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Sunday, 26 May, 2024
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क्या केन्द्र सरकार भी पूर्व सांसदों के लिए एक सांसद एक पेंशन योजना लागू करेगी

स्थिति यह है कि वर्तमान में अगर कोई व्यक्ति किसी भी समय के लिए सांसद बनता है तो वह पेंशन का हकदार हो जाता है.

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सांसदों और विधायकों को मिलने वाली पेंशन लंबे समय से विवादों का केन्द्र रही है. यह मामला उच्चतम न्यायालय भी पहुंचा लेकिन उसने इसे नीतिगत फैसला बताते हुए एक गैर सरकारी संगठन की याचिका खारिज कर दी थी. लेकिन पंजाब के नये मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए राज्य में एक विधायक एक पेंशन योजना लागू करके राजनीतिक दलों और नेताओं को सकते में डाल दिया.

पंजाब सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य है क्योंकि राज्य में पूर्व विधायकों को पांच से छह लाख रुपए महीने तक पेंशन मिल रही थी. निश्चित ही राज्य सरकार के इस कदम से सरकारी खजाने को बड़ी राहत मिलेगी. दूसरे राज्यों में भी पूर्व विधायकों के लिए इसी तरह की पेंशन का प्रावधान है.

एक सांसद एक पेंशन योजना

इसी प्रकार, संसद के सदस्यों का वेतन, भत्ता और पेंशन कानून, 1954 के तहत पूर्व सांसदों के लिए पेंशन का प्रावधान है. पहले नियम था कि अगर कोई सांसद चार साल का कार्यकाल पूरा करता है तो उसे पेंशन का हकदार माना जाता था लेकिन 2004 में कानून में संशोधन कर यह प्रावधान हटा दिया था. इस कानून में कई बार संशोधन किया जा चुका है और इनके आधार पर वर्तमान में पूर्व सांसदों और उनके परिजनों को सारी सुविधाएं देने का प्रावधान भी शामिल कर दिया गया.

स्थिति यह है कि वर्तमान में अगर कोई व्यक्ति किसी भी समय के लिए सांसद बनता है तो वह पेंशन का हकदार हो जाता है.

पंजाब सरकार के इस निर्णय के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार प्रदान करने का दावा कर रहे दूसरे राज्यों की सरकारें भी ऐसा कदम उठायेंगी. क्या राज्य सरकारें और संसद पंजाब के इस कदम से प्रभावित होकर अपने पूर्व सदस्यों को एक विधायक या एक सांसद एक पेंशन देने का साहस करेंगी.

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मौजूदा व्यवस्था के तहत विधायकों और सांसदों की पेंशन उनके कार्यकाल के हिसाब से निर्धारित होती है. यही नहीं, विधायक और इसके बाद सांसद बनने वाले माननीयों को दोहरी पेंशन तो मिलती ही है, साथ ही इसमें भी उनके कार्यकाल के आधार पर वृद्धि होती है.

अगर कोई व्यक्ति राज्यसभा और लोकसभा दोनों सदनों का सदस्य रह चुका है तो उसे दोनों सदनों के पूर्व सांसद की पेंशन मिलती है.


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यह कितना हास्यास्पद लगता है कि देश में जहां वृद्धावस्था पेंशन सिर्फ दो हजार रुपए है तो भविष्य निधि योजना के तहत पत्रकारों को मिलने वाली पेंशन की न्यूनतम राशि सिर्फ नौ सौ रुपए ही मासिक है लेकिन पूर्व सांसदों और विधायकों को तमाम सुविधाओं के साथ हर महीने लाखों रुपए पेंशन के रूप में मिलते हैं. पूर्व सांसद या विधायक का निधन होने की स्थिति में यह लाभ उनके जीवन साथी/आश्रित को जीवन भर मिलता है.

अभी तक पंजाब में विधायकों को उनके प्रत्येक कार्यकाल के अनुसार पेंशन मिलती थी जो लाखों रुपए में होती थी लेकिन अब पंजाब सरकार ने यह नीति में बदलाव कर दिया. नयी नीति के तहत राज्य के विधायकों को प्रतिमाह 75,000 रूपए ही पेंशन मिलेगी भले ही वे कई कार्यकाल तक सदन के सदस्य रहे हों.

सांसदों और विधायकों के लिए पेंशन योजना शुरू से ही विवादों का केंद्र रही है. इसकी एक वजह आम नागरिकों की तुलना में पूर्व सांसदों और विधायकों को पेंशन के रूप आजीवन मिलने वाली राशि और दूसरी सुविधाएं हैं.

भगवंत सिंह मान का तर्क है कि विधायकों मिलने वाली पेंशन से राज्य के राजस्व पर बड़ा बोझ पड़ता है क्योंकि विधायकों को हर महीने पांच से छह लाख रुपए तक की पेंशन मिल रही है.

सांसदों और विधायकों की पेंशन का मुद्दा लगातार किसी न किसी न्यायालय में पहुंचता रहा है. इसी तरह का एक मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय से होता हुआ उच्चतम न्यायालय पहुंचा था.

उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ ने 16 अप्रैल, 2018 को लोक प्रहरी, अपने महासचिव एस.एन. शुक्ला और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया प्रकरण में अपने 20 पेज के फैसले में पूर्व सांसदों की पेंशन के मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए इसे विधायिका के अधिकार क्षेत्र का विषय बताया था.

शीर्ष अदालत ने इस गैर सरकारी संगठन की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि हमारा मानना है कि कुछ सांसदों की बेहतर आर्थिक स्थिति या गरीबों की करोड़ों की आबादी को विभिन्न लाभ प्रदान करना या उनके लिए तर्कसंगत प्रावधान करना विधायी नीति में किसी प्रकार का चयन या बदलाव करने जैसे सवाल संसद के दायरे में आते हैं. यह न्याय के विषय नहीं है.

न्यायालय ने राष्ट्रपति को पेंशन का लाभ प्रदान करने की आवश्यकता पर संविधान सभा में बहस का जिक्र करते हुए कहा कि दिसंबर, 1948 में डा अम्बेडकर ने इस सवाल पर भी चर्चा की थी कि क्या सेवानिवृत्ति के बाद सांसदों को पेंशन के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा था कि इसलिए जिस रूप में संशोधन लाया गया है वह व्यावहारिक नहीं लगता लेकिन राष्ट्रपति सहित संसद सदस्य के रूप में एक निश्चित अवधि तक सेवा प्रदान करने वाले सदस्य किसी न किसी तरह की पेंशन का हकदार होना चाहिए और निश्चित ही भावी संसद इस तथ्य को ध्यान में रखेगी.

न्यायालय ने कॉमन कॉज, रजिस्टर्ड सोसाइटी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया प्रकरण में शीर्ष अदालत फैसले का भी जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि पूर्व सांसदों के लिए पेंशन के बारे में कानून बनाने और इसके लिए शर्तें निर्धारित करने में विधायिका सक्षम है.

संसद सदस्य वेतन तथा भत्ता कानून के तहत किसी पूर्व दिवंगत सदस्य के पति/पत्नी और आश्रित भी दिवंगत सदस्य की मृत्यु के समय उसे मिलने वाली पेंशन का 50 प्रतिशत पाने के हकदार है और यह पेंशन पति/पत्नी को शेष जीवन तक मिलती है.

केरल जैसे राज्य में मंत्रियों के कार्यालय में मात्र दो साल काम करने वाले कर्मचारी को भी जीवन भर पेंशन दी जा रही थी जबकि आम जनता को दो साल तो क्या दस साल की संविदा सेवा के बाद भी शायद ऐसा संभव नहीं हो.

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने इस व्यवस्था की तीखी आलोचना की थी. उन्होंने कहा था कि राज्य में प्रत्येक मंत्री अपने कार्यालय में दो साल के लिए स्टाफ की नियुक्ति करता है और इसके बाद उसकी सेवा समाप्त होने पर आजीवन पेंशन मिलती है.

क्या अन्य सरकारें भी ऐसा कदम उठायेंगी

यह मामला हाल ही में उच्चतम न्यायालय में आया था और शीर्ष अदालत ने इस पेंशन नीति पर अचरज व्यक्त करते हुए टिप्पणी की थी कि ऐसा लगता है कि राज्य के पास धन की कोई कमी नहीं है. न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने केरल सरकार से जानना चाहा कि वह राज्य में मंत्रियों द्वारा दो साल के लिए नियुक्त व्यक्तियों को कैसे पेंशन का भुगतान कर रहा है.

यही नहीं, इस स्टाफ के हटने के बाद उनके स्थान पर दो साल के लिए नया स्टाफ आ जाता है और वह भी आजीवन पेंशन का हकदार होता है. इसी से यह प्रकरण सामने आने के बाद सहज ही सवाल उठता है कि यह कहीं देश में अपने चहेतों को आजीवन पेंशन सुविधा प्रदान करने का कोई संगठित रैकेट तो नहीं है जिसमे दो साल के लिए मंत्री अपने कार्यालय में अपनी पार्टी के ही व्यक्तियों को नियुक्त करके उन्हें आजीवन आर्थिक लाभ पहुंचाते हैं.

निश्चित ही पूर्व सांसदों और विधायकों के लिए पेंशन और भत्ते संबंधी कानून और नियम बनाना विधायिका का काम है लेकिन इस तरह कोई भी निर्णय लेते समय सामाजिक व्यवस्था और नागरिकों को मिलने वाली पेंशन और पूर्व सांसदों तथा विधायकों की पेंशन में तर्कसंगत संतुलन बनाने की आवश्यकता है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि पंजाब के मुख्यमंत्री के इस कदम से प्रेरित होकर दूसरी राज्य सरकारें भी इस तरह का कदम उठायेंगी ताकि सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़े और इसमें कटौती से बचने वाली करोड़ों रुपए की राशि का जनता के कल्याणकारी कार्यो में उपयोग हो सके.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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