गर्मी अचानक मुझे परेशान कर देती है. कमर तक ऊंची थिसल घास को हटाते हुए मैं अपने माथे का पसीना पोंछता हूं और पैर रखने की जगह तलाशता हूं. नीचे बिखरी हुई मकरो पत्थर की जमीन है, जो घास के नीचे काले, छेददार गड्ढों में बदलती जा रही है. मेरा गाइड, जो स्थानीय गांव का मुखिया है और इस काम में कुछ समय के लिए गाइड की भूमिका निभा रहा है, कुछ नहीं कहता. वह बस इशारा करके मुझे अपने कदमों के पीछे चलने को कहता है. कुछ कच्चे घरों के पास से गुजरते हुए हम जिले के सबसे पुराने किलों में से एक की चारदीवारी के किनारे-किनारे आगे बढ़ते हैं.
15वीं और 16वीं सदी के बीच भंज शासक राजा वीर विक्रमादित्य भंज द्वारा बनवाया गया रसिका राय मंदिर, हरिपुरगढ़ के किलेबंद इलाके में झाड़ियों और घास के बीच से ऊपर उठता दिखाई देता है. मंदिर की बची हुई पट्टिका पर पौराणिक कथाओं, राजतिलक और युद्ध के दृश्य खुदे हुए हैं.
मेरे गाइड कहते हैं, “यह स्मारक अपनी यादों की वजह से महत्वपूर्ण है. बाकी सब खत्म हो गया.”
यहीं बंगाल के आखिरी सुल्तान ने 500 साल पहले शरण ली थी. यह दाऊद खान कर्रानी की आखिरी लड़ाई की जगह है, जिसका जिक्र अकबरनामा में भी मिलता है. करीब एक सदी तक यह भंज वंश की दूसरी राजधानी रहा था. अब कई लोगों के लिए इसका महत्व कम हो गया है. और इससे भी कम लोग खुद को इसकी देखभाल करने वाला मानेंगे.
अधिकार का अंतर
दुनिया भर में सांस्कृतिक पर्यटन बढ़ रहा है और ओडिशा की नई टैगलाइन “Think India, Think Odisha” में भी यह नजर आना चाहिए. लेकिन अभी ऐसा नहीं है. 2024 में राज्य में 53,392 विदेशी पर्यटक आए, जो 2023 के 45,173 से ज्यादा हैं, लेकिन 2019 में आए 115,128 पर्यटकों से अब भी काफी कम हैं. 2024 में घरेलू पर्यटकों की संख्या करीब 1.1 करोड़ पहुंच गई. हालांकि, पर्यटन को बढ़ावा देने का ध्यान अभी भी भुवनेश्वर-पुरी-कोणार्क के जाने-पहचाने सर्किट पर ही है. इससे राज्य की बहुत सी ऐतिहासिक इमारतें उन यात्राओं से बाहर रह जाती हैं, जिनके जरिए ओडिशा को पर्यटकों के सामने पेश किया जाता है.
ओडिशा के स्मारक दो अलग-अलग संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और व्यवहार में एक तीसरी व्यवस्था भी है, जिसका जवाबदेह किसी के प्रति होना साफ नहीं है. ASI का भुवनेश्वर सर्किल 30 जिलों में राष्ट्रीय महत्व के 78 स्मारकों की देखभाल करता है. राज्य का अपना पुरातत्व विभाग 222 और स्मारकों की सुरक्षा करता है. इसमें ओडिशा का अकेला UNESCO स्थल कोणार्क भी जोड़ दें, तो कुल संख्या करीब 300 हो जाती है.


INTACH की गवर्निंग बॉडी के सदस्य और स्थानीय चैप्टर के सदस्य अनिल धीर ने मुझे बताया कि उन्होंने 21 जिलों में 6,500 से ज्यादा विरासत स्थलों का स्वतंत्र रूप से दस्तावेजीकरण किया है. इसमें स्मारक और मूर्तियां भी शामिल हैं. उन्होंने बताया कि ओडिशा के ज्यादातर स्मारकों को कानूनी सुरक्षा नहीं मिली हुई है और वे किसी सुरक्षा व्यवस्था के दायरे से बाहर हैं. वह एक आसान सवाल पूछते हैं. अगर किसी स्मारक के अंदर से किसी गांव की मूर्ति चोरी हो जाए, तो गांव वाला किसे फोन करेगा, और उसे ढूंढने, वापस लाने और चोर को सजा दिलाने की जिम्मेदारी किसकी होगी? ऐतिहासिक जगहों पर चोरी और तोड़फोड़ की जांच के लिए कोई खास इकाई नहीं होने से जिम्मेदारी अलग-अलग एजेंसियों के बीच घूमती रहती है और यह अंतर और बढ़ता जाता है.
कंजर्वेशन आर्किटेक्ट आभा नारायण लांबा, जिनके 30 साल के काम में अजंता की गुफाएं, हम्पी और मुंबई के विक्टोरियन-आर्ट डेको समूह की UNESCO नामांकन प्रक्रिया शामिल है, इस अंतर की एक वजह यह मानती हैं कि औपनिवेशिक ब्रिटेन ने भारतीय स्मारकों को बचाने की जगह उन्हें खजाना खोजने की तरह देखा.
उन्होंने कहा, “संस्कृति प्राथमिकता की सूची में नीचे चली गई है.” उन्होंने बताया कि राजस्थान ने कई दशक पहले ही समझ लिया था कि कोई किला या हवेली एक संपत्ति बन सकती है. इससे कमाई हो सकती है और इसे राज्य की नीति के साथ-साथ स्थानीय कारोबार भी चला सकते हैं. इस तरह की स्थानीय स्तर से शुरू होने वाली गति अभी ओडिशा में नहीं बन पाई है.
पैसा है, लेकिन योजना नहीं है
अपने तर्क को समझाते हुए लांबा रणनीतिक योजना की कमी की ओर इशारा करती हैं. 15 साल पहले, ASI की 5वीं-6वीं सदी की सिसुपालगढ़ साइट के लिए संरक्षण योजना तैयार करते समय उन्होंने पाया था कि पुरातात्विक क्षेत्र के अंदर ही रिहायशी निर्माण की योजना बनाई जा चुकी थी. ऐतिहासिक जमीन पर घर बने हुए थे और लोगों को यह बताने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी कि ऐसा नहीं होना चाहिए. आज पुरी के बिल्डिंग नियम व्यवहार में शहरी मुंबई के नियमों जैसे ही हैं, क्योंकि मंदिर शहर के लिए संरक्षण से जुड़े खास प्लानिंग नियम कभी बनाए ही नहीं गए. इसका नतीजा यह है कि जब कोई एजेंसी दखल देती है तो वह PWD होती है, जिसका ध्यान संरक्षण करने के बजाय जगह को “सुंदर बनाने” पर ज्यादा होता है. कमी पैसे की नहीं है. लगता है कि कमी ऐसी योजना की है जो जमीनी स्तर से शुरू हो.
पुरातत्वविद और क्यूरेटर अनिका मान, जिन्होंने पूरे राज्य में 15 दिनों तक अलग-अलग स्थलों का सर्वे किया, इसकी गहरी वजह जनता तक लगातार पहुंचने वाली रिसर्च की कमी को मानती हैं. उपिंदर सिंह और नयनजोत लाहिड़ी जैसे इतिहासकारों ने दशकों में जो रिसर्च तैयार की है, उसे लोगों के बीच इन जगहों की अहमियत समझाने से जोड़ने वाला कोई रास्ता नहीं है.
मान ने कहा, “सूची में जगह मेरिट के आधार पर नहीं, बल्कि लॉबिंग के आधार पर मिलती है. एक UNESCO साइट संस्थागत कमी को दिखाती है, विरासत की कमी को नहीं.” उन्होंने लाहिड़ी का हवाला दिया.

मान उदयगिरि-खंडगिरि, ललितगिरि और रत्नागिरि की ओर इशारा करती हैं. ये सभी उसी वज्रयान बौद्ध गलियारे में आते हैं, जिसने हिमालय और दक्षिण-पूर्व एशिया तक बौद्ध परंपरा को प्रभावित किया.
उन्होंने कहा, “श्रीलंका और इंडोनेशिया ने इसी तरह की विरासत के आधार पर अपनी पूरी राष्ट्रीय पर्यटन पहचान बनाई है. जिस तरह ताजमहल भारत की पहचान बन चुका है, उसी तरह बोरोबुदुर दक्षिण-पूर्व एशिया की बौद्ध विरासत की पहचान है. भारत के पास भी इसी कहानी को बताने के लिए मूल सामग्री मौजूद है, लेकिन इसे लोगों तक पहुंचाने के लिए लगभग कुछ नहीं किया गया.”
दुनिया में भारतीय विरासत को जिस तरह अलग-अलग क्षेत्रों के आधार पर पहचान मिली है, उसमें क्षेत्रीय झुकाव का कारण एक सदी तक चली मुगल और राजपूत विरासत की प्रचार प्रक्रिया है, न कि खुद इन स्मारकों की कोई कमी.
स्वाभाविक सोच यही होती है कि और ज्यादा चीजों की मांग की जाए. ज्यादा लॉबिंग, ज्यादा नीतियां और ऊपर से ज्यादा पैसा. लेकिन वर्ल्ड मॉन्यूमेंट्स फंड की कार्यकारी निदेशक मालिनी थडानी एक ज्यादा खास बात की ओर इशारा करती हैं. उन्हें भारत की किसी राज्य सरकार के साथ ऐसी बैठक याद नहीं है जिसमें संरक्षण में वास्तविक रुचि न दिखाई गई हो.
थडानी ने कहा, “बढ़ती रुचि को संरक्षण के लिए समर्थन में बदला जा सकता है, जब संरक्षण की जरूरतों को साफ तौर पर तय किया जाए, स्थानीय साझेदारियां मजबूत हों और परियोजनाएं लंबे समय तक लोगों को जोड़ने वाला सार्थक काम दें.”
मान एक और समस्या की ओर इशारा करती हैं.
उन्होंने कहा, “‘Adopt a Heritage’ (विरासत अपनाएं) जैसी योजनाएं निजी पैसे को फिर से लाने की कोशिश करती हैं, लेकिन लोगों में उस जगह के साथ जुड़ाव की भावना वापस नहीं लातीं. नतीजा यह है कि ओडिशा के सिर्फ एक स्मारक को इससे फायदा मिला है. और वह वही स्मारक है जिसे कभी इस मदद की जरूरत ही नहीं थी.”
ऊपर से नीचे तक दी गई ऐसी योजना, जिसमें शुरुआत से स्थानीय लोगों की भागीदारी नहीं होती, काम नहीं करती. लेकिन अगर योजना शुरुआत से ही उस समुदाय के साथ मिलकर बनाई जाए जो स्मारक के आसपास रहता है, तो उसके सफल होने की संभावना रहती है. स्थानीय समुदाय ही स्मारक से जुड़ी मौखिक कहानियों को संभालकर रखता है, उसकी खास समस्याओं को समझता है और जब योजना या उसकी कमी से हालात बिगड़ने लगें, तो वही सबसे पहले उसकी रक्षा कर सकता है.

ऐसे कुछ संकेत जरूर हैं जिनके आधार पर आगे बढ़ा जा सकता है. पर्यटन विभाग के तहत विरासत संपत्तियों को बढ़ावा देने के लिए राज्य की ऑपरेशनल गाइडलाइन्स अब 1950 से पहले बनी इमारतों के मालिकों को आर्थिक मदद देती हैं, अगर वे इन इमारतों को विरासत होटल, होमस्टे या शिल्प केंद्र में बदलकर उनका संरक्षण करते हैं. इससे इन इमारतों को बचाने की जिम्मेदारी उन लोगों के हाथ में जाती है जो इनके मालिक हैं. इसके अलावा, नए डायरेक्टोरेट ऑफ़ आर्कियोलॉजी को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है. इसे कला, शिल्प और भाषा के बड़े विभाग के दायरे से निकालकर ज्यादा खास और केंद्रित तरीके से काम करने के लिए बनाया जा रहा है. इस मई में ओडिशा स्टेट आर्कियोलॉजी ने IIT खड़गपुर और SPA भोपाल के साथ मिलकर करीब 294 स्थलों पर LiDAR और GIS मैपिंग शुरू की.
इन उपायों का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अगली कड़ी, यानी स्थानीय निकाय, गांव की पंचायतें और खंडहरों के आसपास रहने वाले लोगों को इन्हें तय करने और लागू करने में वास्तविक भूमिका मिलती है या नहीं.
गांव को क्या याद है
उस शाम हरिपुरगढ़ में गांव के मुखिया ने लगभग यूं ही बातों-बातों में एक पेड़ के पास मौजूद कुछ ग्राम देवियों का जिक्र किया. इस पेड़ की लोग कई दशकों से पूजा करते आ रहे हैं. लेकिन इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि ये देवियां कब यहां आईं या इनकी देखभाल कौन करता रहा है. उन्हें अचानक याद आया कि उनका काम मुझे यहां के ‘बड़े’ स्मारक दिखाना था, इसलिए वह आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे. मैंने उनसे रुकने और पहले उन देवियों को दिखाने के लिए कहा.
यादों की सबसे छोटी-छोटी चीजों में ही कोई समुदाय अपनी पहचान संभालकर रखता है. हरिपुरगढ़ मेरे पूर्वजों ने बनाया था, लेकिन यह उतना ही उस समुदाय का भी है जिसमें वे लोग शामिल हैं. और इसके भविष्य की कोई भी योजना इसी अपनेपन से शुरू होनी चाहिए, बाद में इसे जोड़ने से नहीं. ऐसा लगता है कि विरासत तब बची रहती है, जब उसके सबसे करीब रहने वाले लोगों को यह तय करने का अधिकार मिलता है कि क्या दर्ज किया जाए. वे सिर्फ बड़ी कहानियां ही नहीं, बल्कि छोटी-छोटी कहानियां भी बता सकें, जो धीरे-धीरे आने वाले समय की लोककथाएं बन जाती हैं.
ओडिशा को अभी और आगे बढ़ना है. कमी महत्वाकांक्षा में नहीं है, क्योंकि वह साफ तौर पर मौजूद है. कमी जमीनी स्तर पर लोगों को अधिकार देने में है. प्रासंगिक बने रहने के लिए सिर्फ कागज और फंडिंग जैसी बुनियादी चीजें काफी नहीं हैं. इसके लिए ऐसी योजना चाहिए जो समुदाय के साथ मिलकर बनाई जाए, सिर्फ समुदाय के लिए नहीं.
अक्षिता एम भंज देव, ‘द बेलगाडिया पैलेस’ और ‘मयूरभंज फ़ाउंडेशन’ की डायरेक्टर हैं. उनका X हैंडल @TheGreatAshB है और वे इंस्टाग्राम पर @abhanjdeo के हैंडल से मौजूद हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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