News on Reservation
चित्रण : सोहम सेन
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गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात कोई नई नहीं है. हां, इस पर चर्चा करने की परिस्थितियां अलग-अलग ज़रूर रही है. ऐसी कोशिशें पहले भी हो चुकी हैं. ज़ाहिर है, सवर्ण आरक्षण बिल अब संसद के दोनों सदनों में पास हो चुका है तो इस पर विस्तार से बात होनी ही है.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की जोड़ी हताश नज़र आ रही थी. मोदी सरकार को एससी/एसटी के मुद्दे पर भी अध्यादेश लाना ही पड़ा. जहां एक तरफ राम मंदिर और दूसरी तरफ एससी/एसटी से संबंधित मुद्दों पर मोदी बुरी तरह घिर चुके थे, वहीँ राफ़ेल का मुद्दा उनके गले की हड्डी बन चुकी है. भारत की आम जनता तक विपक्षी पार्टियों ने यह नारा पहुंचा दिया है कि चौकीदार ही चोर है. यही वह राजनीतिक परिस्थिति है, जिसमें नरेंद्र मोदी ने सवर्ण आरक्षण का फैसला किया.

राहुल और गडकरी: दो ‘ब्राह्मणों’ के बीच घिरे मोदी

मोदी सरकार के अपने ही मंत्री नितिन गडकरी ने दो टूक शब्दों में मोदी की निंदा शुरू कर दी थी. खासकर सरकार की उपलब्धियों को लेकर आलोचनाएं सामने आने लगी थीं. हद तो तब हो गई, जब नितिन गडकरी को आरएसएस की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की ख़बर राफ़ेल से भी अधिक गति से चारों तरफ उड़ने लगी थी. उधर विपक्ष के तरफ से राहुल गांधी की छवि को लोग राजनीति में आकर्षक मानने लगे हैं. मोदी ने राहुल गांधी पर जातिगत प्रहार करके उन्हें मजबूर कर दिया कि वे मंदिर-मंदिर घूमें और जनेऊ दिखाकर खुद को ब्राह्मण साबित करें. वे इस काम में काफी हद तक कामयाब भी हो चुके हैं. मतलब सीधा है कि प्रधानमंत्री मोदी और शाह की जोड़ी दो ब्राह्मणों –गडकरी और राहुल के राजनीतिक चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस चुकी थी.

जनरल कटेगरी सिर्फ सवर्णों के लिए नहीं है

मोदी-शाह के लिए आवश्यक था कि आनन-फानन में एक ऐसा मुद्दा उछाला जाए जिससे राफेल के मुद्दे से देश की जनता का न सिर्फ ध्यान भटकाए बल्कि सवर्ण मतदाताओं की नाराज़गी भी दूर की जाए. ज़ाहिर है, आरक्षण से अच्छा मुद्दा और हो भी क्या सकता था? वो भी तब, जब सवर्ण को जनरल या ओपन कटेगरी से काटकर आरक्षण देना हो. मोदी को आरक्षण के स्वरुप की ज़मीनी समझ है. वे जानते हैं कि सौ प्रतिशत सीटों में सिर्फ 49.5 ही जातिगत आधार पर है. शेष सब सामान्य यानी ओपन कटेगरी में है.


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जनरल कटेगरी को लोग अक्सर सामान्य या अनारक्षित नहीं समझते. जनरल सीटों को सवर्णों के लिए आरक्षित मान लिया जाता है. इसी भ्रम के कारण आए दिन न्यायालयों में यह मामला पहुंच जाता है कि जातिगत आरक्षण पाने वाले लोगों को सामान्य या अनारक्षित कोटे में स्थान मिल सकता है या नहीं. यह स्पष्ट है कि जनरल कटेगरी अनारक्षित है, फिर भी सवर्ण हमेशा से इसका विरोध करते आए हैं.

सवर्णों द्वारा अनारक्षित कटेगरी में प्रवेश में बाधा उत्पन्न किए जाने के कारण अवर्णों के बीच 85 और 15 प्रतिशत जनसंख्या के आधार पर आरक्षण की बात चलती रहती है. चूंकि मोदी काफी नीचे से होते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं, अतः उन्हें यह भान था कि अनारक्षित कोटे से अगर सवर्णों को आरक्षण देने का प्रस्ताव लाया जाए तो अवर्ण जातियां विरोध नहीं कर पायेंगी क्योंकि उनके दिमाग में तो ये पहले से है कि अनारक्षित सीट सवर्णों के लिए हैं. दूसरी ओर, चुनाव नज़दीक होने के कारण कोई राजनीतिक दल भी विरोध नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा करने पर इस बात की गारंटी है कि सवर्ण उनसे नाराज़ हो जाएंगे. लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि एससी-एसटी-ओबीसी उनके साथ आएगा.

इसी परिस्थिति में मोदी ने प्रचंड बहुमत की ताकत से वो बिल पारित करा लिया, जिसे लेकर देश में जातिगत हिंसा भड़कने का भय अभी तक बना हुआ था.

सपा और बसपा को चाहिए सवर्णों का साथ

दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश में राजनीति में सवर्णों के प्रभुत्व को देखते हुए लंबे समय से बसपा जैसी मज़बूत पार्टी भी लगातार सवर्णों को आरक्षण देने की बात कर रही थी. सपा भी सवर्णों को लुभाने का प्रयास करती रही है. यह सार्वजनिक तथ्य है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा दलित-ब्राह्मण गठजोड़ को दर्शाती है तो सपा यादव-राजपूत गठजोड़ को. ध्यान देने योग्य बात है कि चंद्रबाबू नायडू ने हाल ही में बेरोज़गार ब्राह्मणों को फोरव्हीलर देने की घोषणा भी कर चुके हैं.

इन सारे बिंदुओं को ध्यान में रखकर अगर हम सोचें तो पाएंगे कि चौतरफा घिरे प्रधानमंत्री मोदी के पास सवर्णों को आरक्षण देने जैसे चमत्कार के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था. मोदी सरकार के पांच वर्षों में दलित, पिछड़े और आदिवासियों के सम्मानजनक अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है, जिससे मोदी की साख कमज़ोर हुई है. इससे सपा-बसपा-आरजेडी जैसी पार्टियों को ताकत मिली है. वहीं दूसरी तरफ, सवर्णों के तुष्टिकरण के लिए राहुल गांधी और नितिन गडकरी खुलकर सामने आ चुके हैं.

ऐसे में गरीबी के आधार पर सवर्णों को आरक्षण देकर मोदी ने अपनी साख को मज़बूत बनाने की कोशिश की है.

यह अलग बात है कि मोदी ने आरक्षण की मूल भावना की अनदेखी की है. भारत में आरक्षण का आधार कभी भी गरीबी उन्मूलन का नहीं रहा है.


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यह ध्यान देने की बात है कि जाति विमर्श के भीतर के जिन प्रश्नों पर सपा और बसपा को बात करनी चाहिए थी उस पर भाजपा अपनी राजनीति चमका रही है. बहरहाल, भारत में जाति और आर्थिक स्थिति समाज के दो ऐसे आयाम हैं जो आपस में कभी नहीं मिलते. जातिगत भेदभाव का गरीबी से सीधे रूप में कोई लेना देना नहीं है. लेकिन सामान्य लोगों को गरीबी का तर्क ज़्यादा आकर्षित करता है. क्योंकि जातिगत दुर्भावना समाज के सिर्फ एक पक्ष को प्रभावित करती है जबकि गरीबी दोनों पक्षों को. भारत में आज तक जातिगत आरक्षण पाने वालों को भी गरीबी का तर्क ज़्यादा आकर्षित करता रहा है. चिराग पासवान का आरक्षण पर गैर ज़िम्मेदाराना बयान कि अमीर दलितों को आरक्षण छोड़ देना चाहिए इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इतना ही नहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो बहुत पहले ही ‘सवर्ण आयोग’ तक की नींव डाल चुके हैं.

यही कारण है कि मोदी ने डिमोनीटाईजेशन की तरह अपने राजनीतिक जीवन में एक और इतिहास (चाहे अच्छा या बुरा) अपने नाम कर लिया. लोकसभा और राज्यसभा में पास होने के बाद, अब सवर्ण आरक्षण बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा. ज़ाहिर है कि राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत और हस्ताक्षरित होने में बाधा और देरी का कोई कारण नहीं है. जब तक यह सब होगा, तब तक लोकसभा चुनाव, जिसके मद्देनज़र मोदी ने इतना बड़ा जोखिम मोल ले लिया है, और करीब आ चुका होगा.

भाजपा की विपक्षी पार्टियों के लिए संसद में जहां एक तरफ यह सबसे बड़ी हार साबित हुई है, वहीं दूसरी ओर उनके सामने अपनी असली राजनीति की तरफ लौटने की मजबूरी भी होगी. सपा, बसपा, आरजेडी जैसी पार्टियां अपनी मूल राजनीति से इस बीच काफी दूर हो चुकी हैं.

मोदी की राजनीति के केंद्र में वापसी

इन तमाम परिस्थितियों में, सबसे बड़ा सच यह है कि देश की जनता और राजनीति के केंद्र में मोदी ने फिर से एकबार वापसी की है, जो पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में हार और राफ़ेल मुद्दे के बाद गायब हो रही थी. प्रधानमंत्री मोदी को उम्मीद है कि सवर्णों को गरीबी के आधार पर आरक्षण देकर वे उनके चहेते नेता के रूप में फिर से सरकार में धमाकेदार वापसी करेंगे. यह अलग बात है कि भारत के पिछले पचास वर्षों की राजनीतिक इतिहास कुछ और ही दास्तां बयान कर रही है. आरक्षण पर बड़े फैसले करने वाली कई सरकारों को चुनाव में कामयाबी नहीं मिल पाई है. वीपी सिंह चुनाव हार गए थे. यूपीए-2 ने चुनाव से पहले जाट आरक्षण दिया और पूरे जाट इलाकों में चुनाव हार गई.

अब देखना है कि क्या मोदी इतिहास के नतीजे जानते हुए भी 2019 के लोकसभा चुनाव में इतिहास के रूख को मोड़ने में सफल हो पाएंगे? चाहे जो भी हो, प्रधानमंत्री मोदी हर हालत में इतिहासपुरुष ही साबित होंगे!

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं.)


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