Friday, 21 January, 2022
होममत-विमतनौकरी चाहिए या मोक्ष? वाराणसी में मोदी के काशी कॉरीडोर की, भारी कीमत चुकानी पड़ेगी

नौकरी चाहिए या मोक्ष? वाराणसी में मोदी के काशी कॉरीडोर की, भारी कीमत चुकानी पड़ेगी

देश के सबसे पवित्र शहर के घाट तो हमारी पिछली यात्रा के मुकाबले साफ-सुथरे, मगर बाकी शहर पहले की ही तरह गंदगी से भरा हुआ.

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वाराणसी के राजघाट पर एक चाय की दुकान के बाहर खटिया पर बैठे नेत्रहीन बुजुर्ग मुझे दुखी मन से कुछ-एक साल पहले अपनी आंख के गड़बड़ ऑपरेशन के बारे में बताते हैं. चाय दुकान में काम कर रही एक खुश दिल महिला मेरे आगे यूं ही चिलम बढ़ाती है. हां, देश के सबसे पवित्र शहर के घाट हमारी पिछली यात्रा के मुकाबले साफ-सुथरे हुए हैं लेकिन बाकी शहर में गंदगी पहले जैसी ही है.

डोम राजा के श्मशान मणिकर्णिका घाट पर अधजले शव और शोक संतप्त परिजन चारों ओर हैं. अस्थियां दिन-रात जलाई जा रही हैं, जैसा सदियों से होता आया है. स्थानीय पुरोहित भविष्य के बारे में दार्शनिक लहजे में बातें करते हैं. एक ने मुझे संक्षेप में बताया, ‘आखिरकार, भारत में हिंदू राज आया….जिसका हम इंतजार कर रहे थे.’ एक सड़क किनारे ‘सैलून’ का नाई कुछ बड़ी-सी पान की पीक थूकता है और हंसता है, ‘चाहे जैसा राज हो….मेरी जगह तो यही है, शोक में डूबे हुओं का सिर मूड़ना. यही मेरे बाप करते थे….यही मेरा बेटा करेगा.’ एक ऊंची कद-काठी का नौजवान बातचीत में कूद पड़ता है और विनम्रता से कहता है, ‘सिर्फ हिंदी, प्लीज.’ वह सेना में भर्ती होना चाहता है और प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा है. बीच-बीच में वह और उसके दोस्त अपने गृह नगर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में भी हो आते हैं. ‘नेपाल का बॉर्डर बस 30 किमी. दूर है….हम वहां सप्ताहांत में जाते हैं.’ क्यों? ‘मैं 21 साल का हूं….मुझे पार्टीबाजी पसंद है.’

तो, उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी फरवरी-मार्च 2022 में होनी है जब राज्य में विधानसभा के 403 सदस्यों का चुनाव होगा. वाराणसी के लोग उदासीन और संशंकित हैं. याद रखें, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है और डोम राजा दिवंगत जगदीश चौधरी 2019 के लोकसभा चुनावों में नमो की उम्मीदवारी के एक प्रस्तावक थे और उन्हें वाजिब ही पद्मश्री से नवाजा गया था.

सन 1585 में बने काशी विश्वनाथ मंदिर के प्राचीन परिसर का ‘कायाकल्प’ लगभग पूरा हो चला है. इसका उद्घाटन 13 दिसंबर को होना है और बेशक आगामी चुनावों में बड़ा मुद्दा होगा. भूल जाइए कि वाराणसी के विस्थापित लोग चमचमाते मुख्य रास्ते तथा टहलने के गलियारे, संग्रहालय तथा कैफे, वैदिक लाइब्रेरी और फूड कोर्ट के बारे में क्या सोचते हैं जिसके लिए मंदिर के आसपास अनगिनत घरों और दुकानों को ढहा दिया गया. इन तमाम कोशिशों के बावजूद मंदिर के चारों ओर फटा दूध बहता रहता है (शिव को परंपरा से ताजा दूध जो चढ़ाया जाता है), सड़ती फूल-मालाओं और कचरे का ढेर बिखरा पड़ा रहता है. मंदिर के दरवाजों के ठीक बाहर खुले नाले और गंदे जल-मल को लांघकर जाना पड़ता है. हजारों तीर्थ यात्रियों को पुलिसवाले जोर से ढकेलते रहते हैं. इस बीच शोपीस वाले इलाके को ‘सुंदर’ बनाने के लिए तेज गतिविधियां जारी हैं जिसे रिकॉर्ड समय और भारी-भरकम खर्च से पूरा किया गया है.


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कितनी कीमत

‘अभी तो पार्टी शुरू हुई है….’ मैंने स्ट्रॉबेरी रंग के बालों और विराट कोहली जैसी दाढ़ी वाले एक उत्साही नौजवान को अपने साथियों से कहते सुना. वे बेकार और बेरोज़गार हैं. गंगा में बहाने के लिए गेंदा फूल और दीया बेचने वाले कम उम्र बच्चे एकदम सुखंडी-से हैं. उनके मां-बाप, दादा-दादी और उससे भी पहले वाले ऐसे ही रहे हैं. कोविड महामारी ने उनकी आमदनी का बड़ा स्रोत-विदेशी पर्यटकों से कमाई-छीन ली है. यही दशा वाराणसी के परंपरागत बुनकरों की है जो पिछले दो साल से लगभग भुखमरी-सी हालत में गुजार चुके हैं लेकिन अब बेहतर वक्त की आस लगाए बैठे हैं.

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लेकिन ठहरिए, भव्य काशी विश्वनाथ कॉरीडोर रिकॉर्ड समय में बनाने जुटे लोगों की लाजवाब काबिलियत तो देखिए! प्रधानमंत्री ने मार्च 2019 में 1,000 करोड़ रुपए की लागत से ‘परिवर्तन’ की नींव रखी थी. प्रोजेक्ट आर्किटेक्ट बिमल पटेल की डिजाइन की खातिर 5.5 लाख वर्ग फुट जगह बनाने के लिए आस-पास के तीन सौ मकानों का अधिग्रहण किया गया. गजब! यह सब हो गया है! 13 दिसंबर को हमारे महान और तेजतर्रार नेता इसका अनावरण करेंगे, जिसका मुआयना एक और महान तथा तेजतर्रार नेता, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 36 बार कर चुके हैं ताकि सब कुछ शानदार रहे. आखिर, मंदिर में हर साल 70 लाख श्रद्धालु जो पहुंचते हैं-तो, क्यों न इसे कीमती शोपीस बनाया जाए?

जैसे महत्वाकांक्षी सेंट्रल विस्टा रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर करदाताओं का 13,450 करोड़ रुपए की विशाल रकम खर्च की गई है. यह चमचमाता प्रोजेक्ट भी बड़ी कीमत का है. वाराणसी के संभागीय आयुक्त दीपक अग्रवाल ने कहा कि कॉरीडोर से मंदिर का इलाका ‘भीड़ भाड़ से मुक्त’ हो गया है. यह सही है. लेकिन किस कीमत पर? बाकी शहर का क्या, जो भीड़ भाड़ से ‘बजबजा’ रहा है? भीड़ भरी बस्तियों से जो कोई गाड़ी से गुजरेगा, उसे ऐसे भारत की याद आएगी जहां समय ठहर गया है, जहां धूल-धक्कड़, गरीबी, विकास और इन्फ्रास्ट्रक्चर के अभाव ठाठे मारता है, जहां प्रगति और समृद्धि के अभाव के अलावा कुछ भी दिखाने को नहीं है. अरे हां, उत्तर प्रदेश जल्दी ही पांच नए चमचमाते हवाई अड्डों पर शान बघारता दिखेगा?

हमें मंदिर में ले जाने वाला एक नौजवान पुरोहित संस्कृत में एमए है. दूसरा तीन साल तक फ्रांसीसी साहित्य की पढ़ाई करने के बाद पीएचडी कर रहा है. इस रहस्यमय शहर में पांडित्य और आस्था का अंबार है, जहां लाखों लोग मृत्यु  का वरण करने और मोक्ष पाने के लिए आते हैं. लेकिन उनका क्या, जो यहां जिंदा रह रहे हैं? क्या उनके कीमती वोट काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के निर्माताओं को मिलेंगे? या उनका नज़रिया उस भारत की ओर विस्तार लेगा, जहां रोजगार मोक्ष जैसे ही खास होंगे? जहां रोजगार मुक्ति का साधन होंगे?

(लेखिका स्तंभकार, सामाजिक टिप्पणीकार, पत्रकार और ओपीनियन-शेपर हैं. उन्होंने 20 किताबें लिखी हैं. उनका ट्विटर @DeShobhaa है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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