Gen Z हो या OG (ओरिजिनल गैंगस्टर), नई दिल्ली के करीब 100 साल पुराने श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) में 13 साल में बहुत ज्यादा चीजें नहीं बदली हैं. हालांकि, पिछले शनिवार जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोबारा कैंपस पहुंचे तो उनके लिए बहुत कुछ बदला हुआ नजर आया. सबसे बड़ी बात यह थी कि वह वही गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं थे, जिनकी मिलनसार मुस्कान, सहज अंदाज और सकारात्मक, भविष्य को लेकर सोच ने 2013 में कॉलेज के दर्शकों और कॉलेज के बाहर भी लोगों को प्रभावित किया था. शनिवार को पीएम मोदी का अंदाज कड़वा और निराश नजर आया. उन्होंने मुस्कुराते हुए SRCC और उसके पूर्व छात्रों की तारीफ जरूर की और वहां मौजूद लोगों का समर्थन पाने की कोशिश की. लेकिन जैसे ही उन्होंने अपनी पिछली यात्रा के बाद का ‘रिपोर्ट कार्ड’ बताना शुरू किया, उनका लहजा पूरी तरह बदल गया.
वह उन तथाकथित ‘दिमागी नक्सलों’ से नाराज थे, जो उन्हें गिरते हुए देखना चाहते थे. एक समय ऐसा लगा कि वह यह कह रहे हैं कि वह और देश अलग नहीं हैं. कोविड-19 और पश्चिम एशिया संकट समेत भारत के सामने आई चुनौतियों की बात करते हुए उन्होंने कहा, “मेरे ‘प्रशंसक’ (यानी आलोचक) खुश थे कि ‘अब मोदी फंस गया, मोदी अब गिरने वाला है, अब उसे कुचला जा सकता है’.”
पीएम मोदी ने कहा, “लेकिन मेरे देशवासियों के आशीर्वाद में इतनी ताकत है कि भारत का नुकसान चाहने वालों की इच्छाएं पूरी नहीं हुईं.” यानी उनके लिए यह चाहना कि उनका नुकसान हो और यह चाहना कि भारत का नुकसान हो, दोनों एक ही बात हैं.
पीएम मोदी ने फरवरी 2013 के बाद उन्होंने क्या हासिल किया, इसका विस्तार से रिपोर्ट कार्ड पेश किया. फरवरी 2013 में वह आखिरी बार SRCC कैंपस आए थे. यही वह मंच था, जहां से उन्होंने BJP की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी हासिल करने की सफल कोशिश की शुरुआत की थी. उनके भाषण लिखने वाले व्यक्ति ने शायद 2013 का पूरा भाषण नहीं सुना था और सिर्फ आधे भरे और आधे खाली गिलास वाली बात सुनी थी. शनिवार को दिया गया उनका 2026 का SRCC भाषण शायद ज्यादा प्रभावी होता, अगर उसमें 13 साल पहले इसी कॉलेज से देश के लिए रखे गए उनके विजन का जिक्र नहीं होता. वैसे भी, 2013 में जो हासिल करने की इच्छा पीएम मोदी ने जताई थी और 2026 तक वह जितना कर पाए, उसके बीच का बड़ा अंतर शायद उन्हें खुद भी निराश करता होगा.
2013 से 2026 तक
पीएम मोदी के SRCC भाषण में मणिपुर के लिए एक अहम संदेश था. उन्होंने कहा कि “जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक शांति बढ़ी है.” उन्होंने मणिपुर का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी बात से इनर मणिपुर के सांसद आंगोमचा बिमोल अकोइजाम की उस राय को बल मिलता दिखा कि मणिपुर का मामला “दिमाग से बाहर, नजरों से बाहर” यानी Out of mind, out of sight है, न कि इसका उल्टा. जब मणिपुर जातीय आधार पर लगभग भौगोलिक रूप से बंटा हुआ है, तो पूर्वोत्तर में ‘बेहतर शांति’ की बात कैसे की जा सकती है? स्थिति इतनी गंभीर है कि कुकी-जो समुदाय के दो विधायक तीन साल बाद विधानसभा सत्र में शामिल होने के लिए मैतेई बहुल इंफाल पहुंचे तो यह राष्ट्रीय खबर बन गई.
मणिपुर की बात पर हम थोड़ी देर बाद वापस आएंगे. पहले देखते हैं कि 13 साल पहले तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी ने SRCC में क्या कहा था. रविवार को जब मैं यह लेख लिख रहा था, तब मुझे अपने घर से करीब 4 किलोमीटर दूर सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत गिरने की खबर के लगातार अपडेट देखने पड़ रहे थे. वहां दर्जनों युवा छात्र फंसे हुए थे. सात युवाओं की जान जा चुकी थी. खबर में फ्लैश हुआ, “CM ने कार्रवाई का भरोसा दिया.” उन्होंने कहा कि आसपास की सभी असुरक्षित इमारतों को “गिरा दिया जाएगा”.
क्या हमने इससे पहले भी कई बार ऐसा गुस्सा और कार्रवाई के ऐसे वादे नहीं सुने हैं? सिर्फ तीन महीने पहले मेरे घर से करीब 6 किलोमीटर दूर मालवीय नगर में एक गैरकानूनी होटल में आग लगने से 21 लोगों की मौत हुई थी. तब भी कार्रवाई के ऐसे ही वादे किए गए थे. कुछ साल पहले ओल्ड राजेंद्र नगर में एक अवैध कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भरने से भी युवा छात्रों की मौत हुई थी. 2019 में करोल बाग के होटल में आग लगने से 17 लोगों की मौत हुई थी. ये सभी घटनाएं प्रधानमंत्री आवास से कुछ किलोमीटर के दायरे में हुई हैं. बेशक, राष्ट्रीय राजधानी में BJP के नेतृत्व वाले स्थानीय प्रशासन की आपराधिक लापरवाही के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इसके बाद मैंने 2013 में SRCC में पीएम मोदी का भाषण फिर से देखा. उन्होंने कहा था, “आमतौर पर हमारा प्रशासन फायर फाइटर की तरह काम करता है. जब कोई समस्या आती है, तो प्रशासन उसके पीछे चलता है, रास्ते निकालने की कोशिश करता है…. प्रशासन का काम पहले से स्थिति की कल्पना करना है….” यह बात बिल्कुल सही है. खासकर राष्ट्रीय राजधानी की ट्रिपल-इंजन सरकार के लिए.
2013 के अपने भाषण में तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी ने बताया था कि उनकी एक राजदूत से बातचीत हुई थी. उस राजदूत ने उनसे भारत के सामने मौजूद दो सबसे बड़ी चुनौतियों के बारे में पूछा था. मोदी ने उन्हें बताया था कि पहली चुनौती ऐसे देश में जनसंख्या से मिलने वाले अवसर का इस्तेमाल करना है, जहां 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की है. दूसरी चुनौती पूर्वी भारत में मौजूद बड़े प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करना है. हालांकि, पहली चुनौती अब भी पूरी नहीं हुई है. नीति आयोग के मुताबिक, सिर्फ 8.25 प्रतिशत ग्रेजुएट्स को उनकी योग्यता के हिसाब से नौकरी मिली हुई है.
इसके अलावा, 15 से 29 साल की उम्र के 8.7 करोड़ लोग NEET की कैटेगरी में आते हैं. NEET का मतलब है कि वे न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न नौकरी कर रहे हैं और न ही किसी ट्रेनिंग में हैं. संयोग से, एक और NEET यानी मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट ने हाल ही में देशभर में विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया. यह एक बार फिर उस बढ़ती निराशा की याद दिलाता है, जिसके बारे में मोदी ने 2013 में SRCC में युवा आबादी की बात करते हुए कहा था.
तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री ने कहा था, “दुनिया भारत को एक बड़ा बाजार मानती है. समय की मांग है कि हम दुनिया को अपना बाजार बनाएं, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आगे रहें और अपने सामान को ग्लोबल मार्केट में पहुंचाएं…. अगर हमें 21वीं सदी में चीन से मुकाबला करना है, तो हमें स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देना होगा.” उन्होंने “मेड इन इंडिया” पर विस्तार से बात की थी.
13 साल बाद, 14 अगस्त को जारी प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो की एक विज्ञप्ति के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अब “GDP में करीब 16-17 प्रतिशत” योगदान देता है. 2013-14 में यह 17.3 प्रतिशत था. ‘मेक इन इंडिया’ के नारे के लिए इतना ही. जहां तक चीन से मुकाबले की बात है, 2025-26 में पड़ोसी देश के साथ भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़कर 112 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जो 2016-17 में 51 अरब अमेरिकी डॉलर था.
2013 के अपने भाषण में पीएम मोदी ने कपास किसानों के लिए अपने 5F कॉन्सेप्ट की बात की थी. इसमें फार्म से फाइबर, फाइबर से फैक्ट्री, फैक्ट्री से फैशन और फैशन से फॉरेन तक की बात थी. उन्होंने कहा था कि इस मॉडल ने गुजरात में किसानों की किस्मत बदल दी. हालांकि, भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास निर्यातक होने से आगे बढ़कर कपास का नेट इंपोर्टर बन गया है.
2013 में SRCC में मोदी ने कहा था, “हम शिक्षक निर्यात क्यों नहीं कर सकते?” पिछले साल एक संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि 2024-25 में भारत के स्कूल शिक्षा सिस्टम में शिक्षकों के 10 लाख पद खाली थे. जाहिर है, हमें शिक्षकों का निर्यात शुरू करने से पहले अभी लंबा रास्ता तय करना है.
मणिपुर में ‘शांति’?
2013 के भाषण में ऐसी कई और बातें थीं, जो आज भी वैसी ही हैं—सिर्फ बातें. अब प्रधानमंत्री मोदी के पूर्वोत्तर में ‘शांति बढ़ने’ के दावे पर आते हैं. पहली नजर में इस दावे को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. पूर्वोत्तर में उग्रवादी संगठनों के साथ कई शांति समझौते हुए हैं. हालांकि, नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड के साथ अगस्त 2015 में प्रधानमंत्री मोदी के आवास पर बड़े जोर-शोर से हुआ फ्रेमवर्क एग्रीमेंट आज भी सिर्फ एक फ्रेमवर्क ही बना हुआ है. 11 साल बाद भी अंतिम समझौता नहीं हो पाया है. लेकिन यह अलग बात है. सवाल यह है कि जब प्रधानमंत्री मोदी पूर्वोत्तर में ज्यादा शांति की बात करते हैं, तो क्या वह मणिपुर को इसमें गिन रहे हैं या नहीं? क्योंकि मणिपुर तीन साल से ज्यादा समय से बेहद खराब स्थिति में है और राज्य की बीजेपी सरकार और केंद्र, दोनों ही इसका समाधान निकालने में बेबस नजर आ रहे हैं.
पिछले हफ्ते ही केंद्र ने राजीव सिंह ठाकुर को मणिपुर का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया है. जातीय हिंसा शुरू होने के तीन साल से ज्यादा समय में ठाकुर राज्य के पांचवें मुख्य सचिव हैं. ठाकुर को एक ईमानदार और कुशल अधिकारी माना जाता है. लेकिन राजस्थान कैडर के एक IAS अधिकारी को ऐसे हिंसा प्रभावित राज्य में भेजना, जहां छह महीने से भी कम समय बाद चुनाव होने हैं, यह दिखाता है कि सरकार बिना किसी पक्की योजना के काम कर रही है. केंद्र को साफ तौर पर समझ नहीं आ रहा कि मणिपुर में क्या किया जाए. पहले उसने राष्ट्रपति शासन लगाया ताकि दिल्ली से सीधे राज्य को चलाया जा सके. इसके बाद बीजेपी विधायकों में बगावत के डर से फिर बीजेपी की सरकार बना दी गई. पिछले सात महीने से ज्यादा समय से इस सरकार में मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्रियों समेत सिर्फ पांच मंत्री हैं.
मुख्यमंत्री के पास 20 विभाग हैं. वहीं, एक उपमुख्यमंत्री, जो नागा समुदाय से हैं, ने दूसरे उपमुख्यमंत्री पर कुकी उग्रवादियों के साथ मिलकर नागाओं के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया है. इसके बावजूद केंद्र इस मामले में कुछ नहीं कर रहा है. आज सरकार में सारे फैसले राज्यपाल एके भल्ला ले रहे हैं. उनके केंद्रीय गृह सचिव रहने के दौरान ही मणिपुर में हिंसा शुरू हुई थी और बढ़ती गई थी. क्या ये सारी बातें मणिपुर में किसी भी तरह की रणनीति होने का संकेत देती हैं? यह स्थिति अविश्वसनीय लगती है. फिर भी, प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को SRCC में पूर्वोत्तर में ‘बढ़ती शांति’ का दावा किया, जैसे मणिपुर का अस्तित्व ही नहीं है.
शनिवार को प्रधानमंत्री मोदी के SRCC भाषण में एक ‘चमकता हुआ भारत’ दिखाया गया. शायद उन्हें अपना 2013 का SRCC भाषण भी सुनना चाहिए. उन्होंने तब से भारत के लिए बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन वह अभी भी उस नजरिए से काफी दूर है, जिसे उन्होंने तब सामने रखा था. गिलास अभी भी आधा भरा हुआ है. सकारात्मक और आशावादी रहना अच्छी बात है, लेकिन मोदी 4.0 के लिए उन्हें अब गिलास को आधा खाली मानकर भी देखना शुरू करना चाहिए.
डीके सिंह ‘दिप्रिंट’ में पॉलिटिकल एडिटर हैं. वे @dksingh73 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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