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Sunday, 1 March, 2026
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केजरीवाल को भूल जाइए, ज़रा सोचिए कि हमारी संस्थाएं किस दिशा में जा रही हैं और क्या मजबूत कर रही हैं

यह फ़ैसला सरकार के लिए इतना नुकसानदायक है कि यह पक्का करने की कोशिश की जाएगी कि यह टिक न पाए. प्रॉसिक्यूशन ने कहा है कि वह हाई कोर्ट में अपील करेगा.

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पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपमुक्त किए जाने का आदेश आज के भारत की स्थिति के बारे में हमें क्या बताता है.

यह बहुत कुछ बताता है, और जिस भी नजरिए से देखें, इसमें अच्छी खबर कम है. सबसे पहले तो यह आदेश संकेत देता है कि सरकार ने अपने जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों से बदला लेने के लिए किया. एक मुख्यमंत्री, उनके उपमुख्यमंत्री और कई मंत्रियों को पर्याप्त सबूत के बिना जेल में डाला गया. और यह सब हर स्तर पर सरकार की दूसरी शाखाओं की मदद से संभव हुआ.

इनमें संसद की विपक्षी पार्टियों के सदस्य भी शामिल हैं, जिन्होंने केजरीवाल की जेल को लेकर खुलकर खुशी जताई और सीमित समर्थन दिया. और सबसे अहम बात, इसमें ज्यूडिशियरी भी शामिल है, जिसने विपक्षी राज्य सरकार के खिलाफ कार्रवाई को आसान बनाया और जिन लोगों को सरकार जेल भेजना चाहती थी, उन्हें बंद कर दिया.

मैं केजरीवाल की दोषी या निर्दोष होने पर कोई निजी राय नहीं दे रहा. यह अदालतों का काम है. ट्रायल कोर्ट ने कहा है कि उनके खिलाफ कोई मामला नहीं बनता, और सबूत के अभाव में मुकदमा चलाने की भी जरूरत नहीं है. जब तक कोई उच्च अदालत कुछ और न कहे, हमें इसे मानना होगा. सरकार के पास सबूत इकट्ठा करने के लिए कई साल थे. और अदालत के मुताबिक उसे कुछ नहीं मिला.

कांग्रेस की भूमिका

यह फैसला सरकार के लिए इतना नुकसानदायक है कि मुझे लगता है इसे टिकने नहीं दिया जाएगा. अभियोजन पक्ष ने कहा है कि वह हाई कोर्ट में अपील करेगा. निचली अदालत के फैसले को रद्द कराने की कोशिश होगी. सरकार ऊपरी अदालत से कहेगी कि मुकदमा चलने दिया जाए. अगर ट्रायल कोर्ट सही है और सबूत कम हैं, तो यह केवल इज्जत बचाने की कवायद होगी. निचली अदालत के आदेश को पलटना बड़ी जीत के रूप में पेश किया जाएगा, और मामला सालों तक चलता रहेगा ताकि लोग धीरे-धीरे इसे भूल जाएं.

मुझे यह मामला किसी और दिशा में जाता नहीं दिखता. हम सब देख सकते हैं कि सरकार क्या करना चाहती थी, इसलिए हमें उन लोगों की बात करनी चाहिए जिन्होंने अन्याय को संभव बनाया.

सबसे पहले कांग्रेस की बात करें. पार्टी के पास केजरीवाल से नाराज होने की वजह है. विडंबना से “इंडिया अगेंस्ट करप्शन” आंदोलन के दौरान केजरीवाल ने मनमोहन सिंह सरकार पर कई तरह के गैरजिम्मेदार आरोप लगाए और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की छवि को नुकसान पहुंचाया, जिन्हें दिल्ली के सबसे अच्छे मुख्यमंत्रियों में गिना जाता है.

यह भी सच है कि केजरीवाल का व्यवहार बहुत अच्छा नहीं रहा. उन्होंने “इंडिया अगेंस्ट करप्शन” के साथ चले कई लोगों को बाद में किनारे कर दिया और अपनी आम आदमी पार्टी के कई साथियों को भी नाराज किया. और हां, उन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए रास्ता साफ करने का काम किया, क्योंकि अपने आंदोलन के जरिए और आरएसएस के गुप्त समर्थन से उन्होंने यूपीए सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया, जिससे मोदी को आगे बढ़ने का मौका मिला.

मैं कांग्रेस से सहमत हूं कि केजरीवाल के रिकॉर्ड को देखते हुए उनके लिए सहानुभूति महसूस करना आसान नहीं है. लेकिन विपक्ष को तय करना होगा कि देश के लिए क्या ज्यादा अहम है, सिद्धांत या व्यक्ति.

यहां एक साफ सिद्धांत का सवाल है. क्या किसी भी केंद्र सरकार को यह अधिकार होना चाहिए कि वह विधानसभा चुनाव से पहले किसी विपक्षी राज्य सरकार को उसके नेताओं को गिरफ्तार करके पंगु बना दे, खासकर जब कथित घोटाला गिरफ्तारी से काफी पहले का हो और जब मंत्रियों को गिरफ्तार किया गया तब तक वह मामला लगभग खत्म हो चुका था. जब असली जल्दी केवल राजनीतिक फायदे के कारण थी.

कांग्रेस को केंद्रीय सत्ता के इस दुरुपयोग के खिलाफ जितनी आवाज उठानी चाहिए थी, उतनी नहीं उठाई. लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आपकी प्रतिबद्धता की असली परीक्षा तब होती है जब आप सिद्धांत के आधार पर किसी ऐसे व्यक्ति का बचाव करते हैं जिसे आप पसंद नहीं करते. ट्रायल कोर्ट के यह कहने के बाद भी कि सबूत मौजूद नहीं हैं, कांग्रेस अब भी स्पष्ट नहीं है कि वह किस पक्ष में खड़ी है.

मौलिक अधिकार, आजादी और न्याय

मुझे आगे जो कहना है, उसमें सावधानी बरतनी होगी क्योंकि मैं ज्यूडिशियरी की अवमानना का आरोप नहीं झेलना चाहता. इस संस्था के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. लेकिन कोई भी समझदार व्यक्ति यह अजीब पाएगा कि इतने सारे जजों ने सिसोदिया को 17 महीने तक जेल में रहने दिया. केजरीवाल पांच महीने जेल में रहे. अगर मामला इतना कमजोर था, तो क्या जजों को सरकार की इस मांग को मानने से इनकार नहीं करना चाहिए था कि आप नेताओं को जेल में रखा जाए.

दिप्रिंट में ही आपको जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के साथ मेरी बातचीत की रिकॉर्डिंग मिलेगी, जिसमें वह मानते हैं कि जिन लोगों को किसी अपराध का दोषी नहीं ठहराया गया है, उन्हें जेल में नहीं रखा जाना चाहिए, जब तक कि कुछ तय अपवाद लागू न हों, जैसे भागने का खतरा, सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका या हिंसक अपराध दोहराने की संभावना. चंद्रचूड़ यह भी कहते हैं कि कुछ मामलों में कानून की धाराएं जजों के हाथ बांध देती हैं, लेकिन आज़ादी का सिद्धांत हमेशा लागू होना चाहिए.

सच यह है कि ज्यूडिशियरी हमेशा इस सिद्धांत का सम्मान नहीं करती. जब चंद्रचूड़ चीफ जस्टिस थे, तब भी कई मामलों में आज़ादी का अधिकार अहम नहीं लगता था. कोई भी सरकार अगर अपने विरोधियों या आलोचकों को फंसाना चाहती है, तो वह उन्हें बिना पर्याप्त सबूत की चिंता किए जेल में डाल सकती है. उसे यह साबित करने की जरूरत भी महसूस नहीं होती कि जेल भेजने के लिए पर्याप्त सबूत हैं. जब ज्यूडिशियरी अन्याय को आसान बनाने का जरिया बन जाए, तो यह बेहद चिंताजनक है और यह दिखाता है कि राजनीतिक व्यवस्था अंदर से सड़ रही है. क्या जज खुद यह नहीं देख सकते.

चंद्रचूड़ ने कहा कि निचली अदालतों के जज बेल देने से डरते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं बाद में लोग यह न कह दें कि उन्हें पैसे दिए गए हैं. मुझे नहीं पता कि यह सच है या नहीं. लेकिन अगर यह सच भी है, तो हायर ज्यूडिशियरी का क्या? क्या प्रॉसिक्यूशन के साथ चलना ज़्यादा आसान और सरल है?

इसलिए हां, इस मामले में केजरीवाल और अन्य आरोपियों को आरोपमुक्त किया जाना केंद्र सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाता है. लेकिन इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि आप नेताओं की गिरफ्तारी के बाद संस्थागत स्तर पर जो विफलताएं सामने आईं. तो कुछ समय के लिए मोदी और केजरीवाल के बारे में अपनी निजी भावनाओं को अलग रख दें. इसके बजाय इस पर ध्यान दें कि क्या हम ऐसे समाज में बदल रहे हैं, जहां नागरिक अपनी मौलिक आज़ादी और न्याय के अधिकार खोते जा रहे हैं, क्योंकि लोकतंत्र की कुछ संस्थाएं अधिनायकवाद को आसान बना रही हैं.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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