Tuesday, 24 May, 2022
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काशी विश्वनाथ एक निर्माण स्थल बन चुका है, वाराणसी की पवित्रता इसकी कीमत है

कई लोगों को लगता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र के विकास से प्राचीन हिंदू आस्था सम्मानित हुई है, लेकिन यह उस मौलिकता को नष्ट कर रहा है जिसने वाराणसी को विशिष्ट शहर बनाया था

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कई वर्षों बाद पिछले सप्ताह मैं वाराणसी लौटा. मौका था भारत के एक महान कवि, दार्शनिक, मानवतावादी संत कबीर की अविश्वसनीय विरासत के समारोह का. लोक एवं शास्त्रीय संगीत, काव्य पाठ और व्याख्यानों के आयोजन के जरिए इस समारोह ने उस प्रेम के शाश्वत संदेश को फिर से प्रसारित किया, जो मानव संबंधों की सीमाओं को भी तोड़ता है और सभी रूपों, रंगों और खुशबुओं में उसका जश्न मनाता है. कबीर में तल्खी भरी है, यहां तक कि उनके जिन कटाक्ष भरे दोहों में धन और सत्ता से जुड़े आडंबर तथा जश्न का मखौल उड़ाया गया है वे हमें यही याद दिलाते हैं कि हम मिट्टी से पैदा हुए हैं और अंततः हमें मिट्टी में ही मिल जाना है.

उनके दोहों में तीखा व्यंग्य भरा है, जो हमारे जीवन में समाई भ्रांतियों का मज़ाक उड़ाते हैं. उनमें गहरी पवित्रता और भक्ति की वह भावना भी समाई है, जो इस आश्चर्य भाव तथा इस तथ्य से उभरती है कि हमारा अपना एक वजूद है, हम सोच सकते हैं, हम प्रेम करते हैं. कबीर के लिए, जीवन का चमत्कार ईश्वर में (चाहे उसका जो भी नाम हो) हमारी आस्था की पुष्टि करता है. शायद यह कोई संयोग नहीं है कि कबीर ने अपना पूरा जीवन उस नगर में बिताया जो प्राचीन था, उस नदी के किनारे बसा था जिस नदी को असंख्य पीढ़ियों की आस्था तथा भक्ति ने महिमामंडित किया है; और जिसकी संकरी गलियां, जिसके मंदिर-मस्जिद, खंडहर और जिसकी भव्य इमारतें उसके समृद्ध ताने-बाने में पिरोई हुई थीं. कबीर ने उस शहर की अपनी भाषा में लिखा, जो भोजपुरी, अवधी और पूर्वी के मेल से बनी है और अपने हर आगंतुक को मोहित कर लेती है.

कबीर की विरासत को फिर से जीने की इच्छा मुझे आपसी होड़ और तीखी सांप्रदायिकता से त्रस्त हमारी राजधानी से दूर ले गई. आश्चर्य की बात यह है कि बनारस एक ऐसा शहर है जहां हिंदू आस्था से जुड़े जीवंत प्रतीकों से दूर रहना नामुमकिन है, फिर भी यहां हम संकीर्ण से संकीर्णतम पहचानों के बदनुमा दावों से शायद हो रू-ब-रू होते हैं. लेकिन यह जहर अब फैलने लगा है, और यह चिंता की बात है.


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वाराणसी में दिनचर्या

कई साल पहले, 1960 के दशक में मैं करीब दो महीने तक बनारस में रहा था. तब यह इसी नाम से जाना जाता था. वहां मैं अपने एक विधुर, सेवानिवृत्त अंकल के साथ रहा था, जो ‘काशी वास’ पर थे. यानी अपनी मृत्यु इस पवित्र शहर में चाह रहे थे. हर सुबह वे पवित्र गंगा स्नान करने के लिए दशाश्वमेध घाट तक पैदल जाते थे. इसके बाद शहर की तंग गलियों से होते हुए विश्वनाथ मंदिर जाते, पूजा-प्रार्थना करते और मंदिर की प्रदक्षिणा करके मशहूर कचौरी वाली गली की ओर चल देते. हलवाइयों और मिठाई की दुकानों से भरी इस संकरी गली में ताजा-ताजा तली जा रहीं कचौरियों और सब्जी के साथ रसीली जलेबियों तथा राबड़ी का स्वादिष्ट नाश्ता उपलब्ध होता. अंकल के कहने पर यह सब मेरी भी दिनचर्या में शामिल हो गया था. गंगा स्नान और पूजा-पाठ के साथ मैं सबसे ज्यादा इंतजार इस नाश्ते का ही करता था. लोग आज भी गंगा स्नान करते हैं लेकिन नदी को स्वच्छ बनाने की ‘नमामि गंगे’ परियोजना लागू किए जाने के बावजूद नदी बुरी तरह प्रदूषित है.

पिछले दिनों इन गलियों से गुजरते हुए करीब पचास साल पहले की मेरी वे सारी यादें फिर से ताजा हो रही थीं. आज ये गलियां पहले से ज्यादा भीड़भाड़ वाली हो गई हैं, उनमें पहले से ज्यादा इमारतें बन गई हैं. फिर भी, यह शहर इस अराजकता के ऊपर एक अकथनीय नीरवता का अहसास कराता है. शायद यहां आने वाले धर्मपरायण तीर्थयात्रियों और इन पवित्र गलियों के निवासियों ने मिलकर धार्मिकता का ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया है, जो पूरे शहर में व्याप्त दिखता है. यह वैसी ही अनुभूति है जैसी कैलाश पर्वत की परिक्रमा करते हुए होती है. यह, देवत्व से साक्षात्कार के लिए असंख्य पीढ़ियां जिस प्राचीन मार्ग से गुजर चुकीं उनके पदचिह्नों का अनुगमन करने जैसा है. कैलाश पर्वत का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है. आध्यात्मिक रूप से सजग तीर्थयात्री अपने पूर्ववर्तियों द्वारा छोड़ी गई भक्ति-ऊर्जा से तुरंत जुड़ जाता है. वाराणसी में भी वह ऊर्जा मौजूद है.

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काशी विश्वनाथ मंदिर में निर्माण

लेकिन इस बार काशी विश्वनाथ मंदिर जाकर किसी भावातीत अनुभव से जुड़ने का भाव काफ़ूर हो गया. वह स्थान विशाल निर्माण स्थल बन गया है. काशी विश्वनाथ मंदिर की संकरी गलियों के जाल की जगह वहां एक विशाल प्रांगण उभर आया था, जिसके चारों ओर नवनिर्मित गलियारे बने थे जिनके ऊपर छत मौजूद थी. प्रांगण की ओर जाने के लिए चौड़ी सीढ़ियां बन रही थीं जिनके ऊपर विशाल मेहराबदार द्वार बनाया जा रहा था. बाहर की ओर यह द्वार घाट किनारे से ऊपर आ रहे चौड़े रास्ते की ओर खुलता है. भगवान शिव को अब एक भारी-भरकम चट्टान में कैद कर दिया गया है, जैसे अयोध्या में भगवान राम को किया गया है.

शायद मेरे कई साथी नागरिकों को यह विकास अपनी प्राचीन आस्था के अनुकूल लग सकता है, उसे ‘इब्राहिमी आस्थाओं’ द्वारा आरोपित सीमाओं से मुक्त किया जाना लग सकता है. लेकिन मुझे यह आस्था के उस सोते को ही सुखाने की कोशिश लगती है जिसने वाराणसी को एक विशिष्ट नगर बनाया, जो कि वह है भी. इतिहास के प्रति हमें विनम्र होना चाहिए. पिछली पीढ़ियों द्वारा छोड़ी गई विरासत के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए. विश्वनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द जो कुछ चल रहा था उसे देखकर हालांकि मैं हतोत्साहित था लेकिन संगीतज्ञों, कवियों, और कथाकारों की नई पीढ़ी से मुलाक़ात ने मुझमें आशा जगाई. यह पीढ़ी कबीर के संदेश का सम्मान कर रही है और साझा मानवता का संदेश दे रही है, जिसकी आज हमें बेहद जरूरत है.

हमारी आस्था के उतने रूप हो सकते हैं जितने रूपों में हम ईश्वर की कल्पना करते हैं. लेकिन याद कीजिए कबीर ने क्या कहा है—‘मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास रे.’

(श्याम सरन पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर में सीनियर फेलो हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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