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Friday, 29 May, 2026
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भारत को तेल संकट के झटकों से उबरने के उपाय करने ही होंगे

अमेरिका-ईरान युद्धविराम से तेल, गैस आदि की कीमतों में कमी आ सकती है लेकिन तेल की कीमतों के झटकों से सामना का भारत का इतिहास बताता है कि नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज कदम बढ़ाना बहुत जरूरी है.

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भारत समेत पूरी दुनिया ने यह घोषणा सुनकर राहत की सांस ली होगी कि अमेरिका और ईरान एक प्रारंभिक समझौते के करीब पहुंच चुके हैं. उम्मीद की जाती है कि इस घोषणा के बाद युद्धविराम जारी रहेगा और होर्मुज जलमार्ग जहाजों की आवाजाही के लिए खोल दिया जाएगा. यह लेख लिखने तक, समझौते का कोई ब्योरा उपलब्ध नहीं है, और यह निश्चित नहीं है कि अंतिम समझौते या समझौतों तक पहुंचने से पहले और बाधाएं नहीं आएंगी, क्योंकि प्रारंभिक समझौते के बाद और भी समझौते करने पड़ेंगे, जिनमें कठिन शर्तें जुड़ी होंगी. इसलिए तनाव में कमी का मामला शायद उन लोगों के साथ भी जुड़ा होगा, जो अपनी सांसें रोके हुए हैं.

रविवार को हुई घोषणा से तेल, गैस, और यूरिया जैसी अहम जिंसों की कीमतों में कमी आएगी. लेकिन वास्तव में कोई समझौता हो भी जाता है तब भी युद्ध से पहले वाली सामान्य स्थिति बहाल होने में महीनों लग जाएंगे. फिर भी, वैश्विक अर्थव्यवस्था में जिस तेज आर्थिक मंदी की आशंका पिछले सप्ताह मजबूत होती दिख रही थी उससे बचाव हो सकता है. खाड़ी क्षेत्र में उत्पादित होने वाले तेल, गैस और यूरिया तथा दूसरी जिंसों के आयात पर भारी रूप से निर्भर भारत खास तौर से राहत की सांस लेगा.

तेल की कीमतों के झटकों से जुड़े संकट से सामना का भारत का इतिहास पुराना रहा है. उस इतिहास को दोहराने से बचने के लिए उनका संक्षिप्त जायजा लेना जरूरी है. अब तक, जब भी तेल की कीमतें बढ़ी हैं, तब-तब आर्थिक संकट पैदा हुआ है और यह राजनीतिक बदलाव लाया है. ऐसा 1973 में, तेल के कारण लगे पहले झटके में ही हो गया था, जब तेल की कीमत में रातोरात चगुना, 3 डॉलर प्रति बैरेल से 12 डॉलर प्रति बैरेल की वृद्धि हो गई थी; मुद्रास्फीति 30 फीसदी के शिखर पर पहुंच गई थी और विपक्ष ने इंदिरा गांधी को बचाव की मुद्रा अपनाने पर मजबूर कर दिया था. उस घटनाक्रम ने भारत को तानाशाही ‘इमर्जेंसी’ हुकूमत को झेलने का अनुभव करा दिया था.

तेल ने दूसरा झटका 1979 में दिया, जब उसकी कीमत दोगुनी बढ़कर 23.50 डॉलर प्रति बैरेल हो गई थी, और तत्काल खरीद वाले बाजार में यह 40 डॉलर प्रति बैरेल पर पहुंच गई थी. सदमे से ग्रस्त भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार में 5 फीसदी की सिकुड़न आ गई. सरकार गिर गई, इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में आ गईं. तेल ने तीसरा झटका 1990 में दिया, जब सद्दाम हुसेन ने कुवैत पर हमला कर दिया था. तीसरा झटका हल्का था और केवल छह महीने रहा. फिर भी, इसने विदेशी मुद्रा का संकट पैदा कर दिया. इसका असर सकारात्मक रहा : नयी सरकार (आपका अनुमान सही है) ने व्यापक आर्थिक सुधार लागू किए.

2012 में लगे झटके ने तेल की कीमत को 125 डॉलर प्रति बैरेल पर पहुंचा दिया और यह 2014 तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रही. इसके कारण चालू खाता घाटा तेजी से बढ़ा और रुपया ‘पांच कमजोर मुद्राओं’ में शामिल हो गया. इसने पहले से ही परेशान मनमोहन सिंह सरकार को लगभग डुबा ही दिया, और (दूसरी वजह के मेल ने भी) नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता में बैठा दिया. उनकी सरकार ने अच्छी किस्मत के साथ शुरुआत की. 2015 तक तेल की कीमत आधी घटकर 50 डॉलर पर आ गई और 2016 में और घटकर 44 डॉलर प्रति बैरेल हो गई. इसने दो साल के अंदर ही आर्थिक वृद्धि की रफ्तार 8 फीसदी से ऊपर पहुंचा दी. तेल के झटकों से जुड़ी इस भारतीय कमजोरी के इतिहास ने अमेरिका-ईरान युद्ध को लेकर भारतीय उपभोक्ताओं और नीति निर्माताओं में केवल तेल की कीमतों (50 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि) को लेकर ही नहीं बल्कि गैस और यूरिया की सप्लाइ को लेकर भी चिंता की लहर दौड़ा दी. गहरी चिंता ऊंची मुद्रास्फीति, कमतर आर्थिक वृद्धि, ऊंचे चालू खाता घाटे और बड़े वित्तीय घाटे की आशंकाओं को लेकर है. ये चारों घुड़सवार फिर से करीब आते दिख सकते हैं लेकिन वैसा संकट नहीं आएगा जिसका कुछ लोगों को डर है.

संकट से छुटकारा उन उपायों के बारे में सोचने की प्रेरणा दे सकता है, जो अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने के लिए जरूरी हैं. पिछले उपायों का ज़ोर तेल और गैस के घरेलू स्रोत ढूंढने पर रहा है, जिनके मामूली नतीजे मिले हैं; तेल के लिए आयात पर निर्भरता 90 फीसदी है और गैस के लिए 50 फीसदी. अब, हमारे इतिहास में पहली बार, सौर एवं पवन ऊर्जा वैकल्पिक समाधान हैं— न केवल इसलिए कि उनकी उत्पादन क्षमता विशाल है बल्कि इसलिए भी कि वे कोयला आधारित नए बिजली संयंत्रों के मुक़ाबले ज्यादा सस्ते हैं, वास्तव में, सौर ऊर्जा काफी प्रतिस्पर्द्धी है, बावजूद इसके कि उनकी स्टोरेज लागत बड़ी है. यह ‘बैक-अप’ बिजली की जरूरत को कम करती है.

नवीकरणीय ऊर्ज के उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई है और यह अब लगभग 25 फीसदी बिजली का उत्पादन कर रही है. महत्वाकांक्षी लक्ष्य इस हिस्सेदारी को वर्ष 2030 तक बढ़ाकर 50 फीसदी करने का है. यह भी मध्यावधि का लक्ष्य होना होना चाहिए, क्योंकि गैर-फॉसिल आधारित बिजली के उत्पादन की क्षमता और बढ़ सकती है.

व्यापक अर्थों में देखें तो भारत को बिजली-देश बनने का लक्ष्य रखना चाहिए. रेलवे ने अपनी सभी लाइनों का विद्युतीकरण कर दिया है. लेकिन सड़क परिवहन के विद्युतीकरण (हालांकि पेट्रोल-डीज़ल की तुलना में सस्ता है) में दूसरे देशों के मुक़ाबले धीमी प्रगति हुई है. बिजली वाले वाहनों के लिए काफी कम चार्जिंग स्टेशन लगाए गए हैं. घरेलू रसोई भी बिजली से चलनी चाहिए ताकि गैस आधारित रसोई की मांग कम हो. फिलहाल कई औद्योगिक प्रक्रियाएं हाइड्रोकार्बन पर निर्भर हैं, उन्हें भी बिजली पर चलना चाहिए, जैसा चीन में बड़े पैमाने पर चलता है. तेल और गैस की मांग कभी कम नहीं होगी लेकिन उन पर निर्भरता इतनी कम की जा सकती है कि अर्थव्यवस्था पश्चिम एशियाई झटकों को झेल ले.

सरकार ने कोयला पर फिर से ज़ोर देना शुरू किया है लेकिन इसके मुक़ाबले उपरोक्त अभियान में काही ज्यादा संभावनाएं हैं और यह ज्यादा सफल हो सकता है. उदाहरण के लिए, कोयला आधारित खाद कारखानों का प्रयोग किया जा चुका है लेकिन वे सफल नहीं हुए और उन्हें बंद करना पड़ा. कोयले से गैस हासिल करने पर भी नीतिगत ज़ोर दिया गया. लेकिन इसके लिए विशाल मात्र में पानी चाहिए, जबकि देश पहले ही जल को लेकर दबाव का सामना कर रहा है.

नवीकरणीय ऊर्जा के लिए अभियान भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर अहम असर डालेगा. सामान के व्यापार में भारत का बड़ा और बढ़ता घाटा (2025-26 में यह जीडीपी के 8 प्रतिशत के बराबर था यानी काफी ऊंचे स्तर पर था) सेवा के व्यापार में बढ़त (जीडीपी के 5 प्रतिशत के बराबर) से काफी कुछ पूरा हो रहा था. जीडीपी के 3 प्रतिशत के बराबर का व्यापार घाटा लगभग तेल और गैस की वजह से है, जो तब लगभग गायब हो जाएगा जब उनके आयात में भारी कटौती की जाएगी.

तब भारत पूंजी की आवक पर कम निर्भर हो जाएगा, जो कि अब तक भरोसेमंद प्रक्रिया रही है और जिसने पिछले एक दशक में विदेशी मुद्रा भंडार को दोगुना बड़ा बनाने में मदद की है, जो 730 अरब डॉलर के शिखर तक पहुंच चुका था. लेकिन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने, जो कभी भारतीय शेयर बाजार को लेकर काफी उत्साहित थे, उसमें से पिछले 18 महीनों में 45 अरब डॉलर निकाल लिये, जबकि कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में नाटकीय कमी आई है. रुपया इससे बाह्य कमजोरी को प्रतिबिंबित कर रहा है, जबकि रिजर्व बैंक का विदेशी मुद्रा भंडार 40 अरब डॉलर कम होकर 688 अरब डॉलर का हो गया है. भारतीय मुद्रा की कमजोरी ने भी भारत के प्रति विदेशी निवेशकों के आकर्षण को कम किया है. भारत को उनके लिए और ज्यादा आकर्षक बनाने की जरूरत है. भारत की अर्थव्यवस्था हाइड्रोकार्बन से जितनी मुक्त होगी, उतनी तेजी से वह अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाएगा.

टीएन नायनन ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के पूर्व संपादक हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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