इंग्लैंड के क्रिकेट पूर्व कप्तान और कमेंटेटर माइकल आथर्टन ने क्रिकेट के लिए चाहे जो कुछ भी किया हो, उन्हें अब इमरान खान के भविष्य के सवाल को दुनिया के सामने लाने के लिए याद किया जाएगा. पाकिस्तानी सत्तातंत्र कश्मीर मसले को दुनियाभर में 75 साल से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उछालने की कोशिश करता रहा है लेकिन इमरान के मसले की खबर उसकी सीमा के पार जाए यह वह कतई नहीं चाहता था. आथर्टन के बाद ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट कप्तान पैट कमिंस ने भी इमरान के पक्ष में आवाज उठाई है. ऐसा करने वाले वे पहले मौजूदा क्रिकेट कप्तान हैं.
खेलों की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय एकता स्थापित करने के लिए अगर कोई सबसे बड़ा पुरस्कार हो तो आथर्टन उसके हकदार हैं. यह तोहफा उन्हें इमरान के बेटों, कासिम और सुलेमान से लॉर्ड्स के लॉन्ग रूम में बातचीत करने के लिए दिया जाना चाहिए. इस बातचीत को ‘स्काई स्पोर्ट्स’ चैनल ने लॉर्ड्स टेस्ट के पहले दिन लंच के दौरान प्रसारित किया, बावजूद इसके कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) ने मैच का बायकॉट करने की धमकी दी थी.
पीसीबी का नेतृत्व आज दूसरे कारणों से ज्यादा ताकतवर माने जाने वाले मोहसिन नक़वी कर रहे हैं. एशिया कप ट्रॉफी को लेकर हुए विवाद के लिए चर्चित हुए नक़वी पाकिस्तान के गृह मंत्री भी हैं. वे डॉनल्ड ट्रंप के चहेते पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के सबसे करीबी ‘सांचो पांज़ा’ (डॉन क्विक्सोट का वफादार साथी) माने जाते हैं. ‘स्काई स्पोर्ट्स’ ने वह बातचीत प्रसारित करके एक बड़ा जोखिम उठाया था, उससे बाकी टेस्ट सीरीज के प्रसारण का अधिकार छिन सकता था, आथर्टन का पाकिस्तानी वीसा रद्द किया जा सकता था, और इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड पाकिस्तान की सदभावना गंवा सकता था.
इन तीनों ने ये जोखिम उठाकर इमरान के भविष्य के सवाल को पाकिस्तान की खूनी घरेलू सियासत के दायरे से निकालकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के मंच पर पहुंचा दिया. पाकिस्तान का सत्तातंत्र इस मुद्दे का ‘क्रिकेटीकरण’ कतई नहीं चाहता था. क्रिकेट के 21 पूर्व कप्तानों ने, जिनमें भारत के भी तीन पूर्व कप्तान शामिल हैं, इमरान के साथ बेहतर बरताव किए जाने की मांग करते हुए एक संयुक्त पत्र जारी किया है. पाकिस्तान इसे गुजरे दौर के प्रति मोह बताकर खारिज कर सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हो सका. एक टेस्ट मैच में लंच ब्रेक पाकिस्तान की सियासत के लिए लंबा समय साबित हुआ है.
अब, इमरान और उनकी पहली बीवी जेमिमा के इन दोनों बेटों (इमरान की तीसरी बीवी बुशरा बीबी भी जेल में हैं) ने पिता के प्रति प्यार और गंभीर चिंता जाहिर की. पाकिस्तान समेत क्रिकेट की पूरी दुनिया की नजर इमरान पर लगी है. पाकिस्तान का सबसे शर्मनाक रहस्य अब अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है. उस दुनिया में तो जरूर है, जहां क्रिकेट खेला जाता है. पाकिस्तान के हुक्मरान अब तक दो बातों से राहत महसूस करते रहे हैं. एक तो यह कि जो ताकतवर देश—अमेरिका, चीन और पश्चिम एशिया— उसके लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं वे क्रिकेट की परवाह नहीं करते. लेकिन ये हुक्मरान जिस मुद्दे (आमतौर पर कश्मीर और भारत) को पहले नंबर पर रखते हैं, उनका मुल्क उसके बाद क्रिकेट को ही दूसरे नंबर पर रखता है.
क्या आथर्टन ने पुराने दोस्तों की दोस्ती की भावना से वह सब किया? वे शायद तीन पीढ़ियों में सबसे महान क्रिकेट ‘आइकॉन’ में गिनी जाने वाली हस्ती के साथ किए जा रहे जुल्म, और उन्हें तिल-तिल कर मौत की ओर धकेले जाने से आहत थे. तीसरे, इमरान की ख्याति क्रिकेट से उनके संन्यास के साथ खत्म नहीं हो गई थी. वे टेलीविज़न पर अपनी कमेंट्री के कारण भी मशहूर थे. भारतीय मीडिया कॉनक्लेव में उन्हें वक्ता के रूप में सबसे ज्यादा फीस मिलती थी. 2012 में उन्होंने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में शामिल होने से इसलिए इनकार कर दिया था कि उसमें सलमान रुश्दी भी शामिल थे. यह खबर सुर्खियों में आई थी.
आथर्टन कभी इमरान की कप्तानी वाली पाकिस्तानी टीम के खिलाफ नहीं खेले. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में खेलना उन्होंने 1989 में शुरू किया, इमरान 1992 में रिटायर हो गए. आर्थर्टन को इमरान की गेंद पर आउट होने का ‘आनंद’ नहीं मिला.
लेकिन आज वे इमरान की ओर से खेल रहे हैं.
अपने मुल्क की फौज के साथ परेशानियों के पहले दिन से ही इमरान को समझ में आ गया था कि अगर वे सियासत से हट जाएं और टेलीविज़न की लाभप्रद दुनिया में लौट जाएं तो उनका जीवन आराम से गुजर सकता है. फौज के साथ छत्तीस का रिश्ता बनाने वाले सभी सियासी नेताओं का स्वाभाविक विकल्प उनके लिए उपलब्ध था, यानी अमीरी वाला निर्वासन. लेकिन इमरान ने अपने अटूट साहस से सबको, और खासकर अपनी क्रुद्ध सेना को हैरत में डाल दिया.
कड़वी हकीकत यह है कि उन्होंने वही खेल तब खेला जब यह उन्हें मुफीद लगा. फौज के साथ मिलीभगत करके उन्होंने एक निर्वाचित प्रधानमंत्री (नवाज़ शरीफ) को गद्दी से उतारकर जेल में पहुंचा दिया और फिर उसे ऐसी चूक के लिए देशनिकाला दे दिया जिसके कारण उन्हें ‘सादिक़ और अमीन’ (इस्लामी सोच के मुताबिक सच्चे और भरोसेमंद) नहीं माना गया.
इसके बाद उन्होंने फौज का इस्तेमाल करके एक चुनाव को चुरा लिया, और बहुमत का आंकड़ा उस तरह जुटा लिया जिसे पाकिस्तानी फौज के ‘ऑपरेशन कमल’ के बराबर माना जा सकता है. और जब उन्होंने उसी फौज की मुखालफत की तब उसने वही किया जो वह हर उस निर्वाचित नेता के साथ करती रही है जो उसके लिए ‘मुश्किल’ साबित होने लगते हैं. इमरान ने ISI के चीफ समेत फौज के आला ओहदों की नियुक्तियों में दखल देना शुरू कर दिया था. वे भूल गए कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों को यह अधिकार नहीं हासिल है. इसके अलावा वे फौज की मेहरबानी पर निर्भर प्रधानमंत्री बन गए थे.
उन्हें जितने साल की जेल की सज़ा मिली है, उस पर गौर करें. प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने जो उपहार पाए उनका खुलासा न करने, और कथित ‘अल-क़ादिर ट्रस्ट’ घोटाले के लिए उन्हें अलग-अलग 14 साल, 3 साल, और 14 साल की जो सज़ाएं दी गई हैं वे काफी भयावह लगती हैं. वहां कानूनी प्रक्रिया भी अराजक ही है, मानो पाकिस्तान के मौजूदा ‘बादशाह’ ने ‘सिर कलम’ करने का हुक्म जारी कर दिया हो.
जब इमरान पहले ऐसे पाकिस्तानी नेता के रूप में उभरे, जो निर्वाचित राजनीतिक नेताओं की स्वायत्तता और नागरिक शासन के वर्चस्व की खातिर फौज की अवहेलना कर सकते हैं, तब पाकिस्तान में लाखों लोग उत्साहित हुए थे. इमरान जनता के ज़ोर पर ‘जनरल हेडक्वार्टर’ (GHQ) का मुक़ाबला कर रहे थे. मैं कई बार लिख चुका हूं कि पाकिस्तान की फौज को पहली बार एक ऐसे लोकप्रिय नेता से चुनौती मिली थी जिसे जन समर्थन हासिल था. मैं पाकिस्तान के जिस सबसे प्रमुख बुद्धिजीवी से 1985 से परिचित रहा हूं उन्होंने मुझे सावधान किया था कि “जरा सब्र रखो पार्टनर. कसीनो में हमेशा उसका मालिक ही जीतता है.” अब तक तो ‘मालिक’ ही जीत रहा है. लेकिन उसे भी पता है कि उसने अब तक जितने नेताओं का सफाया किया है उनके मुक़ाबले इमरान कहीं ज्यादा हिम्मती और सबसे लोकप्रिय भी हैं. अगर इमरान बिना कोई समझौता किए जेल से बाहर आ जाते हैं तब आसिम मुनीर को वही उपाय करना पड़ेगा— या तो उन्हें फिर जेल भेजें या देशनिकाला दें. इस व्यवस्था में सब कुछ उसी का होता है जो जीत गया हो.
इमरान का स्वभाव जितना उग्र और आत्म-मुग्ध है उसके कारण मुझे नहीं लगता कि अदियाला जेल के एकांत में वे आत्ममंथन कर रहे होंगे. मेरी तरह कई लोग उन्हें तब से जानते हैं जब वे क्रिकेट खेलते थे. हम सब तब आश्चर्य में पड़ गए थे जब वे कट्टरपंथी इस्लामवाद की ओर मुड़ गए थे. ब्रिटेन से बॉम्बे तक वे जिस तरह की जिंदगी जी रहे थे उसके मद्देनजर उनमें यह बदलाव ‘सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को’ वाले मुहावरे को चरितार्थ करता दिख रहा था.
कोई ‘ग्लोबल’ नागरिक भला ‘रियासत-ए-मदीना’ की ओर कब आकर्षित होता है? इमरान पर नजर रखने वाले कई लोग और उनकी दूसरी बीवी रहम खान इसे उनके ऊपर बुशरा बीबी के असर का नतीजा बता सकती हैं. उन्होंने न केवल सबसे रूढ़िपंथी इस्लाम को बल्कि इसके लिए उपेक्षित मानी गई रहस्य विद्या और काला जादू को भी स्थापित किया. रहम खान ने विस्तार से लिखा है कि इमरान ने काला जादू के कई उपायों को किस तरह अपनाया. लेकिन इन उपायों ने अगर उन्हें और उनकी बीवी-व-धार्मिक गाइड को जेल में पहुंचा दिया तो यह रहस्य विद्या की बुरी मिसाल ही मानी जाएगी, और यह तर्कबुद्धि के लिए भी एक झटका है.
इमरान की जिंदगी में आए इस बदलाव ने उन सबको सदमा पहुंचाया था, जो उनके अतीत को जानते थे. इमरान बंटवारे के बाद अपने दम पर कामयाब हुए लाहौर के कुलीनों के सबसे प्रमुख चेहरे थे. उनकी मां शौकत खानम जालंधर के विख्यात बर्की परिवार की थीं. उनके मामा ले.जनरल वाजिद अली खान बर्की आर्मी मेडिकल कोर के प्रमुख थे और पाकिस्तान के प्रथम फील्ड मार्शल अय्यूब खान के सबसे करीबी सहायक माने जाते थे.
इससे उस परिवार को लाहौर में नहर के किनारे फैली हुई जमान पार्क की संपत्ति उपहार में मिलने से काफी मदद मिली. परिवार के एक बेटे, जावेद बुर्की, और दो भांजों, मजीद खान और इमरान खान, ने पाकिस्तान की क्रिकेट टीम की कप्तानी की. मजीद के पिता जहांगीर खान ने 1932 में इंग्लैंड में भारत के पहले टेस्ट मैच में भारत के लिए खेला था. जमान पार्क में परिवार के एक और करीबी रिश्तेदार, खालिद अहमद, पाकिस्तान के सबसे प्रमुख संपादकों और कॉलम लिखने वालों में से एक बने. वह पहले पाकिस्तानी थे, जिनसे मेरी जान-पहचान हुई. यह रहा उनके निधन पर लिखा गया मेरा श्रद्धांजलि लेख.
रिटायर होने के बाद भी इमरान की सोच पर क्रिकेट ही लगभग हावी था. मैंने उनसे कई बार बात की थी, 1994 में मैंने ‘इंडिया टुडे’ के लिए उनका इंटरव्यू लिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि “हर कोई बॉल से छेड़छाड़ करता रहा है”. इस पर एलन लैंब और इयान बॉथम ने उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया था. इसके बारे में मैं इस कॉलम में भी लिख चुका हूं. बहुत कुछ ऐसा है जो मैं संदर्भ के मुताबिक लिखूंगा.
मैंने उनके विशिष्ट अतीत का जिक्र इसलिए किया क्योंकि मैं अभी भी नहीं समझ पाया हूं कि उन्होंने अपने जीवन में वह दार्शनिक, धार्मिक, वैचारिक परिवर्तन क्यों किया. उदाहरण के लिए, कश्मीर पर उनके विचार और मुनीर के विचार में कोई फर्क नहीं है. फिर भी इसने मुनीर के कोप से उनकी रक्षा नहीं की. उनका क्रिकेट ‘सेलिब्रिटी’ वाला दर्जा अब अगर उनकी कोई मदद करता है तो यह एक सुखद विरोधाभास होगा.
पोस्टस्क्रिप्ट: : इमरान का परिवार पाकिस्तान का ऐसा परिवार रहा है जिसके बारे में अनगिनत कहानियां कही गई हैं, और क्रिकेट की दुनिया में उसका नाम दूसरी वजह से भी अमर रहेगा. वह है ‘लॉर्ड्स स्पैरो’ वाली घटना. 1936 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की टीम की ओर से ऑस्ट्रेलियाई एमसीसी टीम के खिलाफ गेंदबाजी करते हुए जहांगीर खान ने जो एक गेंद डाली थी वह हवा में एक चिड़िया को लगी थी और उसकी मौत हो गई थी. उस चिड़िया के शरीर को सुरक्षित करके लॉर्ड्स के संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है.
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