Tuesday, 4 October, 2022
होममत-विमतअफगानिस्तान में अपने दूतावास का दर्जा बढ़ाकर भारत ने उठाया सकारात्मक कदम

अफगानिस्तान में अपने दूतावास का दर्जा बढ़ाकर भारत ने उठाया सकारात्मक कदम

लेकिन तालिबान द्वारा ताकत के अनावश्यक इस्तेमाल की कई कहानियां हैं, और ये उसे भारत का नया करीबी दोस्त बनने से रोकती हैं.

Text Size:

निज़ामों के उत्थान और पतन से न तो काबुल की खूबसूरती कम हुई, न शान. इस 15 अगस्त को अफगानिस्तान के पहले इस्लामिक अमीरात के निजाम ने अपनी पहली सालगिरह मनाई. भारत अपना 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. इस अवसर पर उसने काबुल में अपने ‘टेक्निकल मिशन’ के प्रमुख का दर्जा बढ़ाकर दिया है और अब वहां मध्य दर्जे के राजनयिक को तैनात करके अफगानिस्तान के नये निजाम की शान में और वृद्धि कर दी.

तालिबान के विदेश मंत्रालय के युवा, निपुण प्रवक्ता अब्दुल क़हर बलखी, जो लंदन के मध्यवर्गीय लोगों की ऑस्ट्रेलियाई-दक्षिण अफ्रीकी लहजे वाली जबान में बातें करते हैं, शनिवार को ट्वीट किया— ‘अफगानिस्तान का इस्लामिक अमीरात काबुल में अपने राजनयिक प्रतिनिधि का दर्जा बढ़ाए जाने के भारत के फैसले का स्वागत करता है. इसके अलावा, हम उसकी और राजनयिकों की सुरक्षा पर पूरा ध्यान देंगे और उसकी कोशिशों में मदद करेंगे.’

भारत के पूर्व राजदूत और उनका दल 15 अगस्त 2021 को काबुल से तब रातोरात बाहर निकल गया था जब तालिबान ने उस पर कब्जा किया था. इसके ठीक एक साल बाद भारतीय मिशन का दर्जा बढ़ाना एक अच्छा कदम तो है ही, कुछ समय से इसकी उम्मीद भी की जा रही थी.


यह भी पढ़ें: ‘तालिबान नहीं बदला है, अफगानी नागरिकों का प्रतिरोध बढ़ेगा’- अमेरिकी सुरक्षा पूर्व अधिकारी कर्टिस


जब भारत वापस आया

इस बार काबुल के अपने दौरे में मैंने पाया कि बहुत कुछ अब साफ हो गया है. दक्षिण एशिया के सबसे बड़े देश और एक महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय ताकाट होने के नाते भारत को बड़े खेल खेलने के अपने डर से छुटकारा पाने की जरूरत है. भारत चाहता है कि दूसरे देश उसे एक गंभीर खिलाड़ी मानें, जिसने अतीत में अफगानिस्तान में अपनी सबसे छोटी टीम के बूते बड़ी सत्ताओं को पीछे छोड़ कर उनसे बेहतर प्रदर्शन किया है.

अफगानिस्तान में शैतानी ताकत दशकों तक खुफियागीरी और खेल बिगाड़ने की चाल पर पारंपरिक रूप से ज़ोर देती रही लेकिन भारत ने इसकी बजाय वहां की जनता पर ध्यान केंद्रित किया और यही पिछले 20 वर्षों से उसकी विदेश नीति की सफलता का वजह रही है.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

भारत ने वहां के युवाओं पर निवेश करने पर ज़ोर दिया, उन्हें भारत में हजारों की संख्या में छात्रवृत्ति दी; विश्व खाद्य कार्यक्रम के जरिए वहां कुपोषण को खत्म करने के लिए गेहूं भेजता रहा है; जन्मजात हृदयरोग से पीड़ित 400-500 नवजात शिशुओं के इलाज पर हर साल खर्च करता रहा है. इन सबकी वजह से उसने अफगानियों का दिल-दिमाग जीता है.

इसलिए, पिछले साल जब तालिबान ने एक भी गोली चलाए बिना अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया और तब भारत ने बिना सोचे-विचारे भारत-अफगानिस्तान रिश्ते के बीच बड़ी दीवार खड़ी करके उसे जाने-अनजाने तरीके से चोट पहुंचाई. तमाम देशों ने पलायन करने वाले अफगानियों को शरण दी. इनमें अमेरिका (जिसके साथ अफगानियों के नरम-गरम रिश्ते रहे हैं), जर्मनी, कनाडा, तुर्की, ताजिकिस्तान तथा दूसरे मध्य-एशियाई देश तो शामिल थे ही; पाकिस्तान ने भी अपने दरवाजे खोल दिए जबकि उसकी अर्थव्यवस्था मरणासन्न है; ईरान ने पिछली सरकार के लोगों को शरण देने की पेशकश की और तालिबान से करीबी रिश्ता बनाए हुए है.

सिवा भारत के. पता नहीं उसे निर्देश कहां से मिले, लेकिन ऐसा लगता है कि ये भारतीय सत्तातंत्र के शिखर से मिले होंगे. किसी अफगान को भारत में आने की इजाजत नहीं है. पूर्ण विराम! नयी दिल्ली से जारी ‘फतवे’ ने रिश्ते को इतना खराब किया की अब जाकर धीरे-धीरे उसे ठीक किया जा रहा है.


यह भी पढ़ें: यूक्रेन से भारतीय छात्रों को निकालने का जिम्मा मोदी ने संभाला तो सुषमा स्वराज की कमी खलने लगी


रिश्ते में जमी बर्फ पिघलाने के आदेश

अंततः, एक साल बाद लगता है कि नयी दिल्ली ने रिश्ते में जमी बर्फ को पिघलाने की पहल की है. काबुल में राजनयिकों समेत तीन सदस्यीय दल को तैनात किया गया है, जिसमें वे अधिकारी शामिल हैं जिन्होंने पिछले साल अफगानिस्तान से भारतीयों को निकालने की कार्रवाई में भाग लिया था. इस दल में जल्दी ही कुछ और राजनयिक तथा दूसरे विशेषज्ञ शामिल किए जाएंगे, जो भारत-अफगानिस्तान संबंध को फिर से मजबूत बनाने के कदम उठाएंगे. इस पहल का अफगान समाज के कई तबके स्वागत कर रहे हैं, खासकर छात्र, जो अपने पढ़ाई नहीं पूरी कर पाए थे या अपना सर्टिफिकेट नहीं ले पाए थे. ऐसे तबकों में वे बीमार लोग भी हैं, जिनका इलाज इसलिए अधूरा रह गया था क्योंकि भारत ने अचानक दरवाजा बंद कर दिया था.

भारत ने तालिबान के खिलाफ पंजशीरियों की शुरुआती बगावत पर भी नज़र रखी थी, जिसे तालिबान ने बाद में दबा दिया. भारत को यह भी एहसास हुआ कि अपना वतन छोड़ने वाले कई अफगानी ऐसे भी थे जो ताकतवर तालिबान का सामना नहीं कर सकते, जिन्हें एक बना-बनाया मुल्क हाथ लग गया था. आज तालिबान काबुल की गलियों में अपने ऑटोमेटिक हथियार लेकर घूम रहे हैं. यह जमीनी हकीकत है. तालिबान फिलहाल तो गद्दी पर मजबूती से बैठे हैं और विपक्ष नाम की कोई चीज नहीं है जो एक गोली भी चला सके.

तालिबान अब वहां से हटने की हड़बड़ी में नहीं हैं. लगता है, इस एहसास ने भारत को उनकी ज़्यादतियों, खासकर औरतों-बच्चों के खिलाफ, के खिलाफ जबान खोलने से रोक दिया है और उसने नया कूटनीतिक रिश्ता बनाने की पहल की है. सो, आश्चर्य नहीं कि वह वहां अपने दूतावास का विस्तार कर रहा है.

यह बेहद जरूरी भी था.

बंदूक बनाम लोकतंत्र

भारत जैसे विशाल देश के लिए साझा जगह की कमी निश्चित ही बुरी बात है. स्थानीय जनता से मेलजोल बनाने में तालिबान के इनकार से हालात शायद ही बेहतर होने वाले हैं. जनता इस बात पर नज़र रखे हुए है कि यह सरकार प्रायश्चित करने से किस तरह इनकार कर रही है. पिछले सप्ताह कुछ महिलाएं जब सरकार से खाना और रोजगार की मांग करते हुए प्रदर्शन कर रही थीं तब तालिबान गार्डों ने हवा में गोलियां चलाकर उन्हें भगा दिया.

भारत उम्मीद कर रहा है कि काबुल में अपने मिशन का विस्तार करने पर उसे एक ऐसे देश के रूप में देखा जाएगा जिसने अपना वादा निभाया. शायद भारत तालिबान की कुछ ज़्यादतियों पर अंकुश लगाने, और खासकर महिलाओं को उनकी आज़ादी वापस दिलाने में मदद कर सकता है. इसके अलावा, इस क्षेत्र में बाकी खिलाड़ी जबकि गैर-दोस्ताना कार्रवाइयां कर सकते हैं, तब वहां भारत की मौजूदगी उन पर कुछ अंकुश भी लगा सकती है.

लेकिन यह हकीकत भी कायम है कि तालिबान को भारत की जरूरत महसूस होती है. वे चाहते हैं कि पुरानी अधूरी योजनाओं पूरी हों और नयी शुरू की जाएं. वे चाहते हैं कि दक्षिण एशिया के सबसे बड़े देश के साथ उसका व्यापार फिर से शुरू हो. तालिबान को ‘इस्लामिक स्टेट’ के आतंकवादियों खतरा महसूस हो रहा है, वे अपने खतरे कम करना चाहते हैं.

यह दांव काम कर सकता है. लेकिन फिलहाल यह कठिन काम दिखता है. भारत जैसे लोकतांत्रिक ऐसे आंदोलनों को पूरी तरह कबूल नहीं कर सकते और न उनके साथ पूरा सहयोग कर सकते हैं जिन्होंने समतामूलक व्यवस्था को नहीं अपनाया है. तालिबान द्वारा ताकत के अनावश्यक इस्तेमाल की कई कहानियां हैं, और ये उसे भारत का नया करीबी दोस्त बनने से रोकती हैं.

इस बीच, तालिबान और भारत 15 अगस्त की ऐतिहासिक तारीख के कारण आपस में जुड़े हुए हैं. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और एक इस्लामिक अमीरात, जहां सत्ता बंदूक की नली से निकलती है, के बीच कम-से-कम एक चीज तो साझा है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

लेखक एक कंसल्टेंट एडीटर हैं. वह @jomalhotra ट्वीट करती हैं. यहां विचार निजी हैं.


यह भी पढ़ें: पाकिस्तान क्या इजराइल को नजरअंदाज कर सकता है? कुछ बदल रहा है-सऊदी रिश्ते, अब्राहम करार, मौके पर 1 पत्रकार


 

share & View comments