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Tuesday, 17 February, 2026
होममत-विमतदिल्ली ब्लास्ट में पाकिस्तान लिंक से लेकर PM केयर्स तक—जानकारी देने में मोदी सरकार की बढ़ती हिचक

दिल्ली ब्लास्ट में पाकिस्तान लिंक से लेकर PM केयर्स तक—जानकारी देने में मोदी सरकार की बढ़ती हिचक

मोदी सरकार सच को सीमित रखने की प्रवृत्ति वाली पहली सरकार नहीं है. बस यह ज्यादा सतर्क और जानकारी देने में ज्यादा सावधान है.

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10 नवंबर 2025 को लाल किले के पास कार धमाके में 15 लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने के दो दिन बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पास किया. इसमें कहा गया कि यह आतंकी घटना “राष्ट्र-विरोधी ताकतों” ने की. इसमें किसी विदेशी देश की भूमिका या सीमा-पार आतंकवाद का कोई ज़िक्र नहीं किया गया.

ऑपरेशन सिंदूर को सिर्फ रोका गया था. यह अभी खत्म नहीं हुआ है और पीएम मोदी पहले ही आतंकवादियों के लिए एक रेड लाइन ड्रॉ कर चुके थे. देश को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में न्यू नॉर्मल है. पीएम ने कहा कि अगर भारत पर कोई आतंकी हमला होता है, तो उसका करारा जवाब दिया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि भारत आतंकवाद करने वालों और उन्हें समर्थन देने वालों के बीच कोई फर्क नहीं करेगा.

तीन महीने बाद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की काउंटर-टेररिज्म सैंक्शन मॉनिटरिंग टीम ने खुलासा किया कि पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) का लाल किला धमाके से “जुड़ा होना बताया गया” है.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने संकेत दिया कि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भारत की ओर से दी गई जानकारी पर आधारित थी. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में पाकिस्तान स्थित संगठन का लिंक होने पर पूछे गए सवाल के जवाब में जायसवाल ने कहा, “हमने देखा है कि उन्होंने सीमा-पार आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को मजबूत करने के हमारे सुझावों को शामिल किया है.”

यह बात भारतीयों के लिए खबर के रूप में सामने आई. उन्हें पाकिस्तान की भूमिका के बारे में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट से पता चला. कैबिनेट के प्रस्ताव में “राष्ट्र-विरोधी ताकतों” का ज़िक्र होने के बाद, पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन की भूमिका पर कोई आधिकारिक और स्पष्ट बयान लोगों को नहीं बताया गया था.

जैसा कि पीएम मोदी ने साफ कहा था, भारत अब आतंक करने वालों—इस मामले में जैश-ए-मोहम्मद और उन्हें समर्थन देने वालों—पाकिस्तान—के बीच फर्क नहीं करता. सवाल यह है: भारतीयों को इसके बारे में संयुक्त राष्ट्र से क्यों पता चलना चाहिए? सरकार के अंदर ज़रूर इस पर चर्चा हुई होगी कि क्या जैश-ए-मोहम्मद के इस हमले से, जिसमें 15 लोग मारे गए, पाकिस्तान ने पीएम मोदी की लाल रेखा पार की थी. सरकार के पास संयुक्त राष्ट्र को जानकारी देने के अपने कारण रहे होंगे, लेकिन उसने यह जानकारी अपने देश के लोगों से साझा नहीं की.

सरकार से कोई जवाब नहीं

जब राष्ट्रीय सुरक्षा की बात आती है, तो लोग सरकार के जवाब देने के तरीके पर पूरा भरोसा करते हैं. उन्हें जिज्ञासा हो सकती है, लेकिन वो सवाल नहीं पूछते. याद कीजिए, 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद हुई सर्वदलीय बैठक में जब पीएम मोदी ने किसी भी चीनी घुसपैठ से इनकार किया था, तब कांग्रेस ने इसकी आलोचना की थी.

विपक्ष उस समय पीएम के इस इनकार को मुद्दा नहीं बना सका, जो उस समय विदेश मंत्रालय (MEA) के रुख के विपरीत था क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के संकट के समय लोग हमेशा मजबूती से सरकार के साथ खड़े रहते हैं, लेकिन, अगर लोगों को लाल किला धमाके में पाकिस्तान की भूमिका के बारे में संयुक्त राष्ट्र से पता चलता है, तो उन्हें निराशा हो सकती है.

मैं इसे इतना बड़ा मुद्दा नहीं मानूंगा. हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि सरकार हमेशा वह जानकारी नागरिकों के साथ साझा करे, जिसे वह संवेदनशील मानती है. असली चिंता की बात यह है कि सरकार का “जानकारी ब्लैकआउट” करने का रुझान अब उन मामलों में भी बढ़ता जा रहा है, जिनका राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई संबंध नहीं है.

जैसा कि द इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया, आप प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के उस पत्र को कैसे समझाएंगे, जो लोकसभा सचिवालय को भेजा गया था, जिसमें कहा गया था कि पीएम केयर्स फंड, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष और राष्ट्रीय रक्षा कोष से जुड़े सवाल स्वीकार नहीं किए जा सकते.

आखिर सरकार इन फंड्स के बारे में जानकारी क्यों रोकना चाहती है—वह भी सांसदों से? यह तर्क कि ये संस्थाएं सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं, सही नहीं लगता. वैसे भी, कौन-सा सवाल स्वीकार किया जाएगा, यह फैसला सरकार नहीं, बल्कि लोकसभा स्पीकर को करना चाहिए.

और क्या आपने सोचा है कि सरकार संवैधानिक रूप से ज़रूरी डिप्टी स्पीकर का पद क्यों नहीं भर रही है? यह पद मई 2019 से खाली है. परंपरा के अनुसार यह पद विपक्ष को दिया जाता था, लेकिन यह संविधान में ज़रूरी नहीं है. लोकसभा में विपक्ष और स्पीकर के बीच बढ़ते भरोसे की कमी को देखते हुए, यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. इस पर सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया है.

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को याद कीजिए, जिसके बारे में सरकार ने कहा था कि इससे राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता आएगी, लेकिन असल में यह ठीक उल्टा था. इसका मकसद लोगों को दान देने वाली कंपनियों और पैसा पाने वाली पार्टियों की पहचान की जानकारी से दूर रखना था. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इसे “असंवैधानिक और साफ तौर पर मनमाना” बताते हुए रद्द कर दिया और कहा कि यह लोगों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन है. सरकार ने इस योजना को बचाने के लिए देश के बड़े-बड़े वकीलों को खड़ा किया था. अब भारतीयों को कभी पता नहीं चलेगा कि इस योजना के खत्म होने से पहले पार्टियों को हज़ारों करोड़ रुपये देने वाले दानदाताओं और उन पार्टियों के बीच कोई सौदा हुआ था या नहीं.


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जानकारी साझा करने में बढ़ती हिचकिचाहट

पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित किताब को लेकर चल रहे विवाद के बीच, कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि केंद्र सरकार एक प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जिसमें रिटायर सरकारी अधिकारियों के लिए किताब लिखने से पहले 20 साल का कूल-ऑफ पीरियड लागू किया जा सकता है. इसमें सिर्फ सैन्य अधिकारी ही नहीं, बल्कि दूसरे सिविल सेवक भी शामिल होंगे, जिन्होंने महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है.

पूर्व सैन्य, खुफिया या सुरक्षा अधिकारियों द्वारा किए जा सकने वाले खुलासों की संवेदनशीलता को समझा जा सकता है, लेकिन अगर कोई पूर्व सिविल सेवक, जैसे पूर्व वित्त सचिव, नोटबंदी के फैसले के पीछे क्या हुआ, यह लोगों को बताना चाहे, तो इसमें क्या गलत है? या फिर सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना के पीछे क्या हुआ? इसके अलावा, कितने पूर्व सिविल सेवक—जो जानते हैं कि सत्ता में रहते समय उनके राजनीतिक बॉस क्या करते हैं—80 साल की उम्र तक ज़िंदा रहेंगे और किताब लिख पाएंगे? और ऐसे कितने राजनीतिक बॉस—जिनके कामों का खुलासा किताबों में हो सकता है—तब तक ज़िंदा या इतने प्रासंगिक रहेंगे कि उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह ठहराया जा सके? अच्छी बात यह है कि इन रिपोर्ट्स की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं हुआ है. उम्मीद की जा सकती है कि यह सिर्फ ध्यान भटकाने वाली बात हो.

मैं सरकार की लोगों के साथ जानकारी साझा करने में बढ़ती हिचकिचाहट के और भी उदाहरण दे सकता हूं. उदाहरण के लिए, सरकार संसद में दिए गए उस वादे को क्यों पूरा नहीं कर रही है, जिसमें जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापिस देने की बात कही गई थी? अगर सुरक्षा चिंताएं हैं, तो कम से कम चुनी हुई सरकार को भरोसे में लेना चाहिए. मुझे भरोसेमंद सूत्रों से बताया गया है कि जब भी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला राज्य का दर्जा देने का मुद्दा केंद्र के सामने उठाते हैं, तो उन्हें कोई कारण या जवाब नहीं दिया जाता.

प्रसार भारती के चेयरमैन नवनीत सहगल ने इस्तीफा क्यों दिया—या उनसे इस्तीफा क्यों लिया गया, जबकि उनके कार्यकाल में एक साल से ज्यादा समय बाकी था? अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के उप-वर्गीकरण पर रोहिणी आयोग की रिपोर्ट में क्या सिफारिशें की गई थीं और राष्ट्रपति को सौंपे जाने के ढाई साल बाद भी वह रिपोर्ट क्यों पड़ी हुई है? मणिपुर में ऐसा क्या बदला कि अचानक नए मुख्यमंत्री और चार मंत्रियों ने शपथ ली और पिछले दो हफ्तों से उन्हें विभाग क्यों नहीं दिए गए?

ऐसे कई सवाल हैं, जिनका कोई जवाब नहीं दिया जा रहा है. सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून वैसे भी कमज़ोर हो चुका है. देखिए, सरकार के वकील अलग-अलग अदालतों में फाइल नोटिंग्स को सार्वजनिक करने का कितना विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि इससे सिविल सेवक खुलकर राय देने से डरेंगे और उन पर बेकार के आरोप लग सकते हैं, लेकिन एक सिविल सेवक कानून के अनुसार सही बात फाइल में लिखने से क्यों डरेगा? लेकिन सरकार नहीं चाहती कि लोग उसके फैसले लेने की प्रक्रिया की जांच करें.

मोदी सरकार सच्चाई को कम बताने की प्रवृत्ति रखने वाली पहली सरकार नहीं है, लेकिन यह ज्यादा सतर्क है और शायद इसे लागू करने में कम परिष्कृत भी है.

ट्रेड डील पर पारदर्शिता रखें

मैंने यह लेख इसलिए नहीं लिखना शुरू किया क्योंकि सरकार ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की टीम को लाल किला धमाके में जैश-ए-मोहम्मद की भूमिका के बारे में बताया, जो अभी तक आधिकारिक रूप से भारतीय लोगों को नहीं बताया गया है. मेरा सीमित उद्देश्य सिर्फ यह बताना है कि राष्ट्रीय हित के मामलों में सरकार का लोगों के साथ खुला होना अच्छा होता है.

उदाहरण के लिए, विपक्ष चाहे जो कहे, ज्यादातर लोग जानते हैं कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील राष्ट्रीय हित में है. सरकार को बचने की कोशिश करते हुए नहीं दिखना चाहिए—जैसे वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने किया, जब उन्होंने रूसी तेल खरीद पर अमेरिकी दावों से जुड़े सवाल का जवाब देने की जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय पर डाल दी.

सरकार यहां एक और चीज़ नहीं कर सकती, जिसे whataboutery कहते हैं—जब मंत्री ट्रेड डील पर विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के बजाय पिछली सरकारों को किसानों के खिलाफ काम करने के लिए दोष देते हैं. ट्रेड डील बहुत महत्वपूर्ण है और जब आप अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप जैसे व्यक्ति से निपट रहे हैं—जो कूटनीतिक शिष्टाचार की परवाह नहीं करते और लोगों के सामने बयान देना पसंद करते हैं, तो बात छिपाना काम नहीं करेगा.

हालांकि, यह अच्छा है कि मंत्री ट्रेड डील का बचाव करने के लिए सामने आ रहे हैं, लेकिन सरकार को यह भी याद रखना चाहिए कि 2015 के भूमि अधिग्रहण कानून और 2020 के कृषि कानूनों का उसका सामान्य बचाव लोगों को संतुष्ट नहीं कर पाया था. सरकार को भारत-अमेरिका ट्रेड डील के लंबे समय के फायदों के बारे में लोगों से बातचीत करनी चाहिए. अगर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कार्यकर्ता चुनाव से पहले सरकार की योजनाओं को बताने के लिए गांव-गांव जा सकते हैं, तो ट्रेड डील के बारे में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? यहां असली बात है—जानकारी में पारदर्शिता.

जहां तक नागरिकों के पूरे सच को जानने के अधिकार की बात है, यहां एक उदाहरण है: पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी इसी स्थिति में हैं. उनके इस्तीफे को लगभग सात महीने हो चुके हैं. नियमों के अनुसार, सरकार को उन्हें तुरंत टाइप-VIII बंगला देना चाहिए था, लेकिन उनके करीबी लोगों का कहना है कि पिछले सात महीनों में सरकार ने उनसे उनके रहने की व्यवस्था के बारे में संपर्क तक नहीं किया. वह अभी दिल्ली के बाहर एक दोस्त के फार्महाउस में रह रहे हैं.

बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के कुछ ही दिनों में नितिन नवीन को टाइप-VIII बंगला दे दिया गया था. पूर्व उपराष्ट्रपति के मामले में हैरानी की बात यह है कि सरकार ने उन्हें यह भी नहीं बताया कि उन्हें उनका हक वाला बंगला क्यों नहीं दिया जा रहा. इसी बात पर मैं आम नागरिक के सच जानने के अधिकार के मुद्दे को विराम देता हूं.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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