2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 151 मौजूदा विधायक और सांसद महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े मामलों का सामना कर रहे हैं. यह आंकड़ा तब और भी डरावना हो जाता है, जब इसे राजनीतिक दलों में POSH कानून लागू करने पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ जोड़कर देखा जाता है. दो जजों की पीठ ने कहा था, “यह पैंडोरा बॉक्स खोल देगा.” जनगणना और परिसीमन के बाद राजनीति में और ज़्यादा महिलाओं के आने की संभावना है, ऐसे में यह एक ऐसी समस्या है जिस पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत है.
पीड़ित महिला को किसी राजनीतिक ‘वीआईपी’ के हित में अनदेखा करते रहना अब स्वीकार नहीं किया जा सकता.
पार्टी के भीतर की संरचनाएं अपने ही शक्ति-केंद्र बना लेती हैं—अनौपचारिक, विवेकाधीन और अक्सर करियर के लिए निर्णायक—भले ही उनसे जुड़े लोगों के पास कोई औपचारिक सार्वजनिक पद न हो. अगर इसी व्यवस्था के भीतर यौन उत्पीड़न होता है, तो उस महिला के पास कौन-सा साफ और लागू किया जा सकने वाला संस्थागत उपाय है—कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बावजूद?
यही वह सवाल है, जिससे हमारा कानून अब भी बचता रहा है.
पार्टी की शक्ति संरचना
राजनीतिक दल सरकारी विभाग नहीं होते, लेकिन सरकार तक पहुंचने का सबसे बड़ा रास्ता वही होते हैं. इनके भीतर संगठनात्मक अधिकार ही असली अधिकार होता है: यही तय करता है कि किसे मौके मिलेंगे, कौन आगे बढ़ेगा, किसे किनारे किया जाएगा और किसे सार्वजनिक रूप से बचाया जाएगा. यही कारण है कि दलों के भीतर लागू होने वाली, असरदार यौन उत्पीड़न शिकायत व्यवस्था का न होना किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता.
मौजूदा कानून महिलाओं की सबसे साफ सुरक्षा वहां करता है, जहां रिश्ते औपचारिक और अनुबंध पर आधारित होते हैं, लेकिन जहां शक्ति ज़्यादा ताकतवर, अनौपचारिक, निजी और बदले की भावना वाली होती है, वहां महिलाओं को सबसे ज़्यादा असुरक्षित छोड़ देता है.
जब महिला पार्टी कार्यकर्ता बोलती हैं, तो उन्हें दो बार कीमत चुकानी पड़ती है—पहले उत्पीड़न के रूप में और फिर उन पर विश्वास न किए जाने के रूप में. शिकायतों को जल्दी ही मंशा, गुटबाज़ी और “राजनीति” कहकर छोटा कर दिया जाता है और महिला को मौकापरस्त, ब्लैकमेलर या विरोधी पार्टी का मोहरा बता दिया जाता है. पक्षधरता डराने के पूरे औज़ार देती है—ऑनलाइन गाली-गलौज, इशारे, कानाफूसी वाले अभियान, धमकियां और संगठन से बाहर कर देना. कई महिलाओं के लिए चुप्पी ही एकमात्र तरीका बन जाती है, जिससे सामाजिक बदनामी और पेशेवर तबाही से बचा जा सके. ऐसा कानूनी ढांचा, जो दलों के भीतर कोई भरोसेमंद रास्ता नहीं देता, सिर्फ महिलाओं को निराश ही नहीं करता; बल्कि उन्हें सब कुछ सहते रहने की आदत डाल देता है.
कॉन्ट्रैक्ट से आगे की गरिमा
सुप्रीम कोर्ट के विशाखा दिशानिर्देश सैलरी या जॉब की औपचारिकताओं पर नहीं, बल्कि संवैधानिक गरिमा पर आधारित थे—समानता और बिना अपमान के गरिमा के साथ जीने के अधिकार पर.
इसी कारण इन दिशानिर्देशों में संस्थागत रोकथाम और शिकायत निवारण व्यवस्था अनिवार्य की गई, ताकि पीड़ितों को भारी व्यक्तिगत कीमत चुकाकर शत्रुतापूर्ण बाहरी मंचों पर जाने के लिए मजबूर न होना पड़े. संसद ने इसी सोच को 2013 के कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, निषेध और प्रतितोष) अधिनियम—यानी POSH अधिनियम के ज़रिए कानून का रूप दिया. इसमें माना गया कि आधुनिक काम में इंटर्न, ट्रेनी, अप्रेंटिस और ऐसे अन्य लोग भी शामिल हैं, जो असमान शक्ति संबंधों के तहत काम करते हैं और अंदरूनी समझौते से मामला सुलटाने वाले सिस्टम को रोकने के लिए शिकायत समितियों में बाहरी प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया.
राजनीतिक दल बिल्कुल उसी तरह की पदानुक्रम वाली असुरक्षा को दर्शाते हैं, जिसे विशाखा और POSH ठीक करना चाहते थे, फिर भी वे आमतौर पर यह कहकर कानून के दायरे से बाहर निकल जाते हैं कि राजनीतिक काम “स्वैच्छिक जुड़ाव” है.
सुप्रीम कोर्ट का रुख
केरल के एक मामले से जुड़ी उस जनहित याचिका को सुनने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, जिसमें राजनीतिक दलों को वर्कप्लेस यौन उत्पीड़न ढांचे में लाने की मांग थी, एक संकीर्ण औपचारिकता पर टिका है: पार्टी से जुड़ाव “नौकरी” नहीं है; इसलिए दल “वर्कप्लेस” नहीं हैं. इस पर विचार करने से इनकार करते हुए, मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने 1 अगस्त 2025 के अपने आदेश से इस तर्क को कायम रहने दिया और उसे मिसाल के रूप में उद्धृत किए जाने की राह भी खोल दी.
लेकिन यह तरीका कानूनी लेबल को जीती-जागती शक्ति समझने की गलती करता है. पार्टी कोई निजी बैठक-कक्ष नहीं, बल्कि एक संगठित संस्थागत जगह है; यहीं करियर बनते हैं, पहुंच सीमित की जाती है और असुरक्षा का फायदा उठाया जाता है. गुटबाज़ी के दुरुपयोग की आशंकाओं का जवाब छूट नहीं, बल्कि प्रक्रिया है: सुरक्षा उपाय, गोपनीयता, दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर दंड, और शिकायत निवारण में वास्तविक स्वतंत्रता.
अगली पीढ़ी बिना सुरक्षा के न आए
भारत ने अब संविधान के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का वादा किया है, जिसका लागू होना जनगणना और परिसीमन चक्र से जुड़ा है. अगर, महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, लेकिन पार्टी तंत्र लागू होने योग्य यौन उत्पीड़न-रोधी ज़िम्मेदारियों से मुक्त रहते हैं, तो हम नए प्रवेशकों—अक्सर युवा, अक्सर बिना सुरक्षा नेटवर्क के को ऐसी जगहों में आमंत्रित करेंगे, जहां दबाव को “प्रवेश की कीमत” मानकर सामान्य बनाया जा सकता है.
मनोरंजन जगत हमें दिखाता है कि यह कितना नुकसानदेह हो सकता है. “कास्टिंग काउच” वहीं पनपता है, जहां द्वारपाल पहुंच को नियंत्रित करते हैं और पीड़ितों को “मुश्किल” कहे जाने का डर होता है. केरल की हेमा समिति और उसके बाद हुई शिकायतें व एफआईआर एक साधारण सच्चाई बताती हैं—अनौपचारिकता मासूमियत नहीं है और साफ-सुथरे अनुबंधों का न होना दबाव को मिटा नहीं देता.
पार्टियों को वर्कप्लेस मानें
एक जिम्मेदार लोकतंत्र महिलाओं की सुरक्षा को सिर्फ अच्छे इरादों पर नहीं छोड़ता. समाधान न तो पवित्र उपदेश हैं, न ही कोई और “आचार संहिता”, जिसे चुनाव के समय दिखाया जाए और शिकायतें असुविधाजनक होते ही चुपचाप हटा दिया जाए. ज़रूरत लागू होने वाले कानून की है.
POSH ढांचे में संशोधन किया जाना चाहिए—या फिर एक छोटा, लक्षित कानून बनाया जाना चाहिए—ताकि पंजीकृत और मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को यौन उत्पीड़न की रोकथाम और शिकायत निवारण व्यवस्था के दायरे में लाया जा सके.
“राजनीतिक वर्कप्लेस” को राजनीतिक वास्तविकता के अनुसार सबसे व्यापक अर्थ में परिभाषित किया जाना चाहिए: पार्टी कार्यालय और बैठकें, ट्रेनिंग कैंप्स, चुनाव अभियान, आधिकारिक यात्रा और—सबसे अहम—चयन और नियुक्ति की प्रक्रियाएं. सुरक्षा पूरे राजनीतिक वर्कफोर्स तक होनी चाहिए, केवल सैलरी लेने वाले कर्मचारियों तक नहीं, क्योंकि राजनीति में असुरक्षा अक्सर औपचारिक नौकरी के बाहर ही होती है.
पार्टियों को कानूनन बाध्य किया जाना चाहिए कि वे राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर स्वतंत्र शिकायत समितियां बनाएं, जिनमें विश्वसनीय बाहरी सदस्य हों, जिनमें न्यायपालिका, सिविल सेवा या समान सार्वजनिक संस्थानों का पूर्व अनुभव रखने वाली महिलाएं शामिल हों. ये समितियां सख्त गोपनीयता और तय समय-सीमा वाली प्रक्रिया के तहत काम करें और बदले की कार्रवाई रोकने के मजबूत सुरक्षा प्रावधान हों. अनुपालन न करने पर कड़े और समयबद्ध परिणाम तय होने चाहिए.
जिन संस्थानों को सार्वजनिक मान्यता, चुनावी विशेषाधिकार और नियामकीय लाभ मिलते हैं, उन्हें अपने संगठन के भीतर महिलाओं के लिए गरिमा और जवाबदेही के न्यूनतम मानकों को पूरा करना और सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है.
वह सवाल जो हमें पूछना चाहिए
जब किसी राजनीतिक घोटाले में “वीआईपी” का ज़िक्र होता है, तो जनता की पहली प्रतिक्रिया नाम मांगने की होती है. एक परिपक्व लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया समाधान मांगने की होनी चाहिए और वह भी तुरंत. अगर पार्टी के भीतर उत्पीड़न होता है, तो महिला से यह नहीं कहा जाना चाहिए कि कानून किसी कार्यस्थल को नहीं मानता और इसलिए कोई सुरक्षा नहीं है.
कोई लोकतंत्र एक ओर विधानसभाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की सराहना नहीं कर सकता और दूसरी ओर राजनीतिक दलों के भीतर महिलाओं की कानूनी अदृश्यता को सहन नहीं कर सकता. अगर राजनीतिक अवसर वर्कप्लेस की गरिमा से बाहर रहता है, तो समानता शर्तों पर मिलती है—कार्यालयों में उपलब्ध, राजनीति में अनिश्चित, और विवेक पर निर्भर. यही वह विरोधाभास है जिसे भारत को अब ठीक करना होगा.
क्या प्रमुख राजनीतिक दल ऐसे सुधार का समर्थन करेंगे, यह एक कसौटी होगी: क्या वे महिलाओं की गरिमा की सिर्फ औपचारिक बातें कर रहे हैं, या फिर ऐसे प्रभावी कानूनी कदमों का समर्थन करने को तैयार हैं, जो वास्तव में इसे सुरक्षित करते हैं?
(के बी एस सिद्धू पंजाब के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. उनका एक्स हैंडल @kbssidhu1961 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
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