scorecardresearch
Saturday, 7 February, 2026
होममत-विमतनेशनल इंट्रेस्टडियर नरेंद्रभाई: बांग्लादेश चुनाव से भारत–बांग्लादेश के रिश्तों को ‘रीसेट’ करने का मौका है

डियर नरेंद्रभाई: बांग्लादेश चुनाव से भारत–बांग्लादेश के रिश्तों को ‘रीसेट’ करने का मौका है

अगले वीकेंड तक बांग्लादेश में एक चुनी हुई सरकार बन जाएगी. यह भारत के लिए मौका है कि वह चुनाव वाले पश्चिम बंगाल और असम में ‘घुसपैठिया’ वाली भाषा को नरम करके बिगड़े रिश्तों को फिर से ठीक करे.

Text Size:

यह लेख अगस्त 2013 में इसी कॉलम में छपे उस लेख की दूसरी कड़ी है, जिसमें उस वक्त नरेंद्र मोदी से अपील की गई थी, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने थे. हमने इसे उस अपील की दूसरी कड़ी इसलिए कहा है क्योंकि इसका संदर्भ आज भी जुड़ा हुआ है. गौरतलब है कि बांग्लादेश में एक हफ्ते के भीतर चुनाव होने वाले हैं.

अगले हफ्ते के अंत तक या उसके बाद की शुरुआत में वहां एक चुनी हुई सरकार सत्ता संभाल लेगी. अवामी लीग को इस चुनाव में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी गई है, इसलिए चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल बने रहेंगे. फिर भी लोकतंत्र के पैमाने पर इसे कुछ हद तक निष्पक्ष चुनाव कहा जा सकता है. पाकिस्तान के उलट, बांग्लादेश की सेना चुनावी मैदान में नहीं है और न ही उसने किसी उम्मीदवार का समर्थन किया है. सेना प्रमुख वकार-उज़-ज़मां ने पिछले गुरुवार को सिर्फ इतना कहा कि सेना स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराने की कोशिश करेगी.

अब अगस्त 2013 में इसी कॉलम में छपे लेख की बात करें, जिसका शीर्षक था ‘डियर नरेंद्रभाई’. उस लेख में कहा गया था कि भारत और बांग्लादेश ने सीमा से जुड़ी समस्याओं, खासकर सीमा के दोनों ओर दूर-दराज इलाकों में बनी बस्तियों के मुद्दे को सुलझाने के लिए एक ऐतिहासिक समझौता किया है. ये बस्तियां दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर के बंटुस्तानों जैसी बन गई थीं, जहां किसी का सही शासन नहीं था और जो अपराध, तस्करी और आतंकवाद के ठिकाने बन गई थीं.

मोदी की पार्टी में किसी ने इस सीमा समझौते का खुलकर विरोध नहीं किया था. उस समय भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसका समर्थन भी किया था. फिर भी पार्टी ने संसद में इस पर अड़चन डाली. यह पार्टी के अंदर चल रहे सत्ता संघर्ष का नतीजा था. लेख में सवाल उठाया गया था कि क्या मोदी देशहित में अपनी पार्टी को यह समझौता मानने के लिए राज़ी करेंगे. यहां तक कि बांग्लादेश के उच्चायुक्त ने अहमदाबाद जाकर उनसे मुलाकात भी की थी और समर्थन मांगा था.

उस समय मोदी ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया और संकेत दिया कि सत्ता में आने के बाद वे इस मुद्दे को देखेंगे. प्रधानमंत्री बनने के करीब एक साल बाद, 6 जून 2015 को भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौते को मंजूरी दी गई. इसके साथ ही दोनों देशों ने समुद्री सीमा को भी तय और स्वीकार किया.

इसके लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बातचीत करनी पड़ी और उन्हें राजी करना पड़ा. असम और त्रिपुरा की भावनाओं को भी शांत करना पड़ा. इस तरह बांग्लादेश एकमात्र बड़ा पड़ोसी देश बन गया, जिसके साथ भारत ने सभी सीमा विवाद सुलझा लिए. श्रीलंका के मामले में कच्चातिवु को लेकर विवाद औपचारिक रूप से सुलझ चुका है, लेकिन भाजपा चुनाव प्रचार में इसे अब भी उठाती रहती है. बांग्लादेश के साथ भूमि सीमा समझौता मोदी सरकार के करीब 12 वर्षों के कार्यकाल की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता है. यह इसलिए भी अहम है क्योंकि यह समझौता उस समय हुआ, जब पड़ोसी देशों से रिश्ते तनावपूर्ण थे और नेपाल भारत पर उकसाऊ भूमि दावे कर रहा था.

कई मायनों में इसे मोदी की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक माना जा सकता है. यह इस बात का भी सबूत है कि वे बड़ी तस्वीर देखने में कितने व्यावहारिक हो सकते हैं. इसके बावजूद, खासकर पूर्वी राज्यों में भाजपा की राजनीति लंबे समय से अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों या अब कहे जाने वाले ‘घुसपैठियों’ के मुद्दे पर केंद्रित रही है. यह मुद्दा पश्चिम बंगाल के दो विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में काफी गरम रहा, लेकिन फिर भी मोदी इस समझौते पर डटे रहे.

यह वह वक्त था जब उनकी पार्टी इस मुद्दे पर तीखी भाषा इस्तेमाल कर रही थी और इसे जनसंख्या का स्वरूप बदलने की साजिश बता रही थी. पूर्व ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ बिपिन रावत जैसे कुछ लोगों ने तो जर्मनी के नाजी दौर के ‘लेबेन्स्राउम’ जैसे विस्तारवादी विचारों की भी बात की थी. हिटलर ने इस शब्द का इस्तेमाल अपनी किताब ‘मीन काम्फ’ में किया था, जिसमें उसने पड़ोसी देशों में जर्मनों को बसाकर भौगोलिक विस्तार की बात कही थी.

करीब एक दशक पहले जैसी स्थिति थी, आज हम इतिहास के उसी तरह के एक मोड़ पर खड़े हैं. फर्क बस इतना है कि 2014 की तुलना में आज रणनीतिक असर और संभावनाएं कहीं ज्यादा बड़ी हैं. बांग्लादेश में चुनाव पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों से कुछ महीने पहले हो रहे हैं. यह एक तरह से अच्छा मौका है, क्योंकि अभी ‘घुसपैठिया’ वाला नारा बहुत तेज़ नहीं हुआ है.हालांकि, प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अपने भाषण में इसका ज़िक्र ज़रूर किया है.

इसी बीच सोशल मीडिया और कई टीवी चैनलों पर बांग्लादेश के खिलाफ काफी नकारात्मक बातें कही जा रही हैं. चूंकि, बांग्लादेश के चुनाव पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों के ठीक बाद नहीं हो रहे हैं, इसलिए मोदी सरकार के पास हालात को सामान्य बनाने और संतुलन की ओर लौटने का मौका है. हालांकि, शेख हसीना के दौर जैसा रिश्ता फिर से बन पाना अब संभव नहीं दिखता.

यह समय ढाका में भारत की पसंद के नेता को नकारे जाने, या मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार द्वारा विदेश नीति में किए गए बड़े बदलावों को लेकर नाराज़गी दिखाने का नहीं है. यूनुस पिछले डेढ़ साल से पाकिस्तान को खुश करने की कोशिश करते रहे हैं और कई उकसाऊ कदम उठाए गए हैं. उदाहरण के तौर पर, भारत को चिढ़ाने के लिए पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों को बुलाया गया. उनकी सरकार ने बड़े हथियार खरीदने की बात की और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों यानी ‘सात बहनों’ को लेकर भी भड़काऊ बयान दिए. उन्होंने शेख हसीना को भारत में शरण दिए जाने को समझौता तोड़ने वाला कदम बताया. बांग्लादेश के नज़रिए से यह दूरदर्शिता की कमी दिखाता है और भारत के लिए उकसाने वाला है. अच्छी बात यह है कि यूनुस को एक हफ्ते के भीतर चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंपनी होगी, जब तक कोई चमत्कार न हो जाए. इसी मोड़ की बात पहले की गई थी.

खालिदा ज़िया के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर को भेजकर भारत ने एक व्यावहारिक कदम उठाया. उन्होंने उनके बेटे और बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) के अध्यक्ष तारिक रहमान से भी मुलाकात की. अब तक रहमान एक समझदार नेता के रूप में सामने आए हैं.

सच्चाई यह है कि कोई नहीं जानता कि चुनाव कौन जीतेगा या किसी को साफ बहुमत मिलेगा या नहीं. अब तक के जनमत सर्वेक्षणों में तारिक रहमान और बीएनपी को बढ़त दिखाई गई है. प्रतिष्ठित अखबार ‘प्रोथोम आलो’ के सर्वे के मुताबिक 83 प्रतिशत बांग्लादेशी बेरोज़गारी को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं. 77 प्रतिशत का कहना है कि कारोबार के लिए माहौल ठीक नहीं है और 35 प्रतिशत लोग देश की आर्थिक स्थिति से निराश हैं.

इस्लामीकरण या कट्टर राष्ट्रवाद यानी भारत-विरोध के प्रति खास झुकाव नहीं दिखता. आम जनता का मूड भारत के खिलाफ ज़रूर है, खासकर हसीना के मुद्दे को लेकर, लेकिन सबसे अहम बात यह है कि 54 प्रतिशत लोगों को उम्मीद है कि नई सरकार सामाजिक और धार्मिक सहिष्णुता को बहाल करेगी.

‘प्रोथोम आलो’ के अगले सर्वे ‘पीपुल्स इलेक्शन सर्वे’ के अनुसार, 47 प्रतिशत लोग तारिक रहमान को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं, जबकि सिर्फ 22.5 प्रतिशत लोग जमात-ए-इस्लामी के शफीकुर रहमान को प्रधानमंत्री के रूप में पसंद करते हैं. इससे जमात को मिलने वाले समर्थन का स्तर साफ होता है. कुछ ताकतें, जिनमें यूनुस भी शामिल हो सकते हैं, त्रिशंकु संसद चाहेंगी ताकि जमात को शामिल कर सरकार बनाई जा सके. कुछ लोग ‘जुलाई चार्टर’ (2025) के तहत अधिक अधिकारों वाले राष्ट्रपति की भी मांग कर रहे हैं, जिस पर इस चुनाव के साथ ही जनमत संग्रह होगा.

इस चार्टर के अनुसार, सीधे मतदान से चुना गया निचला सदन आनुपातिक आधार पर ऊपरी सदन का चयन करेगा. दोनों सदन मिलकर गुप्त मतदान से राष्ट्रपति चुनेंगे, जिसमें पार्टी व्हिप नहीं होगा. राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री से कुछ ज्यादा निगरानी अधिकार दिए जाएंगे. 85-वर्षीय यूनुस शायद सोच रहे होंगे कि काश वे दस साल छोटे होते. बीएनपी ने पिछले शुक्रवार को जारी अपने चुनाव घोषणापत्र में इन राष्ट्रपति अधिकारों को खारिज कर दिया है. जुलाई चार्टर पर हुई बैठकों में भी पार्टी ने यही रुख अपनाया था. अगर बीएनपी को बहुमत मिल गया तो यह मुद्दा खत्म हो जाएगा.

सबसे अहम बात यह है कि न बीएनपी और न ही जमात ने पाकिस्तान के बारे में कुछ कहा है. जमात भारत के साथ दोस्ताना रिश्ते की बात करती है और बीएनपी सबके साथ आपसी सम्मान पर आधारित संबंध चाहती है. यह एक सकारात्मक संकेत है. भारत के खिलाफ तीखी बातें सिर्फ नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (एनसीपी) करती है, जिसमें छात्रों का दबदबा है और जिसने आंदोलन का नेतृत्व किया था. यह जमात से जुड़ी है, लेकिन इसकी स्वीकार्यता सिर्फ 2 प्रतिशत है.

इस तरह एक रहस्यमय चुनावी माहौल बन चुका है, जिसमें भारत के लिए भी संभावनाएं मौजूद हैं. यह नरेंद्र मोदी को बांग्लादेश के साथ रिश्तों को नए सिरे से शुरू करने का मौका देता है. पश्चिम बंगाल और असम के आने वाले चुनावों को देखते हुए यह एक चुनौती भी है. इसलिए मोदी से वही अपील दोहराई जा रही है जो 2013 में की गई थी. क्या आप भारत के पूरब में रणनीतिक स्थिरता वापस लाने के लिए यह दिखाएंगे कि आपका दिल सच में बड़ा है? इसका मतलब होगा कि इन राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान बांग्लादेश-विरोधी भाषा को नरम रखा जाए. या फिर क्या हम अपने पूरब में एक बांग्ला-भाषी पाकिस्तान बनने देने को तैयार हैं?

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: साल के अंत में राष्ट्रीय हित का कबूलनामा: फौज–इस्लाम का मेल लोकतंत्र को खत्म नहीं करता


 

share & View comments