सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवाना पूर्वी लद्दाख में आगे के जगहों का दौरा करते हुए | फोटो- विशेष व्यवस्था से.
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पूर्वी लद्दाख में पैंगोग त्सो के उत्तरी और दक्षिणी तट से एक साथ सिंक्रोनाइज फेज में सैन्य वापसी शुरू हो गई है. मेरा आकलन कहता है कि 24 जनवरी को आयोजित कोर कमांडर-स्तरीय वार्ता की नौवें दौर की बैठक के बाद से भारत और चीन के बीच गतिरोध वाले विभिन्न क्षेत्रों से धीरे-धीरे सैन्य वापसी जारी है. यह एक बहुआयामी समझौते की शुरुआत है, जिसे अगले कुछ महीनों में पूर्वी लद्दाख का संकट हल करने और दोनों देशों के बीच बिगड़े रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने के लिए अंतिम रूप दिया जाएगा.

दरअसल, मैं तो सैन्य वापसी की खबर ब्रेक होने से पहले ही रणनीतिक और सैन्य स्थितियों का आकलन करके इसी निष्कर्ष पर पहुंच गया था.

मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि इस संभावित समझौते की रूपरेखा क्या होगी. कुल मिलाकर कहें तो भारत ने चीन की 1959 की क्लेम लाइन को सिंधु घाटी में डेमचोक-फुकचे क्षेत्र को छोड़ बाकी पूरे क्षेत्र में नई एलएसी के तौर पर स्वीकार कर लिया है, संभवतः बफर जोन के साथ और देपसांग मैदान के दक्षिणी आधे हिस्से, उत्तरी पैंगोग त्सो और विविध धारणाओं वाले अन्य क्षेत्रों में और सैन्य तैनाती/गश्त/बुनियादी ढांचे के निर्माण के बिना. 1959 क्लेम लाइन पहले से ही अच्छी तरह से रेखांकित है और इसी तरह बफर जोन भी, जो इसके और मौजूदा एलएसी के बीच स्थित हैं. इस समझौते के कारण चीन को मध्य क्षेत्र और पूर्वोत्तर में अन्य सभी दावों को मामूली बदलावों के साथ छोड़ना पड़ सकता है. विडंबना यह है कि इस तरह के समझौते का अंतिम स्वरूप नवंबर 1959 में चाऊ एनलाई की तरफ से रखे गए प्रस्ताव की मिरर इमेज लग सकता है.

अगले दस हफ्तों में, अप्रैल के अंत तक हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ पिघलने लगेगी और इलाके की स्थिति और मौसम सैन्य अभियानों के लिए अनुकूल हो जाएगा. तब तक पूर्वी लद्दाख में चल रहे गतिरोध को भी एक साल पूरा हो जाएगा जो उस समय शुरू हुआ था जब चीन ने देपसांग के मैदान और पैंगोग त्सो के उत्तर में 1959 की क्लेम लाइन वाले अपने क्षेत्र तक 800-1,000 वर्ग किलोमीटर के हमारे इलाके पर आक्रामकता से कब्जा/नियंत्रण कर लिया, साथ ही इस रेखा के पास जुलाई में खाली किए गए गलवान घाटी और हॉट स्प्रिंग्स-गोगरा-कोंगका ला के कुछ इलाकों में भी घुसपैठ की. यह सब करके चीन ने हमें न केवल एलएसी तक गश्त करने से रोका बल्कि इन महत्वपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा भी नहीं विकसित करने दिया, और हमारे एक बड़े भूभाग पर नियंत्रण करके—सीमित युद्ध की स्थिति के लिहाज से—रणनीतिक तौर पर मजबूत स्थिति भी हासिल कर ली.

जवाब में भारत ने भी व्यापक जमावड़े के साथ उसे आगे बढ़ने से रोक दिया. स्थिति विस्फोटक होने का नतीजा 15-16 जून की रात की घटना के तौर पर सामने आया जब गलवान घाटी में ‘मध्ययुगीन हथियारों’ का इस्तेमाल करते हुए झड़प हुई जिसमें हमारे 20 और अपुष्ट संख्या में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के भी कई सैनिक मारे गए. अगस्त के अंत में भारत ने पीएलए को हैरत में डालते हुए चुसुल सेक्टर में प्रमुख कैलाश रेंज, 1962 से कोई कब्जा नहीं था, पर नियंत्रण करके मौजूदा गतिरोध के बीच रणनीतिक रूप से बढ़त स्थापित कर ली. तब से ही दुरूह सर्द इलाकों में प्रतिद्वंद्वी सेनाएं एकदम आमने-सामने डटी हुई हैं.

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सैन्य और राजनयिक प्रयासों का कोई नतीजा निकला. भारत-चीन के बीच सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए स्थापित ज्वाइंट वर्किंग मैकेनिज्म के तहत संयुक्त सचिव स्तर पर कई बैठकों के अलावा एक बार रक्षा मंत्रियों और दो बार विदेश मंत्रियों के बीच मंत्री स्तर की वर्चुअल बैठकें भी हुई. सैन्य स्तर पर नौ दौर की वार्ता चली जो मुख्यत: विवाद सुलझाने से ज्यादा सैन्य वापसी और गतिरोध तोड़ने पर केंद्रित थी. इसके नतीजों को सबसे अच्छी तरह से विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इन शब्दों में व्यक्त किया, ‘सैन्य कमांडरों ने अब तक नौ दौर की बातचीत की है. हमारा मानना है कि कुछ प्रगति तो हुई है, लेकिन यह उस तरह की स्थिति पर नहीं पहुंची है जो जमीनी स्तर पर अभिव्यक्ति हो सके.’ स्थिति को सबसे बेहतर ढंग से अस्थिर गतिरोध के रूप में व्यक्त किया जा सकता है.

अब आगे क्या? क्या हम एक एक्सेलेशन या सीमित युद्ध का सामना करने जा रहे हैं? या फिर बिगड़े रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़कर दोनों पक्ष गतिरोध तोड़ने में सफलता की दावा करके फेस-सेविंग कर पाएंगे?


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चीन की तरफ से सीमित युद्ध की संभावना

हालांकि, विभिन्न कारणों से दोनों में से कोई पक्ष युद्ध नहीं चाहता है. यह साबित करने के लिए यह तथ्य ही काफी है कि जून 2020 में गलवान घाटी में झड़प के बाद तैनाती के दौरान दोनों देशों की सेनाएं एकदम आमने-सामने आ जाने के बावजूद कोई हताहत नहीं हुआ. फायरिंग आखिरी बार सितंबर की शुरुआत में हुई जब भारत ने कैलाश रेंज पर नियंत्रण कर लिया था. फिर भी, स्थिति संवेदनशील बनी हुई है, यह बात 20 जनवरी 2021 को नाकू ला में बिना गोली-बंदूकों के हुई झड़प से साफ है.

चीन के पास युद्ध के लिए कोई वजह नहीं है. इसे अंतरराष्ट्रीय/क्षेत्रीय स्थिति को कमजोर करके भारत पर अपना आधिपत्य थोपने का अपना राजनीतिक उद्देश्य, रणनीतिक लाभ हासिल करने के लिए 1959 की क्लेम लाइन सुरक्षित करना, और अक्साई चिन/बिना दावे वाले अन्य क्षेत्रों के लिए खतरा बन सकने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों के सीमावर्ती ढांचे के विकास को रोकना, आदि हासिल हो चुका है. चीन ने दुनिया के सामने साबित कर दिया है कि उसने अपनी मंशा भारत पर थोप दी है जो घुसपैठ की गतिविधियों का सैन्य स्तर पर जवाब देने में असमर्थ रहा है.

हालांकि, चीन जीत की घोषणा करके आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि भारतीय सशस्त्र बल, एकदम कम समय में अप्रैल 2020 की यथास्थिति बहाल कर लेंगी. अपनी शर्तों पर शांति स्थापित करने के लिए चीन को एक सीमित युद्ध छेड़ना होगा. लेकिन चीन पीएलए के असफल होने की स्थिति आए बिना ही जंग से दूर रहना चाहता है. क्योंकि यदि भारत ने मजबूती से सामना ही कर लिया तो ये एक बड़ी ताकत के हारने के बराबर हो जाएगा.

सीधे शब्दों में कहें तो चीन किसी सीमित युद्ध की शुरुआत तो नहीं करेगा लेकिन पहल यदि भारतीय सेना की तरफ से की जाए तो इसका लक्ष्य परमाणु हमले की स्थिति आए बिना सीमित युद्ध में निर्णायक तौर पर उसकी हार सुनिश्चित करना होगा. दरअसल, यह तिब्बत में अपने सैन्य बुनियादी ढांचे को ऐसी ही किसी स्थिति के मद्देनजर व्यापक स्तर पर विकसित कर रहा है. इसलिए चीन की तरफ से किसी सीमित युद्ध की संभावना बहुत कम है. वह ऐसी मजबूती के साथ बातचीत की कोशिश करेगा ताकि ज्यादा कुछ गंवाए बिना लाभ की जो स्थिति हासिल की है, उसे बरकरार रख सके.

भारत की तरफ से सीमित युद्ध की संभावना

भारत रणनीतिक और सामरिक रूप से हतप्रभ था, और देपसांग मैदानों और पैंगोग त्सो के उत्तर में अनऑक्यूपाइड क्षेत्र गंवाने से उसे बड़ा झटका लगा था. एक उभरती प्रमुख शक्ति के तौर पर भारत की छवि खराब हो गई थी. अगस्त 2020 के अंत में कैलाश रेंज पर कब्जा करके इसने कुछ खोई प्रतिष्ठा फिर हासिल कर ली. भारत का 800-1,000 वर्ग किमी इलाका अब भी चीन के कब्जे में है. इसके अलावा, चीन 1962 तक कब्जाए गए 38,000 वर्ग किमी भारतीय क्षेत्र पर नियंत्रण रखता है.

भारत का राजनीतिक उद्देश्य अप्रैल 2020 की यथास्थिति बहाल करना और एलएसी का सीमांकन है. ऐसे में भारत के पास सीमित युद्ध शुरू करने की वजहें हैं. हालांकि, यह चीन को निर्णायक रूप से पराजित करने की सैन्य क्षमता नहीं रखता है. राजनीतिक तौर पर एक सैन्य पराजय/असफलता विनाशकारी साबित होगी. मुझे यह निष्कर्ष निकालने में जरा-भी हिचकिचाहट नहीं है कि भारत की तरफ से सीमित युद्ध छेड़ने की संभावनाएं न के बराबर हैं. हालांकि, एक दीर्घकालिक गतिरोध बातचीत की मेज पर उसकी स्थिति मजबूत कर सकता है क्योंकि चीन तैनाती जारी रखने के लिए विवश होगा और खुद को जीता हुआ घोषित नहीं कर पाएगा.


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संघर्ष का समाधान निकालने के उपाय

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर मैं दो परिदृश्यों की कल्पना करता हूं. पहला यह कि गतिरोध लंबा खींचने और चीन को थका डालने के लिए नियंत्रण रेखा, पूरी एलएसी और जिन क्षेत्रों में चीन ने घुसपैठ की थी, के साथ-साथ भारतीय सेना के सीमावर्ती ठिकानों पर निरंतर उपयुक्त स्तर पर सैन्य तैनाती जारी रखी जाए. दूसरा यह कि कूटनीतिक समाधान के तौर पर घुसपैठ वाले क्षेत्रों में बफर जोन बनाए जाएं जहां कोई भी पक्ष तैनाती/गश्त/या ढांचे का निर्माण नहीं करेगा, इसके अलावा आपसी सहमति से एलएसी और बफर जोन का सीमांकन हो.

पहले परिदृश्य के लिए पूर्वी लद्दाख के बेहद दुर्गम इलाकों और जमा देने वाली जलवायु के बीच दोनों पक्षों की तरफ से कम से कम दो डिवीजनों की तैनाती जरूरी होगी और एक डिवीजन तत्काल रिजर्व में रखने की भी बाध्यता होगी. यदि पूरी एलएसी संवेदनशील हो जाती है तब तो 6-7 डिवीजनों को स्थायी रूप से तैनात करने की जरूरत पड़ेगी. हमारे पास सियाचिन में डटने का अनुभव है तो चीनी साइबेरियाई मोर्चे पर लड़ने के अभ्यस्त रहे हैं. इसके बाद शांति कैसे बहाल रह पाती है यह तो आगे एलएसी से जुड़े समझौतों पर निर्भर करेगा.

भारत को सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि चीन खुद को विजेता घोषित नहीं कर पाएगा और इस तरह का गतिरोध उसकी छवि पर असर डालेगा, और यह एक बड़ी ताकत की हार साबित होगा. भारत खोई प्रतिष्ठा फिर हासिल कर सकेगा. इससे देमचोक क्षेत्र को छोड़कर, 1959 की क्लेम लाइन के साथ एलएसी के डी फैक्टो सीमांकन का भी रास्ता खुलेगा. घरेलू स्तर पर इसे जीत के रूप में पेश किया जा सकता है. हालांकि, रक्षा बजट पर बोझ निषेधात्मक होगा, और अनुभव कहता है कि इस तरह की तैनाती से बार-बार झड़पें होती हैं जो कभी भी गंभीर रूप ले सकती हैं. ऐसे में यह विकल्प अपनाए जाने के आसार बहुत ही कम हैं. हालांकि, यह पूर्वी लद्दाख के लिए एक व्यावहारिक विकल्प है जब तक कोई स्वीकार्य समाधान नहीं निकलता.

ऐसा आभास होता है कि भारत और चीन दोनों धीरे-धीरे दूसरे विकल्प की ओर बढ़ रहे हैं. चीन मजबूत शक्ति के रूप में जीत की घोषणा नहीं कर सकता है और एक लंबे समय तक गतिरोध जल्द ही हार की तरह नजर आने लगेगा. भारत को 1959 की क्लेम लाइन मानने को बाध्य करने के बजाय देपसांग मैदान और पैंगोंग त्सो के घुसपैठ वाले उत्तरी क्षेत्रों को तैनाती/गश्त/ढांचे के विकास पर रोक वाले ‘बफर जोन’ घोषित किए जाने से चीन अपना चेहरा बचाने और ‘जीत’ साबित करने में सक्षम होगा.

भारत को यह कड़वा घूंट पीना होगा और स्वीकारना होगा कि पिछले समझौते बीती हुई बात हो चुके हैं और नई वास्तविकता का मजबूती से सामना करना होगा. मेरे विचार में देपसांग मैदानों और पैंगोंग त्सो के उत्तर में बफर जोन के साथ सीमांकित 1959 की क्लेम लाइन (डेमचोक क्षेत्र को छोड़कर) एक बेहद व्यावहारिक समाधान है. कैलाश रेंज में हमारी महत्वपूर्ण तैनाती को समझौते में एलएसी के दोनों ओर 20 किलोमीटर का असैन्य क्षेत्र शामिल किए जाने की शर्त पर छोड़ा जा सकता है. यह कोई कहने की बात नहीं है कि ऐसी स्थितियों में भरोसा तोड़ा जाना आम बात होने के मद्देनजर पूरी सावधानी बरतने की बहुत जरूरत होगी.

अब उपरोक्त विश्लेषण को ध्यान में रखकर मेरी भविष्यवाणी को एक बार फिर पढ़ें. विजुअलाइज्ड सॉल्यूशन अभी दूर की कौड़ी है और कई ‘सेल-आउट’ हो चुके भी प्रतीत हो सकते हैं. चूंकि एक कमजोर शक्ति के तौर पर चीन को चुनौती देने वाली सैन्य क्षमता का अभाव है, यह रणनीतिक मजबूरी भी है कि एक समझौते की कोशिश की जाए जो हमारी उत्तरी सीमाओं पर शांति सुनिश्चित करता हो.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(ले.जन. एचएस पनाग, पीवीएसएम, एवीएसएम (रिटायर्ड) ने 40 वर्ष भारतीय सेना की सेवा की है. वो जीओसी-इन-सी नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड रहे हैं. रिटायर होने के बाद वो आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य रहे. व्यक्त विचार निजी हैं)


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