Thursday, 11 August, 2022
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एलएसी पर टकराव को लेकर मोदी की चुप्पी चीन को ही फायदा पहुंचा रही है, भारत को अपना रुख बदलना होगा

पूर्वी लद्दाख में अभी टकराव बना रह सकता है. दोनों पक्षों ने ’कदम थोड़ा पीछे खींच कर' पहल कर दी है, जिसका अर्थ यह होगा कि अब हाथापाई और धक्कामुक्की शायद नहीं होगी. लेकिन सरकार के लिए अभी रास्ता लंबा है इसलिए उसे अपने राजनीतिक और फौजी लक्ष्य स्पष्ट कर लेने चाहिए

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भारत-चीन के बीच लेफ्टिनेंट जनरलों के स्तर पर चुशूल में 6 जून को जो बातचीत हुई वह, भारतीय विदेश मंत्रालय से मिले संकेतों के अनुसार, किसी नतीजे पर पहुंचे बिना निराशाजनक ढंग से समाप्त हो गई. इसके बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हालात में नाटकीय परिवर्तन आ गया है. 9 जून को शाम 4.52 पर ‘एएनआइ’ ने, जो सरकारी सूत्रों के हवाले से खबरें देने में हमेशा आगे रहता है, ट्वीट किया—’आला सरकारी सूत्रों ने एएनआइ को बताया है कि भारत और चीन ने पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में कई स्थानों पर आपसी टकराव खत्म कर दिया है. गलवान क्षेत्र, गश्ती प्वाइंट15 और हॉट स्प्रिंग इलाके में चीनी सेना ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ ने अपने सैनिकों और इन्फैन्ट्री कंबैट वाहनों को ढाई किलोमीटर पीछे कर लिया है. भारत ने भी अपनी सेना को पीछे कर लिया है.’

विदेश मंत्रालय द्वारा सोमवार को जारी प्रेस रिलीज के एकदम विपरीत एएनआइ ने टकराव खत्म होने के लिए लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ताओं को श्रेय दिया है. विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने 7 जून को कहा था कि ‘अभी बहुत फासला तय करना बाकी है और हालात को सामान्य बनाने के लिए छोटे-छोटे कदम उठाने की जरूरत है.’


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‘भारतीय सेना के टॉप सूत्रों’ के द्वारा ब्रीफिंग

जाहिर है कि ‘भारतीय सेना के टॉप सूत्रों’ ने कोर कमांडर स्तर की बातचीत के नतीजों के आधार पर एक सूचना पत्रकारों के बीच मंगलवार को बांट दी. चर्चा यह है कि यह ‘टॉप सूत्र’ दिल्ली में तैनात एक आला मिलिटरी कमांडर है. भले ही यह ब्रीफ़ अनधिकृत हो और बाद में भले इसका खंडन किया जा सकता हो, लेकिन चूंकि यह ताज़ा स्थिति पर पहला सरकारी/सैन्य ब्रीफ़ है, इसलिए इसके ब्योरों को रेखांकित करना उपयुक्त होगा—

  • शनिवार को कोर कमांडर स्तर की बातचीत के बाद दोनों पक्ष ‘थोड़ा-थोड़ा पीछे’ हट गए हैं. फौजी टकराव को खत्म करने की यह कुछ असामान्य किस्म की सूचना है.
  • टकराव के इन पांच क्षेत्रों की पहचान की गई है—गश्ती प्वाइंट 14,15 (गलवान नदी), 17 (हॉट स्प्रिंग), पैंगोंग त्सो का उत्तरी किनारा, और चूसुल. चूसुल का नाम अभी तक सबके सामने नहीं आया था.
  • अगले 10 दिनों में चार स्थलों पर छोटे कमांडरों की कई वार्ताएं करने की योजना है. सभी हॉट लाइन सक्रिय हैं.
  • कोर कमांडर स्तर की बैठकें सालाना/ या साल में दो बार करने की योजना बन रही है.
  • सेना ने जिस तेजी से मजबूत जवाब दिया उससे जाहिर है कि खुफियागीरी के स्तर पर चूक नहीं हुई.
  • सेना मुख्यालय सेना और कोर कमांडर के काम से संतुष्ट है.
  • चीनी सेना का फौज और साजोसामान के स्तरों पर बराबरी से जवाब दिया गया. चीन अगर पीछे नहीं हटता तो भारतीय सेना ‘लंबे समय के लिए या स्थायी तैनाती’ के लिए तैयार है.
  • असली मसला यह है कि एलएसी पर फैसला नहीं हुआ है. जब तक यह नहीं होता, छिटपुट समस्याएं उभरती रहेंगी.
  • सूत्रों ने ज़ोर देकर कहा कि फिलहाल बड़ा मुद्दा अग्रिम मोर्चे से वापसी ही नहीं है, बल्कि पीछे के क्षेत्रों में भारी फौजी जमावड़ा भी है. चीन ने एलएसी पर और उससे कुछ किलोमीटर हट कर बमवर्षक विमान, रॉकेट, डिफेंस रडार, जैमर आदि भी तैनात कर दिए हैं. चीन जब तक अपना जमावड़ा नहीं हटाता तब तक भारत भी अपने बड़ी तैनाती जारी रखेगा.

चीनी विदेश मंत्री के प्रवक्ता हु चुन्यिंग ने बुधवार को कहा, ‘चीन और भारत के राजनयिक और फौजी महकमों ने सीमा पर हालात को लेकर प्रभावी संवाद किया और सकारात्मक आपसी सहमति पर पहुंचे.’

इसके ठीक विपरीत दूसरी रिपोर्टें एकदम उलटा दृश्य प्रस्तुत करती हैं और संकेत देती हैं कि चीनी तौरतरीका उग्र और हठीला था.

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शुरुआती तनावमुक्ति बेशक नरेंद्र मोदी सरकार की सैन्य एवं कूटनीतिक सफलता है और यह अप्रैल 2020 वाली स्थिति की बहाली का रास्ता साफ करेगी. लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के संकट से निबटने में सरकार और सेना के तौरतरीके को लेकर परेशान करने वाला सवाल भी उभरता है. क्या राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पर घटनाओं से निबटने के लिए भारत को ‘अज्ञात अधिकृत सूत्रों’ की ओर से फैलाई गई कहानियों पर निर्भर रहने को मजबूर कर दिया गया है, जिससे अटकलों को बढ़ावा मिल रहा है? मोदी सरकार ने पिछले 6-8 हफ्तों से जिस तरह की कर्णभेदी चुप्पी साध रखी है उसके कारण यह संदेह ज़ोर पकड़ रहा है कि क्या टकराव खत्म करने के लिए भारत को कोई कीमत चुकानी पड़ी है? चीन पहल करके जिस तरह हावी था, उसे देखते हुए सवाल उठता है कि भौगोलिक क्षेत्र, फौज की तैनाती और सीमा पर इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के मामलों में हमने कितनी रियायत दी है?

मेरा तो मानना है कि एलएसी पर टकराव अभी कतई खत्म नहीं हुआ है. राष्ट्रीय सुरक्षा के संकट से कैसे निबट रही है सरकार इस संकट का शुरू में ‘खंडन’ किया गया और राजनीतिक घालमेल की कोशिश की गई, लेकिन चीन की घुसपैठ और इसके साथ एलएसी पर फौजी कार्रवाइयों की खबरें अब जगजाहिर हो चुकी हैं. ऐसा लगता है कि इसके राजनीतिक नतीजों का भूत सरकार पर बहुत हावी हो चुका है, लेकिन उसे इस तरह के अपने रुख के खतरों का अंदाजा नहीं है.

सीमा पर प्रबंधन को लेकर तमाम समझौतों और निरंतर राजनयिक संवादों के बावजूद चीन एलएसी को रेखांकित करने से मना करता रहा है. इसके लिए ‘धारणाओं में अंतर’ का जो बहाना बनाया जाता रहा है वह जांच में खरा नहीं उतरता. गलवान नदी, हॉट स्प्रिंग और पैंगोंग त्सो क्षेत्रों में चीन ने एलएसी के पास अपनी सेना तैनात कर दी है और वह हमें एलएसी के पास गश्त लगाने में बाधा डालता रहा है.

एलएसी पर सैनिक स्थिति के बारे में कोई औपचारिक बयान नहीं दिया गया है. हम एक ही दुष्चक्र में फंसते दिख रहे हैं. चीनी कारवाई हमें रणनीतिक और सामरिक स्तरों पर अचानक हैरत में डालती है, हम कहीं ज्यादा ताकत के साथ जवाबी कार्रवाई करते हैं, यह कभी कबूल नहीं किया जाता कि ठीक किस जगह कितनी घुसपैठ की गई है, सेना और कूटनीति के स्तरों पर क्या संवाद हुआ और क्या रियायतें दी गईं यह कभी सार्वजनिक नहीं किया जाता, और जब संकट फिर आता है तब हम बिना कोई सबक सीखे फिर उसी दुष्चक्र को दोहराते हैं.

पिछले सात वर्षों में देस्पांग (2013), चूमर (2014), डोकलम (2017) और अब पूर्वी लद्दाख में भी यही सब दोहराया गया है. डोकलम तो एक मिसाल ही है. हमने वहां अपनी जीत की घोषणा कर दी. लेकिन आज पीएलए जंफेरी रिज को छोड़कर पूरे डोकलम पठार पर छायी हुई है. ‘वुहान भावना’ का यही हासिल है.

जाहिर है, राष्ट्रीय सुरक्षा को घरेलू राजनीति से अलग रखना बेहद जरूरी है.


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चीन के राजनीतिक और फौजी लक्ष्य

लद्दाख में एलएसी पर जारी संकट के इस दौर में चीन के राजनीतिक और फौजी लक्ष्यों को समझना बहुत जरूरी है. उसका राजनीतिक लक्ष्य अनिश्चित सरहद—अस्पष्ट एलएसी—का फायदा उठाकर सरहद पर घटनाओं को अंजाम देते हुए भारत पर अपना वर्चस्व जताते रहना और उसे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में अपना राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक प्रतिस्पर्द्धी बनने से रोकना है, खासकर चीन-पाकिस्तान एकोनोमिक कॉरीडोर (सीपीईसी), दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक मामले में. ऐसा करते हुए भारत को अपनी सीमा पर इन्फ्रास्ट्रक्चर को सुधारने से रोकना भी है ताकि वह अकसाई चीन और दूसरे कमजोर इलाकों पर दावा न कर पाए.

चीन का सैन्य लक्ष्य सीमा पर तनाव बनाए रखना और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उन इलाकों पर कब्जा करके भारत से उनका संपर्क तोड़ना है ताकि वह अकसाई चीन और दूसरे कमजोर इलाकों के लिए खतरा न बने. भारत की जवाबी कार्रवाई को देखते हुए वह पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे से लेकर डेमचोक और चूमर क्षेत्र पर कब्जे के लिए छोटी-छोटी फौजी कार्र्वाइयां कर सकता है. इस क्षेत्र में काराकोरम से लेकर श्योक नदी, पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे से लेकर कैलास पर्वत में डेमचोक और चूमर तक का इलाका आता है. इस पर कब्जा करने के बाद नुबरा घाटी और सियाचीन ग्लेसियर भी खतरे में पड़ जाएगा और चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर गिलगिट में सीपीईसी को खतरे से मुक्त कर लेगा.


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देश को भरोसे में लें

मेरे ख्याल से, पूर्वी लद्दाख में खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है. लद्दाख में कार्रवाई का मौसम नवंबर के आखिर तक रहता है इसलिए टकराव बना रह सकता है. वैसे, दोनों पक्षों ने ‘कदम थोड़ा पीछे खींच कर’ शुरुआती पहल कर दी है, जिसका अर्थ यह होगा कि अब हाथापाई और धक्कामुक्की शायद नहीं होगी. लेकिन मैं सरकार से यही कहूंगा कि अभी रास्ता लंबा है इसलिए उसे अपने राजनीतिक और फौजी लक्ष्य स्पष्ट कर लेने चाहिए. वह एलएसी की पवित्रता बहाल करने और अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति बहाल करने की कोशिश करे. ‘टॉप सैनिक सूत्रों’ के अंतिम दो मुद्दे इसी विचार का समर्थन करते हैं.

वर्तमान संकट में, मोदी सरकार और सेना ने अपनी साख गंवाई है और मनोवैज्ञानिक द्वंद्व में हार मानते हुए चीन के दावे को ही मजबूत किया है. उसने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को भी गलत संदेश दिया है.. खुली खुफियागीरी और मोबाइल फोन के साथ लैस ‘फौजी पत्रकारों’ के इस दौर में खंडन और बहाने नहीं चल पाएंगे.

मोदी सरकार सुरक्षा का ख्याल रखते हुए संसद और देश को भरोसे में ले. प्रधानमंत्री के लिए बेहतर यही होगा कि वे राष्ट्र को संबोधित करें, और सेना के प्रवक्ता सप्ताह में एक या दो बार औपचारिक ब्रीफिंग किया करें.

(ले. जनरल एच.एस. पनाग पीवीएसएम, एवीएसएम (से.नि.) ने भारतीय सेना की 40 साल तक सेवा की. वे उत्तरी कमान और सेंट्रल कमान के जीओसी-इन-सी रहे. सेवानिवृत्ति के बाद वे आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य रहे. ये उनके निजी विचार हैं)

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