हिंदुत्व के उनके खेमे में भी द्वंद्व पैदा कर दिया था. मसलन आरएसएस में भी, जो इन मसलों पर ज्यादा रूढ़िवादी विचार रखता है. शायद यही वजह है कि सावरकर आरएसएस से अलग ही रहे, हालांकि उनके बड़े भाई गणेश दामोदर केबी हेडगेवार के साथ संघ के संस्थापकों में शामिल थे.
समाज, विज्ञान, अर्थव्यवस्था, और विदेशी मामलों पर सावरकर के लेखन के निष्पक्ष एवं गहन विश्लेषण से यही प्रकट होता है कि उनकी कई भविष्यवाणियां अंततः सच साबित हुईं. अगर कालातीतता और प्रासंगिकता ही किसी नेता के विचारों की असली परीक्षा है, तो सावरकर निश्चित ही ऐसे नेता थे.

(वीर सावरकर पर दो किस्तों में प्रस्तुत सीरीज़ की यह दूसरी किस्त है. पहली किस्त आप यहां पढ़ सकते हैं. इस लेख के लिए ‘सावरकर समग्र वाङ्ग्मय’ में संकलित उनके लेखन की सहायता ली गई है. इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

(लेखक एक इतिहासकार और नेहरु स्मृति संग्रहालय में सीनियर रिसर्च फेलो हैं, और उनकी लिखी सावरकर की जीवनी प्रकाशित होने वाली है.)

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