Monday, 27 June, 2022
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भारतीय राजनेताओं को कानून भी दल-बदल से नहीं रोक सकता है, लेकिन कोई है जो रोक सकता है

दल-बदल रोकने का एकमात्र तरीका यही है कि जनता खुद दल-बदलुओं को चुनाव में सबक सिखाये.

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कर्नाटक में जिस शर्मनाक ढंग से सरकार गिरी है उससे दल-बदल निरोधक कानून (एंटी डिफेक्शन लॉ) को मजबूत करने की मांग मजबूत हुई है. मगर, अफसोस है कि रोग का यह उपचार रोग से भी ज्यादा बुरा है.

कानून को मजबूत करने की मांग ऐसी स्थिति में उठेगी. बेशक ये बात समझ में आती है. एचडी कुमारस्वामी नीत सरकार को जिस तरह गिराया गया. वह राष्ट्रीय शर्म का विषय है. यों कुमारस्वामी की सरकार में गर्व करने लायक कुछ भी नहीं था. इस सरकार की बुनियाद में ही खोट थी. जितने दिन यह सरकार चली, आपसी संशय और हर रोज का नाटक इसके साथ लगा ही रहा. सो, जेडीएस-कांग्रेस का गठबंधन सरकार के नाम पर एक प्रहसन की तरह था. लेकिन सरकार को जिस तरह गिराया गया. वह तो और भी ज्यादा बुरा है. सरकार के गिरने से एक बार फिर ये बात साबित हुई कि केंद्र में सत्ता पर काबिज दल का साथ हो, तो नागरिकों को बेचारा या तमाशबीन बनाये रखते हुए धन के सहारे कुछ भी किया जा सकता है. नैतिक आक्रोश इसी का नतीजा है. इसमें कोई शक नहीं कि संविधान में दर्ज दल-बदल निरोधी प्रावधानों का खुले आम मजाक बनाया गया है.

सो, पहली प्रतिक्रिया यही होनी थी कि दल-बदल को रोकने के लिए प्रावधानों को सख्त बनाया जाय. मुश्किल ये है कि मौजूदा प्रावधान पहले ही काफी सख्त हैं. मौजूदा कानून में राजनीतिक दल को अधिकार दिया गया है कि वो अपने नुमाइंदों को किसी भी किस्म के प्रस्ताव पर विशेष ढंग से मतदान करने के लिए आदेश जारी कर सकता है. इसके अंतर्गत ना सिर्फ विश्वास-मत बल्कि ऐसे किसी भी विषय पर मतदान करना शामिल है. जिसके बारे में पार्टी का अध्यक्ष ह्वीप जारी करे. नाफरमानी की सूरत में सांसद या विधायक को सदन की सदस्यता के अयोग्य ठहराया जा सकता है. अपवाद की एकमात्र स्थिति है. पार्टी का दो-फाड़ होना. पहले विधान था कि किसी पार्टी के 50 फीसदी सदस्य पार्टी से टूटकर अलग होते हैं, तो इस विभाजन को जायज माना जायेगा. लेकिन बाद में नियम को और सख्त बनाया गया और दो-तिहाई सदस्यों के किसी पार्टी से अलग होने पर ही उन्हें स्वतंत्र धड़े के रूप में स्वीकार करने की बात मानी गई. मतलब, नियम को जहां तक सख्त बनाया जा सका, बनाया गया और ऐसा किया भी जाना चाहिए.


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मौजूदा कानून में कमियां

लेकिन हर नियम में कुछ कमियां होती हैं. मौजूदा कानून के मुताबिक किसी विधायी दल के दो तिहाई सदस्य अपनी मूल पार्टी से औपचारिक रुप से नाता तोड़ सकते हैं. गोवा में कांग्रेस के विधायकों ने यही विकल्प अपनाया और बीजेपी से जा मिले. तेलंगाना में इसी रास्ते पर चलकर कांग्रेस के विधायक सत्ताधारी टीआरएस से जा मिले. जाहिर है, दल-बदल निरोधी कानून को और ज्यादा सख्त बनाने का मतलब होगा कुछ ऐसा विधान बनाना कि जब तक किसी पार्टी के शत-प्रतिशत विधायक या सांसद अलग नहीं हो जाते तब तक उन्हें एक स्वतंत्र धड़े के रुप में मंजूरी ना दी जाय. इसका मतलब हुआ कि कोई भी विधायक या सांसद किसी भी स्थिति में अपनी पार्टी को छोड़ने के लिए स्वतंत्र नहीं.

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प्रावधान में एक और खामी बीजेपी ने कर्नाटक में ‘ऑपरेशन कमल’ चलाकर खोज निकाली. एमएलए विधायिका से इस्तीफा देकर पाला बदल लेते हैं, वे किसी नये चुनाव-चिह्न पर फिर से चुनाव लड़ते हैं और सदन में किसी अन्य पार्टी के नुमाइंदे के रूप में आ जाते हैं. बीजेपी ने इस बार भी यही तरीका अपनाया है. इसमें राजनीतिक या फिर विचारधारात्मक अल्गौझे जैसा कोई बहाना नहीं किया जा रहा. यह सीधे-सीधे दल-बदल का मामला है और इसके लिए ‘इस्तीफा’ का रास्ता अपनाया गया है. इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुत बड़ी रकम का लेन-देन हुआ है और इसमें भी कोई शक नहीं कि इस्तीफा-प्रकरण के बाद जो उप-चुनाव होंगे वे निष्पक्ष नहीं होने जा रहे. मतदाताओं को घूस दी जायेगी और चुनावी मशीनरी मूकदर्शक बनी बैठी रहेगी. इसे रोकने का एकमात्र वैधानिक तरीका है कि इस्तीफा को अवैधानिक बना दिया जाय यानि जो लोग इस्तीफा दे रहे हैं उन्हें कुछ समय तक चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया जाय. सुधार की मंशा वाले फिलहाल यही चाह रहे हैं.

लेकिन सुधार के ऐसे लोभ से परहेज किया जाना चाहिए. हम प्रतिबंध आयद करने के लिए मौजूदा कानून की नोंक-पलक संवार सकते हैं. मिसाल के लिए, इस्तीफा देने वाला कोई निर्वाचित प्रतिनिधि उप-चुनाव में जीत कर फिर से विधायिका में पहुंचता है, तो उसे मंत्रीपद या फिर कोई सार्वजनिक ओहदा लेने से साल भर के लिए रोका जा सकता है. लेकिन, दल-बदल निरोधी कानून के प्रावधानों को सख्त बनाने का कोई और कदम उठाया जाता है, तो इससे मकसद नहीं सधने वाला. प्रावधानों को सख्त बनाने से समस्या और जटिल हो सकती है.

दल-बदल को रोका नहीं जा सकता

दल-बदल को रोकने का कोई अचूक उपाय नहीं है. कानून की खामियों को दुरुस्त करने का कितना भी उपाय कर लें, अगर निर्वाचित प्रतिनिधि पाला बदलना चाहता है. तो उसे रोका नहीं जा सकता. प्रावधान को सख्त बनाने से होगा यही कि दल-बदल की कीमत कुछ ज्यादा बढ़ जायेगी. इसी के हिसाब से विधायक या सांसद पाला बदलने के लिए कीमत की मांग करेंगे और फिर पाला बदलने के लिए बोली लगायी जायेगी. अगर प्रावधान बना दिया जाता है कि पार्टी में किसी भी सूरत में दो फाड़ की अनुमति नहीं दी जायेगी तो इसका मतलब यही होगा कि दल-बदल चाहने वाला हर कोई इस्तीफे वाला रास्ता अपनायेगा. अगर इस्तीफे का रास्ता अख्तियार करने वाले प्रतिनिधि को दंडस्वरुप अयोग्य ठहराया जाता है तो फिर दल छोड़ने वाला ऐसा प्रतिनिधि हानि-लाभ का गणित बैठाकर अपने इस्तीफे के लिए और ज्यादा ऊंची कीमत मांगेगा. बेशक, नये प्रावधानों से दल-बदल की घटनाओं में कमी आयेगी लेकिन उसे पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता.

हो सकता है हम कामयाब हों, दल-बदल रुक जाय लेकिन हमें इस कामयाबी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी. स्वर्गीय मधु लिमये संभवतया एकमात्र राजनेता थे, जिन्होंने हमें दल-बदल निरोधी कानून के खतरों के प्रति आगाह किया था. उन्होंने चेताया था कि दल-बदल निरोधी कानून लाने का मतलब होगा पार्टी के अंदरुनी लोकतंत्र तथा सांसद-विधायकों की स्वतंत्रता का खात्मा. इतिहास बताता है कि मधु लिमये की आशंकाएं सच साबित हुई हैं. दल-बदल निरोधी कानून तथा कालक्रम में उसे सख्त बनाते जाने से निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों के ऊपर पार्टी के आलाकमान की जकड़ मजबूत हुई है. पार्टियों के लिए संसद की कार्यवाही बस पार्टी के भीतर किसी एक व्यक्ति के बटन दबाने भर का मामला बनकर रह गई है चंद चुनिन्दा लोगों का जो गुट या फिर परिवार पार्टी पर काबिज होता है उसी की मुट्ठी में उस पार्टी के सांसदों-विधायकों की जिन्दगी भी होती है. अगर पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधि, पार्टी के प्रधान की नजरों से गिर जायें तो फिर पार्टी के भीतर उनकी कोई अहमियत नहीं रह जाती और ना ही ऐसे प्रतिनिधियों को चुनने वाले लोगों की ही पार्टी की नजर में कोई कीमत रह जाती है.


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मतदाता रास्ता दिखा सकते हैं

किसी पार्टी के भीतर आज जो लोग असंतुष्ट हैं उनके लिए बस दो ही विकल्प शेष रह गये हैं कि वे या तो बगावत करें या फिर इस्तीफा दे दें. अगर कोई ऐसा कानून बनता है कि पार्टी के दो तिहाई भी निर्वाचित प्रतिनिधि अपने दल को छोड़ना चाहें, तो उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी जायेगी तो फिर एक हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न होगी कि पूरे के पूरे विधायक दल से वह सब करवाया जा रहा है जो दरअसल विधायक दल के भीतर कोई करना ही नहीं चाह रहा. विधायक दल जो कुछ करना चाह रहा है, उसे वैसा करने की अनुमति नहीं दी जा रही है और अगर कानून ये बनाया जाता है कि जो निर्वाचित प्रतिनिधि इस्तीफा देता है. उसे अयोग्य ठहराया जायेगा तो फिर इसका मतलब होगा पार्टी के भीतर जो सदस्य असंतुष्ट हैं, उन्हें उपलब्ध एकमात्र विकल्प को खत्म करना. हम बेशक दल-बदल को रोक सकते हैं लेकिन ऐसा करने का मतलब होगा पार्टी के भीतर लोकतंत्र को खत्म करना. यह तो वही मसल हुई कि एक बुराई को रोकने के लिए उससे कहीं ज्यादा बड़ी बुराई को न्यौत दिया जाये.

तो फिर वास्तविक समाधान क्या है? मुझे लगता है, वास्तविक समाधान है जनता के पास जाना. दल-बदल करने वालों का जनता का बीच पर्दाफाश करना, उन्हें ओछा ठहराना किसी वैधानिक उपाय से कहीं ज्यादा कारगर है. दल-बदल रोकने का एकमात्र तरीका यही है कि जनता खुद दल-बदलुओं को चुनाव में सबक सिखाये. कोई राजनेता नहीं चाहता कि उसका करिअर शीघ्र समाप्त हो जाय. सो, अगर उसे पता चल जाये कि दल-बदल करने की स्थिति में उसका मतदाताओं के बीच जाना और चुनाव जीतकर फिर से विधायिका में आना नामुमकिन है तो वह दल-बदल की सोचेगा ही नहीं. जब तक कर्नाटक के दल-बदलुओं को यह अहसास रहेगा कि वे फिर से चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंच जायेंगे तब तक आप दल-बदल को नहीं रोक सकते. दरअसल, किसी लोकतंत्र को लोगों से तो बचाकर नहीं रखा जा सकता ना. राजनीति में अचूक उपाय खोजना बहुधा घातक होता है.

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(योगेंद्र यादव राजनीतिक दल, स्वराज इंडिया के अध्यक्ष हैं. यह लेख उनका निजी विचार है.)

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