Thursday, 30 June, 2022
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काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का काम नवंबर तक खत्म करने में जुटे मजदूर, आधुनिकता के साथ विरासत का मिश्रण

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में फिलहाल चौबीसों घंटे काम चल रहा है, वाराणसी के डिवीजनल कमिशनर को नवंबर 2021 की समय सीमा पूरी करने का भरोसा है. वास्तुकार बिमल पटेल का कहना है कि यह परियोजना इस प्राचीन शहर की विरासत के साथ पूरी तरह से फिट बैठेगी.

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वाराणसी: यदि आप कोई अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्ति अथवा वीआईपी नहीं हैं, तो वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर की आपकी यात्रा कुछ इस तरह दिखाई देगी- अति मन्थर गति से चल रहा यातायात, संकरी गलियों में लोगों की धक्का-मुक्की और आगे धकेल दिए जाने से पहले मुख्य देवता महादेव शिव की बस एक झलक मिल पाना. पर इस दिसंबर से काफ़ी कुछ बदलने वाला है और इसका श्रेय जाएगा काशी विश्वनाथ धाम परियोजना को, जिसे इस शिव मंदिर के साथ-साथ इस प्राचीन शहर में आने वाले अन्य पर्यटकों एवम् तीर्थयात्रियों की यात्रा को यादगार बनाने के लिए तैयार किया गया है.

परंतु, कोविड महामारी के प्रभाव के कारण, इस महत्वपूर्ण परियोजना को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले नवंबर 2021 की समय सीमा प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

दिप्रिंट ने सोमवार को इस परियोजना स्थल का दौरा किया, और जन्माष्टमी (भगवान कृष्ण का जन्मदिन) होने के कारण घोषित आधिकारिक अवकाश के बावजूद, उत्खनन, क्रेन और ट्रकों के साथ निर्माण कार्य जोरों पर था.

काशी विश्वनाथ धाम परियोजना के एक हिस्से के रूप में, मुख्य मंदिर को गंगा नदी तट से और अधिक सुगम्य बनाया जा रहा है |प्रवीण जैन / दिप्रिंट

वाराणसी के संभागीय आयुक्त (डिवीजनल कमिशनर) दीपक अग्रवाल, के अनुसार 1,200 से अधिक लोग इस हेतु चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोविड-19 महामारी के कारण होने वाली देरी की भरपाई की जा सके.

अग्रवाल कहते हैं कि ‘हम समय पर काम पूरा करना सुनिश्चित करने के लिए इस कार्यबल को 1,800 श्रमिकों तक बढ़ाने जा रहे हैं. हम इसे इस साल नवंबर तक पूरा करने की योजना बना रहे हैं.’

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प्रशासन का दावा है कि हाल ही में आई बाढ़ से भी यह काम काफ़ी प्रभावित हुआ है. इनका कहना है. ’इस बार, नदी का जल स्तर औसत से कहीं अधिक रहा है. घाटों के आसपास के कुछ काम में थोड़ी देरी हुई है, लेकिन हमें अब भी विश्वास है कि इसे नवंबर तक पूरा कर लिया जाएगा.’

डिवीजनल कमिशनर अग्रवाल ने बताया, ‘परियोजना की लागत, जो शुरू में 339 करोड़ रुपये (जीएसटी को छोड़कर) थी, अब 400 करोड़ रुपये के पार चली गई है. परियोजना के दौरान, कई मंदिरों की फिर से खोज की गई, इसलिए हमें बार-बार डिजाइनों पर फिर से विचार करना पड़ा. हमने 400 करोड़ रुपये की संशोधित लागत सरकार को मंजूरी के लिए भेजी है.‘

इस परियोजना में क्या-क्या शामिल है?

साल 2018 में वाराणसी के सांसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई काशी विश्वनाथ धाम परियोजना के तहत काशी विश्वनाथ मंदिर को तीन सजे-सजाए गए द्वारों के माध्यम से गंगा नदी के त्तटों से जोड़ा जाएगा.

यह परियोजना लगभग 5 लाख वर्ग फुट में फैली होगी. अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि मंदिर के पहले के क्षेत्र से इसकी तुलना करें, तो वह सिर्फ 2,700 फीट था.

इस परियोजना को वास्तुकार बिमल पटेल द्वारा डिजाइन किया गया है. ये वही शख़्श हैं जो नई दिल्ली में सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास योजना के भी प्रभारी हैं.

इसके तहत मंदिर को सड़कों और जलमार्गों के माध्यम से पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए सुगम्य बनाया जाना है – आम जन खिडकिया घाट और राज घाट से यहां तक नाव की सवारी कर सकेंगे. एस्केलेटर और रैंप घाटों से मंदिर तक लोगो की आसान पहुंच सुनिश्चित करेंगे.

इस पवित्र नदी का निर्बाध दृश्य प्रदान करने के लिए एक नई गंगा व्यू गैलरी तैयार की गयी है. साथ ही एक मंदिर चौक (चौराहा) लोगों के बैठने, आराम करने और ध्यान लगाने के लिए उपयुक्त एक स्थल के रूप में काम करेगा. अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि एक गेस्टहाउस, एक आध्यात्मिक किताबों की दुकान, एक गैलरी, वाराणसी के हजारों वर्षों के इतिहास को प्रदर्शित करने वाला एक संग्रहालय, एक बहुउद्देश्यीय हॉल, पर्यटक सुविधा केंद्र, फूड कोर्ट और दुकानें भी इस परियोजना के तहत निर्माणाधीन हैं.

काशी विश्वनाथ मंदिर के तीर्थयात्रियों के लिए तैयार की जा रही नई सुविधाओं में से एक पर काम करते कामगार | प्रवीण जैन / दिप्रिंट

इन सारी सुविधाओं का निर्माण वाराणसी, जिसे बनारस या काशी के नाम से भी जाना जाता है, में पूरे साल आने वाले तीर्थयात्रियों की भारी भीड़ को संभालने के लिए किया जा रहा है.

एक अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि श्रावण (जुलाई-अगस्त) के शुभ महीने के दौरान, अकेले पहले सोमवार को लगभग ढाई से तीन लाख श्रद्धालु इस मंदिर में आते हैं, जबकि महाशिवरात्रि के पर्व पर, यह संख्या एक दिन में चार लाख आगंतुकों के पर चली जाती है -यह एक ऐसा दवाब जिसे पुराना पड़ चुका इंफ्रास्ट्रक्चर संभाल नहीं पा रहा था.

इस परियोजना की परिकल्पना कैसे की गई, इस बारे में बताते हुए वास्तुकार पटेल ने दिप्रिंट को बताया कि वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर, जिसे साल 1780 में बनाया गया था और इसके आसपास के कई अन्य मंदिर सभी तरफ से अत्यंत घने और बेतरतीब विकास से घिरे हुए थे.


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उन्होंने आगे कहा क़ि ‘इस क्षेत्र में कई मंदिरों और अच्छे घरों को काफ़ी असंवेदनशील रूप से बनाया गया था, और सार्वजनिक स्थानों पर भारी अतिक्रमण कर दिया गया था. चलने फिरने की समस्या का सामना कर रहे लोगों के लिए मंदिर तक पहुंचना गंभीर रूप से बाधित, असुरक्षित और दुरूह हो गया था.’

साल 2019 में, काशी विश्वनाथ मंदिर और गंगा के बीच के क्षेत्र के एक व्यापक पुनर्विकास कार्यक्रम को मंजूरी दे दी गई थी. पर कई लोगों ने इस बारे में यह चिंता भी जताई है कि यह परियोजना शहर की प्राचीन विरासत को मिटा देगी और ‘मॉल संस्कृति’ को बढ़ावा देगी. हालांकि, बिमल पटेल ने इस बारे में यह तर्क दिया कि यह परियोजना वाराणसी की प्राचीन विरासत, संस्कृति और आध्यात्मिकता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से ही डिज़ाइन की गई है.

वे बताते हैं कि ‘यह मंदिर और पुनर्विकसित परिसर वाराणसी शहर का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है. यह सुनिश्चित करने के लिए काफ़ी ध्यान रखा जा रहा है कि यहां जोड़े जा रहे स्थल आसपास के क्षेत्र के साथ अच्छी तरह से घुले मिले हों. परिसर के भीतर में अपने महत्व को बनाए रखते हुए मुख्य मंदिर एक अलंकृत स्तंभ से घिरा होगा, जो एक विशाल और पवित्र मंदिर परिसर का निर्माण करेगा. मंदिर चौक, मंदिर परिसर के सामने एक बड़ा खुला हुआ स्थान है जो घाटों की ओर जाने वाले मुख्य मार्ग पर उतरेगा.’

इस परियोजना की आवश्यकता क्यों पड़ी?

इस तथ्य पर जोर देने के लिए कि यह परियोजना समय की जरूरत है. स्थानीय प्रशासन 1916 की एक घटना का हवाला देता है.

डीसी अग्रवाल बताते हैं, ‘साल 1916 में, जब महात्मा गांधी वाराणसी आए और मंदिर गए उसके बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एक भाषण दिया जिसमें उनके द्वारा कहा गया कि मंदिर के आसपास के क्षेत्र में चीजों को सुधारना होगा.’

तब से पिछले 105 वर्षों में, तीर्थयात्रियों और पर्यटकों ने काफ़ी तेजी से यह महसूस किया है कि वाराणसी की संकरी गलियों और घाट की सीढ़ियों में भ्रमण करना एक कठिन काम हो रहा है. जाहिर है, वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए हालात और भी बदतर हैं, खासकर तब जब उन्हें कई-कई घंटों तक कतार में लगना पड़ता है.

लोगों की एक और बड़ी शिकायत तीर्थयात्रियों को मंदिर के अंदर बिताने के लिए काफ़ी कम समय मिलने की है. इसलिए मंदिर चौक को बनाया जा रहा है.

एक अधिकारी ने कहा कि ‘पहले, लोग मंदिर के अंदर कुछ सेकंड बिता पाते थे और वे कुछ ही मिनटों में बाहर हो जाते थे. उन्हें यहां तक आने में कई दिन लग जाते थे, लेकिन उन्हें यहां बैठने, ध्यान लगाने और भगवान से प्रार्थना करने का पर्याप्त समय नहीं मिलता था. इसलिए, हम एक बहुत बड़ा मंदिर चौक बना रहे हैं, जो लगभग 40 मीटर गुणा 70 मीटर आकर का है, जहां लोग बैठ सकते हैं, आराम कर सकते हैं और ध्यान लगा सकते हैं. साथ ही वे यहां अपने परिवार और दोस्तों के साथ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं.’

इस परियोजना को सड़क मार्ग और जलमार्ग से तीन पहुंच मार्गों के साथ प्रतिदिन औसतन दो लाख श्रद्धालुओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.

एक अधिकारी ने कहा कि ‘लोग सीधे खिडकिया घाट और राज घाट से नाव ले सकते हैं और बस एक जेटी के माध्यम से जलासेन घाट तक जा सकते हैं. हमने घाटों से मंदिर तक आसान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एस्केलेटर और रैंप भी लगाए हैं.’

अग्रवाल ने कहा कि इस परियोजना के तहत पूरे मंदिर परिसर के भीतर 24 इमारतें होंगी. वाराणसी के डीसी ने आगे कहा क़ि, ‘इसमे आगंतुकों को ज़रूरतों की पूरा करने के लिए कई सार्वजनिक सुविधाओं – गेस्ट हाउस, पर्यटक सुविधा केंद्र, शौचालय, लॉकर रूम, धर्मशाला और कई अन्य इमारतों – का निर्माण किया जाएगा.’

मणिकर्णिका घाट, हिंदू धर्म का सबसे पवित्र श्मशान घाट। प्रवीण जैन / दिप्रिंट

वाराणसी एक ऐसा शहर है भी जहां कई सारे लोग अपने अंतिम दिन महादेव शिव के साथ जुड़ने और मोक्ष -जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति- की अवधारणा के साथ बिताते हैं – उनकी आवश्यकताओं की पूरा करने के लिए, अधिकारी गण एक वृद्धाश्रम, मोक्ष भवन, भी बना रहे हैं.

एक अधिकारी ने कहा कि ‘काशी में बहुत सारे लोग अपने अंतिम दिन बिताना चाहते हैं, इसलिए हम एक छोटा सा मोक्ष भवन बना रहे हैं जो उनकी सभी जरूरतों को पूरा करेगा.’

हिंदू धर्म के सबसे पवित्र श्मशान घाट मणिकर्णिका घाट, जो काशी विश्वनाथ मंदिर और गंगा तट के बीच स्थित है, को भी आधुनिक चिताओं के निर्माण के साथ बदलाव के दौर से गुज़ारा जा रहा है.

एक अधिकारी ने कहा, ‘यह एक ऐसी स्थिति/हालत में था कि इसमें सुधार की अत्यंत आवश्यकता थी. इसलिए, इस परियोजना के तहत, हम एक संगठित तरीके से मंच बना रहे हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि सभी अंतिम संस्कार उचित तरीके से किए जाएं.’

‘कोई ज़ोर – जबरदस्ती नहीं’

फिर भी यह परियोजना विवादों के वंचित नहीं रही है. प्रारंभ में, इसे उस समय काफ़ी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा जब प्रशासन ने 400 से अधिक संपत्तियों को तोड़ने के लिए अपने कब्ज़े में लेने का फैसला किया, क्योंकि वे परियोजना गलियारे आ गए थे. इनमें से कुछ संपत्तियों में बने लगभग 60 मंदिरों को भी प्रशासन ने अपने कब्जे में ले लिया था.

वाराणसी मंडलायुक्त दीपक अग्रवाल | फोटो: प्रवीण जैन/ दिप्रिंट

इस 400 संपत्तियों की क्षतिपूर्ति लिए 380 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, और 70 करोड़ रुपये का भुगतान उन दुकानदारों और अन्य लोगों के पुनर्वास के लिए किया गया जिनकी आजीविका इस क्षेत्र पर निर्भर थी.

इस सारी प्रक्रिया में जोर- जबरदस्ती के आरोप लगते रहे हैं, जिसे प्रशासन ने सिरे से खारिज कर दिया. वाराणसी के डीसी अग्रवाल ने कहा, ‘हम अनिवार्य रूप से जबरदस्ती भूमि लेने की प्रक्रिया से नहीं गुजरे. हमने आपसी बातचीत का सहारा लिया. हमने इसके लिए बाजार दर से दोगुना मूल्य प्रदान किया. इसलिए किसी भी मामले में जोर -जबरदस्ती का प्रयोग नहीं किया गया.’

उनका कहना है कि कानूनी किरायेदारों, परंपरागत किरायेदारों के साथ-साथ अतिक्रमणकारियों के प्रति भी एक अति उदार नीति का पालन किया गया था, और जिस किसी भी व्यक्ति का उस स्थान कब्जा था, उसे उचित मुआवजा दिया गया था. उन्होने बताया कि ‘दुकानदारों और निवासियों सहित 1,400 से अधिक लोगों को मुआवजा दिया गया है.’

अग्रवाल ने इन इमारतों में बनाए गए 60 मंदिरों को प्रशासन द्वारा अपने कब्जे में लिए जाने के लिए अपनाई गयी प्रक्रिया के बारे में बताते हुए कहा कि ‘जब हमने इस परियोजना के तहत आने वाली संपत्तियों को खरीदने के बारे में सोचा, तो ऐसी लगभग 400 संपत्तियां थीं. जब हमने उन्हें हटाना शुरू किया, तो उनमें से कई संरचनाओं में हमें मंदिर मिले. इनमें तकरीबन 60 के आसपास मंदिर थे. उनमें से कुछ छोटे थे, कुछ मध्यम आकार के और कुछ बहुत हीं बड़े भी थे. इसके लिए हमें फिर से ड्राइंग बोर्ड पर वापस जाना पड़ा और अपनी वास्तु योजना को संशोधित करना पड़ा. हम इन सभी मंदिरों को उनका पूर्व गौरव पर बहाल कर रहे हैं.’

उन्होंने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृति विभाग की मदद से इन मंदिरों के इतिहास का पता लगाने के प्रयास जारी हैं.

विरासत के साथ समझौता?

हालांकि, वाराणसी की आम जनता इस बात से खुश है कि इस परियोजना से दुःस्वप्न बनती जा रही यातायात की भीड़ कम हो जाएगी, लेकिन उनमें से कुछ का कहना है कि प्राचीन विरासत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी.

पेशे से बैंककर्मी अभिषेक कुमार श्रीवास्तव उन लोगों में शामिल हैं जो इस परियोजना के साथ मजबूती से खड़े हैं.

उन्होंने कहा, ‘यह हमारी आस्था के केंद्रों में से एक है इसलिए यह काफ़ी महत्वपूर्ण है कि हम दूर-दराज के इलाकों से आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित करें.’

वे कहते हैं, ‘श्रावण के महीने के दौरान, लाखों श्रद्धालु यहां इकट्ठा होते हैं, और संकरी गलियों में आना-जाना एक कठिन कार्य बन जाता है. कल्पना करें कि आप एक प्राचीन मंदिर में जाएं और बिताने के लिए आपको एक मिनट का समय भी न मिले, क्योंकि पुलिस आपसे कतार में पीछे लगे हजारों लोगों के लिए रास्ता देने लिए कहती जा रही है. इस परियोजना के माध्यम से कम-से-कम हमारे पास बैठने, ध्यान लगाने और अपनी विरासत पर चिंतन – मनन करने के लिए एक जगह तो होगी. जब आप वेटिकन सिटी जाते हैं तो आपको एक समग्र अनुभव मिलता है. इसे भी इसी तरह का होना चाहिए है.’

परंतु, एक छोटा सा व्यवसाय चलाने वाले योगेश केसरी विरासत के खो जाने के बारे में बात करते हैं.

केसरी का कहना है ‘बनारस एक प्राचीन विरासत वाले शहर के रूप में जाना जाता है. बनारसी सिर्फ इस शहर के निवासियों का नाम नहीं है – यह एक मनोदशा है, एक भावना है. उन चीजों को बदल दिया गया है. अचानक पूरी काशी एक मॉल में तब्दील हो गयी है. हर चीज़ को आधुनिकता के चश्मे से नहीं देखा जा सकता. इसमें कुछ चीजें निश्चित रूप से अच्छी हैं – यातायात को आसान बनाना, अधिक स्वच्छता सुनिश्चित करना इन सभी पहलों का स्वागत है. लेकिन कृपया इसे किसी अन्य आधुनिक शहर में न बदलें.’

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख और भगवान हनुमान को समर्पित संकट मोचन मंदिर के महंत (प्रमुख पुजारी) प्रोफ़ेसर विश्वंभर नाथ मिश्रा का कहना है क़ि कुछ ऐसी पर्यावरण और सांस्कृतिक संबंधी लागतें हैं जिनपर इस परियोजना में विचार नहीं किया गया है.

प्रो. मिश्रा कहते है, ‘काशी कोई आम पर्यटन स्थल नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक स्थान है. काशी विश्वनाथ को भगवान शिव का निवास स्थान भी माना जाता है. यह एक जीवंत विरासत है; एक एकदम अलग माहौल. अब आप उसे मिटा रहे हैं और एक उसकी जगह नई चीज ला रहे हैं, और हमें नहीं पता कि क्या यह वाराणसी की परंपरा और संस्कृति के साथ घुलमिल सकेगी.’

आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर वी.एन. मिश्रा, जो वाराणसी में संकट मोचन मंदिर के महंत भी हैं | फोटो: प्रवीण जैन/ दिप्रिंट

प्रो. मिश्रा समझाते हैं कि ‘इसका सबसे दुर्भाग्यपूर्ण हिस्सा यह रहा है कि जिन इमारतों को गिराया गया है उनके निर्माण और विध्वंस के कचरे को वापस नदी में फेंक दिया गया. ललिता घाट पर विध्वंस से जमा हुए कचरे के एक हिस्से को लगभग 30 मीटर की दूरी पर नदी के गहरे चैनल में एक मंच का निर्माण करने क्वे लिए फेक दिए जाने से उस क्षेत्र में नदी के सामान्य प्रवाह में अवरोध पैदा होता है जो एक उभार (स्पर) के रूप में कार्य करेगा. इससे जल प्रवाह की गतिशीलता प्रभावित होगी. इस बिंदु के ऊपर की ओर पानी का वेग कम हो जाएगा और नीचे की ओर गाद की मात्रा बढ़ेगी, जिसके परिणामस्वरूप पूरी नदी चैनल में घर्षनकारी (स्कवरिंग) प्रभाव पड़ेगा.’

प्रो. मिश्रा आगे कहते है, ‘यह सब किए जाने से पहले, एक विस्तृत अध्ययन आवश्य किया जाना चाहिए था. बनारस को इसकी संकरी गलियों और ‘घरों में मंदिर, मंदिरों में घर’ की अवधारणा वाली विशेषता के लिए जाना जाता है. तोड़े गये कुछ मंदिरों में लोगों के पारिवारिक देवता वास करते हैं. हजारों वर्षों से, उन्होंने उनका संरक्षण किया है… यह परियोजना मिसफिट नहीं होनी चाहिए. इसे शहर में एक अलग सिस्टम के रूप में नहीं उभरना चाहिए. बनारस को मॉल कल्चर के आधार नहीं बनाया जा सकता.’

हालांकि, प्रशासन ने इस आरोप को खारिज कर दिया कि इस परियोजना से गंगा नदी के मार्ग में किसी तरह का बदलाव आएगा, परंतु यही चिंता कई पर्यावरणविदों और अन्य लोगों द्वारा भी उठाई गई है.

डीसी अग्रवाल कहते हैं, ‘शुरूआत से ही, यह पूरी योजना न केवल सार्वजनिक डोमेन में रही है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी उपलब्ध रही है. पूरा परियोजना स्थल आम जनता के लिए खुला है, और ऐसा नहीं है कि हमने इसके चारों कोई सख़्त पहरा लगाया हो. यह क्षेत्र सभी मीडियाकर्मियों, विशेषज्ञों की पहुँच में है. हमने सभी तरह की आवश्यक अनुमतियां ले ली हैं. यह बात (नदी के मार्ग में परिवर्तन वाली) सच नहीं है.’

ज्ञानवापी का ‘सद्भावना’ भरा कदम

ज्ञानवापी मस्जिद, जिसकी दीवारें काशी विश्वनाथ मंदिर के साथ बिल्कुल सटी हुई है, भी परियोजना के पक्ष में है.

इस साल कुछ समय पहले मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति ने इस कॉरिडोर परियोजना के लिए अपने परिसर की परिधि में पड़ने वाले एक भूखंड को देने का फैसला किया था. यह मुद्दा पिछले कुछ वर्षों से चल रहा था और अंत में, इसे एक ‘सद्भावना’ संकेत के रूप में छोड़ दिए जाने का निर्णय लिया गया.

अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद, वाराणसी के संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन, कहते हैं, ‘जब तक कोई सुरक्षा संबधी चिंता वाली बात नहीं होती है, हमें इस परियोजना के साथ कोई समस्या नहीं है. और हमें पूरा विश्वास है कि भविष्य में भी ऐसा नहीं होगा.’

यासीन ने कहा, ‘जहां तक परियोजना के लिए जमीन देने का सवाल है तो हमारे पास तीन भूखंड थे, जिसमें एक पर मस्जिद स्थित है, और एक अन्य भी था जिसे पुलिस नियंत्रण कक्ष के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था. प्रशासन ने हमें बताया कि जमीन का एक टुकड़ा उनकी प्रस्तावित योजना में रुकावट पैदा कर रहा है और फिर हमने इस बारे अपने धर्मगुरुओं के साथ कई बैठकें कीं. अंततः उन्हें यह भूमि सद्भावना के तौर पर दे देने का निर्णय लिया गया. यह कोई आसान फैसला नहीं था लेकिन हम एक मिसाल कायम करना चाहते थे.’

हालांकि, डीसी अग्रवाल ने कहा कि इसके बदले में मस्जिद समिति को पास में हीं व्यावसायिक भूमि का एक टुकड़ा प्रदान किया गया है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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