Sunday, 3 July, 2022
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भाजपा को हराने के लिए राहुल गाँधी आरएसएस से सीखें कुछ गुर

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राहुल गांधी की राजनीति में उनकी ही मां सोनिया गांधी की तुलना में अधिक पारंपरिक और कल्पनाशीलता से हीन साबित हुई है।

2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा करते थे कि “बदलाव की आंधी” चल रही थी लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं था कि अगर साइकिल की ट्यूब हवा में रखेंगे तो वह भर खुद-ब-खुद भर जाएगी, पम्प तो मरना ही होगा। इसी तरह की बातों के माध्यम से मोदी ने कार्यकर्ताओं को जनता के बीच जाने को प्रेरित किया।

शुक्रवार को एक अनौपचारिक मीडिया बातचीत के दौरान एक शीर्ष कांग्रेसी पदाधिकारी की प्रतिक्रिया के साथ इसकी तुलना करें। “जब हवा बदलती है तो कुछ काम नहीं आता। 2004 में इंडिया शाइनिंग अभियान का क्या हुआ था?”- ऐसा कहते हुए वे भाजपा की चुनावी तैयारियों को खारिज कर गए।

यह अंतर दोनों पक्षों के दृष्टिकोण को उस समय परिभाषित करता है जब वे अगले आम चुनावों की तैयारी में जुटे हैं : सत्तारूढ़ दल अभी भी मोदी की लोकप्रियता को भुना रहा है लेकिन उसने ज़मीनी मेहनत भी शुरू कर दी है जबकि विपक्ष इस कालचक्र में खुदको संभाल नहीं पा रहा। कांग्रेस के पुराने नेताओं की जगह नए चेहरों को मौका देने के अलावा राहुल की राजनीति अपनी माँ एवं पूर्ववर्ती सोनिया गांधी की तुलना में काफी पारंपरिक रही और कल्पनाशीलता का अभाव साफ झलका।

वह 2019 में बीजेपी को हराने के लिए सोनिया की 2004 की रणनीति का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वह क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ करके अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता और करिश्माई अपील का सामना कर गयीं तो वह 15 साल बाद भी ऐसा कर ही लेंगे। अगर सोनिया ने वॉर रूम में में पार्टी की चुनावी तैयारी की निगरानी करने के लिए जयराम रमेश को लगाया था तो राहुल भी वैसा ही करेंगे।

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यदि सोनिया की कैम्पेन ग्रामीण भारत में सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचितों के आसपास केंद्रित थी, तो राहुल की भी वैसी ही होगी। मां की राजनैतिक रणनीति दोहराने में कोई बुराई नहीं लेकिन एकमात्र समस्या यह है कि मोदी वाजपेयी नहीं हैं।


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काशीनाथ की मारक राजनैतिक व्यंग्य रचना काशी का अस्सी में एक पात्र कहता है, “कांग्रेस का हुक्का तो कब का बुझ गया, पर हम हैं कि गुड़गुड़ाये जा रहे हैं” । आजकल कई अनुभवी कांग्रेस नेता भी यही बोल रहे हैं। वे संसद में राहुल की नाटकीयता या सरकार को निशाना बनाने की उनकी शूट-एंड-स्कूट रणनीति से ज्यादा प्रभावित नहीं हैं।

मोदी सरकार अपनी अधिकांश चमक और अपने समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा भले ही खो चुकी हो ( बेरोजगार युवा और छोटे व्यापारी एवं उद्यमी खासतौर से अधीर हो रहे हैं) लेकिन भाजपा के लिए खतरे की घंटी नहीं बज रागी। जैसा मोदी ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को बताया, कांग्रेसी बस हवा में ट्यूब लहरा रहे हैं।

अब जब राहुल किशोर कुमार के “प्यार बांटते चलो ” की धुन पर दोस्तो और दुश्मनों में कोई फर्क नहीं रख रहे तो ऐसी हालत में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ज़मीनी कार्यप्रणाली के बारे में एक बार बिना किसी पूर्वाग्रह के सोचना चाहिए। वे तभी जान पायेंगे कि भाजपा उनसे इतना आगे कैसे है। हालांकि मोदी और उनके मंत्रियों एवं कार्यकर्ताओं की मेहनत से वे अनभिज्ञ हैं, ऐसा नहीं।

मध्यप्रदेश में आरएसएस ने 1 -5 जनवरी तक स्वामी विवेकानंद दिवस का आयोजन किया। इस दौरान ‘रन फॉर अवेकनिंग भारत’ भाषण और चित्रकला प्रतिगोगितायें आयोजित की गयीं जिनमें 112 कॉलेजों और शैक्षिक संस्थानों ने हिस्सा लिया। यहाँ “गणमान्य व्यक्तियों” ने भाषण भी दिए। विदिशा में एक जागरण का आयोजन किया गया था जिसमें 37000 से भी ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। आरएसएस ने 23 जनवरी को छिंदवाड़ा में ‘राष्ट्रशक्ति सम्मेलन’ का आयोजन किया जिसमें 90 गांवों के लगभग 14,000 लोगों ने “पंच माताओं” की रक्षा करने का संकल्प किया – अपनी स्वयं की मां, नर्मदा, धरती माँ, गौ माता और भारत माता।

यदि राहुल आरएसएस की वेबसाइट पर जाएंगे, तो उन्हें किसी भी दिन देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित किए जा रहे ऐसे बीसियों कार्यक्रमों के विवरण मिलेंगे। इन कार्यक्रमों के पीछे भाजपा की मंशा को लेकर सवाल भले ही उठाये जा सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक पहुंच के मामले में इनके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता।

आइये कांग्रेस सेवा दल की गतिविधियों को देखें। नई दिल्ली में इसका मुख्यालय देश भर के अपने पदाधिकारियों और सदस्यों की एक सूची संकलित करने में व्यस्त है। इनके आस आजतक ऐसी कोई सूची थी ही नहीं। युवा कांग्रेस और एनएसयूआई ने कांग्रेस अध्यक्ष की नज़र में बने रहने के लिए, विशेषकर नई दिल्ली में टोकन प्रदर्शन आयोजित किए हैं और इससे ज़्यादा उनकी गतिविधियों के बारे में कहने को कुछ है नहीं। और, क्या कोई जानता है कि अन्य एआईसीसी सेल और विभाग जोकि किसानों, मछुआरों, बुद्धिजीवियों, ओबीसी,दलितों और दसियों अन्य उद्देश्यों से स्थापित किये गए थे वे आजकल क्या कर रहे हैं?


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कांग्रेस हमेशा चुनाव मोड में रहने और राजनीतिक पूंजी अर्जित करने के लिए अपनी सत्ता का इस्तेमाल करने की भाजपा की आदत की विरोधी है और यह स्वाभाविक भी है। विपक्ष के नेता लगातार सत्ताधारी दल को आड़े हाथों लेते हैं। फिलहाल यह विरोध एनआरसी को लेकर चल रहा है और विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार सत्ता में आने के लिए आम जनता एवं समुदायों का ध्रुवीकरण कर रही है।

राहुल और उनके पार्टी के नेता अपने ट्वीट्स, ऑनलइन पोस्ट्स और प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से भाजपा-आरएसएस के इन हमलों का ‘मुंहतोड़’ जवाब दे रहे हैं। और यदि 2019 में एनडीए सरकार को गद्दी से हटाने के लिए अब भी कुछ करना बाकी है, तो कांग्रेस अध्यक्ष ने इसे मायावती, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी को आउटसोर्स किया है।

Read in English : Rahul Gandhi needs to learn from RSS if he has to defeat BJP

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