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Friday, 13 February, 2026
होममत-विमतभारत-अमेरिका ट्रेड डील एकदम बजट जैसी है. दोनों की तारीफ करने के लिए चापलूसों को मजबूर किया जाता है

भारत-अमेरिका ट्रेड डील एकदम बजट जैसी है. दोनों की तारीफ करने के लिए चापलूसों को मजबूर किया जाता है

नई दिल्ली ट्रंप से इतना डरती है कि वह रूसी तेल की खरीद रोकने के बारे में झूठ नहीं बोल सकती, लेकिन भारतीय नागरिकों के सामने यह बात मानने में भी उसे शर्म आती है, इसलिए मंत्री गोलमोल जवाब देते हैं.

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भारत-अमेरिका के नए व्यापार समझौते पर मैंने लाखों शब्द पढ़े हैं, लेकिन एक तुलना मुझे कहीं नहीं दिखी. यह समझौता और इसमें ताकत का संतुलन हमारे लिए नया नहीं है. भारत में हम पहले भी ऐसा देख चुके हैं.

असल में, यही हाल देश के अंदर सरकार और हमारे व्यापारी व उद्योगपतियों के बीच भी रहता है.

यह बात हमने हाल ही में केंद्रीय बजट पर आई प्रतिक्रियाओं में देखी. अब ये प्रतिक्रियाएं एक तरह की उबाऊ और तयशुदा बन चुकी हैं. हर साल वित्त मंत्री बजट पेश करते हैं. कभी बजट अच्छा होता है. कभी खराब होता है. कभी इससे भारतीय उद्योग को फायदा होता है. कभी नहीं होता.

लेकिन असली बात यह है कि अगर आप भारतीय उद्योगपतियों की प्रतिक्रियाएं सुनें, तो आपको कभी पता नहीं चलेगा कि बजट अच्छा था या खराब. इतना ही नहीं, आप यह भी नहीं समझ पाएंगे कि जिस उद्योगपति ने टिप्पणी की, उसे बजट से फायदा हुआ या नुकसान.

बजट में चाहे जो लिखा हो और उनके कारोबार पर उसका जैसा भी असर हो, उद्योग जगत के बड़े लोग कहेंगे कि यह अब तक का सबसे बेहतरीन बजट है. वित्त मंत्री को जीनियस बताएंगे. कहेंगे कि भारत आर्थिक महाशक्ति बनने वाला है. और जब उनसे पूछा जाएगा कि दस में से कितने अंक देंगे, तो वे दस में बारह अंक देंगे.

बजट के बाद टीवी पर दिखने वाला यह चापलूसों का समूह अब इतना मजाक बन चुका है कि पत्रकार सोचते हैं कि इन कार्यक्रमों को लाइव दिखाने की जरूरत ही क्या है. इन्हें एक-दो हफ्ते पहले रिकॉर्ड कर लिया जाए, क्योंकि बजट चाहे जो कहे, ज्यादातर उद्योगपति—जो अपने-अपने क्षेत्र में बड़े अरबपति हैं—फिर भी बॉलीवुड फिल्म के जूनियर कलाकारों की तरह उसी धुन पर नाचेंगे.

झुंझलाहट में मैंने कुछ व्यापारियों से पूछा कि उन्हें ऐसा क्यों करना पड़ता है. ऑफ द रिकॉर्ड वे लगभग एक जैसी बात कहते हैं. “हमारे पास कोई और रास्ता नहीं है. सरकार इतनी ताकतवर है कि हमें बजट की तारीफ करनी ही पड़ती है. जब बजट की बातें हमें नुकसान पहुंचाती हैं, तब भी हमें दिखाना पड़ता है कि हमें फायदा हुआ है. अगर हम शिकायत करें, तो सरकार हमें और ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी.”

वे कहते हैं कि राजनेता बहुत पतली चमड़ी वाले होते हैं और वे बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया दे सकते हैं. “जिसे आप ‘चमचागिरी’ कहते हैं, वह दरअसल हमारी बचाव की प्रवृत्ति है. हमें खराब डील भी मिली हैं, तब भी हमें दुनिया के सबसे खुश लोग होने का नाटक करना पड़ता है. यही ताकत के रिश्ते में असमानता है.”

इन सफाई देने वाले उद्योगपतियों के लिए मेरे मन में थोड़ी सहानुभूति है, भले ही ज्यादा सम्मान नहीं. उदारीकरण के बाद भी सरकार के पास बहुत ताकत है. अगर उसकी एजेंसियां आपके पीछे पड़ जाएं, तो आपका कारोबार खत्म हो सकता है. इसलिए दांव बड़ा है और विकल्प बहुत कम हैं.

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की सच्चाई

अब अमेरिका और भारत के बीच ताकत के रिश्ते को देखिए. यहां भी कई साफ समानताएं हैं. हमारे उद्योगपति राजनेताओं के दोस्त बनने का दिखावा कर सकते हैं, लेकिन रिश्ता हमेशा लेन-देन का होता है. राजनेताओं को व्यापारियों से कुछ चाहिए होता है. और अगर उन्हें वह नहीं मिलता, तो फोटो खिंचवाने या गले मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के साथ भी यही है. हर रिश्ता लेन-देन का है. अगर आप उन्हें वह नहीं देंगे जो वे चाहते हैं, तो वे आपको अपना सबसे अच्छा दोस्त कह सकते हैं, लेकिन आपको नजरअंदाज कर देंगे.

इस मामले में ट्रंप कम से कम तीन चीजें चाहते हैं.

पहला, वे दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि अमेरिका इतना ताकतवर है कि रूस की कमाई रोक सकता है. इसका मतलब है कि वे चाहते हैं कि कोई भी रूसी तेल न खरीदे. भारत यह कहे कि उसे अपनी संप्रभुता के तहत तय करने का अधिकार है कि वह किससे तेल खरीदेगा, इसमें ट्रंप की कोई दिलचस्पी नहीं है. सस्ता तेल भारत की अर्थव्यवस्था और गरीबों के लिए अच्छा है, इस तर्क की भी उन्हें परवाह नहीं है.

दूसरा, वे टैरिफ को हथियार भी मानते हैं और अपने आप में लक्ष्य भी. वे अमेरिका के बड़े बाजार तक पहुंच का इस्तेमाल उन देशों को इनाम या सजा देने के लिए करेंगे जो अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाते हैं या रोकते हैं. साथ ही वे टैरिफ से राजस्व कमाने में भी विश्वास रखते हैं. अमेरिका के भुगतान संतुलन, निर्यात और आयात को लेकर उनकी चिंता इतनी ज्यादा है कि वे दंडात्मक टैरिफ लगाने को तैयार हैं और साथ ही चाहते हैं कि दूसरे देश भारी मात्रा में अमेरिकी सामान खरीदें.

तीसरा, ट्रंप शेखी बघारने वाले हैं और जैसा कि वे खुद मानते हैं, बहुत संवेदनशील भी हैं. जब वे नोबेल शांति पुरस्कार के हकदार होने और भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध समेत सात युद्ध खत्म कराने जैसे बड़े दावे करते हैं, तो वे उम्मीद करते हैं कि दूसरे देश इन दावों को मानें और उनकी तारीफ करें.

पिछले कुछ महीनों में साफ हो गया था कि भारत-अमेरिका रिश्ते में ट्रंप इन तीनों मांगों पर समझौता नहीं करेंगे. ऐसे में नई दिल्ली के पास दो ही रास्ते थे. या तो ट्रंप को नजरअंदाज कर अपने रास्ते पर चले, या फिर उनकी बात मान ले.

आज की दुनिया में अमेरिका या ट्रंप को नजरअंदाज करना व्यावहारिक नहीं है. हमने इंतिजार किया और उम्मीद की कि शायद वे अपना रुख बदलें, लेकिन आखिर में हमें मानना पड़ा कि अगर हमें अमेरिका के साथ व्यापार करना है, तो वह ट्रंप की शर्तों पर ही होगा.

और फिर एक-एक कर भारत ने हर अमेरिकी मांग मान ली. हमने स्वीकार किया कि हम रूसी तेल नहीं खरीदेंगे. हमने आने वाले कुछ वर्षों में 5 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने पर सहमति दी. हमने अमेरिका को होने वाले अपने ज्यादातर निर्यात पर 18 प्रतिशत टैरिफ स्वीकार किया—यह उस बहुत ज्यादा दर से कम है जो तब चर्चा में थी जब तक हमने रूसी तेल खरीदना बंद नहीं किया था, लेकिन फिर भी उससे काफी ज्यादा है जो ट्रंप के पद संभालने से पहले हम दे रहे थे, जहां कई निर्यातों पर दर लगभग शून्य थी. भारत को कई अमेरिकी उत्पादों पर अपने शुल्क कम या खत्म करने को कहा गया है, और हमने इस पर भी सहमति दे दी है.

ट्रंप को जीतने देना

ट्रंप लगातार दावा करते हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाया. शुरुआत में नई दिल्ली ने कहा था कि युद्धविराम में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं थी, लेकिन अब ट्रंप को खुश रखने की उम्मीद में भारत ने उनके दावों को चुनौती देना बंद कर दिया है.

यह कहना आसान है कि हमारा अपमान हुआ है. लेकिन बार-बार यही बात दोहराने से कोई फायदा नहीं. यहां ताकत का समीकरण वही है जो बजट के समय हमारे उद्योगपतियों और वित्त मंत्री के बीच दिखता है—वही “हमारे पास और क्या विकल्प है?” वाली स्थिति.

और सच में, बजट के बाद जो चापलूसों का समूह दिखता है, वही फिर से नजर आने लगा है. भारत के व्यापार वार्ताकारों की कथित मोलभाव करने की क्षमता की तारीफ की जा रही है, जबकि उन्हें जो कठिन फैसले लेने पड़े हैं, उन्हें छिपाया जा रहा है.

हम ट्रंप से इतने डरे हुए हैं कि रूसी तेल खरीदना बंद करने के बारे में झूठ नहीं बोल सकते, लेकिन अपने लोगों से इसे स्वीकार करने में शर्माते हैं, इसलिए मंत्री सवाल पूछे जाने पर गोलमोल जवाब देते हैं. जिम्मेदारी टालना (“मुझे नहीं पता, आप फलां मंत्री से पूछिए”) आम बात हो गई है. अमेरिका ने जो छोटे-छोटे टैरिफ में रियायत दी है, उन्हें हमारे वार्ताकारों की बड़ी जीत बताया जा रहा है.

सरकार और उसके समर्थक ट्रंप की मांगें मानने के लिए जो लगभग हर बहाना दे रहे हैं, वह असल में गलत है. हां, शायद हमें रूसी तेल पर इतना निर्भर नहीं रहना चाहिए, लेकिन ट्रंप के दबाव से पहले हमें यह बात समझने से किसने रोका था? हां, भारत की टैरिफ व्यवस्था खत्म करना अच्छा विचार हो सकता है, लेकिन हमने यह कदम तब तक क्यों नहीं उठाया जब तक ट्रंप ने हमें मजबूर नहीं किया?

अब समय है कि हमारे नेता सच स्वीकार करें. हम ऐसे दुनिया में रहते हैं जिस पर अमेरिका का दबदबा है, और फिलहाल वहां एक ऐसे राष्ट्रपति का शासन है जो विश्व व्यवस्था के नियम बदलने पर आमादा है. वह धमकी और अनिश्चितता के माहौल में काम करते हैं, दूसरे देशों और संगठनों (जैसे नाटो) से बहुत बड़ी मांगें करते हैं. जब वे अपनी पूरी तरह अव्यवहारिक मांगों को घटाकर सिर्फ बेहद कठोर मांगों तक ले आते हैं (“ठीक है, हम ग्रीनलैंड पर कब्जा नहीं करेंगे, बस उसका नियंत्रण लेंगे”), तो दुनिया ऐसे प्रतिक्रिया देती है जैसे समझदारी जीत गई हो.

और भले ही कुछ संकेत हैं कि ट्रंप की घरेलू नीतियों की लोकप्रियता उनके मतदाताओं में घट रही है, लेकिन उनकी विदेश नीति के खिलाफ अमेरिका में कोई बड़ा विरोध नहीं है. इसलिए उन्हें रोकने वाला बहुत कम है.

हर देश को ट्रंप की विश्व व्यवस्था से निपटने में कठिनाई हुई है, यहां तक कि पश्चिम में अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों को भी. और वे और आगे दबाव बनाना बंद करने वाले नहीं हैं.

भारत इस दुनियाभर के रुझान से अलग नहीं हो सकता. हमें ट्रंप और उनकी सोच के साथ तालमेल बिठाना सीखना होगा. इसलिए यह स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं कि हमने उनकी ज्यादातर मांगें मान ली हैं. हमें लंबी रणनीति अपनानी होगी. ट्रंप के कार्यकाल में सिर्फ तीन साल बचे हैं, और यह संभावना कम है कि उनका कोई उत्तराधिकारी इतना कठोर होगा.

आइए अपने लोगों से ईमानदारी बरतें और मान लें कि हमारे पास सीमित विकल्प हैं और हम भारत-अमेरिका संबंधों को लंबे समय की साझेदारी को ध्यान में रखते हुए संतुलित रखने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

झूठ बोलने और गोलमोल जवाब देने से कुछ हासिल नहीं होगा. लोग हर बजट के बाद चापलूसों की परेड देख चुके हैं. और भारत-अमेरिका समझौते की कथित जीत के बारे में आप चाहे जितने झूठ बोल लें, लोग उन्हें भी समझ जाएंगे.

यही वह दुनिया है जिसमें हम रहते हैं. अब समय है इसे स्वीकार करने का और भारतीय जनता को बच्चों की तरह नहीं, बल्कि समझदार लोगों की तरह देखने का, जिन्हें झूठी जीत और काल्पनिक सफलता की कहानियों से बहलाया जाए. सच बोलना हमेशा अच्छा होता है.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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