आज भारत की रक्षा तैयारियों की बड़ी जिम्मेदारी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL के कंधों पर टिकी है. लाखों करोड़ रुपये की ऑर्डर बुक और समय पर सप्लाई के लिए सशस्त्र बलों के दबाव को देखते हुए, HAL के पुनर्गठन का सरकार का फैसला सिर्फ स्वागतयोग्य नहीं है, बल्कि अब यह अनिवार्य हो गया है.
मैंने HAL की यात्रा को बहुत करीब से देखा है और जानता हूं कि इस संगठन का भविष्य देश की हवाई सुरक्षा से कितनी गहराई से जुड़ा है. पहले हुए सुधार प्रयासों, खासकर चतुर्वेदी समिति को देखने के बाद, मैंने यह भी देखा कि कैसे अच्छे इरादे केवल दिखावटी बदलावों तक सीमित रह गए. इस बार पुनर्गठन सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. HAL आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे या तो गंभीरता से सुधार अपनाना होगा या फिर आधुनिकीकरण की दौड़ में पीछे छूटने का जोखिम उठाना होगा.
चतुर्वेदी समिति से मिले सबक
यह HAL के लिए सुधार का पहला प्रयास नहीं है. अक्टूबर 2011 में सरकार ने तत्कालीन योजना आयोग के सदस्य बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समूह बनाया था, जिसका उद्देश्य HAL की संगठनात्मक संरचना की समीक्षा करना था.
समिति ने सितंबर 2012 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें 38 सिफारिशें थीं. इनमें से 34 को स्वीकार कर लिया गया था.
मुझे समिति के काम को करीब से देखने का मौका मिला और कुछ दौरों में टीम के सदस्यों के साथ जाने का अवसर भी मिला. इस अनुभव से मुझे यह समझ मिली कि समिति कैसे काम कर रही थी और वह किस तरह के बदलाव लाना चाहती थी. हालांकि उद्देश्य HAL को मजबूत करना था, लेकिन कई सिफारिशें केवल दिखावटी साबित हुईं.
सबसे ज्यादा बहस बोर्ड के पुनर्गठन को लेकर हुई. एचएएल के विभिन्न कॉम्प्लेक्स के मैनेजिंग डायरेक्टरों को चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर का दर्जा दिया गया, लेकिन उन्हें बोर्ड से बाहर कर दिया गया, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया कमजोर हो गई.
हालांकि, इन सीईओ को निदेशकों के बराबर सुविधाएं देने का भरोसा दिया गया, ताकि उन्हें शांत किया जा सके. समय-समय पर “जैसा उचित समझा जाए” के आधार पर इन सुविधाओं में संशोधन किया गया. इसमें सेवा के दौरान और सेवा के बाद वाहन, आवास और अन्य लाभ शामिल थे, जिससे अन्य अधिकारियों में नाराजगी पैदा हुई.
नया बनाया गया डायरेक्टर (ऑपरेशंस) का पद भी सीमित अधिकारों वाला था. उसका दायरा मुख्य रूप से मार्केटिंग और कॉरपोरेट प्लानिंग तक सीमित रहा. एक डायरेक्टर ने मुझसे मजाक में कहा था कि उनके पास “चलाने के लिए कुछ ठोस नहीं” है. वास्तव में पहले यही काम डायरेक्टर (कॉरपोरेट प्लानिंग और मार्केटिंग) के तहत आते थे. सिर्फ पद का नाम बदल दिया गया था.
एक और प्रस्ताव एयरोस्पेस यूनिवर्सिटी बनाने का था, जो सुनने में बड़ा था, लेकिन व्यवहार में अव्यावहारिक साबित हुआ. HAL के पास न तो विश्वविद्यालय चलाने का अधिकार था और न ही विशेषज्ञता. यह विचार आगे नहीं बढ़ पाया. हालांकि, बेंगलुरु में HAL की अपनी मैनेजमेंट अकादमी है, जिसमें काफी निवेश हुआ है, लेकिन इसका उपयोग बहुत कम हो रहा है.
मैंने इस अकादमी का कई बार दौरा किया है और इसकी मजबूत बुनियादी सुविधाएं देखी हैं, लेकिन इसकी उपलब्धियां सीमित ही रही हैं. नए सलाहकारों के लिए इस अकादमी में सुधार प्राथमिकता होनी चाहिए. उन्हें यह समीक्षा करनी चाहिए कि इस अकादमी को कैसे पुनर्गठित किया जाए, ताकि यह वास्तविक मूल्य दे सके. इसके लिए विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी, विशेष एयरोस्पेस पाठ्यक्रम या HAL की जरूरतों के अनुसार नेतृत्व प्रशिक्षण जैसे विकल्प हो सकते हैं.
फिलहाल एचएएल कर्मचारियों के लिए बनाए गए कार्यक्रमों से कोई खास नतीजे नहीं निकले हैं. दूसरी ओर, बाहरी उम्मीदवारों के लिए शुरू किया गया पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन मैनेजमेंट यानी पीजीडीएम कोर्स भी ज्यादा लोगों को आकर्षित नहीं कर पाया है. इसका मुख्य कारण यह है कि HAL प्लेसमेंट की गारंटी नहीं दे सकता और संभावित छात्रों को यह कोर्स उपयोगी नहीं लगता.
आउटसोर्सिंग: एक दुर्लभ सफलता
चतुर्वेदी समिति की एक वास्तविक सफलता आउटसोर्सिंग को बढ़ावा देना रही. आज HAL निजी उद्योग के साथ बड़े स्तर पर सहयोग करता है, जिसमें बड़ी कंपनियों से लेकर MSME तक शामिल हैं.
तेजस का उदाहरण लें. तेजस एमके1ए कार्यक्रम में फ्यूज़लाज के हिस्से, पंख और अन्य असेंबली आउटसोर्स की जाती हैं, जिससे उत्पादन तेज हो पाया है. भारतीय वायुसेना को 180 से अधिक तेजस एमके1ए विमान सौंपे जाने हैं. समयसीमा पूरी करने के लिए आउटसोर्सिंग बेहद अहम बन गई है.
एचएएल के भीतर बातचीत के दौरान मैंने देखा कि आउटसोर्सिंग से न सिर्फ उत्पादन तेज हुआ है, बल्कि सप्लायरों का एक ज्यादा स्वस्थ इकोसिस्टम भी तैयार हुआ है. यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां समिति को श्रेय दिया जाना चाहिए. लेकिन जिस गहरे सांस्कृतिक बदलाव की कल्पना की गई थी, जैसे HAL को सख्त PSU कार्यप्रणाली से बाहर निकालना, वह पूरी तरह लागू नहीं हो सका. कंपनी अब भी सार्वजनिक क्षेत्र के दिशा-निर्देशों से बंधी हुई है, जिससे लचीलापन सीमित रहता है. जब तक कुछ नए प्रावधान नहीं लाए जाते, तब तक इसमें बदलाव संभव नहीं है.
मौजूदा पुनर्गठन अभियान
प्रसिद्ध सलाहकारों के नेतृत्व में चल रहा नया पुनर्गठन अभ्यास एचएएल की सबसे बड़ी चुनौतियों को हल करने की उम्मीद करता है, जिसमें बड़े लंबित ऑर्डर को खत्म करना और डिलीवरी की रफ्तार बढ़ाना शामिल है.
जिन प्रस्तावों पर चर्चा हो रही है, उनमें HAL को फिक्स्ड-विंग विमान, हेलीकॉप्टर और MRO सेवाओं के लिए अलग-अलग इकाइयों में बांटना शामिल है. इसके साथ ही स्वदेशी डिजाइन को मजबूत करने के लिए R&D केंद्रों को DRDO और ADA के साथ और करीब से जोड़ने की बात भी है. रणनीतिक बिजनेस यूनिट्स यानी एसबीयू का गठन अहम है, हालांकि PSU ढांचे में यह प्रक्रिया जटिल हो सकती है.
उतनी ही अहम है श्रम-आधारित संचालन से ऑटोमेशन आधारित उत्पादन की ओर बढ़ना. यह बदलाव जरूरी तो है, लेकिन एचएएल के बड़े कार्यबल और जमी हुई कार्यसंस्कृति को देखते हुए यह विवादास्पद हो सकता है.
वित्तीय जटिलताएं, शेयरहोल्डिंग पैटर्न, मार्केट कैपिटलाइज़ेशन और PSU गवर्नेंस और भी चुनौतियां पैदा करते हैं. ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड्स के उलट, HAL के डिवीज़न आपस में मिलकर काम करते हैं, जिससे तालमेल बिगाड़े बिना स्ट्रक्चरल अलगाव मुश्किल हो जाता है.
सबसे कमजोर कड़ी
HAL के गैर-तकनीकी विभागों में मानव संसाधन यानी HR सबसे ज्यादा अस्थिर बना हुआ है. मैंने देखा है कि प्रमोशन नीतियों में बार-बार बदलाव किए गए, जिससे कई तरह की गड़बड़ियां पैदा हुईं. कुछ अधिकारियों को रिटायरमेंट से कुछ महीने पहले ही प्रमोशन दे दिया गया, जबकि कहीं शेष सेवा अवधि के नियम असमान रहे.
इसका नतीजा यह हुआ कि एग्जीक्यूटिव डायरेक्टरों की तादाद जरूरत से ज्यादा हो गई. यह स्थिति हाल के वर्षों में बनी, क्योंकि अब साल में एक बार के बजाय हर छह महीने में प्रमोशन होने लगे हैं. इन्हें पूरी स्वतंत्र जिम्मेदारी के साथ कहां तैनात किया जाए, यह एक बड़ी चुनौती है. खासकर तब, जब जनरल मैनेजरों को भी विभाग प्रमुख के रूप में समायोजित करना होता है. तब सवाल उठे, जब एक एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर को उसके मुख्य क्षेत्र से हटाकर कॉरपोरेट ऑफिस के एक छोटे विभाग में भेज दिया गया.
कुछ साल पहले मैंने एक ऐसी स्थिति देखी, जहां HR में दो जनरल मैनेजर, एक एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और डायरेक्टर (HR) सभी एक ही समय पर कॉरपोरेट ऑफिस में बैठे थे. इनके नीचे कई अन्य वरिष्ठ HR अधिकारी रिपोर्ट कर रहे थे.
HAL के कई कार्यालयों में विभागीय ढांचा, जैसे कंपनी सेक्रेटेरियट, अधिकारियों और गैर-अधिकारियों के अनुपात में भारी असंतुलन दिखाता है. ऐसे मामलों में संगठनात्मक अधिकार, जरूरत और विवेक का तर्क भरोसेमंद नहीं लगता. पुनर्गठन प्रक्रिया के तहत कंसल्टेंट्स को इस असंतुलन को दूर करना होगा.
लोक उद्यम विभाग यानी DPE अब तक काफी हद तक चुप रहा है, लेकिन कुछ बदलावों के साथ महरत्न कंपनियों के लिए एक जैसी HR नीतियां अब जरूरी हो चुकी हैं. जब तक निष्पक्षता और पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक कर्मचारियों का मनोबल गिरना तय है और प्रतिभाशाली अधिकारी हाशिए पर चले जाएंगे. मैंने खुद देखा है कि कैसे बेहतरीन योग्यता वाले कुछ अधिकारी हताश रहते हैं, जबकि कुछ अन्य नीति में हेरफेर का फायदा उठाते हैं.
यह HR का सिर्फ एक पहलू है. इसके अलावा सालाना ट्रांसफर, विभागों का एकीकरण, काम की दोहराव से बचने के लिए मानव संसाधन का समेकन जैसे कई और मुद्दे हैं. HAL के मामले में प्रस्तावित पुनर्गठन अभ्यास इन समस्याओं को सुलझाने का एक नया मौका देता है.
श्रमिकों की स्थिति
HAL इंजीनियरों को विदेशों में और IIT, IIM जैसे बड़े संस्थानों में प्रशिक्षण देने पर भारी निवेश करता है, लेकिन उनका सही उपयोग नहीं हो पाता. मैं ऐसे होनहार इंजीनियरों से मिला हूं, जो ब्रिटेन के क्रैनफील्ड या फ्रांस के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से लौटे, लेकिन उन्हें प्रशासनिक भूमिकाओं में या ऐसे क्षेत्रों में लगा दिया गया, जिनका उनके प्रशिक्षण से कोई खास संबंध नहीं था.
कई बार उनका जबरन तबादला किया जाता है, लेकिन आमतौर पर वे इन भूमिकाओं को स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि ऊंचे दफ्तरों में ऐसी पोस्टिंग के साथ यात्रा, अधिकार और तय प्रमोशन जैसे अतिरिक्त फायदे मिलते हैं.
नई कंसल्टेंसी को यह सुझाव देना चाहिए कि ऐसे प्रतिभाशाली अधिकारी शॉप फ्लोर, रिसर्च क्षेत्रों में समय बिताएं और तकनीक आधारित समाधान विकसित करें, जिनकी HAL के प्लेटफॉर्म को सख्त जरूरत है.
दूसरी ओर, स्थायी कर्मचारियों के पास ओवरटाइम, ट्रांसफर और सुविधाओं को लेकर काफी मोलभाव की ताकत है. साल के अंत के लक्ष्य पूरे होने पर उनके दावे सही ठहरते हैं और परंपरागत जश्न होते हैं. लेकिन यह सफलता सिर्फ स्थायी कर्मचारियों की वजह से नहीं होती. इसका श्रेय आउटसोर्सिंग और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को भी जाना चाहिए. मैंने देखा है कि कम वेतन पाने वाले कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी अक्सर महत्वपूर्ण कमी को कुशलता से पूरा करते हैं, जबकि स्थायी कर्मचारी इससे कहीं अधिक योगदान दे सकते हैं. HR को यह समझना होगा कि सभी कर्मचारियों की मांगों और उनके काम के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.
सहयोग का ताना-बाना
पुनर्गठन अभ्यास में दक्षता और निरंतरता के बीच संतुलन भी बनाना होगा. HAL के डिवीजन आपस में बहुत करीबी तालमेल के साथ काम करते हैं, और इन्हें अलग-अलग इकाइयों में बांटने से इस तालमेल को नुकसान पहुंचने का खतरा है. कंसल्टेंट्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि सुधार HAL को मजबूत करें, न कि उसके कॉम्प्लेक्स और डिवीजनों को जोड़ने वाले सहयोग के ताने-बाने को कमजोर करें.
आगे की राह
HAL का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि पुनर्गठन से वास्तविक फुर्ती, तकनीक पर तेज फोकस और HR का पूरा सुधार होता है या नहीं. HAL के मार्केटिंग और कस्टमर सर्विसेज विभाग, जो लंबे समय से भारतीय सशस्त्र बलों जैसे तय ग्राहकों से ही जुड़े रहे हैं, उन्हें नए ग्राहकों को लाने और HAL उत्पादों की बार-बार कही जाने वाली निर्यात क्षमता को साकार करने के लिए क्रांतिकारी सोच अपनानी होगी. कंसल्टेंसी फर्म की सिफारिशों पर कड़ी नजर रखी जाएगी, क्योंकि भारत की रक्षा तैयारी इस बात पर निर्भर करती है कि HAL एक तकनीक आधारित एयरोस्पेस महाशक्ति के रूप में कैसे विकसित होता है. उम्मीद है कि यह अभ्यास 2012 की चतुर्वेदी समिति रिपोर्ट की कमियों से बचेगा, जिसने बहुत वादे किए थे लेकिन बहुत कम हासिल किया.
अंत में, दांव पर सिर्फ HAL का भविष्य नहीं है, बल्कि भारत की अपने आसमान को सुरक्षित रखने की क्षमता भी है. HAL की यात्रा को करीब से देखने के बाद मेरा मानना है कि कंपनी के पास सफल होने के लिए प्रतिभा, बुनियादी ढांचा और विरासत मौजूद है. लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पुनर्गठन को कितनी गंभीरता, पारदर्शिता और पुरानी प्रथाओं से बाहर निकलने की इच्छा के साथ आगे बढ़ाया जाता है. मैंने देखा है कि जब सुधार सिर्फ दिखावे के होते हैं तो वे कैसे असफल हो जाते हैं. अब मुझे उम्मीद है कि HAL इस चुनौती का सामना वास्तविक बदलाव के साथ करेगा.
गोपाल सुतार HAL के पूर्व प्रवक्ता और SABIC/ARAMCO के मीडिया एनालिस्ट हैं. विचार व्यक्तिगत हैं.
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