Wednesday, 1 February, 2023
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न्यूज़ रूम, कंसल्टेंसी- हर जगह धूम मची है लेकिन जरूरी सवाल गायब हैं: क्या बजट अब महत्वपूर्ण रह गया है?

जब जीएसटी को भारत में लागू किया गया था, तो सरकार के कर राजस्व के 45-50 प्रतिशत से संबंधित प्रस्तावों को बजट से बाहर कर जीएसटी परिषद के अधीन रखा गया था.

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बजट 2023 करीब एक हफ्ते दूर है. देश भर के न्यूज़रूम अपने कवरेज को सबसे आकर्षक तरीकों से पैकेज करने के तरीकों के बारे में सोच रहे हैं. परामर्शदाताओं, निवेश बैंकों से लेकर रिसर्च एजेंसीज़ तक, हर वित्तीय संगठन अपने हिसाब से बजट की अपेक्षाओं को समझाने में व्यस्त है. लेकिन इन सभी में एक मूलभूत प्रश्न गायब है: क्या बजट अब इतना महत्वपूर्ण हो गया है?

केंद्रीय बजट की शुरुआत खातों के एक विवरण के रूप में हुई थी – जिसमें बीते वर्ष के राजस्व और व्यय की स्थिति और आने वाले वर्ष के लिए विवरण दिया गया था. 1947 से 1970 के बीच के बजट भाषण को ज्यादा महत्त्व नहीं मिलता था और अनिवार्य रूप से तथ्यों और आंकड़ों के बारे में ही बात की जाती थी. हालांकि, 1970 के बाद इसमें बदलाव आना शुरू हुआ. बजट भाषण अधिक राजनीतिक हो गए और नारों और जुमलों को शामिल करना शुरू कर दिया.

हाल में, वर्ष भर के लिए संशोधित अनुमानों और अर्थव्यवस्था पर गहरी नज़र डालने जैसी चीजों को लंबे भाषणों की जगह सभी नई योजनाओं और पहलों की घोषणा ने ले ली है.

लेकिन बजट भाषणों के घटते मूल तत्वों के अलावा अन्य कारणों से केंद्रीय बजट का महत्व कम हो गया है.

काम की चीज कम, बयानबाजी ज्यादा

आइए टैक्सेशन से शुरू करें. केंद्रीय बजट वर्ष के टैक्सेशन प्रस्तावों के संबंध में प्रमुख नीति दस्तावेज हुआ करता था. यह बजट में था कि सरकार ने आयकर, कॉर्पोरेट टैक्स, उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क, सेवा कर और इसके द्वारा लगाए गए अन्य करों में बदलाव की घोषणा की.

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अब जुलाई 2017 में आते हैं, जब भारत में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किया गया था. एक झटके में, सरकार के कर राजस्व के 45-50 प्रतिशत से संबंधित प्रस्तावों को बजट से बाहर कर जीएसटी परिषद के अधीन रखा गया. संयोग से, जीएसटी को ही एक विशेष संयुक्त संसदीय सत्र में लॉन्च किया गया था.

इसके साथ, बजट में जनता की रुचि का बड़ा हिस्सा कि क्या सस्ता होने वाला है और क्या महंगा होने वाला है, वह भी खत्म हो गया.

कर प्रस्ताव बजट तक ही सीमित नहीं हैं

अधिकांश अप्रत्यक्ष करों को बजट से बाहर किए जाने की वजह से, सभी टैक्सेशन प्रस्तावों से संबंधित दस्तावेज़ का भाग बी काफी कम हो गया है. हालांकि, चूंकि इसमें अभी भी आयकर और कॉर्पोरेट कर प्रस्ताव शामिल हैं, कोई यह मान सकता है कि यह अभी भी कर नीति के लिए बहुत महत्व रखता है.

बेशक, बजट में महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष कर प्रस्ताव शामिल हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष कर प्रस्ताव बजट दस्तावेज तक ही सीमित हैं. उदाहरण के लिए कॉरपोरेट टैक्स लें. सितंबर 2019 में, सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स दरों में भारी कटौती की घोषणा की. यह देखते हुए कि 2019 का बजट लोकसभा चुनाव के बाद जुलाई में पेश किया गया था, इस तरह के एक महत्वपूर्ण निर्णय को बजट से जानबूझकर बाहर रखने के लिए सरकार द्वारा प्रयास किया जाना चाहिए था.

बजट की एकमात्र चीज जिसमें सभी की रुचि है और जो बजट का एकमात्र डोमेन बनी हुई है वह आयकर है. टैक्स में कटौती की उम्मीद जगी है, लेकिन वे उम्मीदें अक्सर धराशायी हो जाती हैं. शायद बजट 2023 अलग होगा; आइए देखते हैं. इस बात की भी संभावना है कि निर्णय की घोषणा बजट के बाहर और 2024 के लोकसभा चुनाव की तारीख के करीब की जाएगी.


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महत्वपूर्ण फैसले बजट का इंतजार नहीं करते

पहले भी, कई महत्वपूर्ण निर्णय- जैसे कि 1969 का बैंकों का राष्ट्रीयकरण, 1978 और 2016 का विमुद्रीकरण, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 का शुभारंभ, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 शुरू करना, इन्सॉलवेंसी और बैंकरप्ट्सी कोड 2016 का शुभारंभ, और 2020 के विभिन्न बैंक विलय—सभी को बजट से बाहर रखा गया था.

कोई यह सोच सकता है कि कोविड-19 महामारी ने रिकवरी के लिए एक उपकरण के रूप में बजट के महत्व को बढ़ा दिया होगा, लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत है. 2020 और 2021 में घोषित किए गए कई आत्म-निर्भर भारत पैकेजों से जाहिर था कि सरकार ने बजट में एक बार के बजाय पूरे वर्ष समय-समय पर अपने महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए एक मजबूत मिसाल कायम की.

वास्तव में, इस क्षेत्र में भू-राजनीतिक उतार-चढ़ाव को देखते हुए, इस नए दृष्टिकोण के साथ बने रहना एक बेहतर विचार हो सकता है क्योंकि इससे समय-समय पर सुधार या बदलाव किया जा सकता है.

दूसरा सरकारी खर्च की प्रवृत्ति के कारण भी बजट अब उतना महत्वपूर्ण नहीं रह है. सरकार के कुल खर्च को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा गया है-राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय. पूंजीगत व्यय बढ़ाने के लिए इस सरकार के प्रयास के बावजूद, इसके खर्च का भारी हिस्सा (लगभग 80 प्रतिशत) राजस्व व्यय के रूप में चला जाता है.

राजस्व व्यय बार-बार होने वाले खर्चों को संदर्भित करता है जैसे वेतन, पेंशन, केंद्र द्वारा लिए गए ऋणों पर ब्याज भुगतान, सब्सिडी आदि. अब, केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन और पेंशन को अक्सर केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा बजट के बाहर संशोधित किया जाता है, और वैसे ही परिवर्तन किया जाता है जैसा कि संबंधित वेतन आयोगों द्वारा इसकी सिफारिश की जाती है. इसलिए, बजट में कही गई बातें शायद ही अंतिम हो.

चाहे कुछ भी हो, ब्याज भुगतान करना पड़ता है, इसलिए सरकार के वार्षिक वित्तीय विवरण में भी कोई वास्तविक रूप से कुछ नहीं कहा जाता. सब्सिडी एक प्रमुख क्षेत्र है जहां बजट से फर्क पड़ सकता है, लेकिन यहां भी ऐसा नहीं है कि केवल बजट ही फर्क डाल सकता है.

बजट आजकल मतलब की चीज की तुलना में सनसनी ज्यादा हो गया है. उन लोगों की गिनती न करते हुए जिनकी नौकरियां इस पर निर्भर करती हैं, आप पिछली बार कब किसी ऐसे व्यक्ति से मिले थे जो 1 फरवरी को वित्त मंत्री को क्या कहने वाले हैं, इस बात में वास्तव में उनकी रुचि रही हो?

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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