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Saturday, 21 February, 2026
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भारत 1971 को ही याद न करता रहे, बांग्लादेश से लेन-देन वाला रिश्ता बनाने की सोचें

बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था कुछ समय के लिए औपचारिक धर्मनिरपेक्षता के दौर में रहने के बाद बंटवारे के पहले वाली हकीकत के दौर की ओर लौट रही है. भारत को इसे समझते हुए रिश्ते तय करने चाहिए.

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बांग्लादेश के एक लेखक ने वहां चुनाव के बाद एक विश्लेषण में इस बात को रेखांकित किया है कि उनके देश में क्या कुछ हो रहा है, और भारत को नई वास्तविकताओं के मद्देनजर किस तरह सजग हो जाना चाहिए. जहांगीरनगर विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग के प्रोफेसर और ‘बांग्लादेश सेंटर फॉर इंडो-पैसिफिक अफेयर्स’ के कार्यकारी निदेशक शहाब इनाम खान का जो लेख ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित हुआ है वह भारत-बांग्लादेश संबंधों को आगे बढ़ाने के मसले का बेबाक विश्लेषण है. भारत को इस पर जरूर ध्यान देना चाहिए.

1971 में जो कुछ हुआ था उसे भारतीय विदेश नीति गुलाबी शीशे वाले चश्मे से देखती रही है, लेकिन नया (मसलन, 2024 के बाद का) बांग्लादेश उससे आगे बढ़ना चाहता है और अपने स्वतंत्रता संग्राम में भारत की भूमिका को अधिक महत्व नहीं देना चाहता. खान ने साफ संदेश दिया है: “साझा इतिहास को भूल जाइए. वह बीत चुका है”. वे चाहते हैं कि यह संबंध लेन-देन वाला हो और दोनों देश बराबर के पार्टनर हों.

सबसे पहले, भारत के विदेश नीति बनाने वालों को यह मानना ​​होगा कि बांग्लादेशी अपने इतिहास को कैसे देखना चाहते हैं, यह उनका मामला है. हमारी सेना ने उन्हें पश्चिम पाकिस्तान से आज़ाद होने में मदद दी, लेकिन यह हमारा सच है. अगर वे इनकार के मुद्रा में हैं, अगर वे शेख मुजीबुर्रहमान और उनकी पार्टी अवामी लीग के तमाम यादों को मिटा देना चाहते हैं तो यही सही. यह पार्टी हाल में उनकी बेटी शेख हसीना के नेतृत्व में थी, जिन्हें 2024 में छात्र आंदोलन ने सत्ता से बाहर कर दिया तो यह उनका मामला है, हालांकि हमें शेख हसीना को बांग्लादेश के इस्लामवादी भेड़ियों के हवाले नहीं कर देना चाहिए. उन्होंने अपने मुल्क में भारत विरोधी तत्वों को काबू में रखने में मदद दी थी और यह हमारे उत्तर-पूर्वी भाग को स्थिरता प्रदान करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ.

हम इस हकीकत की भी अनदेखी नहीं कर सकते कि आज बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व दो पार्टियां करती हैं—एक है चुनाव में विजयी हुई बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) और दूसरी है नई ताकत हासिल करने वाली जमात-ए-इस्लामी. ये दोनों पार्टियां इस्लामवादी हैं और भारत विरोधी तेवर दिखाती रहती हैं. इसलिए लेखक के विचारों को, जिनमें भारत विरोधी रुझान साफ नजर आता है, इस नजरिए का ही प्रतिनिधित्व करने वाला माना जा सकता है. वे यों ही यह चेतावनी नहीं देते कि वे भारत के साथ लेन-देन वाला संबंध चाहते हैं और यह साफ कहते हैं कि “चाहे कोई भी सरकार हो, चीन आर्थिक गारंटी देने वाला बना हुआ है; और अमेरिका, तुर्की, और पाकिस्तान रक्षा के क्षेत्र में विविधता के समाधान प्रस्तुत करेंगे”. बांग्लादेश किसे अपने पार्टनर के रूप में देखता है और किसे (भारत को) संभावित खतरे के रूप में देखता है, इसे इससे ज्यादा साफ तरीके से वे नहीं कह सकते थे.

हम नया इतिहास बना तो सकते हैं लेकिन इतिहास को पूरी तरह भुला नहीं सकते. यह बात खासकर भारतीयों के लिए है, जो किसी वजह से यह मानते हैं कि बांग्लादेश हिंदू विरोधी, भारत विरोधी पाकिस्तान से अलग मुल्क है. वास्तव में, भारत में जो लोग यह यकीन करना चाहते हैं कि शेख मुजीब किसी तरह एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे, उन्हें इस संभावना को भी अहमियत देनी होगी कि 1946 में जिन्ना के आह्वान पर 16 अगस्त को ‘सीधी कार्रवाई’ के तहत कलकत्ता में जो भारी जनसंहार किया गया था उसके पीछे वे भी एक खामोश ताकत हो सकते थे. उस समय बंगाल के वजीरे आजम हुसेन सुहरावर्दी थे और बताया जाता है कि जनसंहार के पहले हमले में उन्होंने सभी निष्पक्ष पुलिस अधिकारियों का तबादला कर दिया था ताकि मुसलमानों की भीड़ हिंदुओं को निशाना बना सके. उसके बाद दोनों तरफ से सांप्रदायिक कत्ले-आम हुआ. उस समय मुजीब मुस्लिम लीग के छात्र नेता थे और मुस्लिम बंगाल को अविभाजित भारत से अलग करने के पक्ष में थे, और पूर्वी पाकिस्तान के लिए ज्यादा से ज्यादा बड़ा इलाका भी हासिल करना चाहते थे.

मुजीब ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वे पाकिस्तान बनाने के पक्ष में थे, और बंटवारे के दौरान उनका मानना था कि करीमगंज और कछार को बांग्लादेश में शामिल किया जाना चाहिए था. वे यह भी मानते थे कि असम को भी बंटवारे के बाद बने पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहिए था, क्योंकि असम के पास खनिज और वे दूसरे संसाधन थे जिनकी एक नए मुल्क को आर्थिक रूप से मजबूत बनने के लिए जरूरत होगी. सवाल यह है कि यह अंतरिम यूनुस प्रशासन के प्रवक्ताओं द्वारा ऐसे नक्शे जारी किए जाने से भिन्न कैसे है, जिनमें भारत के पूरे उत्तर-पूर्वी क्षेत्र को भावी ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ का हिस्सा बताया गया है?

हमने मुजीब और उनकी बेटी को ‘सेकुलर’ मान लिया यह हमारी समस्या है, किसी बांग्लादेशी की नहीं. दीप हालदार और अविषेक बिस्वास की किताब ‘बीइंग हिंदू इन बांग्लादेश: द अनटोल्ड स्टोरी’ में बताया गया है कि कुछ अवामी लीगी लोग हिंदुओं को निशाना बनाने में जमात-ए-इस्लामी या बीएनपी से कम नहीं थे. अब तारीक रहमान के नेतृत्व में भारी जनादेश के साथ सत्ता में आई बीएनपी को भारत के प्रति अतिवादी नजरिया रखने की जरूरत नहीं है लेकिन जमात की ओर से उस पर बार-बार दबाव डाला जाएगा कि वह अपनी भारत विरोधी पहचान का प्रमाण देती रहे.

लेकिन ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में छपे लेख के लेखक शहाब इनाम खान ने यह झूठा विचार स्थापित करने की कोशिश की है कि भारत और बांग्लादेश की सुरक्षा संबंधी चिंताएं समान हैं, कि खासकर दोनों देशों में बसे अल्पसंख्यकों की नियति समान है. अपने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र से एक संकरी भौगोलिक पट्टी, ‘चिकेन्स नेक’ से जुड़े भारत की चिंताएं बांग्लादेश के मुक़ाबले ज्यादा बड़ी हैं. खान ने अपने इस लेख में तीन ऐसे वक्तव्य दिए हैं जो काबिल-ए-गौर हैं.

उग्रवाद को लेकर भारत की चिंताओं को कबूल करते हुए उन्होंने लिखा है: “उग्रवाद बांग्लादेश के लिए भी एक बुरा सपना है. लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की खातिर अल्पसंख्यकों पर जो अत्याचार किए जाते हैं वे पड़ोसी देश की नजरों से ओझल नहीं रहते”. यह पाकिस्तान के इस दावे से भिन्न नहीं है कि वह आतंकवाद का बड़ा भुक्तभोगी है, हालांकि उसका सरकार प्रायोजित आतंकवाद मुख्यतः भारत को निशाना बनाता है. यह उस आतंकवादी मानसिकता की देन है जिसकी गिरफ्त में आज पाकिस्तान फंसा है. बांग्लादेश.का हिंदू विरोधी उग्रवाद 1971 से पहले के पूर्वी पाकिस्तान वाले अवतार में भी प्रकट होता था और मुजीब के बाद के दौर में एक इस्लामी गणतंत्र वाले अवतार में भी जाहिर रहा है. उसका संविधान तो औपचारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है मगर समाज धर्मनिरपेक्ष नहीं है.

सीमा के दोनों ओर अल्पसंख्यकों के साथ जो कुछ हो रहा है उसकी तुलना करके दोनों देशों के बीच झूठी समानता दिखाने की जो कोशिश खान ने की है वह जाहिर तौर पर एक धोखा है. हमें इस बात से इनकार करने की जरूरत नहीं है कि भारत में समाज विरोधी हिंदुवादी तत्व मुसलमानों की ‘लिंचिंग’ करते रहे हैं या उन पर हमले करते रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं को जिस तरह निशाना बनाया जाता है वह बिलकुल अलग किस्म का है. भारत में कुछ मुसलमानों पर हमले की इक्का-दुक्का घटनाएं होती रही हैं, लेकिन बांग्लादेश में तो हिंदुओं को व्यवस्थित तरीके से निशाना बनाया जाता है. दोनों को एक जैसा नहीं कहा जा सकता. जिस देश में हिंदुओं की आबादी बंटवारे के समय 31 फीसदी से 1951 में घटकर 22 फीसदी और अब 8 फीसदी से भी कम हो गई हो वह यह दावा नहीं कर सकता कि वहां हिंदू अल्पसंख्यकों को दबाने की और उनके खिलाफ हिंसा की मुहिम लगातार नहीं चलती रही है. भारत में मुसलमानों को निशाना बनाया जाता रहा है लेकिन उनकी आबादी आज़ादी के समय 9 फीसदी से आज बढ़कर 14.5 फीसदी हो गई है.

ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अबुल बरकत ने अपनी किताब ‘पोलिटिकल इकोनॉमी ऑफ रिफॉर्मिंग एग्रीकल्चर-लैंड-वाटर बॉडीज़ इन बांग्लादेश’ में दर्ज किया है कि हिंदुओं को किस तरह व्यवस्थित तरीके से निशाना बनाया गया है. उन्होंने लिखा है कि हिंदुओं की संपत्तियों को दुश्मन की संपत्ति मान कर निशाना बनाया गया और इस तरह उनकी आर्थिक ताकत को खत्म किया गया. इसलिए, आश्चर्य नहीं कि रोजाना औसतन 632 हिंदू बांग्लादेश छोड़कर जाते रहे हैं. यह आंकड़ा उन्होंने 2016 में अपनी किताब पर चर्चा के दौरान दिया था. इसमें कोई कमी नहीं आई, चाहे अवामी लीग का राज रहा हो या किसी और का. बरकत कहते हैं कि यही हाल रहा तो 30 वर्ष बाद बांग्लादेश में कोई हिंदू नहीं दिखेगा.

शहाब एनम खान कहते हैं कि भारत में बांग्लादेश विरोधी तेवरों के कारण बीएनपी और जमात, दोनों को फायदा ही हुआ होगा. जमात अब वहां नया विपक्ष है, जिसे बड़ी जीत हासिल हुई है, लेकिन खान का यह कहना अतिशयोक्ति ही है कि “अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों का हौआ” वास्तविकता नहीं है.

बांग्लादेश को यह खिझाता होगा, लेकिन क्या यह वाकई झूठी कहानी है? अत्याचार से बचने के लिए पलायन करने वाले हिंदू हों या आर्थिक कारणों से भारत आने वाले मुसलमान हों, दोनों अवैध प्रवासी हैं. लेकिन अत्याचार से बचने के लिए पलायन करने वालों के साथ हम वैसा व्यवहार नहीं कर सकते जैसा दूसरों के साथ करते हैं. अगर बांग्लादेश यह मानता है कि उसके कम ही लोगों ने अवैध रूप से सीमा पार किया है, तो हम आपस में मिलकर इस मसले का दोनों को मान्य समाधान कर सकते हैं. ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती कि बांग्लादेश के नागरिकों/मतदाताओं की सूची साझा करके यह जांच की जाए कि जिन लोगों ने सीमा पार किया है वे उनके नागरिक या उनके रिश्तेदार हैं या नहीं? भारत अवैध प्रवासियों को विशेष रोजगार वीसा देकर यहां रहने देने को राजी हो सकता है बशर्ते वे यह मान लें कि वे बांग्लादेश के नागरिक हैं, और ये सारे तथ्य बाकायदा दर्ज किए जाएं.

प्रोफेसर विधु शेखर और प्रोफेसर मिलन कुमार के एक अध्ययन का अनुमान है कि पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या उसकी आबादी के आंकड़े से करीब 1.04 करोड़ ज्यादा है. इसलिए, भारत के नेताओं पर यह जायज आरोप लगाया जा सकता है कि वे ज्यादा वोट पाने के लिए अवैध प्रवासियों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अवैध प्रवास की समस्या काफी गंभीर है.

खान ने इस बात पर सही ज़ोर दिया है कि “दो पड़ोसी देशों के बीच का रिश्ता कैसा हो यह सिर्फ बांग्लादेश की ज़िम्मेदारी नहीं है”, लेकिन यह कोई कह भी नहीं रहा है. सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश का कोई नेता यह मानने को तैयार है कि निष्पक्ष समाधान के लिए राजी होने का मतलब यह नहीं है कि भारत के आगे घुटने टेक दिए गए हैं? जिस तरह बांग्लादेश विरोधी तेवर भारत में कुछ वोट दिला सकते हैं (दरअसल, वोटों का यह उलट-पलट दोनों दिशाओं में हो सकता है और यह इस पर निर्भर होगा कि मामला किस धार्मिक समुदाय से जुड़ा है) लेकिन यह बांग्लादेश के मामले में ज्यादा लागू होता है, जहां अब कोई सेकुलर पार्टी नहीं बची है. इस बार जो हिंदू उम्मीदवार जीते हैं वे बीएनपी या जमात के टिकट पर ही जीते हैं.

भारत को अपनी शर्तों पर बराबर के साझीदार के रूप में बांग्लादेश के साथ रिश्ते तय करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. लेकिन इस उपमहादेश के इतिहास की अनदेखी नहीं की जा सकती. बंटवारे का अधूरा रह गया काम यह रह गया कि अलग हुए हिस्सों ने या तो मजहबी मुसलमान बनना तय कर लिया या एक समुदाय के वर्चस्व की ओर झुकी हुई आबादी बनना तय कर लिया. भविष्य में बांग्लादेश के साथ वार्ता करते हुए इस हकीकत की अनदेखी नहीं की सकती.
बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था कुछ समय के लिए औपचारिक धर्मनिरपेक्षता के दौर में रहने के बाद बंटवारे के पहले वाली हकीकत के दौर की ओर लौट रही है. भारत को इसे समझते हुए रिश्ते तय करने चाहिए. उसे अपनी आंखों पर किसी और रंग का चश्मा नहीं लगाना होगा, कोई ‘अमन की आशा’ नहीं. सिर्फ व्यावहारिकता वाला रिश्ता, जिसमें दोनों पक्ष कुछ देकर बदले में कुछ हासिल करे.

आर. जगन्नाथन, स्वराज्य मैगज़ीन के पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. वह @TheJaggi हैंडल से ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार  निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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